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कहानियों का बहीखाता - "कितने रंग जिन्दगी के"

"कितने रंग जिन्दगी के" तेज प्रताप नारयण जी का पहला कहानी संग्रह है। 'तेज प्रताप नारायण जी' का कविता संग्रह 'अपने अपने एवरेस्ट' वर्ष 2015 के  'मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार (भारत सरकार प्रदत्त)' से पुरस्कृत है। 

इसके पहले उनके चार कविता संग्रह चुके है। उनकी किताब के बही खाते में कुल जमा 10 कहानियो की पूँजी है। जीवन के विविध आयामों को अपने आगोश में लेती कहानियों का संग्रह। एक तरफ कहानियों में किसान खूबीराम के घर का छप्पर है, कमोवेश वैसा ही परिवेश जो प्रेमचन्द जी की कहानियों मिलता है, जैसा की फणीश्वरनाथ रेणु  के लेखन में झलकता है। दूसरी तरफ शहरी जिन्दगी की आपाधापी है, भीड़ में अकेलेपन का जख्म है, सदैव आगे बढ़ने जाने का श्राप है। समाज की मान्यताओं और परम्पराओं को चुनौती देती नारी है। कुल मिलाकर कर कहानियो का बही खाता जिन्दगी की जमा पूँजी का जवानी से प्रौढ़ावस्था तक पूरा हिसाब करता है। किताब का प्रकाशक मानो वो मुनीम है जो रंग के नोट को बटोर कर नयी तिजोरी भर लाया हो। 

तेज प्रताप जी की लेखन शैली और भाषा अनुशासन की लकीर इर्द गिर्द ही घूमती है। किन्तु रुचिकर है। भाषा में प्रयोगधर्मिता, रोज नये-नये पैदा होते शब्दों का चुनाव कम है।  किन्तु साहित्य को अराजक होने से बचाये रखने के लिये ये जरूरी भी और लेखन शैली का वजन भी। उनके सफल प्रयास  बधाईयाँ इस उम्मीद के साथ की उनकी कलम अनवरत चलती रहे, विसंगतियों और बुराईयों पर चोट करती रहे। 

