गज़ल:उड़ा परिन्दा दर्द में देखों

साख से पत्ता टूट गया है।
आया पतझड़ लूट गया है।

उड़ा परिन्दा दर्द में देखों
बना घोसला टूट गया है।

सहरा में से मिटी लकीरें
याद का मंजर छूट गया है।

दोस्त बनाकर दगा दे गया
प्रेम का धागा टूट गया है।

कुछ लोगों की बात सुनी थी
सच का साहस टूट गया है।

-विक्रम copy rights reserved 
Post a Comment