मुद्दा: जानलेवा यातायात व्यवस्था में हमारी जिम्मेदारियाँ और शिक्षा की भूमिका।

व्यक्तिगत या सार्वजनिक साधन से यात्रा करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। सुबह,शाम आप या आपका कोई प्रियजन शहर के यातायात का हिस्सा होते है। सुबह हर पारिवारिक व्यक्ति का सबसे प्राथमिकता वाला काम बच्चों को स्कूल या स्कूल बस तक ले जाना होता है।अक्सर देखने में आता है कि स्कूल बस में बच्चे को जरा भी असुविधा हो जाये तो माँ बाप बस वाले के ऊपर,बस स्टाफ के ऊपर गुस्सा करते है। बस में जो भी बच्चे होते है हर एक के माँ बाप अपने बच्चे के लिए एक समान ही चिंतायें रखते है।बच्चे की सुविधा,सुरक्षा स्कूल में स्कूल बस में माँ बाप की चिंताओं का सबब होता है। यदि बस ड्राईवर स्कूल बस को गलत दिशा में गलत तरीके से, अधिक गति से चलाता है और ये आपकी नज़र में आ जाये तो बस ड्राईवर की शिकायत होती है। स्कूल प्रशासन से,हल्ला गुल्ला मचाया जाता है। हर कोई ये चाहता है स्कूल बस का ड्राईवर बिल्कुल आदर्श तरीके से गाड़ी चलाये। किन्तु ये बात खुद पर लागू हो सके ऐसे किसी ख्याल से दूर ही रहते है लोग। ये 60% से अधिक लोगों की बात है।

इन्ही में से अधिकाँश माँ बाप जब घर से दफ्तर के लिये निकलते है। बहुत व्यस्त नज़र आते है। समय इतना कम की एक हाथ में स्टीयरिंग और दूसरे में मोबाइल होता है। व्यस्तता इतनी की गाड़ी चलाते हुये और सड़क पार करते हुये उन्हें ये बात ध्यान नहीं रह जाती की वो अपनी जान और साथ ही अपने ही जैसे किसी की जान खतरे में डाल रहे है। जाहिर है की बात जल्दी गाडी चलाने और फ़ोन पर बात करने तक ही सीमित नहीं है। गाडी तेज चलाना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, हाई बीम पर गाड़ी चलाना इतनी जल्दी कि 1-2 मिनट बचाने के लिये रेडलाइट क्रॉस करने से भी बाज नहीं आते। शायद ये ख्याल भी दिमाग के किसी कोने में शायद नहीं आता की जिस बच्चे की सुरक्षा के लिये वो खुद बस के ड्राईवर से लड़ जाते है स्कूल प्रशासन से झगड़ा करते है। वही आदते वो खुद जीते है, और इत्तेफ़ाकन कभी अपने से कोई गिला शिकवा नहीं करते। यदि कोई यातायात नियमो का हवाला दे तो दोष दूसरे के मत्थे मढ़ कर पल्ला झाड़ लेते है।जब आप अपनी जान खतरे में डालते है तब साथ ही साथ आप अपने बच्चे का भविष्य भी खतरे में डालते है। यातायात के नियमो का पालन करना और करवाना केवल स्कूल बस,ऑटो चालक और ट्रैफिक पुलिस के हवलदार की जिम्मेदारी नहीं है । ये हमारी, हम सबकी जिम्मेदारी है। अक्सर देखिये लोग पूरे परिवार को साथ बिठाकर गलत दिशा से यू टर्न ले रहे होते है। गलत दिशा में चल रहे होते है। ये अपनी जिम्मेदारियो से भागने जैसा ही है। जल्दी सभी को है तो क्या इस जल्दी को जानलेवा बना लेना उचित है? ये बात भी सनद रहनी चाहिये। की यातयात के नियम तोड़ने की बात यदि किसी दुर्घटना में सिद्ध हो जाए तो पीड़ित किसी तरह के मुआवजे का हकदार नहीं होता।

सड़क दुर्घटनाओं का आँकलन करे यो ये साफ़ हो जाता है कि अधिकार मामलात में, शराब पीकर गाड़ी चलाना, गलत दिशा में गाडी चलाना, तेज गति से गाड़ी चलाना रेडलाइट करना। किसी के लिये 2 मिनट की जल्दी दुसरे को अकाल मौत दे गम्भीर अपराध ही तो है।यमुना एक्सप्रेसवे में होने वाले हादसे तेजगति के जानलेवा होने का उदहारण है। किन्तु फिर भी रफ़्तार के सौदगर है की थमते ही नहीं। कई बार के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहूँ तो हर आदमी दूसरे से आगे निकल जाने की चेष्टा रखता है। सड़क पर चलने की अधिकतम रफ़्तार क्या है ये मुद्दा होता ही नहीं है। कुछ लोग ऐसा मजे और दूसरो पर रौब ज़माने के लिये भी करते है।
भारत में चण्डीगढ़ की यातायात व्यवस्था को अपेक्षाकृत अच्छा माना जाता है। चण्डीगढ़ के कई चौराहो पर स्पीकर लगे हुए है जो यात्रियों को ये बताते रहते है की "दुर्घटना से देर भली", "कहीं कोई है जो आपका इंतज़ार कर रहा है"। ये बात बहुत सारे लोगो के कानो से बस होकर गुजर जाती है। किन्तु हाथ जब गाडी के एक्सीलरेटर पर जाता है तो सब नियम कायदे कानून हवा हो जाते है। ये प्रवत्ति बेहद चिन्ताजनक है। ये जरूरी है की भी नियमो का पालन करे और जो नहीं करता उसकी शिकायत करे। चण्डीगढ़ के अखबारो में ये खबर आम रहती है की किसी ने ट्रैफिक नियम तोड़ने वाले की तस्वीर खीचकर फेसबुक डाल दी और पुलिस ने उसका चालान कर दिया।

सरकारों को भी ये चाहिये की ट्रैफिक पुलिस को प्रॉपर ट्रेनिंग मुहैय्या करायी जाय। उन्हें पेशेवर तरीके से काम करने की हिदायत जी। नोयडा के चौराहो में जहाँ ट्रैफिक पुलिस कभी-कभी मिल जाती है। मैं आज तक कभी नहीं देख पाया की पुलिस वाला प्रोफेशनल तरीके से आगे बढ़ने का इशारा करता हो। इसके इतर चण्डीगढ़ में अक्सर ये पाया है की पुलिस का बर्ताव ज्यादा पेशेवर है। यातायात कर्मी बाकायदा सीटी बजा कर चौराहे के बीच नियम के अनुसार सिग्नल देता है। खासकर जब ट्रैफिक का कण्ट्रोल किसी कारणवश मैन्युअल हो।

यातयात के नियम स्कूली बच्चों की शिक्षा का अंग होने चाहिये। पढ़ाई के शुरुआती दिनों से ही। बालमन में जो एक बार छप जाता है उसका असर दूरगामी होता है। एक बेहतर और सुरक्षित समाज के लिये ये बहुत जरूरी है की अच्छी गणित और अच्छी विज्ञान के साथ साथ अच्छी नागरिक शास्त्र भी पढ़ाये और अच्छे नागरिक बनाये।

