लघु कथा: कलुआ

कलुआ को आज पुलिस फिर उठा ले गयी। कल प्रधान जी के टूबवेल से मोटर चोरी हुयी थी। पुलिस ने बिना  किसी मुकद्मे के फिर कलुआ २ दिन जेल रखा। साथ ही साथ थर्ड डिग्री भी। लौटते हुये चलना मुश्किल था। पुलिस की मार आदमी को खोखला कर देती है!! कलुआ महसूस कर रहा था।

जब से कलुआ का पानी लगाने के चक्कर में प्रधान से विवाद हुआ तब से मानों कलुआ ने पूरे सरकारी तंत्र से पंगा ले लिया हो। चकबन्दी में उसकी सड़क किनारे वाली जमीन का टुकड़ा भी बेच में कर दिया गया। समाज में रोज की बदनामी अलग। "कलुआ चोर है" का नारा भी गाँव में बुलन्द हो गया था।  गाँव में उठना बैठना मुहाल हुआ।

बिस्तर पे पड़ा कलुआ अपनी बेबसी पर कुण्ठित होता जाता। सोचता की आखिर क्या करें कहाँ जाय कैसे लोगो को ये बताये की वो गलत नहीं। गलत तो प्रधान है। कुछ न कुछ तो कुछ करना भी पड़ेगा अब तो वो पुलिसकी हिट लिस्ट में आ चुका है।  बात बात पर पुलिस उठा लेती है।  इसी ऊहापोह में रात बिना किसी को बताये कलुआ उठकर खेतो की तरफ बढ़ चला। प्रधान में खेत और घर में आग लगा दी।  ........ रस्ते में भागते हुये सोचता था की ठीक किया अब गाँव में नहीं रहना ...... बीहड़ चलता हूँ।
Post a Comment