11वी सदी का राष्ट्रवाद

इतिहास का लेखा जोखा जो अखबारों और सोशल मीडिया में चलता है, उसमें ये अक्सर पढ़ने में आता है कि 11वी सदी भारत में बाहरी आक्रमणकारियों के प्रवेश की सदी थी। चर्चा उसी पर है। बाहरी कौन और कैसे? राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद

इतिहास ये भी पुख्ता करता है 11वी सदी वीरो की सदी थी। दिल्ली के शासक पृथ्वीराज, महोबा के पराक्रमी सामन्त बन्धु आल्हा-ऊदल, मलखान, कन्नौज के जयचन्द और उनके पुत्र लाखन इत्यादि इत्यादि 11 वी सदी में जन्मे।

तत्कालीन संस्कृति  बेवजह लड़ाइयों के तमाम खाके खींचती है। ये भी कहती है लड़ाई स्वाभाविक कम पैदा की हुयी ज्यादा होती थी।महोबा के वीर आल्हा-ऊदल,मलखान ने 52 लड़ाईयाँ लड़ी, आधी से अधिक लड़ाईयाँ तत्कालीन विवाह पद्धतियों के कारण हुयी, जहाँ टीके से लेकर गौने तक खून बहता था। बाकी की अधिकतर लड़ाईयाँ अपने-अपने अहम् को तुष्ट करने की लड़ाईयाँ थी। जिन्हें इतिहासकार साम्राज्य विस्तार की लड़ाई भी कहते है।

11वी सदी के उत्तरार्द्ध में दिल्ली और महोबा के बीच जो युद्ध हुये उसने विदेशी आक्रमण कारियों के लिये द्वार खोले। इन युद्धों में मुख्यतया भुजरियों की लड़ाई जिसमें आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज को हराकर महोबा को बचाया और बैरागढ़ की निर्णायक लड़ाई जहाँ ऊदल मारे गये और पृथ्वीराज की सेना लगभग तबाह हो गयी।

ये जाहिर है की राजा अपनी रक्षा, अपने अहम् की रक्षा, अपने राज्य विस्तार जी लडाईयां लड़ते रहे, वहाँ राष्ट्रवाद नहीं दूर तक नहीं राज्यवाद, अहमवाद था। राष्ट्रवाद एक राज्य की सीमा से दूसरे राज्य की सीमा पर जाकर दम तोड़ता हुआ दीखता है। हर राज्य की सीमा खत्म होते ही जो भी दूसरा राज्य था वो बाहरी था। कुल मिलाकर 11वी सदी में राष्ट्रवाद था ही नहीं, केवल राज्यवाद था, घना राज्यवाद था।रियासते थी और सियासतें थी।

चुपके-चुपके रो रहा रसखान देखो...

हाँसिये पर आ गया इंसान देखो
चुपके-चुपके रो रहा रसखान देखो

चर्चा में है प्रेम कृष्ण और मीरा का
दे रहे है लोग कैसे-कैसे नाम देखो

कबिरा मिट गया प्रेम का संदेश देते
नफरतों का हो रहा गुणगान देखो

दुनिया भर का है उपद्रव जिंदगी में
है शान्त कितना लेटा,शमसान देखो 

है प्रेम-कबूतर थाने में...

बरपा कहर ज़माने में
है प्रेम-कबूतर थाने में

लईका बिटिया इश्क़ लड़ाये
लगे माई बाप लगा कमाने में

इश्क का बाजार लुट गया
था अरसा लगा पटाने में

बन मुर्गा मशहूर हो गया
शहर भरे दीवानों में

बैठ पार्क, फरहाद बना
वही लगा रिरियाने में

प्रेम पपीहा मुँह बायें था
छलकी मदिरा पैमाने से

यादव जी सस्पेंड हो गये
बस अपनी बात बताने में

भैया भाभी दोवु नप गये
मुर्ग मुसल्लम खाने में

एन्टी रोमियो वर्सेज एन्टी ठर्की

रोमियो, यूँ तो सेक्सपियर के उपन्यास का नायक था, पर भारत में है "एक तरफ़ा प्रेम कबूतर" भी कहते है। खैर अब तो थप्पड़ थेरेपी चल रही है ससुरऊ की थाने में, पुलिस और में बाप दोनों ने गत करी।

