मुद्दा:करों का बोझ आम जनता पर ही तो है।

एक मुआयना करते आयकर और अन्य करो के परिपेक्ष में। कुल मिलाकर अधिकतम 33.99% टैक्स देना पड़ता है, और ये केवल शुरुआत है। इसके बाद हर सामान खरीदने पर 12 से 14.5 % VAT, उसके बाद restraunt में खाना खाने तक पर 15.5% का सर्विस टैक्स। सभी जानते है की पेट्रोल में आधे से ज्यादा टैक्स होता है जो हम जैसे लोग पेय करते है। सरकार लाइफ insurance देती नहीं और आप ले तो उस पर भी सर्विस टैक्स।
घर खरीदे बैंक से loan लेकर तो उसमे भी 3.6% की आस पास का टैक्स लगता है। रजिस्ट्री इत्यदि में तो टैक्स लगना ही है।

इतनी वसूली के बाद भी, जब किसी सड़क से गुजरते है तो toll टैक्स लगता है केवल आम लोगों बाकि exempted होते, पुलिस वाले गाली गलौज करके निकल लेते है। कहीं वाहन पार्क करो तो पार्किंग फीस निर्धारित राशि से ज्यादा वसूली जाती है, और टैक्स उस पर भी लगता है। फ़िल्म देखो तो एंटरटेनमेंट टैक्स लगता है। कभी पुलिस स्टेशन जाना पद जाये तो पुलिस टैक्स देना पड़ता है।खासकर वेतन भोगियों को पूरा टैक्स देना पड़ता है। क्यों की उनके पास बेईमान हो जाने का विकल्प नहीं है।
कॉर्पोरेट सेक्टर के लोग यूँ तो पिंक स्लिप और जबरदस्ती के वर्क प्रेशर के कारण 60 तक कम ही पहुँच पाते है अगर पहुँच गये तो पेंशन नहीं मिलती। बुढ़ापा खुद के हवाले। दूसरी ओर सरकार है की मंत्री संत्री सब ठाढ़ के साथ BMW पर चलते है। पूरे शहर का चक्का जाम कर भाषण देते है। आदर्श झाड़ते है। और ले दे के 100 रुपये की गैस सब्सिडी के पीछे पड़े रहते है।

मेरा भारत महान,
नेता ही काव्य नेता ही पुराण है ।

Odd even का फार्मूला आज नहीं तो कल लगाना पड़ेगा।

गुजारिश है राजनीति से ऊपर उठकर देखे। ........दिल्ली और आस पास के क्षेत्रो में प्राइवेट स्कूलों द्वारा अभिवावकों से अनाब-शनाब पैसा वसूला जाता है। नर्सरी और KG में फीस 1.5 लाख तक या उससे ज्यादा है। हद तब हो जाती शिक्षको को मानकों के अनुरूप पैसा नहीं दिया जाता और स्कूल के ट्रस्टी जो तरह तरह की सब्सिडी सरकार से लेते है वो ऑडी और BMW में सफ़र करते है। इस क्षेत्र में दिल्ली सरकार ने सुधार के जो प्रयास किये है वो सराहनीय है। मूर्त रूप में उतर आने पर सभी को फायदा होगा। शिक्षा माफिया के अलावा। इसके अलावा....

दफ्तर जाते हुये आकाशवाणी पर "Street Vendor livelivood and protection" को लागू करने, उनकी greivances को सुनने और सहायता उपलब्ध कराने में मामलात में बहुत विज्ञापन सुनें। कई बार दिल्ली के रेहड़ी वालो से बातचीत से ये भी पता चला की उनको काफी राहत हुयी है इस मामले में।NCR के किसी भी अन्य क्षेत्र में ये एक्ट बस अनाथ सा पड़ा है।यहाँ भी दिल्ली सरकार ने अच्छा काम किया।

कुल मिलाकर जनता से जुड़े मुद्दों पर दिल्ली सरकार का जो रुख रहा है काबिलेतारीफ है।odd even का फार्मूला लागू होने पर  पुरजोर विरोध हो रहा है। किन्तु शुरुआत कहीं न कहीं से तो करनी होगी।निर्णय अच्छा या बुरा हो सकता है।पर निर्णय के पीछे की निष्ठा सवालिया नहीं लगती।हज़ारो लोग आलोचना कर रहे है किन्तु ये नहीं बता रहे की odd even नहीं तो और क्या करना चाहिये? सकारात्मक आलोचना बेहतर विकल्प होता। व्यक्तिगत तौर पर बहुत से सन्देह मेरे दिमाग में भी किन्तु मैं सरकार के नजरिये और निर्णय का पुरजोर समर्थन करता हूँ।

दिल्ली की रगों में हैं बहती सियासत .......

