"जिन्दगी सियासत के शामियाने" का अनावरण

सूर्या सँस्थान के एक कार्यक्रम में जिंदगी सियासत के शामियाने का अनावरण। डॉ रामशरण गौर जी अध्यक्ष दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, देवेन्द्र मित्तल जी, अशोक जी सम्पादक शुलभ इण्डिया, गायक और लेखक दीपक श्रीवास्तव की उपस्थिति में।
उपलब्धता:
https://www.flipkart.com/jindagi-siyasat-ke-shamiyane-mein/p/itmejveqxaxdg5jd?pid=9789386163134







"जिन्दगी सियासत के शामियाने में", आदणीय अनुप्रिया पटेल जी के साथ

मौसम सर्द है और सियासी पारा चढ़ा हुआ। कयासों और प्रयासो का दौर है। अनवरत घनघनाते फ़ोन, प्रत्याशियों की प्रत्यशाएँ, दिल्ली में दिग्गजोंं के माथे पर शिकन छोड़ रही है। ऐसे में आज एक बेहद शान्त और स्वछन्द मुलाकात युवा तुर्क, कद्दावर नेता, केन्द्रीय मन्त्री आदरणीय अनुप्रिया पटेल जी से, चाय पे लम्बी चर्चा और इत्तफाकन मेरी पुस्तक का जिक्र।

वो यकीनन गौरव के क्षण थे जब अनुप्रिया दीदी ने एक के बाद एक मेरी कई कविताये पढ़ी और कहा बहुत खूब विक्रम....लेखन जारी रहे, खासकर तौर पर "हुज़ूर एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर", "दिल्ली सियासत का सेन्टर है भाई", "आओ करे CBI जाँच की माँग" का जिक्र किया।

किताब की उपलब्धता:
https://www.flipkart.com/jindagi-siyasat-ke-shamiyane-mein/p/itmejveqxaxdg5jd?pid=9789386163134





How to use BHIM App, Introduction os usages and technology

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1.What is BHIM-. Bharat Interface for Money App.
2. How we can use this, as a option mobile vallet,
3. How it is using UPI, it is just extension of IMPS.
4. How your account listed just via phone no.
5. How instant transfer work.
6. UPI pin generation, what u need.
 7. Precautions to be taken.

आल्हाखण्ड: बेतवा मैदान की लड़ाई

ऊदल पहुँचा गढ़ सिरसे में
गज मोतिन ने कहा सुनाय
अब क्यों आये गढ़ सिरसे
तुमको पड़ी कौन परवाय
ऊदल ऊदल करते मरा मलखा
तब तुम क्यों नज़र ना आये
रोते रोते ऊदल बोला
ऐसी वाणी बोलो नाय
जब जब ऊदल घिरा भीड़ में
तब तब चमकी मलखे की तलवार
ऊदल ऊदल करता मरा है दादा
मेरे जीवन पर धिक्कार

रानखेतो में पहुँचा ऊदल
मार मार कर दिया मैदान
कट कट मुण्ड गिरे धरती पर
उठ उठ रुण्ड पुकारे जाय
मरे के नीचे जिन्दा घुस गये
कैसे जान बचेगी हाय
कुछ सुमिरे है रामचन्द्र को
कुछ सुमिरे शारदा माय
आधा हाथी रण में जूझे
आधा लिये महावत जाय
खेत छोड़कर भगा चौडिया
आगे बढे पिथौराराय
देख के गरजा रणबंका
और पृथ्वी से कहा सुनाय
एकला जान मार दौ मलखे
तुमने सिरसा घेरा जाय
पहला वार करो तुम मुझ पर
अपने अरमान निकालो आय
इतना सुन के पृथ्वी जल गया
गुस्सा भरा बदन में आय
मार निशाना साँग चला दी
देख वार को ऊदल हट गया
अपनी ली है जान बचाय
और बेंदुला बढ़ा अगाड़ी
जैसे कला कबूतर खाय
दो पैर धरे गज मस्तक पर
और ऊदल दी तलवार चलाय
जार बेजार हुये पृथ्वी अब
और गिरे धरा पर आय
ये सब देख रहा नर धांधू
आगे बढ़ कर ऊदल रोका आय
पृथ्वी की ली जान बचाय
पैर उखड गये लश्कर के
छोड़ छोड़ भगे मैदान

मंडलीक आल्हा की कनवज में कैद

जैसे ही वीर मलखान की मृत्यु की खबर आल्हा तक आती है, आल्हा कनवज के राजा जयचन्द के दरबार में सिरसा कूच की आज्ञा लेने जाते है किन्तु जयचन्द उन्हें कैद करवा लेते है। ऊदल को खबर लगती है।

जैसे खबर मिली ऊदल को
बंध गये मंडलीक अवतार
झपट के बँगले पहुँच गया
जिसने बाँधा मंडलीक को
उसका रहा काल ललकार
देख के हालत नर आल्हा की
नैना भये लाल अँगार
झपट के कब्जाया जयचन्द को
और सीने पर हुआ सवार
कौन सूरमा तेरी फौजो में
जो झेले ऊदल का वार
बाद में जायूँ गढ़ सिरसे की
पहले तेरा खटका देयु मिटाय

