नज़रबन्द मानवधिकार, ईरोम चानू शर्मिला और मलोम हत्याकाण्ड।

ये सनद रखते हुये कि भारत गाँधी का देश है।जरा गौर करे 15 साल अनशन पर रही ईरोम शर्मिला। सन 2000 में मलोम हत्याकाण्ड के विरोधस्वरूप AFSPA को हटाने की मांग को लेकर। मालोम हत्याकाण्ड में 10 लोग मारे गये। मारे गये लोगों में २ लोग" नेशनल ब्रेवरी अवार्ड" प्राप्त थे, ८ वर्षीया लड़की और 62 वर्षीया महिला भी!!

शर्मिला का विरोध कहाँ गलत था?  कोर्ट ने कछुआ चाल चलते हुये 14 साल बाद पूरे मलोम हत्याकाण्ड को फर्जी बताया। वैसे भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विरोध हक़ है। शायद AFSPA पर ईरोम की बात सुननी चाहिये थी। बीच का रास्ता निकलना चाहिये था। भारत का सम्विधान कहता है 100 दोषी छूट जाये तो ठीक किन्तु निर्दोष की सजा नहीं होनी चाहिये। ऐसे में मलोम हत्याकाण्ड निरंकुशता ही तो थी।मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन ही तो था।
साभार:http://www.livemint.com/

मुझे अखबार की वो खबर आज भी याद है जब जन्तर-मन्तर में आसाम रायफल्स के खिलाफ शर्मिला के समर्थन में 30 महिलायों के नग्न प्रदर्शन की खबर छपी थी। ये बैनर लेकर की "Indian Army Rapes Us" यहाँ भी मौका था की बीच रास्ता निकाला जाता। किन्तु नग्न हुयी महिलायों को 3 महीने के लिये जेल भेज दिया गया। अभी भी वक्त है। कोई तो हल निकाल ही सकती है सरकार।

खैर सरकार जिद्दी हो सकती है कुछ मजबूरियाँ भी हो सकती है। पर ईरोम शर्मिला असाधारण है। उनके लम्बे और असाधारण संघर्ष को परास्त होते देखना बड़ा कष्टदायी है। 1957 से लागू AFSPA के नफे और नुकसान की समीक्षा भी सरकार की जिम्मेदारी है। नफे और नुकसान पर क्यों ना भारत सरकार एक स्वेत पत्र जारी करके ये बताये की मानवधिकारों को अब तक नज़रबन्द रखने से क्या नफे हुये। बेमियादी नज़रबंदी पर सवाल उठने तय है।

मजदूरी कर रहे है, घर चला रहे है।

दिल्ली के कड़क लौण्डे,
खोज-खोज के बैंड बजा रहे है,
आप के विधायक रोज जेल जा रहे है,
सलमान खान जश्न मना रहे है,
संजय दत्त फिल्मे बना रहे है,
नेताजी चुनाव की रणनीति बना रहे है,
आदर्श सोसाइटी पर विचार किये रहे है,
स्कूल फीस बढ़ा रहे है,
बाकी हमारे जैसे दफ्तर जा रहे,
मजदूरी कर रहे है, घर चला रहे है,
देश का खर्च चला रहे है।

नोयडा का साइकिल ट्रैक प्रोजेक्ट और उसकी चुनौतियाँ

दिल्ली जाईये, रिहायशी इलाको में सड़क की चौड़ाई को आधा करती पार्क वाहनों की कतारें, इन्ही वाहनों का बोझ उठाता फुटपाथ, चलने की लिये रस्ते की जुगत भिड़ाते पैदल, जगह जाम की स्थिति और बात-बात पर सर फुटब्ब्ल की नौबत। ये दिल्ली का मोटा-मोटा सा खाका खींचा है । अखबार पढिये कभी NGT, कभी न्यायालय, कभी सरकार छोटे-मोटे गैर स्थायी तरीके अपनाकर प्रदूषण और यातायात दोनों की समस्या साथ चोट करना चाहती है। किन्तु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। ऐसे समय में ये सोचने की जरूरत जाहिर है की इन सब समस्याओं का स्थायी निवारण किस तरह से सुनिश्चित किया जाय।  