एन्टी ठर्की ऑपरेशन कब चलेगा भैया? संसद से जुम्मा-जुम्मा 2 किलोमीटर की दूरी पर ठरक पन शबाब पर है?कानूनी शब्दो में एंटी जिस्मफरोसी ऑपरेशन भी कह लीजिये। GB रोड वाला ठरकपना!!! ऑपरेशन कब शुरू होगा? माना कि उनका वोट बैंक ज्यादा नहीं पर है तो भारतीय नारी ही, चलो कुछ तौ करो, सनी लियॉन टाइप पुनर्ववासित भी।

ये कैसी शर्माने लगी सैफई देखो ....

नेता वोट लेकर चला गया भाई
वोटर खड़ा झुनझुना हिलाता है ।

ये कैसी शर्माने लगी सैफई देखो
जैसे कोई सलमान घूँघट उठाता है

लुट गया डेमोक्रेसी का हस्तिनापुर
द्रौपदी सा खड़ा कोई मुस्कराता है।

खुमार कभी उतरता नहीं देखो
देशभक्ति का हुक्का गुड़गुड़ाता है ।

@विक्रम

तुम आदमी नहीं...

तुम आदमी नहीं
इंसानियत की जिन्दा लाश हो
हाड़ के ढाँचे में
गुथा हुआ मास हो
ये तुम्हारा घर इंसानियत की कब्र है
ये तुम्हारा स्पन्दन करता यकृत
खोपड़ी की गुथम्म-गुत्था
साजिशो का साज है
@विक्रम

मुट्ठी भर ही सही हौसला बचाये रख......

जिगर है चाक, ना सी, बस देखता रह
गिलास में शराब, ना पी बस देखता रह

बहुत भीड़ है और शोर शराबा भी है
उन्माद की तासीर है, बस देखता रह

कई अभिनय अदाकारियाँ चलते रहेंगे
तामझाम है शहर का बस देखता रह

ये डर ये कैद ये सलीब सब किसके है
शोर है नये निजाम का बस देखता रह

मुट्ठी भर ही सही हौसला बचाये रख
कि होते है करिश्मे भी बस देखता रह

@विक्रम

भौरा-भौरा गुँजन करता...

जीवन अपना,
रंग-बिरंगे फूलों जैसी पाती है
भौरा-भौरा गुँजन करता,
तितली-तितली गाती है

रात चरागों की बारातें
झिलमिल-झिलमिल आती है
दिन आता है सुबह लेकर
आस कभी न जाती  है।

एक शेर : कोख किराये पर है, आबरू चौराहे पर है,

कोख किराये पर है, आबरू चौराहे पर है,
और हम है कि नारी दिवस मनाये जाते है।
@विक्रम

जिन्दगी लीज पर है, फ्रीहोल्ड थोड़ी है...

अमा कैसी नफ़रतें,कैसी अदाकारियाँ
जिन्दगी लीज पर है, फ्रीहोल्ड थोड़ी है।

सियासी लिबास पहने आया है मजहब
अपने भी उसूल है, झाड़ का पेड़ थोड़ी है।

ना जमीं, ना दौलत का शौक मुझको
तहजीब की पूँजी मुश्किल से जोड़ी है।

कब तक नफ़रतपसंद रहोगे दोस्त मेरे
बंजारों का तम्बू है,परमानेंट थोड़ी है ।

ईमान को क्यों काँधे पे उठाये फिरते हो
अरे मेरा शहर है, शमशान थोड़ी है ।

वो मुकर गया करके बड़े-बड़े वादे
कोई नहीं इंसान है, भगवान थोड़ी है।

शहर में चर्चे है आपके कारनामो के
सब जानते समझते है, अंजान थोड़ी है।

नित नये फतवे है धर्म का कारोबार है
कोई मौलवी है सम्विधान थोड़ी है

हाथ जोड़े करता है सेवक वायदा
कातिल है, हुक्मरान थोड़ी है



जिसपे नामजद थाने में कई FIR है...