दिल्ली की रगों में हैं बहती सियासत।
तो कैसे वो समझेगी लोगों जरूरत।।

वजीरों की बस्ती में रहता रसूख है।
पैदल की होती है ना कोई रियासत।।
                           -Vikram

कभी दीवार की दरारों में लिखा देखा......

इश्तिहारों में लिखा देखा
अखबारो में लिखा देखा
मजबूती का दावा
घर के किवारों में लिखा देखा
रंगीनियत का दावा
बहारों में लिखा देखा
खूबसूरती का दावा
नज़ारों में लिखा देखा
गर्मजोशी का दावा
अंगारों में लिखा देखा
जगमगाने का दावा
सितारों में लिखा देखा
अहसासों का दावा
इश्तिहारों में लिखा देखा।
हुकूमत का हक़
दरबारों में लिखा देखा
ये सब इंसान के साथी होते है
पद और प्रभाव के बाराती होते है।
मन के बदलाव की साथ ही
बदलती है इनकी फितरत
सच कभी इंसान के दिल पे
कभी दीवार की दरारों में लिखा
होते समझौते और करारों में लिखा देखा
सब के सब दावों कभी ना खरा देखा।
कभी ना खरा देखा।।

वहीें तो आसमानों में भी उड़ा होगा।

जो दूर तक जमीन पर चला होगा 
वहीें तो आसमानों में भी उड़ा होगा।

रही होगी गर्दो गुबार सहने की ताकत 
तभी तो जमकर तूफानों में खड़ा होगा।
                                   -विक्रम 


मुद्दा: सम्माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय के नाम एक प्रार्थना पत्र ............

सम्माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
 
विषय: "मुम्बई हिट एंड रन" केस में मुख्य गवाह "रवीन्द्र पाटिल" के साथ हुये अन्याय का सच सामने लाने हेतु !!

महोदय बड़े दिनों से मन में विचार आ रहा था की आपको पत्र लिखूँ। पत्र लिखने के कुछ कारण है और उसके निवारण की तलाश है। खैर आपको बताता चलूँ की मैं एक जनसाधारण हूँ। उसी संघीय ढाँचे का जनसाधारण जिसके मुख्य न्यायाधीश, दण्डाधिकारी आप है। भारत सरकार और उससे जुड़े संस्थान आयकर वसूली के समय ही हमे आदेश देते है। मतदान के समय अनुरोध भी करते है बस उससे ज्यादा कुछ और नहीं........ हाँ मुझे और मेरे जैसो को देश की दशा और दिशा के चिन्ता है। ये कभी-कभी बढ़ जाती है जैसे कि..........

पिछले दिनों के अखबार में पढ़ा कि मुम्बई कि "हिट एंड रन" केस में सलमान खान "सबूतों के आभाव में बरी"  हो गये और आज के अखबार से सूचना मिली कि  वो भूतपूर्व नाबालिग "अफरोज" "कानून के अभाव में" रिहा हो गया। सलमान के मामलें में सत्र न्यायलय में लगभग 13 वर्ष तक सुनवाई हुयी। सजा भी हुयी। फिर अचानक एक दिन पता लगा कि "सबूतों का आभाव हो गया"!!!! मैं समझ ही नहीं पाया की भला ऐसा क्यों हुआ? मैं और पूरा देश ये सुनता और पढ़ता आया था कि इस मामले में मृतक के आलावा तीन घायल और मुम्बई पुलिस का एक हवलदार चश्मदीद थे। फिर अचनाक सबूतों का आभाव और न्याय का पराभाव क्यूँ हुआ, कैसे हुआ?

