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कहानियों का बहीखाता - "कितने रंग जिन्दगी के"

"कितने रंग जिन्दगी के" तेज प्रताप नारयण जी का पहला कहानी संग्रह है। 'तेज प्रताप नारायण जी' का कविता संग्रह 'अपने अपने एवरेस्ट' वर्ष 2015 के  'मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार (भारत सरकार प्रदत्त)' से पुरस्कृत है। 

इसके पहले उनके चार कविता संग्रह चुके है। उनकी किताब के बही खाते में कुल जमा 10 कहानियो की पूँजी है। जीवन के विविध आयामों को अपने आगोश में लेती कहानियों का संग्रह। एक तरफ कहानियों में किसान खूबीराम के घर का छप्पर है, कमोवेश वैसा ही परिवेश जो प्रेमचन्द जी की कहानियों मिलता है, जैसा की फणीश्वरनाथ रेणु  के लेखन में झलकता है। दूसरी तरफ शहरी जिन्दगी की आपाधापी है, भीड़ में अकेलेपन का जख्म है, सदैव आगे बढ़ने जाने का श्राप है। समाज की मान्यताओं और परम्पराओं को चुनौती देती नारी है। कुल मिलाकर कर कहानियो का बही खाता जिन्दगी की जमा पूँजी का जवानी से प्रौढ़ावस्था तक पूरा हिसाब करता है। किताब का प्रकाशक मानो वो मुनीम है जो रंग के नोट को बटोर कर नयी तिजोरी भर लाया हो। 

तेज प्रताप जी की लेखन शैली और भाषा अनुशासन की लकीर इर्द गिर्द ही घूमती है। किन्तु रुचिकर है। भाषा में प्रयोगधर्मिता, रोज नये-नये पैदा होते शब्दों का चुनाव कम है।  किन्तु साहित्य को अराजक होने से बचाये रखने के लिये ये जरूरी भी और लेखन शैली का वजन भी। उनके सफल प्रयास  बधाईयाँ इस उम्मीद के साथ की उनकी कलम अनवरत चलती रहे, विसंगतियों और बुराईयों पर चोट करती रहे। 

@विक्रम 

सत्तासीन नेता जी.....

अद्वितीय भाषण शैली
नेता जी की रैली
रैली में आये
मंचासीन हुये
नज़रे तरेरी
इधर उधर फेरी
प्रदेश अध्यक्ष से बतियाये
भैया केवल 20 हज़ार जी भीड़ लाये?
माइक थामा
अभिवादन के साथ
1950 तक गये
वल्लभभाई को सराहे
गाँधी और नेहरू को गालियाये
1965 आये शास्त्री जी टकराये
प्रसंशा किये
इंदिरा को तानाशाह बताये
आपातकाल पर टूट पड़े
खोद डाली कांग्रेस की जड़े
हर पंचवर्षीय का हिसाब बताया
लूट का हिसाब किताब बताया
मण्डल और कमण्डल पर आये
हिलाएँ डुलायें, थोड़ा गंगागल फैलाएँ
पवित्र हुये,
20वी का लगभग सब बेकार
21वी शताब्दी से हुआ करार
कई वादे किये
सब कुछ सुधारने के इरादे किये
सत्तासीन हुये
गद्दी पर आसीन हुये
बाहर निकलना छोड़ दिया
हर वादा तोड़ दिया
अब 15 अगस्त को लाल किले से चिल्लाते है
कि हम सपने दिखाते है।
कि हम सपने दिखाते है।

...इन्साफ फ़ुटबाल है

इन्साफ फ़ुटबाल है
इंसान फ़ुटबाल है
न्यायालय टकसाल है,
इंतज़ार का,
दुर्व्यवहार का

कानून जुनून है
सत्य को दबाने का
मनमाफिक करने का
लोगो को धरने का
सच को हरने का

न्यायालय में,
न्याय के थोक और फुटकर विक्रेता
अदालतों के विजेता
अपील करने में
जलील करने में
माहिर,
पीड़ित की लिखाई पढ़ाई
पीड़ित से कमाई धमाई
थोड़ा बहस थोड़ा मुहावसे
बाकी तारीख,

और पीड़ित
न्याय को पकड़ने में
जकड़ने में 
के बॉल सफ़ेद
चप्पले घिसी हुयी
झुर्रियां पड़ी हुयी
मुसीबतें खड़ी हुयी
बीबी लड़ी हुयी
बेबसी जड़ी हुयी
नींद उडी हुयी
कभी छले जाने का दर्द
कभी न्याय ना पाने का दर्द
दर्द ही हमसफ़र
दर्द ही हमदर्द

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित

गरीब का होता कोई कभी ना!!!