वो सुशासन का वादा कर गया सबसे
जिसपे नामजद थाने में कई FIR है।

हवा भी नहीं है,डेमोक्रेसी क्या बला है?
वो सर झुकाकर मत माँगने को तैयार है।

कल चलाता था गोलियां अपने हाथ से
आज सियासत उसकी लूट का औजार है।



@विक्रम 

नाहक ना तितली को बागों से उड़ाया जाय

उस दौर में जब संस्कृति का संक्रमण गम्भीर मुद्दा है। पाश्चात्य और प्राचीन के बीच रस्साकशी का दौर जारी है। जब "सन्त वेलेंटाइन" और प्रेम के मूर्त रूप "दशरथ माँझी" के तौर-तरीको और उपलब्धियों पर चर्चा होती है। जब युवायों की नयी फसल, संस्कृति के रक्षको से निरन्तर संघर्षरत है । संस्कृतियों के संक्रमण में प्रेम सबसे चर्चित विषय है। ऐसे में इस विषय पर बात भी जरूरी हो चलती है। ऐसा ही एक सफल प्रयास 18 FEB -17 "@परिवर्तन साहित्यिक मँच" के तत्वाधान में हुआ। जहाँ पर प्रेम के विविध रंगों, आयामों और विधायों को उकेरती, चिन्तन करती , उनके सामाजिक प्रभाव और सरोकारों की बात करने वाली रचनाये प्रस्तुत की गयी। जहाँ से समाज को "मुहब्बत की तासीर मुहब्बत" ही होने का सन्देश दिया गया। जहाँ साहित्य की दुनिया के वरिष्ठ हस्ताक्षर थे और नवोदित भी। जहाँ सुरमयी शाम थी और ज्ञान गंगा भी। जहाँ सामाजिक सरोकार भी थे और गम्भीर चिंतन भी। ऐसे "परिवर्तन साहित्यिक मँच" में मँच संचालन का जिम्मेदारी भरा दायित्व और काव्य पाठ करने की गरिमामयी अनुभूति के साथ कुछ तस्वीरे साझा कर रहा हूँ। टीम परिवर्तन के मित्रो बन्धुयो और वरिष्ठों के प्रति हार्दिक। आने वाले समय में नयी ऊँचाईयो को छूने के शुभकामना साथ। तस्वीरों के लिये Omendra भाई को विशेष आभार के साथ।
मुहब्बत की चाशनी में रिश्तों को पकाया जाय
नाहक ना तितली को बागों से उड़ाया जाय
मुहब्बत में मायनों को फिर से जगाया जाय ........

@विक्रम 






मुहब्बत में गिरफ्तार सा लगा...

मुहब्बत डे पर विशेष पेशकश.....

घर से अक्सर फरार सा लगा
मुहब्बत में गिरफ्तार सा लगा

मन में ख्वाब, हाथों में गुलाब
लड़का बड़ा अदबदार सा लगा

टिपटॉप हो के निकला था घर से
लौटा तो खर्च हुयी पगार सा लगा

शेरों शायरी सब सीख लिया उसने
जलेबी में सने अखबार सा लगा

रात चाँद तारों को ताकता रहा
इश्क़ का कीड़ा जोरदार सा लगा

खोल रखे है दिल के रोशनदान उसने
किसी साये का तलबगार सा लगा

दिल हार आया मुहब्बत के मैदान में
कभी खुश तो कभी बीमार सा लगा

बारहा इतराता है आईने के सामने
किसी काबिल अदाकार सा लगा


@विक्रम

Jindagi Siyasat ke Shmaiyane me- जिन्दगी, सियासत के शामियाने में

व्यंगात्मक कवितायें :
पाठक के मन को गुदगुदाती, व्यवस्था और राजनीति, सामाजिकता पर तंज कसती कवितायें