फिर मुझे अचानक सत्येन्द्र दुबे जी याद आ गये। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना वाले सत्येन्द्र दुबे। पिछले बरस "The Hindu" नाम के अखबार में छपी छपी खबर ने सत्येन्द्र दुबे को "सच का सिपाही बताया" बताया की वो भ्रस्टाचार की लड़ाई में शहीद हुये मैंने उस समय भी लिखा था "http://bulbula.blogspot.in/2014/02/blog-post_23.html" पर दूसरे ही पल मुझे ये भी ध्यान आया की अदालत ने दशकों तक चली न्यायिक लड़ाई के बाद ये कहा था कि "सत्येन्द्र दुबे को भोर के लुटेरों ने मारा" कुल मिलाकर बहुत देर ये सोचता रहा कि जिसे देश शहीद मानता है। मीडिया शहीद मानता हैं। भला क्या कारण हो सकते है कि उसे न्यायलय महज एक लूट की घटना का शिकार मानती है??? तीनो मामलात में बस एक बात समान की देश के लोगों जो मानते है अदालत का मानना उससे अलग है !!!

"हिट एंड रन" केस का मामला दर्ज कराने वाले "रवीन्द्र पाटिल" को न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते ना जाने क्या हो गया? किसी को पता नहीं!!! 5 सालों में एक नौजवान पुलिस वाला पहले होते -होते खत्म हो गया!!ना जाने क्यूँ ? मरते मरते भी कुछ बोलता रहा। क्या हम सबने सुना नहीं? ना जाने क्यूँ ? रवीन्द्र पाटिल को मुम्बई पुलिस ने सस्पेंड भी कर दिया और न्यायलय के गिरफ्तार भी !!!!!!! ना जाने क्यूँ हुआ ये सब?? महोदय क्या न्यायालय और कानून से जुड़े लोगों की ये नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती थी की रवीन्द्र पाटिल के मुद्दे पर हर ना जाने क्यूँ का जवाब खोजती? क्यूँ ख़त्म हुआ वो नौजवान इसकी जाँच भी करती। मामले का मुख्य गवाह होने के नाते रवीन्द्र का मामला इसी मुक़दमे का हिस्सा बनता। इतना सब होता रहा  सलमान खान बेल पर घुमते रहे। क्या व्यक्तिगत तौर पर आपको नहीं लगता की जमानत पर छूटे सलमान मुक़दमे और गवाहों  प्रभावित कर सकते थे ?

13 साल में एक निपट गया और कुछ की गरीबी बिक गयी। बिकनी है थी!!! महोदय  13 बरस न्याय की लड़ाई लड़ने वाला आदमी अन्त में केवल समझौताकर सकता है बिक सकता है टूट सकता है। खैर क्या मान लिया जय की न्याय हो गया!!! न्याय मिल गया। खासकर रवीन्द्र पाटिल को !!!!!! ये अजीब बात है की जिस सचको सारा देश जनता है अदालतें उस सच को स्वीकार करती। ऐसा क्यूँ ? क्या सच में कानून अँधा है? महोदय के मुद्दे पर देश की निगाहें गड़ी रही। सबने देखा जो हुआ। "जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड" की बात को आधार बनाये तो अन्याय हुआ सभी के साथ।  इस मामले में और हज़ारों मामलात में ऐसा ही होता है। इस मामले की अन्त देखकर कोई किसी हादसें का गवाह बनना चाहेगा ? न्याय की आवाज़ उठायेगा??? क्या ये मामला उन हज़रो लोगो को हतोत्साहित नहीं करता जो किसी ना  किसी रूप से अन्य मुक़दमे में जुड़े है। क्या ये मामला ये नहीं दर्शाता की भारत की कानून और नये व्यवस्था में भरोसा रखने की बात करने वाले लोग सिर्फ छलावा करते है।

महोदय करबद्ध निवेदन है कि "हिट एंड रन" केस में "रवीन्द्र पाटिल" के साथ हुये अन्याय का सच सामने आना चाहिये। अनुरोध है कि आप " Suo Moto cognizance" ले। ये जरूरी की लोगों को पता चले कानून सब के लिये बराबर होता है, बिकाऊ नहीं , न्याय हमारा हक़ है मौलिक अधिकार इसके लिये यदि किसी को वर्षो तक थका देने वाली लड़ाई लड़नी पड़े तो अन्याय है।  भारत के सम्विधान  आत्मा के अनुरूप नहीं है।