व्यक्ति विशेष: नोयडा का छोटू आशीष

नोयडा का जल बड़ा कठोर है!!! जल की कठोरता 1700 TDS के आसपास, बर्तन में अगर आयरन कंटेंट है तो यकीन मान लिजिये की जंग लगना तय है। महिलाओं के बाल गिरने की समस्या भी बेहद गम्भीर है। पीने के लिये वाटर फ़िल्टर से काम चल जाता है। किन्तु बाल धोने के लिये पानी किसी ब्राण्डेड कम्पनी का ही चाहिये होता है। इसी के चलते नोयडा में पानी बेचने व्यवसाय चरम पर है। पानी उपलब्ध करना एक व्यवसाय के रूप में जन्मा है ब्राण्डेड से लेकर लोकल कई तरह के पानी की बोतलें मार्केट में उपलब्ध होती है। इस इंडस्ट्री में जो लोग पानी की डिलीवरी की काम में लगे हुये है। उनमें कुछ बालिग और अधिकाँश नाबालिग बच्चे है। 10 -15 साल की उम्र के बच्चे। जिन्हे हम जैसे लोग छोटू कहते है। शिवम मिश्रा जी ने एक बार ब्लॉग बुलेटिन में लिखा था। कि होटलों और ढाबो में काम करने वाले ये छोटू अक्सर अपने घर के बड़े होते है। छोटी सी कमाई से अपना घर चलाते। 

एक ऐसा ही छोटू हमारी सोसाइटी में पानी की डिलवरी देने आता है। नाम है "आशीष" उम्र 13 साल के आस-पास है। आशीष नोयडा के सर्फाबाद का मूल निवासी है। सर्फाबाद बाहुबली DP Yadav और उनके पुत्र "विकास यादव" के गाँव के तौर पर पहचाना जाता है। कुल मिलकर छठवीं जमात तक पढ़ाई का दावा करता है। आशीष के पिता 3-4  साल पहले चल बसे तो उसे और उसकी माँ को परिवार का बोझ उठाना होता है। उसके पिता के देहान्त के बाद पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। कुल मिलाकर आशीष की पढ़ाई छूट गयी और अब उसे पूर्णकालिक तौर पर काम करना पड़ रहा है। आशीष की आँखों में कभी-कभी रंगीन दुनिया को जीने के सपने दिखते है, किन्तु वो जी नहीं सकता है। बात करके ये भी पता लगता है की वो कभी पढ़ाई नहीं छोड़ना चाहता था।  किन्तु जीवन की दुस्वारियाँ उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं देती। 

आशीष से बात करते-करते अचनाक मुझे ये याद आया की आशीष जो कर रहा है वो तो बाल मजदूरी के अंतर्गत आता है। किन्तु फिर भी आशीष को पढ़ाई छोड़ कर काम क्यों करना पड़ रहा है? क्या किसी की नज़र आशीष और आशीष जैसे हज़ारों बच्चों पर नहीं जाती क्या? प्रशासन की क्या जिम्मेदारी है। इस मुद्दे पर? हालाँकि मुझे नहीं पता की बाल मजदूरी करते बच्चों को बाल मजदूरी छुड़वाने के क्या उपाय है? ऐसे उपाय जिससे उसका घर भी चलता रहे और उसकी पढ़ाई भी चलती रहे? मान लीजिये की बच्चे ने मजदूरी छोड़ दी उसके उपरान्त कानून क्या कहता है? घर कैसे चलेगा? आर्थिक सहायता का प्रबन्ध कैसे होगा। जिम्मेदार अधिकारी कौन होता है? मुझे कैलाश सत्यार्थी भी याद आये किन्तु आगे क्या इसका पता नहीं चला? आपको पता हो तो बताईये।  शायद हम मिलकर आशीष जैसे बच्चों के लिये कुछ कर सके।

तकनीकि: Wi-Fi जायेगा तभी तो Li-Fi आयेगा

तकनीकि( technology) एक ऐसी चीज है जो पूर्णतया डार्बिन के सिद्धान्त "सर्वोत्तम की उत्तर जीविता( Survival Of Fittest) का पालन करती है। देखिये मोबाइल संचार में पहले डाटा की तकनीकि आई "GPRS" उसके बाद थोड़ी सी तेज डेटा स्पीड वाला "Edge" आया। उसके बाद  3G और अब 4G  एक का आना दूसरे के जाने के तौर पर देखा जा सकता है। ये विश्व के परिपेक्ष में देखे ना की केवल भारत के। इसी तरह हम टीवी एन्टीना से निकल कर सेटअप बॉक्स तक आ गये। एन्टीना चला गया।

कम्प्यूटर से एसोसिएटेड डिवाइस से कम्युनिकेशन के क्षेत्र में। कॉमपोर्ट(DB-9) से हम USB तक आये अब USB के भी नये वर्शन उपलब्ध है। आजकल Wi-Fi का उपयोग चरम पर है। किन्तु हमेशा तो नहीं रहने वाला। तो आगे  क्या? जैसा की प्रतीत होता है।  आगे आने वाला समय पूर्णतया ऑप्टिकल कम्युनिकेशन की ओर जाता लगता है। उदहारण के लिये Wi-Fi की लोकप्रियता को २०२० तक ऑप्टिकल कम्युनिकेशन हर लेगा। आपके मोबाइल और लैपटॉप( यदि बचे रहे तो) पर ऑप्टिकल पोर्ट दिखेगा। जो LED लाइट के इस्तेमाल कर आपके पर्सनल डिवाइस से कम्यूनिकेट करेगा। यकीन माने की ऑप्टिकल कम्युनिकेशन से आने वाला डेटा रेट आपको चौका देगा। अभी तक 10 GB का डेटा रेट हासिल किया जा चुका। इसके आगे भी सम्भावनाये है।

कुल मिलाकर किसी technology का भविष्य दो चीजो पर निर्भर करता है। एक तो technology द्वारा प्रद्दत features और दूसरा अपने प्रतियोगियों के अपेक्षा उसका दाम। आज Wi-Fi जिस दाम है। उससे 1/4 कीमत पर LIi-Fi उपलब्ध होगा। Li-Fi की बात करते हुये ये ध्यान रखना जरूरी है की दुनिया में अभी तक का सबसे बड़ा नेटवर्क है लाइटिंग नेटवर्क। हर घर में लाइट है। लाइट वहाँ पर भी है जहाँ लोग नहीं है। लाइटिंग का existing infrastructure यदि उपयोग में आ गया तो ये मान मान लेने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिये की। ना दिल्ली में केजरीवाल को ना देश में मोदी को अलग से Wi-Fi देने की जरूरत पड़ेगी। Li-Fi  सस्ता और टिकाऊ होगा। किन्तु पूरी बात कहने के उपरान्त ये कतई नहीं भूलना चाहिये की। तकनीकि अमेरिका और यूरोप से शुरू होकर भारत भारत आती है सो। LI -FI जब प्रयोगशाला से निकालकर रियल वर्ल्ड मई आयेगी तब भी भारत तक आते आते बहुत देर लगेगी। लेकिन जब भी आयेगी क्रान्ति लायेगी।


