पैदल हमेशा से मात खाता हुआ

लोकतन्त्र अभी आया है क्या?
कोई खबर मिले तो चस्पा करे!!
सड़क पर चलता हुआ पैदल,
सड़क पार करने की फिराक में,
कभी सड़क के इस किनारे,
कभी उस किनारे,
कभी जेब्रा क्रासिंग पर
कंफ्यूज सा जान की खैर मनाता हुआ
गालियाँ खाता हुआ
सड़क पार की,

वहीं उसी सड़क पर
बुलेट प्रूफ बख़्तरबंद में पैक
भारी लाव लश्कर से लैस
सड़क पर पूरी हनक से
पूरे रसूख से
पूरे हक़ और हुकूक से
सायं सायं सायरन बजाते हुये
बजीर निकल गया!!!
वाकई लोकतन्त्र आया क्या?
पैदल हमेशा से मात खाता हुआ
अधिकारों की पुंगी बजाता हुआ
बजीर, राजतंत्र की नजीर
स्थिति गम्भीर
लोकतन्त्र आया क्या?
मिलेगा तो बताईयेगा!!!

फेसबुक चस्का है, चरस है

फेसबुक चस्का है,  चरस है 
सेल्फी चिपकाने,
फीलिंग फैलाने,
अपनी खुशियाँ बताने की हवस है
फीलिंग हैप्पी, फीलिंग सैड,
अम्मा, बच्चा बाप भी मैड,
फीलिंग्स की हवाई फायरिंग,
रिश्तों और मित्रता की आभासी वायरिंग,
में धाराप्रवाह डेटा,
भारत से अमरीका और फिर 
अमरीका से भारत 
आ रहा है, जा रहा है।
देखलो फेसबुक 
आदमी को पोपला 
सामजिकता को खोखला बना रहा है
भारत की एक तिहाई जीडीपी खा रहा है।
भारत की एक तिहाई जीडीपी खा रहा है।



अपराध,बलात्कार, निलम्बन, बहाली और राजनीति

देर रात हाईवे पर एक नाबालिग और एक प्रौढ़ के साथ बलात्कार हुया। देर रात घटना को दबाने की कोशिश भी हुयी। देर सुबह कुछ पुलिसवालों के निलम्बन की खबरें आयी और देर शाम कुछ बड़े अधिकारी भी नप गये। लखनऊ से बड़े लोगों का आना जाना शुरू हुआ। कुछ गिरफ्तार हुये, कौन थे कौन है पता नहीं चला। सियासत शुरू हुयी पर एक सवाल कल भी कायम था आज भी कायम है। व्यवस्था में क्या सुधार आये?? वो कौन से साकारात्मक कदम उठाये गये जो। जो घिनौने अपराध से हिले हुये हुये लोगो सम्बल दे । पीड़ित को न्याय दे। इस सवाल के जवाब में रोज अखबार खोलता हूँ बन्द करता हूँ किन्तु ढाक के तीन पात ही नज़र आते है। 

मुख्यमन्त्री जी से कुछ सकारात्मक की आशा थी। उनका बयान भी आया, बचने बचाने की जुगत में दिखे। बयान में सियासत बहुत दिखी, ईमानदारी बहुत कम। मेरी नज़र में बुलन्दशहर की घटना 16 दिसम्बर ( निर्भया घटना ) से भी ज्यादा शर्मशार कर देने वाली है। उस दर्द के कारण जो एक नाबालिग बेटी ने जिया, वहीं आस-पास ही उसकी माँ ने जिया। वो दर्द जो एक बाप ने जिया, खुद का दर्द, पत्नी का दर्द और सबसे बड़ा, सबसे भारी बेटी का दर्द। वो दर्द, वो भय जो ताउम्र उस पिता हो सालता रहेगा। पीड़ित परिवार को अब जिन्दा लाश ही मानिये। वो पीड़ित है किन्तु अपराध का भर उन्हें ही सहना होगा। इस सबके बीच इस सच को मुख्यमंत्री जी शायद अपनी व्यस्तता या शायद किसी सियासी भय के कारण दरकिनार कर गये। बेहतर होता इस मामले में वे सीधे बोल बोलते। बेहतर होता की बहुत ही पारदर्शी तरीके से वो पूरी सरकारी ताकत पीड़ित को न्याय दिलाने के लिये झोक देतें। एक ऐसा अद्वितीय दण्ड जो अपराधियों की जान हलक तक ले आये दिलवाने की कोशिश करते। 