- विक्रम प्रताप सिंह सचान 
साभार:http://indianexpress.com

मुद्दा:राजनीति पैसे की हो गयी, राजनीति पैसे से हो गयी।

देश की राजनीति में जन्मे नये पुराने नेताओं की घोषित सम्पत्तियों का ब्योरा भी दाँतों तले अँगुलियाँ दबा लेने के लिये मजबूर करने वाला है। जितना अखबारों में पढ़ा उस आधार पर याद आता है कि मायावती,मुलायम,चण्डीगढ़ के पूर्व साँसद पवन बंसल, हिमांचल के मुख्यमन्त्री वीरभद्र, समूचा गाँधी परिवार, रॉबर्ट बाड्रा और  भारत सरकार के वित्त मन्त्री जेटली की सम्प्पतियाँ चन्द वर्षो में कई गुना बढ़ गयी। सनद रहे की बात केवल घोषित सम्पत्तियों की हो रही है।   ....... अब चुनाव के दौरान सम्प्पतियाँ घोषित करने से कम से कम ये तो पता चल जाता है कि किसके पास कितना है। किन्तु ये अब भी राज की बात है कि इस सम्पत्तियों का श्रोत क्या है??? लिहाजा ये जरूरी हो चला है कि घोषित सम्पत्ति के अर्जन का श्रोत भी पता चले। ये पता चले की वो कौन सा फार्मूला है जिसके सहारे सम्प्पतियाँ गुणोत्तर बढ़ती है।

ये दबा कुचला सत्य है कि अघोषित सम्पत्तियाँ भी होती है। जो घोषित से ज्यादा ही होती होगी। यूँ तो अरबों का हेर फेर करने वाला "यादव सिंह" भी अपनी सम्पत्तियाँ कुछ करोड़ों में बताता है। ये भी एक कड़वा सत्य है की अधिकतर अमीर राजनेताओं की सम्पत्तियाँ आय से ज्यादा होती है। माया,मुलायम और वीरभद्र पर मुक़दमे भी चल चुके है।  .......... चलते चलते इन मुकदमों ने डैम भी तोड़ दिया। सच गुजरे गवाही की मानिन्द थका हरा और निराश कुनबे में दुबका बैठा है!!! राजनीति देशसेवा के मिशन का रास्ता भटककर बैंक बैलेंस बनाने के रास्ते निकली। राजनीति पैसे की हो गयी, राजनीति पैसे से हो गयी। गाँव की प्रधानी का चुनाव भी लोग अब स्कार्पियो खरीदने के लिये लड़ते है। उसी स्कार्पियो के नीचे विकास सालों तक कुचला जाता है। CBI केजरीवाल के दफ्तर पर छापा मारे उनके सचिव को धरे, जेटली आरोपों की सफाई देते घूमे ये मात्र एक छलावा है ये मात्र दिखावा है।  हमाम में सब नंगे है। CBI आउट इनकम टैक्स वाले तो हथियार है। जिसके सर पर मुकुट हुआ वही तरकश से निकालकर धनुर्धर होने का दम भरने लगता है।

खुशियाँ आती है किलकारियों सी......

जिन्दगी तूँ है उसी की
जिसे जीने का सलीका आता है
खुशियाँ आती है किलकारियों सी
मातम अर्थी सा चला जाता है।
ना मजा है जिद में ना अहम् में
मजा तो बस इंसानियत में आता है
तमाम परेशानियाँ पल में हवा होती है
जब दुधमुँहा घर में मुस्कराता है।
-विक्रम

दिल्ली का प्रदूषण: precaution is better than cure

Court, सरकार और एनवायरनमेंट रेगुलेटर NGT सभी एक साथ जाग उठे। सब दिल्ली को सही करने पर उतारू हैं। हवाओं में घुलता जहर सब को अखर रहा है। इस दौर में कई नये फरमान भी जारी हुये। जैसे odd  और even नम्बर की गाड़ियाँ alternate days पर चलाने की बात है। जैसे डीज़ल की गाड़ियों पर प्रतिबन्ध लगाने की बात है। NGT द्वारा कई रिहायशी projects स्थगित कर देने की बात है। ये सभी घटनाये कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रतिक्रियावादी होने की बात को पुख्ता करते है। कमोवेश Newton के नियमों को जीवन्त करते है। ये प्रतिक्रियावाद का दर्शनशास्त्र है कि अचानक व्यवस्था परिवर्तन कर देने का की बात होती है। ऐसा माहौल बनता है की रातों-रात दीन दुनिया बदल जायेगी। सभ्यता बदल जायेगी, लोग बदल जायेगे और शहर एक नये शहर में बदल जायेगा। अक्सर प्रतिक्रियावाद short term measures लेने के लिये प्रेरित करता है। वही हो रहा है। अचनाक साइकिल पर चलने की बात हो रही है। carpool की बात हो रही है। ये जरूरी है किन्तु क्या ये कल्पना जमीन पर उतर सकती है? शायद नहीं!!!

