अमीरों के घर का चमन है गरीबी

महज आँकड़ो का दमन है गरीबी 
अमीरों के घर का चमन है गरीबी
शोषण अशिक्षा को नमन है गरीबी
बीमारियों अभावों की सनम है गरीबी 

दबंगो डर है हनक है गरीबी 
यहाँ जुर्म की भी जनक गरीबी
नीति नियंता की सनक है गरीबी
नोटों की बढ़ती खनक है गरीबी

गरीबी की रेखा है,क्या हमने देखा?
कितना घटाते कितना बढ़ाते है?
संसद में देखो क्या क्या बताते है?
महज आँकड़ो में है सिमटी गरीबी
महज आँकड़ो में ही मिटती गरीबी
गरीबों के तन से है लिपटी है गरीबी
गरीबों के मन से है लिपटी गरीबी 

अमीरों की बस्ती जा चलन है गरीबी
गरीबी का मुद्दा हमेशा गरम है
चुनावों को देखो, है लड़ती गरीबी
मंचो और तख्तो पे चढ़ती गरीबी
वादों इरादों में झरती गरीबी
महज ख्यालो में ही तो मरती गरीबी
बैलेट बुलेट से ही तो बढ़ती गरीबी 
सत्ता की सीढ़ी की चाभी गरीबी
अदालत में मुकदमा लड़ती गरीबी
सालों साल पैदल चलती गरीबी


गरीबी जनतन्त्र की वो मरीचिका है
जिसे ना कोई भी मिटा सका है।

देशद्रोही बना हार्दिक, देशभक्त बने गये है जाट

देशद्रोही बना हार्दिक, देशभक्त बने गये है जाट
दोहरे मानदण्डों से है खड़ी लोकतन्त्र  की खाट।

देखिये राजनीति में होती हुयी बन्दरबाट
साहेबानो और कद्रदानों के बने हुये है ठाठ।

हिन्दू और हिन्द दोनों होते जाते ख़ाक
रोज-रोज है बढ़ रही है,राजनीति की खुराक।


-विक्रम

दौर यही आरोपों का बार बार फिर आयेगा

दौर यही आरोपों का बार बार फिर आयेगा
अन्त में हमको हासिल क्या है?
कौन भला बतलायेगा?

आदमी, हाड़ माँस का बना वजूका
खेत खेत में खड़ा हुआ है
फसल ना खाये कोई परिन्दा
इसी बात पर अड़ा हुआ है।
पर खुद बिन भोजन सूखा जाता है।
ये सच कौन भला झुठलायेगा ?

दौर यही आरोपों का बार बार फिर आयेगा।
अन्त में हमको हासिल क्या है?
कौन भला बतलायेगा?

हम लड़ते है लड़ जाये
हम मरते है मर जाये
अन्त में देखो यही नियंता
भर भर के इठलायेगा।
भर भर के इठलायेगा।।

-@ विक्रम all Rights reserved

JNU समर्थन केवल भाजपा विरोध में ????

समूचे विश्व में इस्लामिक कट्टरपन्थी ही तो बम फोड़ रहे है। आप से अनुरोध है कि गौर से देखिये आँकड़ो को घटनाओं को!!! सीरिया, इराक, nyjiriya, पकिस्तान में बलात्कार की जा रही  महिलओं के बारे भी सोचिये, क़त्ल हुए बच्चों और  लोगो के बारे में सोचिये, असहनशीलता का चरम घटना "चार्ली हेबडो" को ध्यान कीजिये..... और ध्यान कीजिये ना जाने कितने और हमले जो मानवता के दामन पर हुए!!!

भारत में यासीन भटकल, याकूब, अब्दुल करीम टुण्ड़ा, दाऊद, उनके गुर्गो के बारे में भी सोचिये, वो जो IS में भर्ती हो गये, लड़े मर गए, वो जो बम बन के फटने को तैयार खड़े है वो सब जन्नत जा रास्ता तलाश रहे है। उनके बारे में भी सोचिये कि आखिर उनके लिये देश से बड़ा धर्म क्यों रहा है?.... किसी बात का समर्थन केवल मोदी या बीजेपी का विरोध करने के लिये उचित नहीं है।

अफजल वही है जिसने संसद में हमले का जाल बुना उसके समर्थन में JNU में देश विरोधी नारे बाजी की घटनाये तब से सुनता आया हूँ जब से सियासत का स भी ना पता था। जब बीजेपी कहीं थी ही नहीं। JNU देश विरोधी जम्हूरियत का गढ़ रहा है। नारे लगाने वालों को हमेशा प्रोत्साहन मिला है क्या ये देश की सम्प्रभुता को चुनौती नहीं है? या हम उस दिन का इंतज़ार करे जब पाकिस्तान की तरह भारत में भी रोज बम फटने लगे!!!

