बेवाक: लोकतन्त्र मतलब "लाठी का तन्त्र"

विगत समय में भारत के विभिन्न हल्कों में हुयी कुछ घटनायों पर नज़र डाले देखे और समझे की क्या हो रहा है? समाज और हमारे क्रियाकलाप किस दिशा में अग्रसर है। आईये ऐसी ही कुछ घटनायों पर नज़र डालते है। १. मालदा और मुजफ्फर नगर में धर्म विशेष के लोगों का हिन्सक आन्दोलन।
२. हरियाणा में जाट आन्दोलन, हिन्सक और क्रूर, सेना पर हमला, पुलिस पर हमला, लोगों की हत्या और क्रूर बलात्कार।
३. 7000 करोड़ के कर्जदार माल्या भाग निकले
४. मध्यप्रदेश में "हरलाल कुर्मी" जला दिये गए, 8 दिन बाद मृत्यु हुयी और मृत्यु के बाद FIR दर्ज हुयी, कोई गिरफ्तारी नहीं, दरोगा से लेकर मुख्यमन्त्री तक को जानकारी है मामले की। 
5. दिल्ली में डॉक्टर नारंग पीट-पीट कर मार दिये गये, बांग्ला देशी कैंप के कुछ क्रूर नाबालिग लड़कों ने सोचे समझे तरीके से हत्या को अंजाम दिया। 

कुलमिलाकर यदि घटनायों का विश्लेषण, जिम्मेदारियों के आधार पर, देश में लागू कानून और अधिकारों के आधार पर तो सहज ही ये कहा जा सकता है। लोकतन्त्र का शब्द विन्यास "लाठी का तन्त्र" होना चाहिये !!!!

जब अधिकारों पर अतिक्रमण हो, सुरक्षा सवालिया हो और वो जिन पर अधिकारों को सुरक्षित रखने का दारोमदार है वो बेपरवाह हो तो लोकतन्त्र मतलब "लाठी का तन्त्र" ही तो होगा। न्याय पालिका, कार्यपालिका और विधायिका यूं तो एक दूसरे के पूरक है किन्तु अधिकतर मामलात में जिम्मेदारी एक दुसरे में पाले में फेक कर बच निकलते है। प्राथमिकी दर्ज ना होना, भीड़ के सामने बेबस हो कर उसे खुली लूट अत्याचार की छूट देना, कार्यवाही ना करना, धर्म विशेष के लोगों के हिन्सक और अराजक व्यवहार को वोट बैंक बचाने की लिये अतिक्रमण की छूट देना। और एक साधारण सी बात पर गली कूचे के लड़कों द्वारा एक गणमान्य व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या करने का साहस होना ये "लाठी तन्त्र का" ज्वलन्त उदहारण है। बिना लड़ाई के, बिना ज्ञापन के कोई कोई कार्यवाही ना होना ये लोकतन्त्र नहीं है। ये कुछ और ही है जिसे मैं "लाठी का तन्त्र" नाम से सम्बोधित करना उचित समझता हूँ। देखिये आगे आगे ये लाठी का तन्त्र क्या क्या गुल खिलाता है।

शिगूफा: ध्यान दियो अब लौटेगा रामराज्य

रामलाल: मियाँ ई "महबूबा मुफ़्ती" कौन है, इरादा क्या है मैडम का?
मियाँ मकबूल: नामकूल, बेखबर रहते हो!!! मालूम होता है ज्यादा भाँग छान ली होली में।
मैडम, अफजल की प्रशंसक है, अभी तक कोप भवन में थी, शाह साहब ने माँगे कबूल कर ली सो फूल सी खिल उठी है,
अब ताज सर पर महकेगा।
रामलाल: तो मियाँ गज़ब हो जायेगा , मतलब अफजल अब देशद्रोही नहीं रहेगा???
मियाँ मकबूल: अमा, जब सत्ता से बियाह होता है तो सब हर कोई निगेबाह होता।
तुम गुस्ताखी बन्द करो वर्ना है "जगह-जगह सूजन आ जायेगी जब पुलिस डण्डा चटकाएगी !!!!" ध्यान दियो अब लौटेगा रामराज्य

भारत माँ घायल थी ... बाकी सब ठीक था

बाकी सब ठीक था
जब मैंने कल रात ये कविता लिखी थी
तब जब भारत माँ मुझे दिखी थी
बस वो थोड़ी तिलमिलाई सी थी
थोड़ी अकुलाई सी थी
थोड़ी झल्लाई सी थी
बाकी सब ठीक था ।

बोली बेटा शायद ये भारत वही है?
पर ये शायद महाभारत नयी है।
कुछ के लिये अस्तित्व ही सवालिया है
कुछ फितरत से ही बावलिया है
पीड़ा टपक रही थी
बाकी सब ठीक था।

पर वो चिल्लाने लगी
ना जाने ये अशफाक कहाँ चला गया?
जाने ये आज़ाद कहाँ चला गया?
विस्मिल का पता भी नहीं मेरे पास
पेशानियों पर बल आता चला गया
बाकी सब ठीक था।

बेसबब ही चीख उठी
तुम्हे आज़ादी चाहिये
पर मुझे "आज़ाद"
आज़ाद चाहिये,आज़ाद चाहिये
बाकी सब ठीक था।

बस भारत माँ जीर्ण शीर्ण
तेज कदमों से
बदहवास सी अल्फ्रेड पार्क की तरफ
भाग रही थी।
रास्ते में एक दीवाना, कट्टर
अचानक पत्थरों की बारिश करने लगा
बोला उठा शैतान, शैतान
रस्म पूरी करो
और पत्थर बरसाओ शैतान पर
माँ लहूलुहान, बेजान
बाकि सब ठीक था।