ऐसे में दिल्ली से राष्ट्रीय राजमार्ग -24 होते हुये नोयडा के सेक्टर -62 में प्रवेश करिये। तो कुछ उम्मीद भरे प्रयास आपको दिखेंगे। नज़ारा देखकर नज़रे टिकी रह गयी। सेक्टर -62 के थाने, IIM लखनऊ के कैंपस से होकर गुजरने वाली सड़क के दोनों ओर लालरंग की कारपेट सी बिछी नज़र आती है । इस कारपेट पर और इसके किनारे लगे बोर्डस पर कई जगह साइकिल के निशान बने हुए है। जाहिर है की साइकिल के लिये समर्पित पथ का निर्माण किया गया है । ये न सिर्फ देखने में आकर्षक था बल्कि मन में उत्साह भर देने वाला है। मेट्रो शहरों में रहने वाले लोग जिन्हें अपना स्वास्थ्य दुरुस्त रखने के लिये सुबह-शाम जिम में जाकर कृत्रिम साइकिल चलनी पड़ती । ऐसे में यदि साइकिलिंग रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाये। तो ये एक सपने के सच होने जैसा ही तो है। बिना किसी खर्चे, बिना किसी प्रदूषण के आप गन्तव्य तक पहुँच रहे है। किन्तु इस सपने के साथ कुछ चुनौतियाँ भी है। जो अभी कायम नज़र आयी।
साभार: http://www.hindustantimes.com

साइकिल ट्रैक के साथ-साथ चलिये, आप पायेंगे की इस ट्रैक का इस्तेमाल इक्का-दुक्का लोग ही कर रहे है। हालाँकि कुछ लोग साइकिल से मुख्य मार्गो में चलते दिखते है पर साइकिल ट्रैक से दूर नज़र आते है कई जगह पर साइकिल ट्रैक पर कारों ने अतिक्रमण किया हुआ है, कई जगह स्ट्रीट वेंडर्स भी खड़े दिखायी देते है। केवल कुछ एक चौराहों पर साइकिल चालकों के लिये विशेष ट्रैफिक लाइटिंग सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया है। किन्तु इसका पालन कितना होगा ये सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है? ये अभी तक जाहिर नहीं है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं है तब तक लोगों को साइकिल का इस्तेमाल करने के लिये प्रेरित करना दूर की कौड़ी होगी। देश और खासकर प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं की आँकड़े सीधा संकेत करते है कि सड़क पर किसी भी तरह का दुपहिया वहां चलाने में पहली जरूरत है चालक की सुरक्षा। सुरक्षा के कड़े मानदण्ड तय किये बिना इस प्रोजेक्ट की सफलता एक मारीचिका को पाने की कवायद भर है।


अतैव दीगर है नोयडा के साइकिल ट्रैक के रख-रखाव, नियमित जाँच, यातायात के नियमों के पालन इत्यादि को सुनिश्चित करने के लिये अलग से अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित होनी चाहिये। इस बावत एक हेल्पलाइन की व्यवस्था हो जो 100 नंबर जैसी व्यवस्था के समानान्तर हो, जिमसें शिकायत निवारण के जिम्मेदारी भरी व्यवस्था हो। कुल मिलाकर साइकिल सवारों की शिकायत को प्राथमिकता से सुना जाय।


इसके साथ सहकारिता के सिद्धान्त को भी साथ लेकर चला जा सकता है।  पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की तर्ज पर लोगो को भी जोड़ने की जरूरत है। जहाँ-जहाँ से होकर ट्रैक गुजरता है उसके आस-पास या सामने स्थित संस्थानों को ट्रैक की निगरानी की जिम्मेदारी दी जाय। मतलब यदि ट्रैक पर अतिक्रमण है, कोई नया काम चल रहा है तो पुलिस या जिम्मेदार अधिकारी को सूचित करना उनकी जिम्मेदारी हो। खासकर नोयडा में RWA इसमें महती भूमिका निभा सकते है। 

कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया प्रवास के दौरान रोजमर्रा के कामो में साइकिल का इस्तेमाल भरपूर होता देखा है। साथ ही साथ ये  की सड़क पर चलने वाला पैदल या साइकिल सवार किसी भी बड़े वाहन पर प्राथमिकता पता है। यदि किसी कारणवश पैदल या साइकिल सवार को किसी भी तरह का नुकसान पहुँचता तो मान लीजिये की कानून पूरी मजबूती के साथ पैदल या साइकिल सवार के साथ खड़ा होगा। यहाँ पर अलग से साइकिल ट्रैक, जगह-जगह पर साइकिल को बाँध कर रखने वाले स्टैण्ड उपलब्ध है। यहाँ की लोकल रेल और बस में साइकिल लेकर चलने की सुविधा उपलब्ध है। ये साइकिल प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री  नीदरलैण्ड से लेकर आये है। सो ये समझना भी जरूरी है की सत्तर के दशक में गाड़ियों का देश बन गये नीदरलैण्ड ने अनवरत होती साइकिल सवार बच्चों और बड़ो की होती मौतों के उपरान्त हुये सांकेतिक धरना प्रदर्शनों को संज्ञान में लेते हुये। साइकिल सवारों को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ बनायीं। अलग से साइकिल के ट्रैक बनाये, नियामक संस्थाएँ बनायीं। आज नीदरलैण्ड पुनः साइकिल सवारों का देश है।


कुछ आँकड़ों पर नज़र: 
- उत्तर प्रदेश में साइकिल की खरीद पर वैट हटा दिया गया है। 
- नोयडा में कुल मिलाकर ४२.5 किलोमीटर लम्बा ट्रैक बनाने का प्रावधान है 
- ग्रेटर नोयडा, लखनऊ, आगरा, आगरा से इटावा लायन सफारी तक साइकिल ट्रैक का काम चल रहा है। 
- देश में सड़क दुर्घटना में मरने वालो में 25 प्रतिशत लोग दुपहिया वहां वाले होते है।

हर दहलीज़ लाँघ गयी जिन्दगी

हर दहलीज़ लाँघ गयी जिन्दगी 
अब चैन कहाँ और सुकून कहाँ। 

आपाधापी में खुद ही उलझ गये  
अब वो फुरसत का मजमून कहाँ।

        ना अदब आशिकी में, ना मौज मौसिकी में
अब मौजो में वो जूनून कहाँ।


@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित 




बहुत मुँहफट है, बहनजी

दलित आन्दोलन के प्रणेता थे मान्यवर कांशीराम जी। बहनजी उसी आन्दोलन के राजनीतिक पैदाइश है। आन्दोलन और उसके मूल्यों से बहनजी का धेले भर का लेना देना नहीं है। जिस तरह अण्णा जी के आन्दोलन से केजरी निकले बिलकुल उसी तरह मान्यवर कांशीराम जी के एक लम्बे और मूल्यों पर आधारित आन्दोलन से जन्मी बहनजी।  मान्यवर कांशीराम जी को और उनके परिजनों को उनके अन्त समय में किस तरह प्रताड़ित किया गया। ये बहनजी  से बेहतर कौन जानता है?? बहुजन समाजवादी पार्टी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तानाशाही पार्टी है।

कुछ रोज पहले बीजेपी के नेता ने बहनजी पर जी पर जो टिप्पणियाँ की, उनके से अन्त में की कई एक टिपण्णी विशेष को छोड़ दिया जाय तो ये बात तो सही ही है ना कि बहनजी टिकट बेचती है!!! उनके पूर्व सिपहसालार स्वामीप्रसाद जी में भी यही बात कहीं थी। बहुजन समाजपार्टी से जुड़े अधिकतर लोग भी यही कहते आये है कहते है। निचले सदन के विधायक, एमएलसी सभी का टिकट बेचा जाता है। एक मुकदमा एक कार्यवाही उन भी बनती है।

खैर, बहनजी की खुद भी तो बहुत मुँहफट है बहुत मुँहफट,  गाँधी से लेकर देवी देवतायों तक को नहीं बक्शा। आज बयान आया है की वो देवी, पर ये नहीं क्लियर किया की कौन सी देवी है जो अक्सर गाँव घरों में आ जाती है या जो मंदिर में बैठती है। 