संजीदा कवितायें :
कवितायें जो रिश्तों​​ के बदलते मायने को टटोलती है, कवितायें जो आधुनिकता के मकड़जाल में फसते जाते सामजिक सरोकारों को खोजती है। जो नयी दोस्ती में पुरनेपन को खोजती है।
आधुनिक कवितायें :
आपाधापी भरी जिन्दगी में ,भूमण्डलीकरण के दौर में माँ,बाप, मायने तलाशती, बदबूदार होती सियासत, और महकते चहकते सियासतदारों, धर्म और अधर्म के बीच झूलती इन्सानियत को तौलती मापती कवितायेँ


ग़ज़लें:
सामान्य आदमी के जीवन में परत दर परत झाँकती, किसानों,कामगारों की बात करती ग़ज़लें, उस बुधिया की बात , जिसके कभी भीड़ आकर मार जाती है, कभी गाँव में वही बुधिया तहसीलदारों ​​ के​ दबाव में बिखर जाता है, शहर में सब्जी की दुकान लगते जिसे पुलिस जीने नहीं देती उसी बुधिया, और उसके सरोकारों , रिश्तों, उसके योगदान, बात करती ग़ज़लें।

देशी ठर्रा सी मुहब्बत है जो गली कूचों में होती है ..

आने वाले "मुहब्बत डे" मौके पर "मुहब्बत मैनो" को समर्पित  ...... 

देशी ठर्रा सी मुहब्बत है जो गली कूचों में होती है 
शहरी वाली सजधज कर  कैफे कॉफी डे में बैठी 
हो लो टिपटॉप तुम भी अब लगाकर Fogg देखो
जो विलायत वाली है किसी के इंतज़ार में बैठी है। 
  

खेतो में किसानों की मुहब्बत हल चलाती है

मुहब्बत का महीना आ चुका है ,बस तारीख आनी बाकी है।  ऐसे में केवल ये बताने की कोशिश है कि मुहब्बत केवल महबूब और महबूबा की कॉपीराइट नहीं है। मुहब्बत हर जगह हर तरह है। ..... मुहब्बत वो भी है जो नेता कुर्सी से करता है। जो किसान हल से करता है। जो जवान अपने कर्तव्य से करता है।

सियासत की पतंगे है उड़ाई जिन जनाबों ने 
कि सत्ता संग सगाई है रचाई साहबों ने 
जिनके दम पे मातम है गिरिजाघर, शिवालों में 
दिल्ली उन्ही के अदब में सर नावती है
मिलते ही मौका बाँहों में झूल जाती है।

खेतो में किसानों की मुहब्बत हल चलाती है 
सावन और भादव में ख़ुशी के गीत गाती है 
हरियाली ही हरियाली है फसले लहलहाती है 
गौरैया फिर से पेड़ो पर अविरत चहचहाती है 
चौपालों देहातों में गाती और बजाती है। 

सीमा पर जवानों की शहादत ही मुहब्बत है
धरती और माटी की इबादत ही मुहब्बत है
घर में माँ, बहनों की दुआएं  ही मुहब्बत है
बुजुर्गों का स्नेह,आसीष ही मुहब्बत है
हवायों में मुहब्बत है फ़जायो में मुहब्बत है।


+Vikram Pratap Singh Sachan 




"जिन्दगी सियासत के शामियाने" का अनावरण

सूर्या सँस्थान के एक कार्यक्रम में जिंदगी सियासत के शामियाने का अनावरण। डॉ रामशरण गौर जी अध्यक्ष दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, देवेन्द्र मित्तल जी, अशोक जी सम्पादक शुलभ इण्डिया, गायक और लेखक दीपक श्रीवास्तव की उपस्थिति में।
उपलब्धता:
https://www.flipkart.com/jindagi-siyasat-ke-shamiyane-mein/p/itmejveqxaxdg5jd?pid=9789386163134