@विक्रम 

लघु कहानी: समाज कल्याण

शुक्ला जी रोज की तरह दफ्तर से निकल कर सीधे पप्पू पनवाड़ी की दुकान पर आ टिके। पप्पू ने शुक्ला जी को देखते ही पान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। पप्पू पान में कत्था लगा ही रहा था उसका ध्यान शुक्ला जी की खास वेशभूषा ने आकर्षित किया। थोड़ी देर चुप रहने के बाद पप्पू शुक्ला जी से थोड़ा झिझकते हुये बोला, "अरे का बात है साहब आज कोई खास दिन है का ।" शूट-बूट में है साहब एकदम लाट साहेब लग रहे है । अरे यार आज एक प्रोग्राम रहा उसी के चक्कर में पहिन के आना पड़ा। दूर -दूर से बड़े साहब लोग आये है। रेपुटेशन का सवाल था तो हम भी बन लिये लाट साहब। पप्पू मुस्काया पान शुक्ला जी की तरफ बढ़ाया। शुक्ला जी ने पान को मुह में दबा लिया, और बोले आज शाला टेंशन बहुत है। पान थोड़ा भी गिर गया शूट में तो मेझरारु घर के बाहर खड़ा कर देगी। पर पान तो पान है खाना तो पड़ेगा ही। पप्पू मुस्कराते हुये बोला अरे साहेब मेहरारू से भी कोई जीत सका है का!! थोड़ा ध्यान से खाईयेगा।  अरे शुकुल जी कैसे है? बिल्कुल चमक रहे है आज!!! शर्मा जी ने शुक्ला जी से हाथ मिलाते हुये चुटकी ली। शर्मा जी शुक्ला जी के ही दफ्तर में वित्त विभाग में काम करते थे।
रोज की तरह पान के साथी थे। शर्मा जी के आते ही दुकान पर सामाजिक बहस का दौर छिड़ गया। कहिये शुक्ल जी आज का हुआ प्रोग्राम में का कही के गये बड़े बड़े साहब लोग। अरे "वहीं  समाज कल्याण के राग अलाप रहे थे!!!" दिल्ली से आते है तो बड़ी बड़ी बाते तो छौंकेगे ही। इनको भी तो अपनी दुकान चलानी है। शाला पूरा दिन इन लोगो को सुनना भी एक बड़ा काम है। वैसे हम भी आज दफ्तर की काम काज पर एक सेशन दिये थे बड़े साहब लोगो को। का बताये आप ऊ सेशन माँ शुक्ल जी? शर्मा जी ने शुक्ला जी से सवाल किया। अरे वही की कितने बच्चों को स्कॉलरशिप दी, कितनो को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया !! वही कच्ची मड़ैया वाले स्लम के कुछ लोगो का ब्यौरा दिये थे। पर मामला तब गड़बड़ा गया थोड़ा सा जब साहब लोग क्रॉस वेरिफिकेशन करने लगे।  बोले दिखाईये दस्तावेज कितने लोगो को वजीफा मिला कितनो का जीवन स्टार सुधारा इत्यादि- इत्यादि!!! थोड़ा गड़बड़ हुआ।  हम पाहिले से कई लोगो को बुला के  साइन करा लिये थे। ५०-१०० रुपये में सब मान जाते है।  अँगूठा लगा के चले जाते है।  हाँ सही कहे शुक्ला जी आजकल नये नये लौण्डे साहब बन जाते है फिर लगते है चलाने हम जैसे लोगो के ऊपर हम। "समाज कल्याण विभाग में नौकरी कर कर लिये!! जीना मुश्किल किये है लोग" समाज का ही कल्याण करते रहेंगे तो अपना कब करेंगे????  शुक्ला जी और शर्मा जी काफी देर तक लगे रहे और पप्पू ज्ञान बटोर लेने वाली मुद्रा में एक वक की तरह सुनता रहा।  बातें करते करते शुक्ला और शर्मा जी दफ्तर की तरफ बढे। ध्यान बातों में था और रिक्शे की घण्टी शुक्ला जी को सुनायी नहीं दो एक रिक्शे का आगे वाला पहिया शुकुल जी के पैर को स्पर्श करता हुआ निकल गया। शुक्ला जी हड़बड़ा कर रुके और ये देख कर आग बबूला हो गये की उनके पैन्ट में दाग लग गया।  शुक्ला जी आपा खो बैठे और रिक्शे वाले को जोर की चपत लगा दी। रिक्शे वाला रोने की मुद्रा में आ गया।  साहब हमार का गलती है येमा हम तो बराबर घण्टी बजावत रहे! आप ही नहीं सुने तो हम का करे!! शर्मा  जोर से चिल्लाये जानता नहीं हमे हम समाज कल्याण विभाग में काम करते है। एक आवाज़ लगायेगे तो पूरा दफ्तर निकल आयेगा तुम्हारा कल्याण करने। रिक्शे वाला चुप हो गया शुक्ल जी आग बबूला होकर उसको सड़कछाप गलियों से नवाजते रहे। और दफ्तर की तरह बढ़ गए।

कहानी: पुलिसिया बूट ....

रात के करीब ११ बज चुके थे। पराठे और मैगी खाने के शौक़ीन लोगो का जमावड़ा राजू की दुकान पर हमेशा की तरह सजा हुआ। राजू हमेशा की तरह तेजी से हाथ चलाते हुये सभी ग्राहकों की माँग पूरी करने की कोशिश कर रहा था। काम के भारी दबाव के बीच भी राजू के चेहरे पर चिरपरिचित मुस्कान ग़ालिब थी। कष्टो का गुबार घर पर कोई बीमार, मौसम की मार या कुछ भी पर ऐसा कभी देखा नहीं की राजू की पेशानियो पर बल आया हो !! मुस्कान अविरत राजू की चेहरे की शोभा बनी रही। शायद यही वजह थी की लोग राजू की दुकान पर जाना पसंद करते थे। कोई भी हो मुस्कराते हुये स्वागत हो तो किसे अच्छा नहीं लगेगा और यकीनन ज्यादा ग्राहक बटोरने में कामयाबी मिलनी तय होती है।