तब हाथो में किस्मत की लकीर आयी है ।

अक्सर सजाता रहा ख्वाब मखमल के
तब जाकर पैरो तले जमीन आयी है।

उम्र गुजारी है दस्तकारियों में हुज़ूर
तब हाथो में किस्मत की लकीर आयी है ।

मान लिया की नहीं हूं किसी मजहब का मैं
अब देखिये थोड़ी बहुत तहजीब आयी है।

अब मुकद्दर से लड़ना छोड़ दिया विक्रम
जो जिन्दगी आयी है बड़ी लजीज आयी है।

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित

भारतीय रेल की लेट लतीफी पर एक विचार

आज श्रमशक्ति एक्सप्रेस रास्ता चलते-चलते बिदकने लगी, इतनी बिदकी इतने नखरे दिखाये की कानपुर सेण्ट्रल आते-आते पूरे 3.30 घण्टे लेट हो ली।

कुछ छात्र भी ट्रेन में थे, जो दिल्ली से कानपुर कोई प्रतियोगी परीक्षा देने आये थे। परीक्षा 10 बजे से शुरू थी। ट्रेन जितना बिदकती रही उतनी ही हवाईयां छात्रों की उडी रही। सेण्ट्रल में ट्रेन आयी 10.05 मिनट पर, तय था की छात्र परीक्षा छूट गयी।

अब ऐसे मामलात में क्या छात्रों ने जो द्वन्द सहा जो पीड़ा सही, जो हानि हुयी उनकी, उसकी  भरपाई की जिम्मेदारी क्या रेलवे की नहीं है??? वो रेलवे तो तत्काल टिकट कराने पर वरिष्ठ नागरिक को वरिष्ठ मानती ही नहीं, वो रेलवे जो प्रीमियम तत्काल में फ्लाइट के टिकट से भी ज्यादा चार्ज करती है। वो रेलवे जो तत्काल टिकट कैंसिल कराना पड़े तो पूरे पैसे डकार जाती है। तत्काल में टिकट कैंसिल करने पर क्या सीट खाली जाती है जो पूरा पैसा डकार जाया जाता है?? भारत की किसी ट्रैन में कोई सीट खाली जाती बजी है क्या? सामान्य टिकट कब और कैसे बुक होती है ये शायद आपको ध्यान भी ना हो।

कुल मिलाकर रेलवे जिस तरह की खुला दोहन कर रहा है उसके पश्चात लेट लतीफी पर हुये नुकसान की भरपाई रेलवे की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिये। भक्तगणों के हमले की पूरी उम्मीद है।

.... सियासत की और सियासतदार मशहूर हो गये।

सैकड़ो गलियाँ, हज़ारों घर बेनूर हो गये
सियासत की और सियासतदार मशहूर हो गये।

निगाहों ने देख लिये कैसे कैसे मंजर 
झुक गयी निगाहे और हम मजबूर हो गये। 


थोड़ी ही दूर चले है राहें जिन्दगी में 
अभी से थक गये थककर चूर  हो गये है। 

शहरों में  जीते रहे जो अक्सर जिन्दगी अपनी 
शहरी  हो नहीं पायें गाँवों से भी दूर  गये। 

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित 

....भूतो ना भविष्यति

मामला मेरे संज्ञान में नहीं,
जाँच चल रही है,
कड़ी कार्यवाही होगी,
अपराधियों को बख्शा नहीं जायेगा,
ये जुमले है? 
ढाढ़स बाँधने के तौर तरीके है?
व्यवस्था चलाने के सलीके है?
या जिम्मेदारियों की थूकी पीकें है?