बदलूराम वल्द बरसातीराम
खेत खलिहान में करते काम
पर मिलती पगार अधूरी
पण्डित जी भी रखते थे दूरी
बदलूराम ने किया हौसला
शहर जाने का लिया फैसला
शहर में आके ज्ञान बटोरा
सब्जी की लगायी दुकान
कोई यहाँ ना जात पूछता
कोई यहाँ न पात पूछता
छुया छूत का मिटा फासला
बदलूराम का बढ़ा हौंसला

हफ्ता भर बीता था भाई
एक दिन वहाँ कमेटी आई
बदलूराम से माँगे थे पैसे
बदलूबोले भैया क्यों और कैसे?
कमेटी को आया गुस्सा
बदलूराम की करी खिंचाई
सड़क पे तुमने दुकान लगायी!!
जगह क्या तुम्हारे बाप ने दिलायी???
ठेलिया पर मारेगे लात
फैले फिरेंगे तुम्हरे जज्बात!!!
देकर पैसे जान जान छुड़ाई
फिर रोज की तरह करी कमाई

कुछ ही दिन गुजरे PCR आई
पैसे की माँग उठाई
बदलू हो चुका था ज्ञानी
पैसे देकर बना वो दानी

फिर कुछ दिन गुजरे पुलिसवाला आया
पैसा पैसा कान में चिल्लाया
बदलू भैया चक्कर खाये
बोल ही बैठे कल ही तो दिये थे भाई
पुलिस वाले ने हनक दिखायी
साले तीतर से बटेर लड़ा दूँगा
बिना मुकदमें के ही थाने में सड़ा दूँगा
हमको कानून ना सिखाना
नहीं तो वापस घुसा देगें जहाँ से आये हो वही वापस पहुँचा देगे!!
हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट सब धरे रह जाते है
जब हम डण्डे चलाते है।
बबलू की जान हलक तक आई
फिर से दिया रूपया जान छुड़ायी।

अब बदलू में बदलाव है आया
तुरत फुरत देता है पैसे जैसे ही पड़ती
पुलिस प्रशासन की छाया!!!
गाँव शहर की करता है तुलना
सोच रहा है गरीब का होता कोई कभी ना!!
गरीब का होता कोई कभी ना!!!

मन में डर भर गया, एक और घर बिखर गया।

ये अक्सर होता है कभी मेरे शहर में कभी तेरे शहर में। कभी भीड़ आकर कर जाती है। कभी अपराधियों का एक झुण्ड ऐसे मन यही बोलता है कि  " जुर्म होता रहा  और मेरा शहर सोता रहा" पेशे खिदमत है कुछ पंक्तियाँ जो दंगे जैसी स्थिति में जीवित हो उठती है ……

अफवाहों की एक शाम थी
शंकायें भी जवान थी
हलक तक आई जान थी
जिन्दगी हलकान थी
व्यवस्था बेजुबान थी
झूठ सज सँवर गया
              मन में डर भर गया
              एक और घर बिखर गया।

स्वप्न सब बिखर गये 
लोग सब सिहर गये
खौफ में हर पहर गया
शोर का गुबार था
धधकता अँगार था
ताण्डव घर-घर गया
               मन में डर भर गया
               एक और घर बिखर गया।

नफरते पसर गयी
प्यार सब बिखर गया
रक्त का रंजन हुआ
मौत का गुन्जन हुआ
मोहल्ला शमसान था
गिद्धों में घमासान था।
फ़ज़ाओं में जहर भर गया
                मन में डर भर गया
                एक और घर बिखर गया। 
                एक और घर बिखर गया। 

नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित है। बिना लेखक की जानकारी के किसी इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही को आमन्त्रित करता है।

अच्छे दिन दिखला दो बाबू, रोजगार दिलवा दो बाबू ........

