गंगा जी में होता चल....

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

जब जन्मा तब था बनवारी
फिर ओढ़ी थी दुनियादारी
बहुत करी है झूठ पैरवी
अब तो सच्चा होता चल

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

आयी देखो हनक करारी
छूट गयी हर रिश्तेदारी
खुद को अपने पास बिठा
कुछ पैबन्द तो सीता चल

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

धर्म धर्म का राग जपा
सब गंगा पर लाद दिया
बहुत चढ़ावा चढ़ता आया
कुछ अच्छाई बोता चल 

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

मन मंतर हो माथे चन्दन
सर पे जटायें शंकर वाली
रख दे किनारे सारे झंझट
मार के हुक्का सोता चल

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

Link of poem at youtube :
https://www.youtube.com/watch?v=Jv6JdNrMIMQ&feature=youtu.be
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