जैसा की कहावत है "precaution is better than cure" उसी तर्ज पर चला जाये तो बेहतर। यदि अभी तक नहीं चले तो आगे चल सकेंगे इसके लिये प्रयास जरूरी है। अचानक हो हल्ला भी बस एक नए प्रदूषण को बढ़ाता है। यूँ तो हर शहर में प्रदूषण नियन्त्रण board है। किन्तु धरातल पर सब क्या है? आँकड़ो से खेलने वाले संस्थान!!! किसी शहर में गाड़ी चलने हेतु, फैक्ट्री लगाने हेतु, बिल्डर द्वारा घर बनाने हेतु प्रदूषण विभाग से NOC लेनी होती है। विडम्बना ये है की प्रमाणपत्र जारी तो होते है किन्तु प्रदूषण जस का जस बना रहता है, बढ़ता रहता है। फिर अचानक एक दिन सुरसा की भाँति मुह खोलकर लोगो को निगलने के लिये तैयार हो जाता है। कुल मिलाकर दिल्ली एक सबक है। इस सबक को अन्य शहरों में अभी से लागू किया जाना चाहिये। प्रदूषण नियन्त्रण के रेगुलेटर को सक्रियता से कम करने की सीख सरकार और कोर्ट दोनों को दी जानी चाहिये।

सबके सब मिलकर दिल्ली का रोना रोये उससे बेहतर है कि उन सभी शहरों की पहचान की जाये जहाँ भविष्य में प्रदूषण बढ़ने के आसार है। अभी से इसके लिये कदम उठाये जाये। शहर में साइकिल के चलन को बढ़ावा देने के प्रयास होने चाहिये, जो तभी सम्भव है जब साइकिल और रिक्शा के लिये अलग पथ बनाये जाये। साइकिल से चलने का मुद्दा सीधा सीधा सुरक्षा से जुड़ा है। सड़क सुरक्षा और दूसरी चोरो और लुटेरो से सुरक्षा। चार लोग शपथ लेकर दो दिन साइकिल से चले उससे बेहतर है की वृहद स्तर पर इसके लिये सुरक्षा के इंतजामात हो।  यही एक बेहतर और स्वाथ्य कल के लिए जरूरी है।

फिर पछताय होत का जब चिड़िया चुग जाये खेत !!!

सरकार में कुशल रणनीतिकारों की कमी साफ़ है। हर छोटी बड़ी लड़ाई अहम की लड़ाई बन जाती है।  खामियाज़ा भुगतना पड़ता है। मोदी सरकार को!! मोदी सरकार अच्छा काम कर जरूर रहे है।  किन्तु मुद्दो पर राह बेहद घिसा पिटा है। जैसे रेलवे ने कल जो कार्यवाही शकूरबस्ती से शुरू की वो किसी भी अन्य प्रदेश से शुरू की जा सकती थी। हर शहर ने रेलवे ट्रैक के अस्स पास कब्जे है।  बाद में दिल्ली भी इसके दायरे में आता और यहाँ भी कार्यवाही हो जाती। किन्तु बजाय इसके टकराव का रास्ता चुनना मँझे हुये नेताओं की तरफ से एक अपरिपक्व तरीका है। कुल मिलाकर टकराव के रास्ते में गम ही गम है।

CBI राजेन्द्र कुमार से पहले अनिल यादव के छापा मारती भ्रष्टाचार के मामलों में लंबित अन्य लोगो पर लगाम कसती तो बेहतर था।  जैसे  कि "यादव सिंह" के यहाँ समय रहते छापा मारा होता। जाहिर है अधिकतर बड़े बाबुओं पर कोई ना कोई मामला तो होता ही है। अन्य पर लगाम कसते और फिर राजेन्द्र सिंह पर तो बेहतर होता किन्तु ऐसा करने की जगह पर अहम को तवज्जो देना बेहद खतरनाक है।  ....... फिर पछताय होत का जब चिड़िया चुग जाये खेत !!!  बिहार में चिड़िया चुग चुकी है। गुजरात ने हार्दिक चुग चूका है खेत।

एक सेर ......