साभार: http://www.lificonsortium.org/tech2.html
कुछ ऐसा दिखेगा ऑप्टिकल कम्युनिकेशन
ये भी समझ लेना जरूरी है की देश-विदेश में एलेक्ट्रिक्सिटी measurement( Household/Industrial  energy consumption) में optical coupling का इस्तेमाल बहुत दिनों से होता आया। किन्तु इसका उद्देश्य था। Light के द्वारा संचार को बहुत मोटे अर्थो में उस संचार से समझा जा सकता है। जो रेलवे स्टेशन पर खड़ा के गॉर्ड torch के इशारे से ट्रेन के ड्राइवर को करता है।

बीते दिनों "Lighting" की सर्वश्रेष्ठ कम्पनी Philips ने "Visible Light Communication-VLC" का उपयोग करके फ्रांस के एक शॉपिंग मॉल में "Light Positioning System" का डिप्लॉयमेंट किया। यहाँ किसी प्रोडक्ट के पास लगी LED लाइट आपको ये सूचना दे सकती है की। वहां पर रखे प्रोडक्ट्स पर क्या-क्या ऑफर है। क्या प्राइस है। इसके लिये बस आपको मोबाइल फ़ोन का कैमरा ON करना होगा। ये Li-Fi के क्षेत्र में बढ़ते हुये कदमो की ओर इशारा करते है।  
"Philips Light Positioning System" के video का You-Tube लिंक https://www.youtube.com/watch?v=uQw-o6bjrec

मुद्दा: कन्नौज में इत्र की जगह आग क्यों?

कन्नौज से फसादों की खबर है। खबर पढ़ते ही "कफ़ील आजर" याद आये। उनकी नज्म भी याद आयी 

"अब फसादों की खबर सुनकर मैं लर्ज जाता हूँ, 
 घर में एक ही है बेटा कमाने वाला"

अपनी इत्र और उसकी खुशबू के लिये मशहूर कन्नौज की फिजायें आजकल आग की लपटों और तनाव की हमसफ़र है। प्रतिमा विसर्जन जुलूस में उड़े गुलाल ने कहर बरपा दिया। एक की अकाल मौत और कई घायल। ये बेहद दुखद है की आग लपटे दूर चली गयी और शहरों को छावनी में तब्दील करना पड़ा। कुल मिलाकर बेहद जरूरी हो चला है की इन फसादों के  मूल कारणों की पहचान की जाय और उन्हें उखाड़ फेका जाय।

मुजफ्फरनगर, काँठ, सहारनपुर, बरेली, दादरी अब कन्नौज और आस पास के इलाके। इसके अलावा भी कई फसाद पिछले वर्षो में प्रदेश में हुये। हर बार आरोप प्रत्यारोप की बाद कुछ भी ठोस उपाय ना हो सके। प्रदेश सरकार केन्द्र पर आरोप मढ़ती है और केन्द्र इंकार करता है। कुल मिलाकर ये दीगर है की प्रदेश की पुलिस व्यवस्था राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। प्रदेश का ख़ुफ़िया तन्त्र अगर किसी तरह की सम्भावित साजिश जो सूँघ नहीं पाता तो विफलता का श्रेय प्रदेश सरकार का ही है। ये भी जाहिर है कि प्रदेश में सरकार बदलते ही लोगो के काम के तरीके बदल जाते है।अमूमन  प्रदेश सरकार को किसी न किसी वर्ग विशेष की समर्थक/ प्राथमिकता देने वाला माना जाता। उदहारणस्वरुप उत्तर प्रदेश में जब भाजपा की सरकार आ जाती है लोग ये मानते है कि हिन्दूवादी सरकार है। जब बहुजन पार्टी की सरकार आती है तो ये माना जाता है की ये दलितों के मुद्दे को प्राथमिकता देने वाली सरकार है। जब समाजवादी पार्टी की सरकार आती है तो लोग ये मान लेते है कि सरकार समाजवादियों, यादवों और मुस्लिमों को प्राथमिकता देने वाली सरकार है। 

ये जाहिर है की उत्तरप्रदेश की सरकार अपनी मुस्लिम समर्थक नीतियों के लिये जानी जाती है। ये भी जाहिर है की किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष को ये लगे की सरकार उसके मुद्दे पर उसके साथ खड़ी है तो इस तथ्य का उपयोग और दुरूपयोग करने वाले दोनों बहुतायत मात्रा में उपलब्ध होते है। बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल को दलितों के उत्थान के तौर पर जरूर देखा जा सकता है किन्तु ये भी एक कड़ुआ सच है की इसी शासनकाल में दलितों को दिये गये कानूनों का जबरदस्त दुरुपयोग भी हुआ। व्यक्तिगत रंजिश और बदले की भावना से। अदालत तक ने सरकारों को चेतवानी दी। कुछ देर के लिये अगर राजनीति की बात छोड़ दी जाये। बात देश में महिलाओं की जाय तो महिला अधिकारों का कितना दुरुपयोग हुआ ये इसी बात से जाहिर है की। स्वयं माननीय सुप्रीम कोर्ट को दहेज़ के मामलात में पहले एक सक्षम अधिकारी से जाँच तत्पश्चात मुकदमा या गिरफ्तारी के निर्देश दिये। 

खैर मुद्दे पर वापस लौटते है। उत्तरप्रदेश में भूमाफियाओं, असमाजिक तत्वों का बोलबाला इस समय अन्य सरकारों से कहीं अधिक है। उत्तर प्रदेश में यदि आपकी जमीन पर कोई मुस्लिम कब्ज़ा कर ले ये ये मान लेना चाहिये उचित ही होगा की अपनी जमीन पाने के लिये आपको प्रदेश सरकार से लड़ाई लड़नी है। कानपुर और आसपास के इलाको में बहुतायत मात्रा में ये चल रहा है। प्लाट पर कब्जे का केस भी तब साम्प्रदयिक रंग ले लेता है। सहारनपुर में सिक्खों धर्मस्थल पर हमले में कोर्ट के आदेश को नज़रअंदाज़ कर भीड़ ने हमला किया क्यों? उस हमले में भी कई लोगों की हत्या हुयी प्रदेश सरकार ने उनको मुआवजा क्यों नहीं दिया? उनकी खोज खबर क्यों नहीं ली? कन्नौज के दंगे क्या केवल गुलाल गिरने से हो गये? किसने किसके साथ मारपीट की ये अखबारों में क्यों नहीं आया? सरकार ने बयान जारी क्यों नहीं किया? अगर तथाकथित अल्पसंखयक के साथ ज्यादती हो तो उसका प्रचार प्रसार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर किया जाना। और यदि किसी बहुसंखयक समुदाय के साथ ज्यादती हो तो कूड़े के ढेर में। मुआवजे की जरूरत सबको होती है। ये हिन्दू और मुस्लिम देख करने की जगह गलत और सही देख कर करना चाहिये। अन्यथा आग की लपटे पसर जाने के तनिक देर भी नहीं लगती। ये पक्षपात है। सरकारी पक्षपात जब तक चलता रहेगा, तब तक कभी कन्नौज कभी सहारनपुर जलता रहेगा"


साभार:गूगल
कुलमिलाकर प्रदेश सरकार को ये आत्मचिन्तन करना ही पड़ेगा की आखिर क्यों उसके ही शासनकाल में दंगो का गुबार क्यों आ जाता है? क्यों नहीं थमती आग की लपटे? जब की धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े फरमाबरदार इसी सरकार में है। जब सत्ता आपकी है दोष दूसरों पर कैसे और क्यों? सरकार को पक्षपात और जातपात की राजनीति से उठना होगा। जहाँ एक तरफ हाईकोर्ट बड़े सम्वैधानिक पदो पर की गयी नियुक्तियों पर सवाल उठा चुका है। निरस्त कर चुका है। वहीं दूसरी ओर तथाकथित अपराधियों को विधान परिषद् भेजने से राज्यपाल इन्कार कर चुके है। ये सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिये काफी है।

कविता: यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई .....दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई।

यहाँ दिल्ली का तात्पर्य दिल्ली में चलने वाली साजिशो से है। सत्ता की बदनीयती से है। ये शहर प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े नहीं करती। पेशेखिदमत है एक और सच ..........