आल्हा खण्ड: मलखान की मृत्यु (Alha Khand Malkhan kee mrityu)

जहाँ आल्हा की लगी कचहरी
एक हलकारा पहुँचा आन
नौलख दल से सिरसा घेरा
जिसका नाम धनी चौहान
रणखेतों में कई दिना तक
एकला लड़ा वीर मलखान
जुलम गुजार दये पृथ्वी ने
सिरसे डालो मलखे मार
होश बिगड़ गये बनाफरो के
ऊदल गये सनाका खाय
एक पल गरजे एक पल बरसे
मन में सोच-सोच रह जाय
देवला रोवे मछला रोवे
महलों गया है मातम छाय
अब गरजा है रणबंका और
आल्हा से कहा सुनाय
कूच की भैया आज्ञा दे दो
अब क्यों रखी देर लगाय
एकले मलखे के बदले मैं
सबके लेयू शीश उतार
खेद-खेद दिल्ली तक मारू
जिसका नाम पिथौराराय
खोज मिटा दूँ चौहानों की
जिन्दा किसी को छोड़ू नाय
इतना कह कर ऊदल सज गया
उड़ा बेंदुला पंख लगाय।

शहर का मौसम चुनावी है।

बढ़ गयी है इज़्ज़त लोगो की
शहर का मौसम चुनावी है।

फिर सज गये सुरमयी सपने
मानो आसमाँ का रंग गुलाबी है

गले बजने लगे है माइको के
वादे और बातें सब किताबी है।

घर पे दस्तक दिन में होती बारहा
विनम्रता हमला है जवाबी है

मौका दे फिर एक बार मुझको
पास मेरे खुशियो की चाभी है।

@विक्रम


सुना है नौकरी करने कार्पोरेट दफ्तर जाता है।

तनाव ओढ़ता है और तनाव ही बिछाता है
सुना है नौकरी करने कार्पोरेट दफ्तर जाता है।

नफे,नुकशान का सजा बाजार है हरदम
रेशमी बातों से यहाँ कारोबार किया जाता है

ऊँची इमारतों में कशिश होती है बहुत
मिलावटी खुशबुयो पे ऐतबार किया जाता है

सच कह नहीं पाता,मैं थामकर दामन झूठ का
जो है ही नहीं उसी का इश्तेहार दिया जाता है।

@विक्रम 

पिथौराराय (पृथ्वीराज)और ऊदल के बीच का सम्वाद रण क्षेत्र में

अलंकार और वीररस.................
"चन्द्रावल का डोला दे दो 
अब तुम रार बढ़ाओ नाय
जो ये बात नहीं मानी तो
गढ़ महोबे में जिन्दा बचे कोई भी नाय
इतना सुनकर ऊदल जल गया
गुस्सा भरा बदन में आय
सांग खींच लाई ऊदल ने
जैसे शेर तामेड़ा खाय
काले बादल की लाली में
जैसे बाज रहा मंडराए"

आल्हाखण्ड: जगनिक के परमाल रासो की कुछ अंश जो  आल्हा गवैयों  मुँह से सुना 
AlahaKhand, Jagnik, parmalraso 

पैबन्द जिन्दगी के सारे दिखे मुझे ( Paiband Jindagi ke saare dikhe mujhe)

उस रात आसमा पे कुछ तारे दिखे मुझे
पैबन्द जिन्दगी के सारे दिखे मुझे

दवायो पे जिन्दगी, दुआओ का चलन है
लोग दीवाने सारे के सारे दिखे मुझे

थी पते की बात कि हलक में रुक गयी
चहु ओर दुश्मनों के हरकारे दिखे मुझे

आँखों से बह गये जलते सवालात कई
लुटती हुयी आबरू के नज़ारे दिखे मुझे

सर्वधिकार सुरक्षित
विक्रम

Us raat asmaan pe kuch taare dikhe mujhe
paiband jindagi ke saare dikhe mujhe

davayo pe jindagi hai duyayo ka chaan hai
log deewane saare ke saare dikhe mujhe

thee pate kee baat kee halat me ruk gayi
chauhoo ore dushmano ke harkaare dikhe mujhe

aankohn me bah gaye jalate savalaat kayi
lutti huyi aabru ke nazare dikhe mujhe
@Vikram




माँ किसी किताब की जिल्द कि तरह ....

अपने सर लेती है बलाएँ मेरी
माँ किसी किताब की जिल्द कि तरह।

बड़ी परेशानियाँ और बहुत आपाधापी
माँ है कि नज़र आती दवाई कि तरह |

संसद खोजता है लोकतन्त्र कहाँ है किधर है?

दिल्ली खुद दर-बदर है, सियासत तरबतर है 
संसद खोजता है लोकतन्त्र कहाँ है किधर है?

दिन कई गुजरते रहे है घोषणायों के दौर में 
हकीकत का ताना और बाना शून्य है सिफर है । 

हो गयी है रात देखो मत निकलना घर से अब
घात में है जुर्म बैठा ये संगीनों का शहर है।

खुद्दारियो को रख के अलमारी में लगा दो ताला 
बोलना मत कुछ फ़िज़ायों में हर तरफ जहर है ।