ये कविता केन्द्रित है उस मजदूर पर जो अपना घर छोड़ कर परदेश जाता है। खासकर शहरी क्षेत्रो में बहुमंजिला भवनों के निर्माण में कार्य करने वाले लोग जिन्होंने हर जगह हक़ की लड़ाई लड़नी पड़ती  घरबार अधिकार शिक्षा सभी सवालिया है। एक मजदूर का अनुरोध है सरकारों से असरदारों से …… ध्यान से पढ़े 

अच्छे दिन दिखला दो बाबू
रोजगार दिलवा दो बाबू
दो जून की रोटी का हमको 
अधिकार दिल दो बाबू

शिक्षा दीक्षा तो हम पा न सके
गीत ज्ञान का गया न सके
पर मंज़ूरी तो करवा लो बाबू
मौलिक हक़ दिलवा दो बाबू

                रोजगार दिलवा दो बाबू। 
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू। ।

छोड़ छाड़ के घर बार अपना
दूर देश से आये है
2 जोड़ी कपडे और
साथ स्वप्न भी लाये
रहने का जुगाड़ करा दो बाबू
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू । ।

पुलिस प्रशासन दूर की कौड़ी
स्वस्थ्य डॉक्टर हर की पौड़ी
पहचान तो दिलवा दो बाबू
आधार कार्ड बनवा दो बाबू 
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू। । 

हम जन्मजात मजदूर जो ठहरे
लगाते अंगूठा जैसे अन्धे बहरे 
शोषण तो रुकवा दो बाबू 
दर्जा इंसान का दिलवा दो बाबू।
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू । ।
साभार:http://www.cec-india.org/

बच्चों को पढ़वा दे बाबू 
फटी कमीज सिलवा दो बाबू
हुआ कुपोषण अब बेकाबू
कोई दवा दिलवा दो बाबू 
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू । ।

काम काम में रपट गया था 
एक साथ का निपट गया था।
उसकी रपट तो लिखवा दो बाबू
मुजावजा तो दिलवा दो बाबू
                रोजगार दिलवा दो बाबू।
               अच्छे दिन दिखला दो बाबू ।

कविता: यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई .....दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई।

यहाँ दिल्ली का तात्पर्य दिल्ली में चलने वाली साजिशो से है। सत्ता की बदनीयती से है। ये शहर प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े नहीं करती। पेशेखिदमत है एक और सच ..........

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई ।

दिल्ली जहन में जहर घोलती है
धर्म के तराजू में इंसा तोलती है
दिल्ली का दिल भी फरेबी भाई
सत्ता भी होती किसकी लुगाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली के दलदल में ताकत आजमाना
सन के जो निकले वो नेता सयाना
दिल्ली में सच बस दवाई सा है भाई
झूठ का टेम्पो हमेशा हाई है भाई।

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली में ताकत है नोटों से वोटों से
अदालत में आर्डर आर्डर की चोटों से
दिल्ली से हुयी है जिसकी सगाई
उसकी तो बस निकल पड़ी है भाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली की दहलीज में लड्डू बताशे
यहाँ लोग ससटांग हो हो के आते
दिल्ली सियासत का संगम है भाई
धन्य है वही जिसने डुबकी लगाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई।

दिल्ली लुभाती है दिल्ली बुलाती है
सरेआम ईमान को फाँसी लगाती है
दिल्ली के चक्कर में आना ना भाई
दिल्ली ना सुनती किसी की दुहाई।

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।

दिल्ली का दिल भी बड़ा बेअदब है
पहले जो माँगो वो मिलता वो सब है
आने पे मौका रास्ता दिखाती है दिल्ली
फिर नंगा नाच नचाती है भाई

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।

फसादों की आग लगाती है दिल्ली
फिर लपटों में रोटी पकाती है दिल्ली
और देर तक मुस्कराती है दिल्ली
फिर सान्त्वना भी जताती है भाई

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।
-विक्रम

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