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई ।

दिल्ली जहन में जहर घोलती है
धर्म के तराजू में इंसा तोलती है
दिल्ली का दिल भी फरेबी भाई
सत्ता भी होती किसकी लुगाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली के दलदल में ताकत आजमाना
सन के जो निकले वो नेता सयाना
दिल्ली में सच बस दवाई सा है भाई
झूठ का टेम्पो हमेशा हाई है भाई।

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली में ताकत है नोटों से वोटों से
अदालत में आर्डर आर्डर की चोटों से
दिल्ली से हुयी है जिसकी सगाई
उसकी तो बस निकल पड़ी है भाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली की दहलीज में लड्डू बताशे
यहाँ लोग ससटांग हो हो के आते
दिल्ली सियासत का संगम है भाई
धन्य है वही जिसने डुबकी लगाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई।

दिल्ली लुभाती है दिल्ली बुलाती है
सरेआम ईमान को फाँसी लगाती है
दिल्ली के चक्कर में आना ना भाई
दिल्ली ना सुनती किसी की दुहाई।

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।

दिल्ली का दिल भी बड़ा बेअदब है
पहले जो माँगो वो मिलता वो सब है
आने पे मौका रास्ता दिखाती है दिल्ली
फिर नंगा नाच नचाती है भाई

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।

फसादों की आग लगाती है दिल्ली
फिर लपटों में रोटी पकाती है दिल्ली
और देर तक मुस्कराती है दिल्ली
फिर सान्त्वना भी जताती है भाई

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।
-विक्रम

नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित है। बिना रचनाकार का नाम लिखे, बिना इजाजत लिये प्रकाशित करना कानूनी कार्यवाही को वाध्य करता है।

गज़ल: लड़ाई है बस आदमी बनाम आदमी की

जीसस मोहम्मद राम पहचान आदमी की
सस्ती बड़ी है संसार में जान आदमी की

है रिश्ते मिटाता है खुद को जलाता
माया की गुत्थी में जान आदमी की

जीवन डगर में हर एक पहर में
बहुत कीमती है जुबान आदमी की

खुद को सम्हालो दिल दिल से मिला लो
लड़ाई है बस आदमी बनाम आदमी की

आपाधापी छोड़ो पल फुरसत के जोड़ो
रुककर मिटेगी थकान आदमी की ।


नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित

मुद्दा : Builder और authority के nexus से .... अच्छे दिनों की तलाश है

अभिषेक ने आज से चार साल पहले नोयडा के एक्सप्रेसवे में घर बुक करवाया। 3C नाम के एक International बिल्डर के यहाँ। अपने  स्तर जितना भी वेरिफिकेशन हो सकता था किया और फिर नोयडा के लाखो लोगो  की तरह कुछ कैश बाकी लोन लेकर बिल्डर को चुकाना शुरू कर दिया। बिल्डर ने वादा किया था कि 2014 के पहले क्वार्टर में घर का possession देगा। किन्तु ऐसा हुआ नहीं।  अभी तक possession  इन्तजार चल रहा है।  कुल मिलाकर लाखों वेतन भोगियों की तरह अभिषेक भी इक तरफ घर किराया दे रहा है, दूसरी तरफ लगभग उतनी ही EMI भी। दोहरी मार झेल रहा है। 

ये मार कितने दिन झेलनी पड़ेगी पता नहीं। बिल्डर ने करीब १.5 साल पहले ही बिल्डिंग का स्ट्रक्चर रेडी कर दिया था, पर उसके बाद अचानक काम रोक दिया। काम रुकने का कारण फण्ड का ना होना बताया गया है। अभिषेक 95 % payment कर चुका है। अभिषेक और कई अन्य खरीददारों ने मिलकर बिल्डर के खिलाफ कोर्ट में गुहार लगायी। पर अभी तक नतीजा ढाक के तीन पात है। राहत मिलती नहीं दिखायी देती। ये भी गौरतलब है की बिल्डर के कई प्रोजेक्ट चल रहे है। अमूमन हर प्रोजेक्ट का स्ट्रक्चर खड़ा होने के बाद वह फण्ड का रोना रोने लगता है। किन्तु दूसरे की launching भी नहीं रूकती और  लोगों से होने वाली उगाही भी। 

अभिषेक और उसके साथी खरीदार कोर्ट  में गुहार लगा चुके है। धरना और प्रदर्शन भी कर चुके है। मामला समाचारपत्रों और दूरदर्शन ने भी चुका है। इन सब के बाद भी ना नोयडा का प्रसाशन जागा और ना सरकार के कानों में जूँ रेंगी। ना कोई एडवाइजरी जारी  गयी ना ही कोई धर-पकड़ की गयी। एक तरफ white कॉलर गिरोह है। खुले आम चुनौती देकर लूट होती है। बिल्डर और development authorities का बड़ा nexsus है। लूट सहभागिता हो रही है परस्पर सहयोग से हो रही है। 

अभिषेक केवल एक नाम है। अभिषेक जैसे लाखों लोग नोयडा में, चण्डीगढ़ में , बैंगलोर में, हैदराबाद में, चेन्नई में और भी कई शहर है जहाँ ये सब रहते है। जहाँ लूट का धन्धा खुले आम चलता है। जीवन भर की जमा पूँजी के साथ जुआँ खेलता है। जो भी कमाता है कुछ बिल्डर को कुछ बैंक को देकर अपना सारा हिसाब किताब खत्म कर लेता है। इस पूरे प्रोसेस दलाल तो बहुत मिलते है। हलाल भी बहुत करते है पर सरकार सोयी रहती है।  घिसट -घिसट कर जब घर का possession मिल जाता है तब सरकार स्टाम्प ड्यूटी का चार्ज लेना नहीं भूलती सरकार। एक्सटर्नल डेवलपमेंट का चार्ज लेना नहीं भूलती सरकार। 

कुल मिलाकर अभिषेक और अभिषेक जैसो को अच्छे दिनों की तलाश है। देखिये कौन देता अच्छे दिन कानून व्यवस्था या प्रदेश सरकार या फिर केन्द्र सरकार!!!! 
साभार : गूगल 

