डॉक्टर सर्वज्ञ सिंह कटियार का यूँ चले जाना

पद्मश्री, पद्म विभूषण .... महान वैज्ञानिक ..... कानपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति के तौर पर तमाम दूरदर्शी परिवर्तन लाने वाले डॉक्टर सर्वज्ञ सिंह कटियार का यूँ चले जाना ... हम सबसे ... हमारी सभ्यता और संस्कृति से सवाल करता है .... ये अहसास दिलाता है कि आधुनिकता का दम भरती हमारी संस्क्रति हमारे तौर तरीक़ों का अन्त क्या है? क्या हम अस्त होते हुये सूर्य को  केवल गोधुलि बेला कहकर अपना पीछा छुड़ा सकते है।

जीवन की तमाम आपाधापी में रोज़मर्रा की ज़रूरतों और रोज़ी रोटी की दौड़ में .... जब हमारे बच्चे क्रेच में पलने को मजबूर है..... ऐसे समय में बुज़ुर्गों का क्या? जब परिवार छोटे होकर 2BHK में सीमित होते चले जा रहे है और हम आभासी दुनिया में रमे हुये है। तब क्या साथ साथ ही मानवीय मूल्य भी सीमित होते जाते है।  या ज़रूरत के सामने घुटने टेकते हुये हम जन्मदाता को भूलते जाते है। ये भूलकर कि अंत हमारा भी यही है। 


ख़ालीपन एक दिन हम और आपको भी सालेगा, दीमक की तरह चाट जायेगा....डॉक्टर कटियार जैसे बुद्दजीवी का इस तरह जाना नये सिरे से इच्छा मृत्यु का मसला उठाता है। जब जीवन साथी का साथ छूट जाना ...... ख़ालीपन अकेलेपन का कारण है....  शहरी संस्कृति में बात करने वाला कहाँ है कोईज़िन्दगी में बुढ़ापा एक डाकखाना समझिये जहाँ .... अब कोई चिट्ठी नहीं आती ना हाई जाती है। इंटरनेट के प्रभाव वाले ज़माने में अब बुज़ुर्गों का अनुभव भी आदरणीय नहीं रहा। हम दादी और माँ के हाथ का अचार खाने वाली संस्कृति से नवरंग अचार वाली संस्कृति बन गये ..... और अब सवाल ही सवाल है ....
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