एक सेर ......
मालिक नींद की गोलियाँ लेकर भी जागता है रात भर
और नौकर सो जाता है बस यूँ ही चादर तानकर।
 -विक्रम 

मुद्दा: वो साजिशें करके अपराध से बरी हो गया

भाईजान की रिहाई, कानून के गर्भ में पलते 13 वर्षीय बच्चे का,न्यायपालिका द्वारा किये गये गर्भपात के समान है। गुस्ताख रवीन्द्र पाटिल रोता होगा कहीं यमलोक में ...... भावनायें व्यक्त है गौर फरमायें।

वो साजिशें करके अपराध से बरी हो गया
पहले एक नम्बरी था अब दस नम्बरी हो गया।

सबूत, गवाह और सच, है बन्द ताबूतों में
अर्थी काँधों पे उठाये वो भी शमसान तक गया।

वो पागल खानों में कराता इलाज़ फिरता है
जब से न्याय कानून के दरवाजों तक गया।

सोचता हूँ कर ही दूँ अपनी आँखें दान विक्रम
देख ले दुनिया वो कानून भी जो अन्धा हो गया।

-विक्रम

विचार: कार चलने से रोकने की जगह बैटरी ऑपरेटेड कारों पर ध्यान दे सरकार ..........

बीते दिनों दो पर्यावरण संरक्षण हेतु दो बड़ी घोषणायें हुयी और कुछ प्रयोग भी। प्रधानमन्त्री जी ने कार्बन उत्सर्जन कम करने का वादा विश्व से कर दिया। दूसरी ओर दिल्ली में सम (Even) विषम (Odd) नम्बर वाली कारों को हफ्ते में केवल alternate डे पर घर ही चला सकेंगे। कुछ दिनों पहले हरियाणा के गुडगाँव में उसके बाद दिल्ली के कुछ हलकों में कार फ्री डे भी मनाया गया। परिणाम आशा अनुरूप नज़र आये। कुल मिलाकर प्रयोग या घोषणाओं के तौर पर जो भी संकेत मिले है पहलेपहल वो सही दिशा में मालूम पड़ते है, किन्तु ये भी जाहिर है की जनमानस में भी चिंताए बढ़ी है। ये साफ़ करती है कि इस मुद्दे पर और अधिक चिन्तन और मनन की आवश्यकता है। विशेषज्ञों को साथ लेने की आवश्यकता है।

कारों को प्रतिबन्ध लगाना काम समयावधि के लिये एक अच्छी कोशिश जरूर हो सकती है। किन्तु दूरदर्शी नहीं लगती। सवाल उठेंगे कि जब कारों पर प्रतिबन्ध लगेंगे क्या सरकार पर्याप्त सुरक्षा के साथ पब्लिक ट्रांसपोर्ट देने की स्थिति में है कि नहीं? सरकार ने इस ओर क्या कदम बढ़ाये है? रोज चलने वाली कारों की सँख्या सडको काम जरूर होगी  किन्तु सड़क पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाले वाहनो की सँख्या तो बढ़ानी ही पड़ेगी। समाज के कुछ जागरूक लोग सरकार के फैसले के विरोध में अदालत भी जा सकते है। आखिर कार खरीदते हुये भरी भरकम टैक्स लिये जाते है। वैल्यू एडेड टैक्स से लेकर रोड टैक्स तक। अगर गाड़ी आधे दिन सड़क पर चलेगी तो क्या आधा टैक्स सरकार को वापस नहीं कर देना चाहिये?? कुल मिलाकर दूरगामी लक्ष्यों को साधना होगा।

लिहाजा, ये जरूरी हो चला है की सरकार गैर-परम्परागत ऊर्जा श्रोतो के इस्तेमाल पर जोर दे। जिसमें सौर ऊर्जा एक महती भूमिका निभा सकती है। प्रचुर मात्रा में उपलब्धता भी इसका मुख्य कारण है। बीते कुछ वर्षो में सौर ऊर्जा और विधुत से चालित वाहनो की सँख्या में इजाफा हुआ है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार ने शहरों में और ग्रामीण क्षेत्रों में मार्ग प्रकाश हेतु जिस गति से टेंडर निकाले है , जिस गति से दिन के प्रकाश का इस्तेमाल रात में करने की सोच को आगे बढ़ाया है वो उत्साहित करती है। प्रधानमन्त्री जी ने ये भी भारत में सौर ऊर्जा के उपयोग का प्रतिवर्ष गुणोत्तर दर से करने का विज़न सामने रखा और उसके लिये गम्भीर प्रयास भी किये। इस सब को देखते हुये बैटरीचालित( battery operated ) कारों को बढ़ावा देना प्रदूषण से लड़ने का एक महत्त्वपूर्ण उपचार बन सकता है।