दुकान में कुछ पराठे खा रहे थे और कुछ पराठो के इंतज़ार में टेलीविज़न पर नज़रे गड़ाये हुये थे, इसी बीच हल्के से शोर शराबे की आवाजे दुकान पर बैठे लोगों के कानो से टकरायी। कुछ लोग दूकान से उठ कर बाहर आ गये। आवाज़ो की तीव्रता बढ़ती हुयी प्रतीत हुयी। गली में लोग आनन-फानन में अपनी दुकानों के शटर गिरा रहे थे। ग्राहकों की भीड़ दुकान से निकल कर सड़क पर खड़ी हुयी थी। टक टक टक ....... करती हुयी ठोस आवाज तंग गलियों में गूँज उठी। खाकी वर्दी में 3-4 लोग आगे बढे आ रहे थे, राजू की दुकान की तरफ। राजू की दुकान गली के अन्त में थी और बाकि दुकानों से थोड़ी दूर मुख्य बाजार से थोड़ा हट कर। राजू के दुकान के सामने आकर बूटो की आवाज़ थम गयी थी। पुलिस वाले ने राजू को घूरा " तन्ने निमन्त्रण भिजवाना पड़ेगा के दुकान बन्द करने के लिये!!"  पुलिसिया आवाज़ थोड़ी ऊची और हनकदार होती गयी। बन्द कर दुकान शाला !!!

"सर क्या हो गया ये धन्धे का टाइम है क्यों बन्द करवा रहे हो दुकान?" राजू ने पुलिस वालो की तरफ एक सवाल फेका। बन्द कर दुकान ज्यादा सवाल जवाब मर कर चल शटर गिरा। आक्रामक तेवर के साथ पुलिस वाले राजू की दूकान के अन्दर घुस गये। राजू खड़ा रहा। कुछ पैसे हाथ लेकर हाथ पुलिस वालों की तरफ बढ़ा दिये ये कहते हुये की सर इस हफ्ते का तो पहले ही दे चुका हूँ ये और ले लीजिये। शाला घूस देता है हमको पुलिसवाला आगबबूला गया। तड़ाक की आवाज़ गूँज उठी पुलिसवाले का वजनदार हाथ छोटे कद के राजू के गालों पर छप गया। राजू और बाकी के सब लोग अवाक थे। राजू के गालों की धमनियों पर रक्त श्राव तेज था। मानों "सत्यमेव जयते का" स्टाम्प राजू के गाल पर छाप दिया गया हो। अपने दायें हाथ से बायें गाल को राजू ने छुया और एक अश्रुधारा राजू की आँखों से फूट पड़ी।

मानों लोकतन्त्र के जंगल में वर्षो से जमी हुयी धूल पर पानी की कुछ बूँदे गिरी और गर्द का एक गुबार उठा हो। और इस गुबार में न्याय,कानून इत्यादि-इत्यादि धूल से धूषरित हो गये  हो।  न्याय का तराजू केन्द्र बिन्दु के दोनों तरफ तेजी से हिल कर टूट जाने को तड़प उठा हो। पुलिसिया गुर्गे हर हफ्ते पैसा वसूल करते थे देर तक दुकान खोलने का!! ये एक अनकहा अघोषित सत्य था। गाँधी  बन्दरों की तरह अगर इस सत्य को स्वीकार किया गया हो तो बेहतर होता।  पर उस रोज ना जाने क्यों रोज और हमेशा मुस्कराते रहने वाला राजू बागी हो गया था।

पुलिस वाले जा चुके थे। राजू ने स्टोव बंद किया। और रोते हुये बोला "क्या अपराध कर रहे है क्या? दुकान पर मेहनत कर के ही तो पैसा कम रहे थे।" हर हफ्ते इनको भी तो देते है। पर इन्हे ज्यादा और ज्यादा चाहिये!!! तो क्या खून बेंच के दे? दुकान का किराया भी देना है न भैया!! दुकान का मालिक दुगुने दाम पर दुकान देता है।  ब्लैक में घासलेट लाते है। सिलिंडर भी मिलता है तो ब्लैक में। ऊपर से इनको साहब लोगों को दो। हमको भी घर चलाना है। घर से दूर यहॉँ कमाने आये है। पुलिसवालों को जिस दिन ज्यादा चाहिए हमला बोल देते है। हम गरीब है तो क्या मेहनत करने।का अधिकार भी हमसे छीन लिया जायेगा। सम्मान के साथ कोई काम करने ही नहीं देते लोग। आज सम्मान भी खत्म कर दिया शालों ने। राजू बेहद आहत था। इतना आहत था कि जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो। उस दिन जब राजू ने अपनी दूकान का शटर गिराया था। वो शटर उसकी उस मुस्कान पर भी पड़ा जो सदाबाहर थी हमेशा थी। पर उस रात पुलिसिया प्रकोप से ऐसा पतझड़ आया था की मानों अबकि बार जो पत्ते टूटे थे वो शायद फिर कभी नहीं लौटेंगे।

कहानी: और बापू बहुत देर तक हँसते रहे!!!

चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन पर उतरकर राजघाट की ओर रुख किया। मन आज गाँधी जी से मिल लेने की धुन में रमा हुआ था। राजघाट आने का ये दूसरा प्रयास था। पहली बार जब आया था उस दिन राजघाट बन्द था। आम आदमियो के लिए बन्द था!! क्यों कि अगले दिन कोई खास आनेवाला था। किसी देश का राष्ट्रपति था शायद। बैरंग वापस लौटना पड़ा था। गहरा निराशा भाव मन में था। एक तो दिल्ली की आपाधापी वाली जिन्दगी में ट्रैफिक और भीड़ का मुकाबला करते हुये यहाँ तक आ पाना आसान ना था। और जब आ गये तो निहित उद्देश्य हासिल किये बिना जाना मन को थका देने के लिये काफी था। किसी देश का कोई राष्ट्रपति आ रहा है तो गाँधी जी के दर्शन बन्द क्यों हो भाई? जन्म से भारतीय होना क्या पर्याप्त नहीं है दर्शन हेतु????

जैसे तैसे आगे बढ़ा और बस पकड़ कर राजघाट की ओर बढ़ लिया। बस के धक्के खासकर गर्मियों के महीने में लू के थपेड़ो से भी खतरनाक होते है और साथ ही बस कन्डक्टर की कर्कश खड़ी बोली हृदय को लहूलुहान कर देती है। ऐसा लगता है की मानों दिल्ली की बस में नहीं किसी असभ्य समाज में घुस आये हो आप!! चन्द गुण्डे थोड़ी सभ्यता के साथ गलियाँ रहे हों। वो लखनऊ, कानपुर की नजाकत और नफासत भरी भाषा यहाँ थोड़ी ही मिलेगी !!! दिल्ली की बसों में सम्मान बचाये रखना भी उपलब्धि जैसा होता है। "राजघाट राजघाट, राजघाट वाले उतर लो भाई" कन्डक्टर की कर्कश आवाज गूँजी, राजघाट आ चुका था। लगभग रेंगती हुयी बस से उतरना पड़ा। ले दे कर सड़क पार करी और एक पानी की स्टाल पर रुक कर नीबू पानी का गले के नीचे उतार लिया।  तरावट महसूस हुयी। जान में जान आई और आगे बढ़ने के लिये पर्याप्त ऊर्जा भी भी सँजो ली। राजघाट के दरवाजे फिर बन्द थे। कल कोई आ रहा था। कोई बड़ा आदमी नाम याद नहीं पड़ता पर कुल मिला कर आम जनता  लिये राजघाट आज भी बन्द था।

निराशा का भाव चरम पर था। चौकीदार से बहस होने लगी। "क्या मजाक लगा रखा है? रोज-रोज बन्द ही रहता है ये" हम कब देख पायेगे गाँधी जी को एक तो ले दे के दिल्ली आना होता है!! पूरा दिन ख़राब कर के आओ और राजघाट बन्द ??? हाथ लगी निराशा और मौसम के मारक मिजाज से तेवर तल्ख़ हो चले थे। पर सामने से आये जवाब ने मानो घड़ो पानी उड़ेल दिया हो !!! "अरे बाबू हमसे कहे लड़ रहे हो? हम तो वही कर रहे है ना, जो हमसे कहाँ गया है। हमे क्या मिलना है आपको रोक कर? हम तो साहब लोगो की आज्ञा बजा रहे है बस" उम्र दराज से दिखने वाले उस चौकीदार की बात से गुस्सा हवा हो गया। "सही बात" मैंने जवाब दिया।
साभार :http://www.biography.com/

