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बन्दूख तंत्र और बीहड़ के बागी 'ददुआ' के बहाने

'चम्बल' और 'चम्बल के बीहड़' मतलब खौफ का दूसरा नाम। चम्बल के बीहड़ों में बागियों का लम्बा इतिहास रहा है। अखबार की खबरों और दूसरेे कई माध्यमो से हमेशा चर्चा में रहे है और वहाँ पनाह पाने वाले बागी भी। इन बागियों को कुछ लोग डाकू भी कहते है!! किन्तु मैं इसके इतर सोचता हूँ। ये सवाल मेरे जहन में अक्सर आता है। कि आखिर क्यों अधिकतर बागी चम्बल में ही हुये? क्या चम्बल का पिछड़ापन या वहां पुलिस प्रशासन का बौनापन बागियों के जन्म का कारण है? या चम्बल का पिछड़ापन वहां के बागियों के कारण है?

'नक्सलवाद की उत्पत्ति' का 'बीहड़ के बागियों' से बुनियादी और सैद्धान्तिक जुड़ाव मेरे देखने का एक पहलू है। नक्सलवाद जहाँ भी  है वहां भी जबरदस्त पिछड़ापन है। कई रिपोर्ट, कई लेख इस बात का हवाला देते है की नक्सलवाद पिछडेपन और शोषण के विरुद्ध संगठित बगावत थी। पुलिस प्रशासन, सरकारी वादों से उठी आस्था के समानान्तर सत्ता थी। कुछ उसी तर्ज पर "चम्बल के बीहड़ो" का खूनी इतिहास भी है। चम्बल के बीहड़ो में समय के साथ शोषण के खिलाफ बगावत छोटे-छोटे गिरोहों ने की, हाँ ये गिरोह संगठित नहीं हो सके। अन्यथा देश नक्सलवाद की मानिन्द बीहड़वाद से भी एक छद्म लड़ाई लड़ रहा होता।

'चम्बल के बागियों' की दास्ताँ सुनिये उनकी पृष्ठभूमि खंगालिये तो बड़ी सरलता से ये देखा जा सकता है की अधिकतर मामलात में। तत्कालीन सामजिक ढाँचे "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाला ढाँचा। जहाँ सैड़कों गावों की जद  में एक पुलिस चौकी हुआ करती थी। वहाँ के दरोगा जी भी प्रभावशाली लोगो की जद में, उस पर गाँवों में जमीन जायदाद के मामलात में दीवानी के मुक़दमे फौजदारी में बदल जाया करते थे। उस समय फौजदारी अदालत में वकील नहीं लड़ते थे। खुद ही लड़नी पड़ती थी। ऐसे में 'बन्दूक तंत्र' का हावी होना लाजिमी था। एक बार आमने सामने की फौजदारी हुयी तो बस बागी होने के अलावा कोई चारा शायद ही बचता था।

बागी बनने के बाद 'बीहड़ में जिन्दा' रहने की कुछ अपनी मजबूरियाँ होती है जो यहाँ से हम देख सकते है। पुलिस और उनके मुखबिरों से मुकाबला, बदला पूरा करना, जीविका और हथियारों के लिये पूँजी का इन्तेज़ाम करना इत्यादि इत्यादि। बीहड़ में जितने भी नरसँहार हुये उनमें अधिकतर मामलात में पुलिस के मुखबिरों को डराने का प्रयास ही दिखा। 22 जुलाई 2007 को पुलिस मुठभेड़ में मारे गये, ३० साल तक बीहड़ों राज करने वाले "बागी ददुआ" ने ९ लोगों को एक गाँव में इसीलिये मारा चूँकि कुछ रोज पहले मुखबिरी के कारण पुलिस द्वारा घेर लिया गया था।  पुलिस मुठभेड़ में बच निकलने के बाद खौफ पैदा करने के लिये के गाँव के ९ लोगो को मार दिया। उसके २० वर्ष बाद भी शायद ही ददुआ का पता ठिकाना किसी ने पुलिस को बताया। मुरैना के बागी "पान सिंह तोमर" ने भी 10 -11 लोगो को एक साथ मार दिया वो भी पुलिस की मुख़िबरी के आरोप में खौफ पैदा करने की कोशिश थी। बीहड़ की एक और बागी 'फूलन देवी ' ने १९ लोगो को बेहमई में मारा उस मामले को फूलन के महीने तक बन्द कमरे में हुये बलात्कार का बदला ही माना गया।
 
 हालाँकि ये भी जाहिर है के सभी बागी कानून के अपराधी थे। किन्तु साथ ही साथ अपराधी प्रशासन भी था जिसने बन्दूख तंत्र को जन्म लेने दिया। जिसने समय पर न्याय दिलाने का कार्य नहीं किया। कारण  कुछ भी हो सकते है। न्याय तंत्र और सरकार से भरोसा उठा तो बागियों जन्म होना ही था। कुल मिलकर बागियों के भी मानवीय पहलू रहे। उन्होंने "बन्दूख तंत्र" से पाना न्याय खुद न्याय किया औरर बाद में पुलिस की गोली ने उनके साथ न्याय क्या किया।  बीहड़ में ३० साल राज करने वाले 'बागी ददुआ' को तो विंधायचल  में बहुत सारे लोग वहाँ का रॉबिनहुड भी कहते है। गरीबों की शिक्षा, बेटियों के सामूहिक विवाह इत्यादि का भी श्रेय उन्हें दिया जाता है। फतेहपुर के कबरहा में ददुआ का मंदिर भी है।   "पान सिंह तोमर" राष्ट्रीय खिलाडी थे बागी क्यों हुये ये हम सब जानते है। पान सिंह को भी बहुत मानने वाले थे प्रशंसक भी थे। वहीँ आज के परिपेक्ष में कई आधुनिक बागी जो नेता बन गये , सैकड़ो मुकदमे है पर संसद में बैठते है।  रफ्ता रफ्ता उनकी स्वीकार्यता हो गयी।  ये सामना भी जरूरी हो चलता है की बागी कोई जानबूझ कर नहीं बनता।  बागियों को सम्मान भले न दिया जाय , उन्हें स्वीकार भले न किया जाय किन्तु उनके मानवीय पहलू पर गौर जरूर किया जाय।