जब बैटरी चालित वाहनों के इस्तेमाल की बात आती है तो अगला विषय होता है सौर ऊर्जा का संरक्षण। इसके लिये उपयोग में आने वाली बैटरी और की बात आती है। बेहतर बैटरी बेहतर ही कारों को ज्यादा दूर तक चलने में मदद कर सकती है। बीते सालो सौर ऊर्जा को इकठ्ठा करने की एफिशिएंसी बढ़ी है। जुड़े  हुये पूरे के पूरे हार्डवेयर की लागत में भी भरी कमी आई है। जिससे आम-जनमानस की पहुँच सौर ऊर्जा के उपकरणों तक बढ़ी है। ऊर्जा को इकठ्ठा करने वाली बैटरी के भी कम जगह घेरते हुये अधिक ऊर्जा इकट्ठी करने की तकनीति के साथ आई है। हम LED -ACID जैसी बैटरी से निकल कर LI-ION बैटरी का इस्तेमाल हुआ है। मोबाइल में इसका भरपूर इस्तेमाल हुआ है। समय के साथ LI-ION बैटरी की तकनीति भी सुधरी है। बैटरी की नयी तकनीकि जैसे Nikil-Cobalt बैटरी, Solid-State बैटरी पर भी काम काफी आगे बढ़ चुका है।
बैटरी पॉवर्ड कार साभार :https://www.google.co.in/?gws_rd=ssl#q=reva+car


जरूरी हो चला है की हमारी सरकार भी इस क्षेत्र में अन्वेषण( Research) के ध्यान दे। हम "मेक इन इंडिया" जैसे प्रयासों में इस क्षेत्र में खोज को बढ़ावा दे। बैटरी चलित कारों को बढ़ावा देने के लिये लगने वाले टैक्स को काम करें सम्भव हो तो सब्सिडी पर विचार करे। यदि एक अभियन्ता के दृष्टिकोण से कहूँ तो मार्केट में बिकने वाले किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सामान की कीमत उसके खरीदार कितने है इस पर निर्भर करती है। अधिक मात्रा में उत्पादन ना केवल दाम काम करता है बल्कि उस क्षेत्र में नयी खोजो को बढ़ती गुणवत्ता को भी जन्म देता है। सो जरूरी है दूरगामी प्रयास किये जाय। मार्ग प्रकाश( Road Light ) और गाड़ियों दोनों में सौर ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल हो। कार्बन उत्सर्जन रोकने में भारत अग्रणी हो, इस क्षेत्र से जुड़े सभी विषयों पर उसके उपयोग में हम सबसे आगे निकले। सारा संसार हमसे सीखे, हमारा उदहारण दे। LED लाइटिंग के क्षेत्र में "Make In India" कुछ ऐसा ही प्रभाव दिखा है।

रामखिलावन लड़े प्रधानी.........

अबकि अच्छी बारिश आयी
रामखिलावन ने मस्त फसल उगायी
और बेच-बाच के करी कमायी
जेब गर्म थी, दिमाग भी गरमाया
दोस्तों ने उसको समझाया
देखो चुनाव का मौसम आया
करोड़पति बनने का रास्ता बतलाया
प्रधानी में नामांकन करवाया
रामखिलावन लड़े प्रधानी
ओढ़े फिरते चादर धानी
हाथ जोड़ फ़ोटो खिंचवाये
जगह-जगह पोस्टर चिपकाये
मुर्गा काटा दारू पिलवायी
नब्ज लोगों की समझ ना पायी
हुआ मतदान और परिणाम जब आया
राम खिलावन ने धक्का खाया
उधार वापसी के आये तगादे
रामखिलावन बोले राधे-राधे
खेत बिका बिका खलिहान
बचा खुचा गया सम्मान