गाँधी जी से ना मिल पाने का ग़म लिये यमुना की तरफ कूच किया। कदम बढ़ रहे थे और साथ ही मन में रस्साकशी भी। क्या यही गाँधी जी के सपने का भारत है? क्या राष्ट्रपिता से मिलने के लिये किसी की आज्ञा की जरूरत है? अफसोसजनक है की केवल गाँधी जी केवल बड़े लोगो के हो गये !! वैसे गाँधी जी तो जन-जन तक पहुँचने की बात करते थे। तो क्या सरकारी तन्त्र ने बापू को बन्धक बना लिया ??? सामने पुल देख कर कदम रुक गये। शायद यमुना किनारे आ चुका था। पर जैसे ही नज़र पुल के नीचे के जल पर गयी … मन का भरम दूर हुआ ये यमुना नहीं कोई गन्दा नाला था। एक सज्जन से पूछने की सोच ली। " भाईसाहब यमुना कितनी दूर है अभी?" अजी यही तो है यमुना!!! जहाँ आप खड़े है। दुबारा पुछा यही है यमुना?? हाँ भाईसाहब यही है यमुना मैं यही पास में ही रहता हूँ, यही है यमुना " सज्जन जवाब दे कर आगे बढ़ गये और मैं ठगा सा यमुना को निहारता रहा। "यमुना तीरे.......पर कृष्ण जी बाल्यकाल कहानियों का चित्र मन में जीवंत हो उठा" इसमें अगर शेषनाग होता तो अब तक शहीद हो चुका होता। खैर यमुना रुपी गन्दे नाले के पास साफ़ सुथरी से जगह खोज बैठ गया।

यनुमा की हालत पर तरस खा की रहा था कि एकाएक नज़र अपनी शर्ट की जेब में पड़ी। ऊपर की जेब में जो पचास का नोट पड़ा था उसमे से हँसते बापू नज़र आये। बापू बहुत देर तक हँसते रहे!!! और फिर सहसा मुझे सम्बोधित करते हुये बोले बेटा। तुम सही सोच रहे थे!! मुझे सरकारी तन्त्र ने कैद कर लिया है !!! ये वो कैद है जो आपको सम्मानित करने के नाम पर दी जाती है। ये कैद ताजीरातेहिन्द के तहत नहीं है पर है। अपार कष्ट वाली। एक पीड़ा जो हमेशा होती है। मुझे नोट पर छाप दिया, लड़ाई का जरिया बना दिया। भाई-भाई ना रहा, मुझे सफ़ेद और काला बना दिया। सफ़ेद  बैंक में कैद हो गया। काला कोठरियों में कैद हो गया। विदेश के क़ैदख़ानो में भी डाला। जिन विदेशियों से मैं उम्र भर लड़ा , वो विदेशी जो मेरे सामने टिक ना सके मैं उन्ही के क़ैदख़ानो में हूँ। हर थाने, चौराहे, हर सरकारी दफ्तर में मेज के नीचे से इधर-उधर किया जाता हूँ।  हालाँकि ऊपर चिपका मैं ये सब देख रहा होता हूँ। रोता हूँ पर मेरे आँसू काफी नहीं। मैं औरों से क्या उम्मीद करुँ  देश की संसद में मेरी आँखों के सामने जूतम -पैजार हुआ करती है। मैं कैद हूँ बेटा इसीलिये इतने प्रयासों के बाद भी मिल ना सका। अभी मैं हँस जरूर रहा हूँ, तुम्हारी मनोदशा देख कर किन्तु मैं रोज रात को राजघाट में रोता हूँ आगे भी रोता रहूँगा ……

संस्मरण: जियासराय का देशी कुत्ता

जियासराय की गलियों में कुछ मित्रो के साथ चाय पर चर्चा चल रही थी। चाय की दुकान से पोर्टेबल गिलास में चाय लेकर हम सब थोड़ी दूरी पर खड़े थे। चाय की हर चुस्की के साथ नयी खुशियो का एक सवेरा सा आ जाता। जिया सराय की तंगहाल गलियों में सुकून के कुछ पल या तो चौराहे पर खड़े होकर मिलते थे या फिर किसी चाय की दुकान पर। वर्ना बाकी जगहों पर हाल ये था की आसमान से गिरा पानी भी अपना रास्ता नहीं खोज पाता। धूप इधर-उधर दीवारों से टकराकर गुम हो जाया करती है, परावर्तन की कोई प्रक्रिया धूप को सड़क तक ला पाने के लिये नाकाफी थी। चाय की चुस्कियाँ खात्मे की ओर अग्रसर थी .......... तभी एकाएक कुछ कुत्तों के भौंकने और किसी के भागने की कदमताल ने हमारा ध्यान भंग किया। चाय की कुछ चुस्कियाँ मामला समझने में लग गयी। अब नज़रे कुत्ते और आदमी के ऊपर गड़ी हुयी थी।