मुद्दा: PINK SLIP, और Corporate Sector की use and throw नीति

जब तक आप कमा रहे है, सरकार आपकी साथी है, हमकदम है हमनमा है । "आयकर विभाग" आपकी मदद को हरकदम तैयार दिखता। ये बताने के लिये की एडवांस टैक्स कब भरे, ये बताने के लिये कि कर भरने की अन्तिम तिथि क्या है, इत्यादि इत्यादि। ये भी बताया जाता है कि यदि कर नहीं दिया तो पुलिस आपके घर आ सकती है, जेल-दर्शन भी हो सकते है।
साभार: The Economics Times

किन्तु जब आपको "PINK SLIP" मिल जाती है, आप किसी "गम्भीर बीमारी" के शिकार हो जाते है, या किसी "दुर्घटना के शिकार" हो जाते है। एक ऐसी स्थिति जब आप चाहते हुये भी काम नहीं कर सकते तब सरकार एक स्वार्थी प्रेमिका की तरह आपसे मुँह फेर लेती है। ना कोई खोज लेती है ना कोई खबर। जब तक हाथ पैर चल रहे है। तब तक इस सरकारी प्रेमिका को खिलाते रहिये वर्ना फाँके कसना तो आपकी नियति है।

कुल मिलाकर सरकार हर तरह की बात करती है। किन्तु कॉर्पोरेट सेक्टर के लोगों की सामाजिक सुरक्षा की बात नहीं करती। जिन शहरों में कॉर्पोरेट सेक्टर की नौकरियाँ मिलती है वहाँ के आसमान छूते खर्चे पहले की कमरतोड़ होते है। जो कमाया जाता है लगभग सभी, कभी सरकारी टैक्स, कभी बिल्डर टैक्स, कभी शॉपिंग मॉल टैक्स, कभी बच्चों के स्कूल के टैक्स के रूप में चुका देना होता है। दीगर है खुली लूट है। खुली लूट है जो जितना ले पाया ले गया। हर चीज का २ दोगुना दाम लगता मेट्रो शहरों। हाँ ये बात अलग है की सरकार मेट्रो भी अधिक महँगे शहरों को मेट्रो मानने के लिये तैयार नहीं है।

हाल फिलहाल सैमसंग का नाम आ रहा है। साल भर पहले टाटा कंसल्टेसी सर्विसेज -TCS ने कहर बरपाया था। ये सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता। कारण साफ़ है। सरकार की ढील कम्पनी को "यूज़ एंड थ्रो" पद्धति को अपनाने की इजाजत देती है।  किन्तु रोजगार ना होने पर कोई बन्दोबस्त नहीं करती। कभी कम्पनी की "CODE OF CONDUCT"  की बात करके कभी "performance" की बात कर नौकरियों की बलि ली जाती है। 15 साल तक अच्छा perform करने वाला १६वे साल अचानक bad performer कैसे बन जाता है। ये मुझे तो आज तक नहीं समझ आया। सरकार कैसे समझ जाती है पता नहीं?

ये बात भी गौरतलब है की जो भी कम्पनीज pink slip बात रही है। कोई भी घाटे में नहीं है!!! मुनाफा थोड़ा काम हुआ। तो रायता फैला दिया। कुल मिलाकर सरकार को कानून में संसोधन करने चाहिये और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये।  अमेरिका की तर्ज पर , जर्मनी की तर्ज पर। नहीं तो  भगवान भरोसे तो चल ही रहा है। 

मुद्दा: गुजरात में दाल काली लग रही है .......

देश ने जाट आन्दोलन देखा, पिछड़ा वर्ग में शामिल होने हेतु, सड़के जाम हुयी, रेल की पटरियां उखाड़ी गयी। बसे तोड़ी गयी और जाहिर है कानून भी। जाट भी सलामत रहे और नेता यसपाल मलिक भी।फिर देश ने गुर्जर आन्दोलन देखा, पेड़ काटे गये, सड़के जाम हुयी, सार्वजानिक सम्पत्ति पर तोड़फोड़ आगजनी हुयी, राजस्थान बन्धक बना रहा। लोकतन्त्र सिहर गया। प्रदेश और केन्द्र सरकार नतमस्तक हो गयी। कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुयी। गुर्जर नेता किरोड़ी लाल बैसला का रसूख और ग़ालिब हुआ।कोई बदले की कार्यवाही नहीं हुयी। देश ने गुजरात में पाटीदार आन्दोलन देखा। शान्ति पूर्ण धरना करते पाटीदारो के नेता हार्दिक को गिरफ्तार किया गया। लाठी बरसाई गयी। कमोवेश हिन्सा उकसाई गयी!!! नाबालिक श्वेतांग पटेल को हिरासत में मार दिया गया। अब पाटीदारो को देशद्रोही घोषित कर दिया गया !!! तिरंगे का अपमान करने वाला बताया। वल्लभ भाई पटेल के वंशज तिरंगे का अपमान करने लगे है!!! देखिये देश कहाँ जा रहा है!!! कौन ले जा रहा है। दाल काली लग रही है। सत्ता मतवाली लग रही है!!!
जग जाहिर है। गुजरात की मुख्यमन्त्री शीर्ष नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करती है। उन्ही के द्वारा चुनी गयी है। जाहिर है रबर स्टाम्प है। बिलकुल उसी तरह जैसे राज्यपाल होते है।साफ़ है सरकार कौन चला रहा है। इसी गुजरात से मोदी ने सफ़र शुरू किया। केशुभाई पटेल को पदच्युत किया। यही से उडान भर दिल्ली के बजीर बने। यही से पतन का रास्ता भी खोल रहे है। पुलिस कैसे काम करती है ये भी देश को दिखा रहे है। बदले की भावना कभी किसी का भला नहीं करती ये बात सभी को सनद रखनी चाहिये। इतिहास अपने को दोहराता है। गुजरात में जो रहा है वो भी इतिहास दोहराएगा। विनाशकाले विपरीत बुद्धि का नारा चरितार्थ नज़र आयेगा।

गज़ल: फसादों की दुल्हन रोज नयी-नवेली

भाव चवन्नी के बिकती मजबूर चमेली
अच्छाई बुराई रही पुरानी सखी सहेली

धर्म की दीवार बड़ी दिखती नहीं मगर
फसादों की दुल्हन रोज नयी-नवेली

घटता हुआ धीरज सिमटता हुआ जहन
क्षण में मिटे दोस्ती लगती है पहेली

साजिशो का मजमा, खूनी है सियासत
था प्यार का राग जहाँ सूनी है हवेली ।


नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित है। 

चुनाव: विकास की नाव पर सवार होगा बिहार का चुनाव

बिहार का चुनाव आजकल सुर्खियों में है। दूरदर्शन से लेकर समाचारपत्र तक मुद्दो और प्रतिनिधियों का डिसेक्शन चल रहा है। ये चुनाव जहाँ ओर २ बार के मुख्यमन्त्री नितीश के लिये "लिटमस टेस्ट" साबित होने वाले हैं। वहीं दूसरी ओर दिल्ली में हार का स्वाद चख चुकी भाजपा के सिपहसालार अमित शाह के लिये "वाटर लू"। चुनाव का महत्व इसलिये और बढ़ जाता है कि विकास की बात दोनों तरफ से है। एक तरफ खुद बिहार के विकास पुरुष है और साथ में लालू का परम्परागत जनाधार। दूसरी तरफ आशीर्वाद है गुजरात के और फिर देश के विकास पुरुष नरेन्द्र मोदी, और उनके कुशल रणनीतिकार अमित शाह का साथ ही साथ दलितों का ध्रुवीकरण करने वाले रामविलास और जीतनराम का जनाधार जो भाजपा के लिये परम्परागत मत नहीं रहे है। विकास की बात मतलब साक्षरता, शिक्षा,रोजगार, सुरक्षा  की बात। विकास बात मतलब बिहार की छवि की बात और बिहारी होने और उससे जुड़ी सामाजिक मान्यताओं की बात है । उस सामाजिक बदलाव जिसकी लोगो को तहेदिल से दरकार है। आईये विश्लेषण करते है की विकास का ऊँट किस करवट बैठेगा।