भारत में आँकड़े कभी सच नहीं बोलते। जाहिर है आँकड़ें हमेशा मैनिपुलेट किये जाते है। छोटे-छोटे अपराधो को दबाकर आँकड़ें तो बेहतर होते है किन्तु ये बड़े और विकृत अपराधो के लिये अपराधी को मनोबल देते है। हमारे प्रदेश और समूचे देश में प्रवृत्ति हमेशा से रही है। ये अघोषित सत्य रहा है की छोटे-मोटे मालमात की प्राथमिकी कभी नहीं होती। यही छोटे-मोटे अपराधी किसी दिन बड़े और विकृत अपराध को अंजाम देते है। हम गिरते मानवीय मूल्य और क्षरण की ओर जाती सभ्यता में जी रहे है। ये क्षरण किस हद तक होगा मालूम नहीं किन्तु। इस तरह की घटना में ना जिम्मेदारियों से हम बच सकते है ना ही सरकार। ये जरूरी है कि ईमानदार प्रयास हो। पुलिस प्रसासन की कार्यप्रणाली में लम्बे समय से चली आ रही खामियों को उजागर कर सुधार किया जाय तो ये बेहतर तरीका होगा बजाय इसके की उन्हें अनवरत छिपाते रहा जाय। ये भी किसी से छिपा नहीं है की प्रदेश पुलिस बल की भारी कमी है। जरूर है कि उसे पूरा किया जाय। किन्तु इन सबके बीच कार्यप्रणाली में पूरी पारदर्शिता का होना भी जरूरी है। निलम्बन का हथियार केवल एक बहाने जैसा लगता। एक फौरी मानसिक राहत जैसा। निलम्बन के बाद बहाली हमेशा होती है। कुछ की जल्दी कुछ की थोड़े दिनों में किन्तु लोकतन्त्र और कानून व्यवस्था का निलम्बन कभी का भूलने वाला दर्द दे जाता है। सभ्यतायों और उसके निगहबानों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

भक साला सब बेकार!!!

पिछले इतवार को,
छत पर गया,
कुर्सी,अखबार और चटाई  टाँग कर 
छत पर जाकर,
दूरतक नज़र दौड़ाई 
दुनियादारी में लगे 
फॅसें लोगों देखा,
कुछ सोचा, कुछ कोसा,
थोड़ा इधर, 
थोड़ा उधर, 
ताकाझाँकी की 
मोहल्ले का मुआयना किया,
मन ही मन बातें की,
थोड़ा इसको थोड़ा उसको गलियाया,
कुर्सी डाली,
बैठ गया,
जबर अँगड़ाई ली,
अखबार पर चढ़ाई की,
अखबार पूरी चौड़ाई तक फैलाया,
सूरज के ताप को धता बताया,
एक एक खबर पढ़ी,
फिर पूरा अखबार घोट डाला 
मोहल्ला, नगर, देश विदेश तक 
हर खबर, 
का स्टीकर मन में चिपकाया,
नेता, मन्त्री, से लेकर ओबामा तक 
सबको गलियाया, 
देश का कुछ हो नहीं सकता,
आदमी ठीक हो नहीं सकता 
भक साला सब बेकार!!!
थके अलसाये हुए शरीर और मन के साथ 
फिर नीचे गया,
एक कटोरी में कड़वा तेल लाया  
सर पर चुपड़ा,
सर थपथपाया,
फिर पूरे बदन में लगाया,
सूरज के ताप से बंद होती 
आँखों को जोर से मीशा 
ले-देकर चटाई बिछाई,
और फ़ैल गया,
टाँगें फैलाकर,
सूरज से मुँह चुराकर 
देर तक नींद के नशे में सुस्ताता रहा,
देर तक नींद के नशे में सुस्ताता रहा। 

@विक्रम  सर्वाधिकार सुरक्षित 



चौराहे पर लुटता चीर....

बुलन्दशहर की घटना पर जनाबेआली आज़म खान की टिप्पणी आयी!!! ये सोचने में कई लम्हात खर्च हो गये कि राजनीति कितनी क्षुद्रता तक जा सकती है। आदमी की जबान को कितना बेशर्म और कितना बेकाबू बना सकती है। इसी झंझावात से दिमाग थोड़ा बाहर निकला तो अटल जी की कालजयी रचना याद आयी।

चौराहे पर लुटता चीर,
प्यादे से पिट गया वजीर,
चलू आखिरी चाल की बाजी छोड़,
विरक्ति रचाऊँ मैं,
राह कौन सी जाऊँ मैं .....