एक तरफ एक मरियल देशी कुत्ता दूसरे ओर आयातित विदेशी टाइप नश्ल का भारी भरकम कुत्ता दोनों के घमासान छिड़ी हुयी थी। मरियल देशी कुत्ता झबरा टाइप कुत्ते को कूटे पड़ा था और झबरा गुर्रा कर विरोध जरूर दर्शा रहा था पर निरीह था। झबरा कुत्ता मुकाबले में शुरू से ही पिछड़ गया था। झबरा कुत्ता किसी तरह बच कर भागा और एक कार के नीचे घुसने प्रयत्न करने लग गया पर घुस नहीं पाया, फँस जरूर गया। देशी कुत्ता फिर टूट पड़ा दो-तीन पटखनी लगा दी। विदेशी कुत्ते का मालिक हाथ में पत्थर लिये भागा और देशी कुत्ते पर प्रहार किया। देशी कुत्ता बाल बाल बचा और चिरपरिचित अंदाज़ में आवाज़ निकालते हुये भागा। मम मम मम ………… उसके भागने देर थी की विदेशी कुत्ते में अचानक ऊर्जा जाने कहाँ से आ गयी . मानों उसके मालिक ने ग्लूकॉन D का घोल पिला दिया हो। वो गुर्राया और भौका …… देशी कुत्ता भी पलटा  ....... दोनों में गुर्राना और भौंकना जारी रहा। झबरा कुत्ता थोड़ा जोर दिखाते हुये मालिक से छुड़ा कर देशी कुत्ते के तरफ हमलावर हुआ किन्तु सर मुड़ाते ही ओले पड़ गये देशी कुत्ते ने आव देखा ना ताव और यलगार कर दिया विदेशी कुत्ता नीचे और देशी फिर ऊपर ……  इस बार झबरा के चारो खाने चित्त थे देशी कुत्ता विजय का बिगुल बजा चुका था। झबरा का मालिक जिया सराय की बड़ी भीड़ के सामने शर्मिन्दा महसूस कर रहा था। इसी के चलते उसने भी मोर्चा सम्हाल लिया डण्डा लेकर देशी कुत्ते पर प्रहार किया। देशी कुत्ता चिल्लाते हुये भगा ....... और मौका पाकर झबरा भी भाग निकला देशी कुत्ते ने फिर झबरा को दौड़ाया। दृश्य कुछ था झबरा आगे देशी कुत्ता पीछे और उनके पीछे झबरा का शर्मिन्दा मालिक।

भागा दौड़ी में झबरा ने कोण बदल कर ऐसी दौड़ लगायी की सीधे मालिक की शरण में आ गया देशी कुत्ता दूर खड़ा गुर्रा रहा था। मानो कह रहा हो की जी भर पेट भोजन नहीं मिला तो क्या बात सम्मान की थी इसलिये मुकाबला किया। देखो झबरे को कितने बिस्कुट और दूध का स्वाद मिला हो पर जमीन पर हम ही है भारी। जैसे कह रहा हो की जी सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं!!!! झबरा का मालिक झबरा पर बरस पड़ा और झबरा शर्म के कारण नीचे की तरफ देख रहा था। झबरा और उसके मालिक ने अपना रास्ता पकड़ा देशी कुत्ता विजयी भाव में खड़ा उन्हें जाते देखता रहा। जिया सराय की आधी जनसँख्या ये दृश्य देख रही थी। हर तरफ ठहाके थे और एक तरफ शर्मिन्दा मालिक। इस पूरे वाकये के बीच हमारी चाय की चुस्कियाँ लाख टके की हो चुकी थी और चाय खात्मे की ओर थी। चाय का गिलास डस्टबिन में फेक कर हम सभी ये कहते हुये आगे बड़े की भाई "काम का ना काज का दुश्मन अनाज का" .

कहानी: भोर के लुटेरे ......