रोज सुबह अखबार में,
पढ़ता हूँ, सोचता हूँ,
क्या हुआ?
क्या होने को है?
क्या हो पायेगा?
भूतो ना भविष्यति ही,
चरितार्थ होता, होता जायेगा।
@ सर्वाधिकार सुरक्षित

अग्रिमा की आर्ट

...इन्साफ फ़ुटबाल है

इन्साफ फ़ुटबाल है
इंसान फ़ुटबाल है
न्यायालय टकसाल है,
इंतज़ार का,
दुर्व्यवहार का

कानून जुनून है
सत्य को दबाने का
मनमाफिक करने का
लोगो को धरने का
सच को हरने का

न्यायालय में,
न्याय के थोक और फुटकर विक्रेता
अदालतों के विजेता
अपील करने में
जलील करने में
माहिर,
पीड़ित की लिखाई पढ़ाई
पीड़ित से कमाई धमाई
थोड़ा बहस थोड़ा मुहावसे
बाकी तारीख,

और पीड़ित
न्याय को पकड़ने में
जकड़ने में 
के बॉल सफ़ेद
चप्पले घिसी हुयी
झुर्रियां पड़ी हुयी
मुसीबतें खड़ी हुयी
बीबी लड़ी हुयी
बेबसी जड़ी हुयी
नींद उडी हुयी
कभी छले जाने का दर्द
कभी न्याय ना पाने का दर्द
दर्द ही हमसफ़र
दर्द ही हमदर्द

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित

....... फिर से नर्सरी में पढ़ाई शुरू करते है।

फुरसत की ईकाई दहाई शुरू करते है
फिर से नर्सरी में पढ़ाई शुरू करते है। 

एक ही कमरे में बैठकर गुथमगुत्था 
भाईयों बहनों से लड़ाई शुरू करते है। 

लूटकर लानी है गर वो पतंग फिर से
तो फिर मिल के चढ़ाई शुरू करते है। 

खेलते है खेल डॉक्टर मरीज वाला 
मुफ्त में एक दूसरे की दवाई शुरू करते है। 

गमजदा रहने में लुत्फ़ कहाँ आता है 
वो बच्चों सी निश्छल हँसाई शुरू करते है।  

@Vikram All Rights Reserved

जैसे रौशनी से सगाई कर ली।

मैंने तुझसे लड़ाई कर ली
अपनी जिन्दगी परायी कर ली।

वो देखो कैसे चमकता है चाँद
जैसे रौशनी से सगाई कर ली।

फूलो के खिलने का सिलसिला है
जैसे पौधों ने छटाई कर ली

जब भी उठा है दर्द जहन में
अपने आप ही अपनी दवाई कर ली

किसको बुलाते फिरते इधर उधर
अदालतों में हमने खुद ही गवाही कर ली।

@Vikram all rights reserved.

चुप रहता हूँ, जुर्म को हवा देता हूँ.....

जब भी होता है, दर्द दवा लेता हूँ
हर बार सच को छुपा लेता हूँ।

खड़ा रहता हूँ, तमाशाई बनकर
चुप रहता हूँ, जुर्म को हवा देता हूँ।

जिन्दगी मुझसे कभी सँवर नहीं पायी
आग है, पर अधूरे हक़ से हवा देता हूँ।

आओ तुम भी बैठो मेरे साथ कभी
ग़मों में मुस्कराने की अदा देता हूँ।

ऐ मालिक मेरा हक़ ना छीन मुझसे
मैं भी दरबार में तेरे हाजिरी लगा देता हूँ ।

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित



ये जुलाहे तेरी कारीगरी की दरकार है मुझको

ये जुलाहे तेरी कारीगरी की दरकार है मुझको
सुलझाता हूँ जिन्दगी, उलझ जाती है बेवजह

@Vikram
जिन्दगी सियासत के शामियाने में।


कल रविश कुमार द्वारा सातवें वेतन आयोग पर लिखे आर्टिकल का जवाब

कल रविश कुमार द्वारा सातवें वेतन आयोग पर लिखे आर्टिकल पर नज़र पड़ी। उनके तर्कों और तथ्यों को पढ़ने और समझने की कोशिश की। पर कोशिश नाकाम रही। इसी कोशिश में पिछले वर्ष की कुछ घटनाये याद आ गयी। जानी मानी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के एक कर्मचारी, उम्र करीब ४२ साल की डेंगू से मृत्यु हो गयी। कम्पनी द्वारा कर्मचारी का कोई बीमा नहीं था। अच्छी खासी कमाई करने वाले कर्मचारी का परिवार आगे क्या करेगा कैसे करेगा ये एक बड़ा सवाल हो गया। कुछ सहकर्मियों ने मिलकर कुछ आर्थिक मदद दी किन्तु 8 -10 लाख रुपये में जिन्दगी २ बच्चों और बीवी की जिन्दगी बसर हो सकती है क्या? सनद रहे की कर्मचारी मृत्यु से पूर्व भारत सरकार को अच्छा खासा टैक्स भुगतान भी करता था। जीवित था तो सरकार ने प्रत्य्क्ष और अप्रत्क्ष्य दोनों तरीके से टास्क्स वसूला। आदमी मर परिवार सड़क पर!!! सरकारी जिम्मेदारी सिफर!!!!!

