भूखा मुँहनोचवा....

शहर में खौफ पसरा था, अखबार के दफ्तर के फ़ोन घनघनाने का सिलसिला थमता ही नही था। मुँह नोचने के अनवरत होते हमलों की खबरें अखबार में छायी थी। सूरज ढलते ही लोग दहलीज जे भीतर शरणागत होते, कुछ रंगबाजी करने के चक्कर मे छतों पर मंडराते।

विशाल, इस मुद्दे पर स्टोरी लिख रहा था। कलम मुँह में दबाये सोचता उन लोगो के बारे में जो शिकार हुये, आखिर  मुँह नोचवा केवल उन्ही इलाकों में क्यों नोचता है, जहाँ कम पढ़े लिखे लोग रहते है, कभी रईसों की बस्ती में क्यों नही जाता?? आर्य नगर, स्वरूप नगर, में कोई घटना नही अधिकतर घटनाएं ब्यस ग्वालटोली, बजरिया, सुतरखाना में क्यों? मैं तो रात दो बजे घर जाता हूँ दफ्तर से 10 किलोमीटर चल कर मुझे क्यों नही मिलता मुँह नोचवा!!!

जहाँ देवी आती है वही मुँह नोचवा भी आता है आखिर क्या कारण है, क्या अशिक्षा ही इस तरह के भ्रमो का कारण है???.... कि अचानक दफ्तर का फ़ोन कान बजाने लगा। विशाल ने फोन उठाया, ... जागरण से बोल रहे,....सुतरखाना से रामदीन बोल रहे है,  हमने मुँह नोचवा को धर लिया, जबर हौका है ससुरे को, ......निपट ही जायेगा।

मुँह नोचवा मारा गया की खबर आम थी, दूसरे दिन मुँहनोचवा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट छपी दो दिन से भूखा था, मुँहनोचवा, ओड़िसा के कालाहाण्डी का था, रोजगार की तलाश।में कानपुर आया था।

कानपुर का हाहाकारी मुँहनोचवा !!!

जैसे आजकल चोटी कटवा का सुर्रा चलायमान है उसी तरह 12-13 बरस पहले कानपुर में "मुँहनोचवा" का प्रकोप हुआ था। दैया- दैया करके कई मोहतरमाएँ अटरिया से कूद गई। आस पड़ोस के लोग रात-रात भर छत आकर पहरा देने की जुगत भिड़ाते और जरा सा हल्ला मचते ही हवा हो जाते। अखबार के दफ्तरों में फोन की घण्टियाँ 24×7 बजती। कितनो का मुँह नुचा इसके पुख्ता सबूत कभी नही मिले। हाँ हफ्ते से ज्यादा समय माहौल में खौफ पसरा रहा। कुछ मामलात तो ऐसे थे की लोगो ने खुद ही अपने मुँह नोच डाले थे, ध्यानाकर्षण हेतु  .....कानपुर पुलिस मुँहनोचवा की सच्चाई का पता कभी नही लगा पायी।....