मुद्दा विकास ही होगा।
21वी शताब्दी का दूसरा दशक भारत की राजनीति में विकास का दशक बनकर उभरा। 2010 में विकास को मुद्दा बना कर जनतादल यूनाइटेड और भाजपा गठबन्धन को बहुमत मिला। इसी दौर में आगे उत्तर प्रदेश में विकास एक बार फिर प्रमुख मुद्दा था। युवा अखिलेश को कमान सौपी। पूर्ण बहुमत के साथ। 2013 आते-आते विकास की बात राजनीति में एक पुख्ता मुद्दा बन गयी। विकास  कट्टर हिन्दूवादी छवि के ऊपर भारी पड़ गया। मोदी की जीत ने विकास के मुद्दे के होने और बेहद वजनदार होने की बात को सिद्ध कर दिया। आगे देश में कहीं भी चुनाव हो तो  विकास का मुद्दा प्राथमिकता के साथ उठना है। वही बिहार में है। गाँव में रहने वाली 85 फीसदी आबादी विकास के ही भरोसे है। दूसरी तरफ 58 फीसदी मतदाता 25 वर्ष की आस-पास होने से कारण नये भविष्य और नयी आशाओं के साथ जाना पसन्द करेंगे। यहाँ ध्यान देने वाली बात ये भी है की लगभग 58 फीसदी महिलाये साक्षर होने के नाते मतदान में बड़ी भूमिका निभायेगी। जो प्रमुखता से रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की बात करने वाले की तरफ ही जायेगा। 

मतदाताओं का बदला दृष्टिकोण
1990 के दशक में देश ने साझा सरकारों का दौर देखा है । केन्द्र और प्रदेश दोनों जगह। त्रिशंकु विधानसभा , अल्पकालिक सरकारे ,समझौता करते मूल्य। ६ महीने तुम ६ महीने हम। इन सब के बाद बाद उत्तर प्रदेश से लेकर लगभग सभी जगह बहुमत देने का दौर आया। उप्र में मायावती का बहुमत  के साथ आना। फिर अखिलेश को बहुमत मिलना बिहार में नितीश का बहुमत के साथ आना इस बात का स्पष्ट संकेत है। कि 21 शताब्दी में साक्षरता के साथ-साथ मतदाताओं में अपना अच्छा बुरा समझने मुद्दों को परखने की क्षमता का उत्तरोत्तर विकास हुआ है। ये विकास निरन्तर चलती प्रक्रिया सा प्रतीत होता है । कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि आगे बढ़ते हुये असली मुद्दो विकास, सुरक्षा इत्यादि ही होगे ,जाति धर्म थोड़ा पीछे छूटते नज़र आयेगे। ये भी समझ लेना जरूरी है गुजरे समय में बिहार से रोजगार के लिये होने वाला पलायन 30 पतिशत तक घटा है। ये इस धारणा को मजबूत करता है कि सही सरकार, मजबूत सरकार रोजगार दे सकती है। 

नितीश की बदली chavi और बोझ बना गठबन्धन
नितीश कुमार बिहार की राजनीति का अहम और बेदाग़ चेहरा रहे । अब विकास की बात करते नज़र आते है।  लेकिन सवाल ये है ये है की अब उनकी विश्वसनीयता कितनी रह गयी है !!!! 2013 में बाद विकास की बात करते मोदी से और भाजपा से दूरियाँ बनाना फिर पद त्याग और पुनः उसे पाने प्रयास। उनके निर्णय को तार्किक आधार पर देखे तो महत्वकाँक्षा और अहम नजर आता है। लिहाजा मतदाताओं का भरोसा काम हुआ। जिसे  आगे चलते हुये लालू से हाथ मिलाकर नितीश  स्वप्रमाणित कर दिया। लालू का साथ उनके राजनीति करने के तरीकों को फिलहाल सवालिया बनाता है। लालू  साथ खड़े होकर विकास की बात "कीचड में खड़े होकर सफाई की बात करने जैसा है"। जो बीते २ सालों में लोगो ने देखा की किस तरह बिहार को अनाथ सा हो गया । पद छोड़ा और फिर उसी को पाने के लिये लड़ाई लड़ी बिना। पद पाने के लिये कुतर्को के सहारे विस्वसनीयता प्रभावित की। लालू से मिलकर विकास मुद्दा भी हाथ से गया और बेदाग होने की बात भी हाथ से गयी। कुल मिलाकर कर चुनावी भाषणों में भाजपा को कोसने और के धर्मनिपेक्षता के आलावा शायद ही कोई अन्य बात कर पाये। सो कुल मिलकर दायरा सीमित होता है। और वोटबैंक भी। पूरा वोट बैंक लालू + नितीश की  वोट  जो हमेशा मिलते आये है। हालात कुछ यूँ नजर आते है कि गठबन्धन के चक्कर में विकास छोटा और अन्य मुद्दे बड़े हो जायेंगे।

भाजपा के लिये बढ़त है
जब मुद्दा विकास का है तो मोदी की रैलियों से फायदा होना तय है। साथ ही साथ ये भी तय है कि बुद्धजीवी वर्ग वोट देते समय केन्द्र में भाजपा सरकार के होने को और उससे जुड़े हितों को भी मद्देनज़र रखेगा। पिछले वर्ष से दिल्ली में अलग पार्टी सरकार होने  के  कारण  विरोधाभास दिल्ली में दिखे, उनका प्रभाव देश  हिस्सो मे जाना तय है। ये मतदाता के निर्णय को प्रभावित करते नज़र आयेगे। इन सबके बीच दलितों नेता के तौर उभरे जीतनराम माँझी और रामविलास पासवान कि लोकजनशक्ति पार्टी कुछ हद तक गैर परम्परागत भाजपा मतों का ध्रुवीकरण  करने में सक्षम नजर आते  है। हाँ ये गौरतलब है कि भाजपा के पास बिहार में कोई बड़ा कद्दावर नेता नहीं है जिसका खुद का जनाधार हो। कुल मिलाकर मुख्यमन्त्री पद के लिये उम्मीदवार के चेहरे का साफ़ न होना मतदाताओं को संशय में डाल सकता है। किन्तु लालू की छवि एक धनात्मक उत्प्रेरक की तरह है। हालाँकि गुजरात में पटेलों पर चली लाठी कुर्मी मतदाताओं का ध्रवीकरण नितीश कुमार की तरफ करेगी।