 "चाय चाय चाय" ....... न्यूज़ पेपर दैनिक जागरण,आज, अमर उजाला ...........आवाजों की बढ़ती तीव्रता ने मेरे कान के पर्दो में कम्पन पैदा कर दिया, जो गहरी तन्द्रा को भंग करने के लिये काफी था। मन जाग चुका था पर आँख खोलना मुश्किल हो चला था मानो किसी ने धड़ी भर बोझ आँखों पर लाद दिया हो। अमानत में खयानत वाली बात हो गयी। आँखे खुलने का यत्न कर ही रही थी कि अचानक जूतों का ख्याल मन में कौंदा और बस अगले ही पल अपर बर्थ से सीधे लोअर बर्थ के नीचे कूद पड़ा नज़रे गड़ाये जूते ताकने लगा, जूते अपनी जगह से दूर पर सीट के नीचे पड़े थे, दिल को गहरा सुकून मिला। जूता चोरी के कई मामलात मित्रो साथ हो चुके थे। खैर आँखें खुल चुकी थी और नज़र घड़ी पर गयी 3 बज कर १७ मिनट का समय हो चला था। एक अखबार वाले से पूछा कौन सा स्टेशन है? कानपुर कितनी देर में आयेगा? बस भाई साहब अगले २५ मिनट में कानपुर होगे आप। अखबार भी ख़रीद लिया और खबरे खंगालने लगा। ट्रेन लगभग ५ घण्टे लेट हो चुकी थी। बाहर वातावरण में घना कोहरा आच्छादित था। इतना घना की बाया हाथ दाये हाथ को खोजता रह जाये।

अखबार पलट रहा था, नज़र महानगर पन्ने पर टिक गयी। "भोर के लुटेरो ने कनपटी पर तमंचा लगा, कपडा व्यापारी को लूटा" खबर पढ़ कर खून सर्द हो गया। जिस्म जुम्बिश कर उठा जैसे ही ये समझ आया कि कानपुर पहुँचते-पहुँचते ४ बजा होगा। भोर के लुटेरो की सक्रियता का आदर्श समय यही है। भयभीत मन एक पल को मान बैठा कि कल की अखबार में खबर मेरी ही होगी। मैं भी छप जाऊँगा अख़बार में पीड़ित की तरह, लुटेरे तो कन्टापीकरन भी करेंगे ही साथ ही साथ पुलिस वालो से भी हील-हुज्जत का चक्कर भी होगा। सोच-सोच कर दिल बैठा जा रहा था। "डरा हुआ मन शंकाओं का घर" बस फिर क्या छूटते ही भोर के लुटेरों की कुछ पुरानी खबरे भी जहन में ताजा हो उठी। पल-पल भारी होता जा रहा था। लगता था अभिमन्यु की मानिन्द चक्रव्यूह में फस गया हूँ। बच निकलने का रास्ता नहीं पता। सुना था जिसका जब समय आ जाता है उसे जाना ही होता है कोई रोक नहीं सका, ख्याल भयातुर करने के लिये काफी था। ऐसा लग रहा था की मानो काल एक व्यूह रच चुका हो और सिलसिलेवार ढंग से सब कुछ होता जा रहा था जैसे पहले ही रच दिया गया हो ट्रेन ५ घण्टे लेट, कल तक कोहरे का नामो निशान नहीं था आज घुप्प अँधेरा। नियति मेरे खिलाफ साजिशरत थी। भय बढ़ता जा रहा था, इस समय एक कुत्ते की भौक ही ह्रदय गति को थाम देने लिये काफी थी।
साभार गूगल

शरीर जड़वत था किन्तु फिर मरी गिरी सी हालत में कुछ बची खुची हिम्मत बटोरी और हनुमान चालीसा के एक दो दोहो कण्ठस्थ किये और आगे की खबर पर नज़र बढ़ायी। जैसे-जैसे निगाहें आगे बढ़ी दिमाग में शंकायें नाच उठी ये कहे की ताण्डव करने लगी। ख्याल आया की मान लो लुटेरों ने धर लिया तो क्या करुँगा? हाथ पैर ही जोड़ने पड़ेंगे और क्या? तो हाथ पैर जोड़ लूँगा, जान की भीख माँग लूँगा इतना रायता फैलाऊगा की लुटेरों को भी दया आ जाये, पर अगर नहीं माने तो क्या? कन्टाप रसीद कर दिया तो क्या? पर्स में १०० -२०० पत्ता देख कर नाराज़ हो गये तो क्या? लुटेरों के लिये तो वही वाली बात हो जाएगी की "ना खुदा मिला न विशालेसनम" इतनी सर्दी में निकले है लूट के लिये उनको भी लगेगा की इतनी मेहनत की और मिला क्या? भाई कंटाप तो तय है, बचना छुरे से है।आक्रोश में छुरा भी तो भोक सकते है, खिसियानी बिल्ली अक्सर खम्भा नोचती है!! मैं पक्का नुचा भाई इतने घुप्प कोहरे में अस्पताल का रास्ता भी न नज़र आयेगा। इतनी सर्दी में आदमी आलरेडी छुईमुई टाइप होता है। छुरे ख्याल ही नेस्तोनाबूत करने को काफी था। मन डर-डर सिकुड़ा जा रहा था यकायक एक ख्याल कौंदा की स्टूडेंट डिस्काउंट की बात आगे करुँगा, ....... पर ये शिमला समझौता थोड़ी ही है की वो मेरी सुनेगे। ऊपर से एक कन्टाप बोनस में भी दे सकते है। 