"जिन्दगी सियासत के शामियाने में", आदणीय अनुप्रिया पटेल जी के साथ

मौसम सर्द है और सियासी पारा चढ़ा हुआ। कयासों और प्रयासो का दौर है। अनवरत घनघनाते फ़ोन, प्रत्याशियों की प्रत्यशाएँ, दिल्ली में दिग्गजोंं के माथे पर शिकन छोड़ रही है। ऐसे में आज एक बेहद शान्त और स्वछन्द मुलाकात युवा तुर्क, कद्दावर नेता, केन्द्रीय मन्त्री आदरणीय अनुप्रिया पटेल जी से, चाय पे लम्बी चर्चा और इत्तफाकन मेरी पुस्तक का जिक्र।

वो यकीनन गौरव के क्षण थे जब अनुप्रिया दीदी ने एक के बाद एक मेरी कई कविताये पढ़ी और कहा बहुत खूब विक्रम....लेखन जारी रहे, खासकर तौर पर "हुज़ूर एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर", "दिल्ली सियासत का सेन्टर है भाई", "आओ करे CBI जाँच की माँग" का जिक्र किया।

किताब की उपलब्धता:
https://www.flipkart.com/jindagi-siyasat-ke-shamiyane-mein/p/itmejveqxaxdg5jd?pid=9789386163134





How to use BHIM App, Introduction os usages and technology

Several questions reated to BHIM App answwred here n this blo post via youtube video.
In case you have further queries please write via commnets.

1.What is BHIM-. Bharat Interface for Money App.
2. How we can use this, as a option mobile vallet,
3. How it is using UPI, it is just extension of IMPS.
4. How your account listed just via phone no.
5. How instant transfer work.
6. UPI pin generation, what u need.
 7. Precautions to be taken.

आल्हाखण्ड: बेतवा मैदान की लड़ाई

ऊदल पहुँचा गढ़ सिरसे में
गज मोतिन ने कहा सुनाय
अब क्यों आये गढ़ सिरसे
तुमको पड़ी कौन परवाय
ऊदल ऊदल करते मरा मलखा
तब तुम क्यों नज़र ना आये
रोते रोते ऊदल बोला
ऐसी वाणी बोलो नाय
जब जब ऊदल घिरा भीड़ में
तब तब चमकी मलखे की तलवार
ऊदल ऊदल करता मरा है दादा
मेरे जीवन पर धिक्कार

रानखेतो में पहुँचा ऊदल
मार मार कर दिया मैदान
कट कट मुण्ड गिरे धरती पर
उठ उठ रुण्ड पुकारे जाय
मरे के नीचे जिन्दा घुस गये
कैसे जान बचेगी हाय
कुछ सुमिरे है रामचन्द्र को
कुछ सुमिरे शारदा माय
आधा हाथी रण में जूझे
आधा लिये महावत जाय
खेत छोड़कर भगा चौडिया
आगे बढे पिथौराराय
देख के गरजा रणबंका
और पृथ्वी से कहा सुनाय
एकला जान मार दौ मलखे
तुमने सिरसा घेरा जाय
पहला वार करो तुम मुझ पर
अपने अरमान निकालो आय
इतना सुन के पृथ्वी जल गया
गुस्सा भरा बदन में आय
मार निशाना साँग चला दी
देख वार को ऊदल हट गया
अपनी ली है जान बचाय
और बेंदुला बढ़ा अगाड़ी
जैसे कला कबूतर खाय
दो पैर धरे गज मस्तक पर
और ऊदल दी तलवार चलाय
जार बेजार हुये पृथ्वी अब
और गिरे धरा पर आय
ये सब देख रहा नर धांधू
आगे बढ़ कर ऊदल रोका आय
पृथ्वी की ली जान बचाय
पैर उखड गये लश्कर के
छोड़ छोड़ भगे मैदान