स्कूल फीस और लोकतान्त्रिक तानाशाही

पिछले दिनों जब बेटी के स्कूल में फीस जमा करने पहुँचा।बेटी KG में पढ़ती है। पता चला फीस 25% बढ़ा दी गयी। इस बावत सूचना केवल स्कूल की फीस जमा करते वक्त मिली। 25% बढ़ोत्तरी का मतलब लगभग 20 हज़ार साल का खर्चा और (ट्रांसपोर्ट की फीस नहीं बढ़ी इसलिये 20 हज़ार)।

CBSE के नियम कहते है। 10% से ज्यादा फीस नहीं बढ़ सकती, बिना अभिवावक की सहमति के भी फीस नहीं बढ़ाई जा सकती। स्कूल के अन्दर ड्रेस किताब इत्यादि बेचना गलत है। इन्ही नियमो का हवाला देते हुए स्कूल के प्रिंसिपल जवाब माँगा, कोई जवाब नहीं मिला!!! एक दो बार reminder भेजे। जवाब नहीं आने पर ट्रस्टी को लिखा, फिर अचानक एक दिन प्रिंसिपल ने बुलाकर फीस बढ़ाने की जरूरत को तर्कों से स्पस्ट किया। जबरदस्ती के तर्क!! उगाहने वाले तर्क!!! मैंने प्रिंसिपल पर एक जलता हुआ सवाल दागा, क्या आपने स्कूल के शिक्षको को 25% का इन्क्रीमेंट दिया? क्या आपने RTE का पालन करते हुये गरीब बच्चों को स्कूल में एडमिशन दिया?  जवाब गोलमोल इतने की मैं भी उलझ गया। RTE के नियमो का जबरदस्त उल्लंघन चल रहा है। सबको पता है सब बस नज़रअंदाज़ किया जाते है।

खैर मैंने और मेरे जैसो बहुतो ने नॉएडा के डीएम को ख़त लिखे। डीएम साहब ने पक्ष सुनने के बाद जाँच बिठा दी।स्कूल्स से फीस कम करने का अनुरोध किया। स्कूल ने नहीं सुनी। डीएम भी असहाय उन्होंने विस्तृत जांच रिपोर्ट cbse को भेजी कार्यवाही की मांग की। पर कार्यवाही हवा!!!
व्यक्तिगत तौर मैंने डीएम की रिपोर्ट का हवाला देते हुये, प्रदेश के मुखिया अखिलेश जी, स्म्रति ईरानी जी, प्रधानमंत्री जी को ट्वीट किया, कई इ-मेल लिखे। कुल मिलकर 2 महीने गुजर गये और अभी तक सब की कुछ हवा हवाई। कुल मिलाकर शिक्षा संस्थानों का अनैतिक टैक्स भी हमे ही देना होगा। ये टैक्स दूर तक बाटा जाता है बराबर। स्कूल, सीबीएसई, शिक्षा के प्रधान सेवक सब एक इस मामले में। अनूठी एकता है, जबरन उगाही की!!!

मेरे शहर का हर वाशिंदा

मेरे शहर का हर वाशिंदा
बस ले दे के है जिन्दा
की ना जाने कब कोई पुलिसवाला
फर्जी एनकाउंटर कर जायें
ना जाने कब उस पर यूनिपोल गिर जाये
ना जाने जब तेज रफ़्तार काल बन जाये
ना जाने कब जाति और धर्म बबाल बन जाये
ना जाने कब और कहाँ जिन्दगी सवाल बन जाये!!!
-विक्रम

सरबजीत देखने की सोच रहे है? तो देख लीजिये!!

देखियेगा तो पाकिस्तान को कोसते हुये मत लौटियेगा। पाकिस्तान के 
चरित्र से हम सब वाकिफ है। कोसियेगा उस भारतीय लोकतांत्रिक 
व्यवस्था को जो सुधरने का नाम नहीं लेती। जिस व्यवस्था में आम आदमी 
सबसे ताकतवर होकर भी लगभग बर्बाद है। यूँ तो अख़बारों के माध्यम से 
हम सब सरबजीत और उसकी बहन को जानते है। किन्तु 2.12 घण्टे 
उसके और उसके परिवार को उसकी विवशता को जी कर देखिएगा। 
"माँझी-दा माउंटेन मैन" के बाद आम-आदमी के संघर्ष की, धैर्य और 
निश्चय की दूसरी दमदार कहानी है। इन सब के बीच रणदीप हुडा के 
दमदार अभिनय को देखियेगा सरब जिन्दा हो उठेगा। .... हाँ रुमाल लेकर जाना मत भूलियेगा!!