मन विचलित था बाहर पंक्षियों  के कलरव की आवाज़ गूँजने लगी थी और कानपुर सेंट्रल भी नज़दीक था। मन में भय बढ़ता रहा था। पाँव में जूते डालते हुए ऐसा था मानों भारत के सीमावर्ती इलाके में युद्ध करने हूँ ….... कर चले हम फ़िदा साथियों जैसे गाने मन ही मन बजे जा रहे थे ……  स्टेशन पर यूँ उतरा मानों दोजख का द्वार हो और मैं अपने किये की सजा पाने के लिये आगे बढे जा रहा हूँ। खैर गिरते पड़ते ऑटो स्टैण्ड पर आ ही गया। हर ऑटो वाला भोर का लुटेरा दिखायी दे रहा था। कौन सा ऑटो यमराज का भैसा बन जाये किसको पता। पूरे शहर में यमराज ने लंगर फेक रखे है किसमें फसा का ऊपर घसीट ले पता नहीं। हर मूँछ वाला ऑटोचालक यमराज प्रतीत हो रहा था, मरता क्या ना करता घर तो जाना ही था। एक बिना मूँछ वाला ऑटोचालक फाइनल किया। ऑटो में बैठा एक यमदूत सा लगने वाला सहयात्री बैठा था। पर भी मनोबल थोड़ा बढ़ा। कुछ देर के बाद एक जोड़ा आ गया महिला बुर्केवाली थी, उसे देख सीट पर जड़वत हो गया और सिमट गया ….... भोर के लुटेरे अक्सर ऐसे ही आते है कभी पुलिस की वर्दी में कभी बुर्के में!!! 

ऑटो वाला चल पड़ा टाटमिल चौराहा आते-आते जान हलक तक आ गयी थी। हर पल ऐसा ही लग रहा था की अब बुरका उठा और कब हमला हुआ ……  टाटमिल चौरहे पर सवारी और चढ़ी। टाटमिल के आगे का रास्ता थोड़ा सेफ सा था निगाहे पुलिस पिकेट की तरफ टिकी रही। पुलिस पिकेट तो दिखी पर पुलिस वाले नहीं। आ कुछ जगह लोग अलाव लगाये बैठे थे। उसी अलाव की गर्मी से ऊर्जा मिल रही थी मुझे। टाटमिल से किदवई नगर का रास्ता भारी था। रास्ते जितने भी भगवान पड़े उन्हें कोहरे में देख तो नहीं सका पर अन्दाज़े लगा कर हाथ जोड़ लिये प्रार्थना कर डाली। …… हे भोलेशंकर ये गणेश जी …… बस आज यम के प्रहार को विफल कर दो प्रभु जीवन आपकी भक्ति में काटूँगा … इतनी भक्ति भावना पहले कभी नहीं उमड़ी थी जितनी की आज थी .... भगवान भी मुसीबत में  ही याद आते है …… दुःख के सुमिरन सब करे …… प्रार्थनाओं का दौर चल ही रहा था की किदवई नगर चौराहे पर ऑटो ने विराम लिया। हनुमान जी का बड़ा मंदिर देख मन दण्डवत था। हनुमान जी की कृपा बरसी और बुर्केवाली उतर गयी। दो भले से दिखने वाले लोग चढ़ गये जान में जान आ गयी। अँधेरा छट रहा था मनोबल बढ़ता जा रहा था। दीप टाकीज के पास डर का एक दौर आया पर करो या घर की नज़दीकी ज्यो ज्यों बढ़ रही थी मनोबल बढ़ता जा रहा था रहा। बर्रा चौराहे पर जब उतरा तो लगा की मानों के नयी जिन्दगी मिल गयी हो मानो कारगिल से जीत वापस आया हूँ भोर के लुटेरों से सामना नहीं हुआ किन्तु  अंतरात्मा उनके दर्शन भली प्रकार से कर चुकी थी .... मैं पैदल बैग उठाये घर की तरफ बढ़ रहा था डर बाहर बिखरता जा रहा था।