किस बात के चलते JNU की घटना का  समर्थन किया जा रहा है केवल जाति के नाम पर ??? केवल धर्म के नाम पर या मोदी विरोध के नाम पर या कुछ और है जो समझ से परे है।

मैंने भी हमेशा पढ़ा की हम धर्मनिरपेक्ष देश में रहते है और यही हमारी सँस्कृति की विशेषता है। किन्तु मैं रोज सुबह अखबार भी पढता हूँ समाचार भी देखता हूँ। पत्र पत्रिकाओं पर भी नज़र रखता हूँ। ये मेरी आदत में शुमार है। कुल मिलकर रोज मरते लोगो के बारे में पढता था, रोज फूटते बमो के बारे में भी, कश्मीर के लाल चौक में पकिस्तान का झण्डा फहराते लोगो के बारे में भी पढ़ा, कश्मीर से पलायित पंडितों के बारे में भी पढ़ा। उन्ही से पता चला की धूर्त कौन है और सज्जन कौन ।

आज भी जब किसी सार्वजानिक जगह जाता हूँ वो कभी कभी डर लगता है की पता नहीं कब कौन बम बन के फट जाये? क्या आपको कभी ऐसा दर नहीं लगता परिजनों और बच्चों के साथ होते है तो???? मुझे सालों पहले की वो घटना भी याद है जब दीवाली की छुट्टियों के लिए घर से निकले थे ट्रेन पकड़ने पहाड़गंज से कुछ ही दूर थे तो पता चला बम फैट गये, निर्दोष निपट गये, बम सरोजिनी नगर में भी फटा था, आज भी वहाँ जाने पर अनहोनी की आशंका घर किये रहती है। आतँक का समर्थन किसी के विरोध में न करे, व्यक्तिगत अहम् में न करे, अपनी आत्मा की आवाज़ को गौर से सुने,  आपका मन सच औने आप बोल देगा। वही सच लिखे और शेयर करे।

इसीलिये कमजोर दिखता रहा है ।

वो अक्सर सच लिखता रहा है
इसीलिये कमजोर दिखता रहा है ।

झूठ की शानोशौकत रही है
सच कौड़ियों में बिकता रहा है।

सालों-साल तारीखों में गुजरे है
गुजरा गवाही बूढ़ा ही दिखता रहा है।

जो अपनी मातृ भाषा में लिखता रहा है
बस गरीबी की चादर में लिपटा रहा है।

-विक्रम @Copyrights reserved 

कि फिरता है पीछे बहेलियाँ तीर ताने।

सच का सिपाही हूँ, मुझे अमृत पिला दो
कि फिरता है पीछे बहेलियाँ तीर ताने। 

है कैद, बेबस ईमान दौलत की तिजोरी में 
चलता है मुकदमा, अदालत है, माने कि ना माने। 

दम घुटने लगे जब अन्दर की आवाज़ का
दम लगाकर चीखना, जग जायेगे फिर जमानें । 

बेघर ही फिरता रहा है, वो शख्स भी उम्र भर
जो मयऔजार आया है, ना जाने कितने घर बनाने। 

जान देकर है चुकायी कीमत जिसने प्यार की
जग ने सुने है ध्यान से, उन्ही के फँसाने।

@विक्रम कॉपीराइट्स रिजर्व्ड
 

कौन है वो जिसके भीतर गदर नहीं होती।

सर्दी के दिन में धूप सी खुशगवार हो तुम
बिन तुम्हारे जिन्दगी में रौनक नहीं होती।

तेरे जाने का ख्याल ही आया है जहन में
दुआ भी कमबख्त कोई असर नहीं होती।

महफिले सजती सँवरती रहती है अक्सर 
कोई लम्हा नहीं कि तुझपे नज़र नहीं होती।

लाजिमी है यादें सुबह,शाम, हर पहर 
जिन्दगी बिन तेरे कभी बसर नहीं होती।

फकत चेहरे ही हँस दिया करते है  विक्रम
कौन है वो जिसके भीतर गदर नहीं होती।

-विक्रम
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गज़ल : देखो साहब का बँगला और ऊँचा हो गया है।

बन गयी है, मेरे घर के सामने की सड़क
देखो साहब का बँगला और ऊँचा हो गया है।

क्या जरा भी इल्म है तुझको "विक्रम"
स्तर ईमान का कितना नीचा हो गया है?

जो बने फिरते थे सत्य के सिपाही देश में 
हाल उनका "सत्येन्द्र दुबे" सरीखा हो गया है 

थी उसे न्याय मिलने की उम्मीद, मगर
सच दफ़न, एक कुनबा समूचा हो गया है। 

देखो होती नुमाइश अधिकारो की हमेशा
भूखा और भूखा, नीचा और नीचा हो गया है।

बड़ी लम्बी, अँधेरी है न्याय की गालियाँ हुज़ूर
जुर्म जन्मा और बढ़कर खलीफा हो गया है।

-Vikram CopyRights Reserved