पायें हर समस्या का निदान, आओ करे CBI जाँच की माँग,


कोई भी घटना हो दुर्घटना हो देश में बस CBI जाँच की माँग होती आई हैं पर CBI के आँकड़ें देखें, प्रदर्शन देखें
जीरो बटा सन्नाटा, उसकी पर व्यंगात्मक कविता ........

पायें हर समस्या का निदान,
आओ करे CBI जाँच की माँग,

सत्येन्द्र दुबे से सुनन्दा पुष्कर तक
आसान और कार्य बड़े दुष्कर तक
सब ही तो CBI जाँचती आयी है
सरकारी पहाड़ा बाँक्षती नज़र आयी है
करती आयी है बस ऊँट-पटांग

पायें हर समस्या का निदान,
आओ करे CBI जाँच की माँग,

........ बाकी हिस्से का करें इंतज़ार " कवितायों के संकलन का किताब के रूप में मूर्त रूप लेने तक"


@सर्वाधिकार सुरक्षित

आज माँ की तस्वीर पोस्ट करने का दिन है?

जब बात माँ की उठती है, तो तुरत फुरत दिमाग एक तस्वीर उकेर लेता है ....... एक नौनिहाल एक दुधमुँहे के मुख से पहली बार प्रस्फुटित होते कुछ शब्द .. माँ माँ .... बच्चे की भाषा में, माँ की समूची परिभाषा मिल जाती है। बच्चे का संसार माँ के आँचल से माँ के साथ तक होता है। इसी छोटे से संसार में समूचा बचपन गुजर जाता है। एक बच्चे से नाराज माँ कई बार जब बच्चे को पीट देती है। तब बच्चा तो रोता है और साथ ही साथ माँ स्वयं भी रो रही होती है। ये बात अलग है कि कई बार आँसू आँखों से झलक आते है,कई बार अन्दर ही अन्दर पी लिए जाते है । माँ के मन में बच्चे की गयी पिटाई की ग्लानि अन्दर तक उसे झकझोर देती है।  वो कभी सोये हुये बच्चे को चूम कर, कभी उसके बाल सहलाकर अपनी ग्लानि को तिनका मात्र काम करने की कोशिश कर रही होती है।  

हमारे गाँवों में शादी और त्योहारों के मौके पर जब बड़े बुजुर्ग बच्चो के साथ दिल बहला रहे होते थे, उस समय यदि कोई बालक रोने लग जाये, हिलाने, डुलाने, झुलाने और भी कई प्रकार के जतन करने के बाद भी चीखें बढ़ती जाये, तो बड़े बुगुर्ज कहते थे "महतारी के पास दे आओ, अबही दिखतैखन चुपा जयी।" हालाँकि माँ का पुत्र, पुत्री के प्रति वात्सल्य, स्नेह परिभाषायें से परे है। बड़े-बड़े शब्द शिल्पी भी इस रिश्ते की पूर्णता को गढ़ पाने में सफल नहीं हो पाते। मेरा एक अदना सा प्रयास है। अपनी माँ के बारे में भी विस्तार से लिखूँगा कभी। कहानियों का एक लम्बा सिलसिला है। जो उस गाँव की पृष्ठभूमि से आता है जहाँ विरासत में रंजिशे मिली, रंजिशों से बन्दिशें मिली, जहाँ गोलियों की आवाज पटाखों से ज्यादा कुछ भी नहीं होती थी। जहाँ गोलियों के खाली खोके ५-६ साल के बच्चे भरकर, गुम्मा ( ईंट) मारकर फोड़ देते थे। इन्हीं रंजिशों और साजिशों के बीच माँ की अदभुत और अद्वितीय भूमिका जिक्र करुँगा। इंतज़ार करे  :)!!!

संसद में बहस जारी है .....

बुंदेलखण्ड सूख गया,
उत्तराखण्ड जल रहा है
जन्तर मन्तर पर जल सत्याग्रह चल रहा है
धूप में झुलस रहा है
आदमी की जबर पैदाइश जारी है
समूची व्यवस्था को बीमारी है
और संसद में बहस जारी है
अगस्ता वेस्टलैंड पर
बोफोर्स की डेड लैंड पर .....
-विक्रम