Taken from wikipedia:
Religion

Percent
Hindus
  
82.7%
Islam
  
16.9%
Others
  
0.4%

मुद्दा: सफर "याकूब मेमन" से लेकर दादरी में विषवमन तक

३० जुलाई को आतंकी "याकूब मेमन" को फाँसी दी गयी। एक आतँकी को विदा करने के लिये जबरदस्त भीड़ उमड़ी। समाचारपत्रो और न्यूज़ चैनल्स पर विदाई समारोह सजीव दिखाया गया। मनाही के बावजूद। ये ख्याल लाजिमी था कि एक आतँकी को विदाई देने क्या मतलब? भीड़ में जो लोग जुटे क्या हासिल करना चाहते थे? उनकी मंशा या शंका क्या थी? इस बात का जवाब कभी ढंग से समझ नहीं आया। किन्तु तार्किक तौर, तथ्यों के आधार पर, ये मान लेने में कोई सँकोच नहीं था की लोग सम्विधान की अपेक्षा व्यक्ति विशेष और उसके द्वारा किये गये कार्यो को तरजीह दे रहे है। न्यूज़ चैनल्स छोटा शकील और उनके लोगों को लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे। एक भगोड़ा 1.2 अरब की सँख्या वाले लोकतन्त्र को धमकी दे रहा था। किन्तु बेशर्मी के साथ TRP के लिये सजीव प्रसारण था।

30 जुलाई की शाम और उसके हफ्तों बाद तक समाचारपत्रो और न्यूज़ चैनल्स को बारीकी से खंगाला। पर आतँकी को महिमामण्डित करने वाले लोगों के विरोध में कोई बयान खोजे ना मिला। लगा मानों समूची मीडिया समूचे धर्मनिरपेक्ष बिरादरी, समूचे संवेदनशील लोग चुप्पी की चादर ओढ़े बैठे हो!!! लगा जैसे नंगा सच देखने के बाद भी लोग आँखें घुमाकर निकल जाना चाहते हो। ये तथ्य देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बना रहे शायद इसके लिये पचा लिया गया। किन्तु जरा सोचिये, सच से आँखें फिरा लेने से, मौन हो जाने से क्या सच बदल गया। विरोध ना करना मूक समर्थन जैसा ही तो था? किन्तु जिस सहजता से आतँक के इस महिमामण्डन को स्वीकार किया गया वो चौकाने वाला था। यहाँ ये तथ्य गौरतलब है कि आतँकी याकूब को भारत की दण्ड सँहिता का पालन करते हुये फाँसी दी गयी। बचाव का हर मौका भी किन्तु अंततः सजा हुयी और मौत मिली। लोगो की भीड़ कमोवेश उस दण्ड का विरोध करती नज़र आई। ये दण्ड के साथ भारत कि न्याय व्यवस्था का विरोध था। भारतीय होने का विरोध था।

अब देखिये, २ महीने बाद दादरी में एक हादसा हुआ। गोकशी की अफवाह पर एक हत्या हुयी। यकीनन हत्या निन्दनीय और मानवाधिकारों का उल्लघंन करने वाली थी, शर्मनाक थी। किन्तु हत्या को हिन्दू-मुस्लिम का तमगा लगा कर प्रचारित किया गया। देश-व्यापी सुनियोजित साजिश करार दिया गया। ये गौर करना जरूरी है जाँच अभी पूरी नहीं हुयी किन्तु अब देश की मीडिया, धर्मनिरपेक्ष बिरादरी, संवेदनशील लोग कुण्डली मार कर बैठे है दादरी में। समाचारपत्रों में न्यूज़ चैनल्स में सोशल मीडिया बस २ हफ्ते से एक खबर थी। नगर पन्ना, राष्ट्रीय पन्ना, और अन्तराष्ट्रीय पन्ना सब पढ़े पर सब जगह खबर घूम फिर कर एक ही थी, दादरी काण्ड, हर नेता से लेकर वायुसेना के मार्शल साहब भी बयान देने से नहीं चूके?? सवाल लाजिमी है। जब खुले देशद्रोह का मूक समर्थन किया गया तो फिर यहाँ लाउडस्पीकर लेकर चिल्लाना क्या दोहरे मानदण्डों का प्रतीक नहीं है? क्या हमे ये नहीं चाहिये की एक राजनीतिक और पेशेगत रोटियाँ सेंकी जा रही है? दादरी से पहले एक हादसा बरेली में हुआ, एक दरोगा जी को कुछ पशु तस्करो को मार दिया। सरकारी ड्यूटी करते दरोगा की मौत का लोगो को इल्म तक ना हुआ और अब देखिये !!! सोचिये भी। सोचना और समझना जरूरी है।

एक बच्चे को किताबों में ये पढ़ाया जाता है की देश धर्मनिरपेक्ष है। यही बात उसके मन में तब तक रहती है। जब तक वो खुद निर्णय लेना नहीं सीख जाता। जब बच्चा बड़ा होता है। खुद अच्छे बुरे की पहचान करने लगता है। तब साहित्य, दूरदर्शन, समाचारपत्र की खबरें, न्यूज़ चैनल्स जो केवल खबरें बताते है( व्यक्तिगत राय नहीं)। से प्राप्त सामाजिक ज्ञान के आधार पर फैसला करता है। सो कुल मिलाकर बहुत समझदार हो जाने के बाद ये निर्णय लेना मुश्किल नहीं की वो किस पाले में रहना चाहता है। या ये कहना होगा कौन बेहतर है।  कश्मीर में रोज चलती गोलियाँ, रोज मरते देश के सैनिक, पड़ोसी देश की साजिश से हलकान होने की खबरें, जगह-जगह होते विस्फोट साथ ही साथ अंतर्राष्ट्रीय खबरें भी हर खबर कुछ सीखाती है। कुल मिलाकर आसपास होता घटनाक्रम ये सिखाता है क्या क्या सही क्या गलत। वही सीख कर लोग आगे बढ़ते है। कुल मिलाकर जबरदस्ती का प्रचार कई बार बेहद नकारात्मक प्रभाव डालता है।

मुद्दा: विभीषण रेलनीर पी गये ...........