जब से कोई वेतन आयोग गठित होता है , जब भी किसी का महँगाई भत्ता बढ़ता है।  हर उस बार ना जाने क्यों मैं इस सोच से किनारा नहीं कर पता की क्या वेतन आयोग के साथ-साथ गरीबी रेखा रिव्यु करने के लिये भी किसी आयोग का गठन हुआ क्या? नहीं हुआ!!! क्यों नहीं हुआ? गरीबी रेखा को महँगाई भत्ते के अनुक्रमानुपाती क्यों नहीं बढ़ाया गया? आखिर क्या वजह है की वेतन आयो केवल कुछ लाख लोगों की वेतन बढ़वाने के लिये गठित होता है। होता है तो होता रहे कोई बुराई नहीं। पर क्या उसी अनुपात में अन्य लोगों की जरूरतें भी रिव्यु की गयी। क्या अनाज का समर्थन मूल्य भी उसी दर से बढ़ा दिया गया? किसानों का सूखा राहत मुआवजा आखिरीबार काम और किस हिसाब से रिव्यु हुआ था। क्या आपमें से किसी कोई ध्यान है।

सरकारी टैक्स सरकारी और गैर सरकारी कर्मचारियों दोनों के लिये बराबर है। किन्तु जरूरतें केवल एक की ही रिव्यु होती है? सरकार की जिम्मेदारी लोकतन्त्र के आखिरी आदमी तक राहत पहुँचना है। पर क्या वास्तव में ऐसा है। हम सब सरकार के लिये तो काम करते है। सरकार को टैक्स देने के लिये ही तो काम करते है।  बदलें में सरकार हमे क्या देती है? सामाजिक सुरक्षा की केवल सरकारी लोगो की जरूरत है? बाकी हवा हवाई है? हड़ताल और यूनियन फॉर्म करने की आज़ादी क्या देश के हर कर्मचारी संगठन को है? क्यों नहीं है?

रविश जी लिखते है की सरकार ठेके पर काम करने करने वाले लोगों का इस्तेमाल कर बहुत सारा धन बचा रही है!!!  जाहिर नहीं है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में ८% के आस-पास का हिस्सा रखने वाली पूरी की पूरी सूचना पौद्योगिकी ठेके पर ही चलती है। हर बड़ी कम्पनी में सिक्योरिटी, आईटी स्टाफ, फैसिलिटी का पूरा स्टाफ, प्रोजेक्ट में काम  करने वाले बहुत सारे रिसोर्स श्रम कानूनों को धता बताते हुये। काम वेतन पर काम करते है। किसी भी बहुमंजिला भवन में देख लिजिये १२ घटे से ज्यादा काम करने वाले लोग ठेके पर होते है। ठिकाना ना पगार का। क्या रविश को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पत्रकारों के शोषण के बारे में जानकारी नहीं है।  १२ घण्टे काम और पगार बिलकुल बेकार?  सरकार बहुत कॉपोरेट से देखकर सीखती है।

कुल मिलाकर वेतन आयोग का गठन जरूरी है, और होना भी चाहिये किन्तु उसी आवृत्ति से अन्य क्षेत्र ( संगठित और असंगठित क्षेत्र के लोगों की जरूरतें भी देखनी चाहिये। उसी दर से सामाजिक सुरक्षा, स्वस्थ्य सुरक्षा सभी की होनी की चाहिये ना केवल साहेबान की। मान्यतायों के हिसाब से जिनकी पगार तो बस कहने के लिये होती है।