घर का भेदी लंका ढावे !!! ये कहावत आज रेल नीर घोटाले साथ सिद्ध हो गयी। रेलनीर देश का सबसे ज्यादा बिकने वाला पानी होगा शायद। अब देखिये अच्छा पानी सरकारी लोग और उनके जानने वाले पी गये, बाकी हमको हमारे बच्चों को पिला गये? पैसा भी गया  स्वास्थ्य भी। जो पानी मुफ्त मुहैया होना चाहिये, उसे हम 10  से 20 रुपये तक की कीमत अदा कर पीते है।पर कीमत अदा करने के बाद भी गुणवत्ता सवालिया होती है। बस अड्डो पर, दूरदराज के इलाको में ट्रेन में बिकता पानी कैसा है इसका अन्दाज़ा भी नहीं लगा सकते आप।  यदि आपको लगे भी की पानी ख़राब है तो बोतल फेकने के अलावा  सकते है आप। 

Sabhar: www.google.com

शिकायत करने  की जगह कहाँ है। दिल्ली के कश्मीरी गेट टर्मिनल बस बस  पकड़ने जाईये बिसलेरी  के नाम में थोड़ा सा परिवर्तन करके कई तरह के पानी बिकते है। पीना मजबूरी हो जाती है। कीमत लगभग सामान होती है। मान लीजिये की आप शिकायत करना चाहते  तो कहाँ करेंगे??? ये बड़ा सवाल है जवाब किसी के पास नहीं। हाँ कोई प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के दफ्तर का रास्ता बताये तो जाया भी जा सकता है। 

कभी ध्यान दीजियेगा। ट्रेन से आपके उतरते ही कई बच्चे बड़े ट्रैन में चढ़ कर वो बोतल बीन ले जाते है। जिन्हे आप यूज़ करने के बाद क्रश नहीं करते। उन्ही बोतल में दुबारा पानी भरा जाता है। बेचा जाता है। पानी  स्टेशन से लगे नलों से भरा जाता है। यकीन ना आये तो सुबह -सुबह घर के पास वाले स्टेशन  पर चले जाइयेगा। प्लेटफॉर्म के सबसे किनारे वाले नल बोतल भरते मैले कुचैले नाक पोछ्ते लोग मिल जायेगे आपको। कानपुर से आवागमन  अक्सर दृश्य देखा है।  खैर किया भी क्या जा सकता है। जिनके पास गुणवत्ता परखने की जिम्मेदारी है वही विभीषण बने जाते है।  तो लंका  गिरेगी ही। खैर पीते जाईये पिलाते जाईये। 

मुद्दा: आपसे मदद की अपील है।

मोदी जी को अपील करते आप ने सुना होगा। उनकी बात को माना भी होगा। स्वच्छता से लेकर गैस सब्सिडी तक। किन्तु आज मैं एक सामान्य आदमी छोटे मुँह बड़ी बात करने जा रहा हूँ। अपील करने जा रहा हूँ आपसे । "इस बार की गैस सब्सिडी छोड़े नहीं वापस ले। उस सब्सिडी का योगदान दे , पाँच अन्तर्राष्ट्रीय पदक जीत कर भी उपेक्षित रहने वाली "निधि सिंह पटेल" को।" कनाडा के कॉमनवेल्थ में हिस्सा लेने के लिये। वह पदक जीती तो देश का का गौरव बढ़ेगा। नहीं तो गैस सब्सिडी तो वैसे भी जानी ही हैं सरकार के खाते में।

निधि के कोच कमलापति त्रिपाठी जी ने निधि के साथ, प्रदेश सरकार, खेल फेडरेशन और केन्द्र सरकार के पास कई माध्यमों से गुहार लगायी।  व्यक्तिगत तौर पर मैं और बहुत सारे जागरूक लोगो ने लिखा, प्रधानमन्त्री जी की फेसबुक टाइमलाइन पर, प्रधानमन्त्री जी के e -mail, उनके twitter पर, पर अफ़सोस जवाब नहीं आया। कुल मिलाकर सरकारे ध्यान नहीं दे रही बावजूद लाख प्रयासों के। तन्द्रा भंग नहीं होती!!!

सो जरूरी हो चला है की हम जागे!!! तिरंगे को नयी ऊँचाई देने वालो को, राष्ट्र के गौरव को नए आयाम देने वालो को, निराश ना होने दे, दिल छोटा न होने दे। उसका हक़ सरकार नहीं देती तो क्या? क्या हम उनका मनोबल उनका आर्थिक सम्बल नहीं बन सकते? आखिर सरकार हमारे करो से चल रही है जो जबरन वेतन से ले लिया जाता है। कर का एक प्रतिशत से भी कम होगी आपकी गैस सब्सिडी। वो इस बार निधि के लिये छोड़ दे। ये मेरी अपील है। सरकार जब जागेगी तब देखा जायेगा।

बूँद-बूँद सेे सागर भरता है मित्रों, एक बूँद आप भी डाले। मेरी अपील पर न सही देशहित में। खाते के डिटेल नीचे है।

Nindhi Singh Patel,
SBI CHUNAR Cement Factory ac. No. 31443174406
IFSC code is SBIN0006512        CIFS  85881611764
District: Mirzapur

निधि का फेसबुक पेज : https://www.facebook.com/NidhiSinghOfficial?fref=ts
Logical Indian me Nidhi kee news: http://thelogicalindian.com/story-feed/sports/a-common-wealth-gold-winner-who-wants-to-leave-sports-due-to-our-apathy/

मुद्दा: आज के पत्रकार, साहित्यकार, और सरकार

डेंगू दिल्ली में फैला, लोगो का दर्द सबको दिखायी दिया, मीडिया ने खूब हो हल्ला मचाया, CM साहब आकाशवाणी पर बोलते सुनायी दिये, नगर निगम वाले भी सावधानियों की फेहरिस्त जारी करते सुने गये । ये जरूरी भी था की हकीकत जो स्वीकार किया जाय और आगे के लिये सुधार किये जाय।

किन्तु दिल्ली में भारत की केवल 3 प्रतिशत आबादी रहती है। बाकि 22 प्रतिशत अन्य शहरों में रहते है। जिनके लिये दिल्ली दूर है !!! 75 % फ़ीसदी गाँव में रहते है। जिनके दिल्ली केवल कहानियों और जुबानियो का हिस्सा है। डेंगू वहाँ भी है , जोरदार है।  किन्तु कुल मिलाकर जिन्हे हम झोला छाप कहते है वहीं उनके लिये भगवन है। सरकारी डॉक्टरों और दवाखानों के अपेक्षा लोग झोला छाप डॉक्टर्स को प्राथमिकता देते है। कारण साफ़ है कि सरकारी दवा खाने हैं तो जरूर पर डॉक्टर कब बैठता है ये पता ही नहीं चलता। ना लोगो को न सरकारों को। दूर गाँव में भी डेंगू से मर रहे है लोग, कुछ जानकारी के आभाव में ,कुछ दवा के आभाव में। 

देखिये मीडिया को केवल दिल्ली दिखता, दादरी दिखता है, वहाँ हुयी एक मौत दिखती है।  पर बीमारी से असमय कालकलवित होते लोग नहीं दिखते। किसी साहित्यकार भी डेंगू से हुयी मौतों को आधार बना कर पुरष्कार वापस नहीं किया??? इसे क्या कहना चाहिये?  प्रेमचन्द जीवित होते तो इसी को आधार बना कर पुरष्कार वापस करते ना कि भावो में बाह जाते है।  आज के पत्रकार, साहित्यकार, और सरकार सभी केवल दादरी में ही सम्वेदनशील दिखाई पड़ते है। यही भारत है!!! जो दिख रहा है उसी का एहतराम है। आम आदमी बस निरीह प्राणी है। रोज पैदा होता और मरता है। इनकी फिक्र कौन करता है।  

मुद्दा: निबन्ध पुरष्कार वापसी की घोषणा!!!!

शायद 2003 था, मालवीया(MMMEC GKP) में आयोजित निबन्ध  प्रतियोगिता में प्रथम पुरष्कार मिला। एकमुश्त 251 रुपये की सरकारी धनराशि मिली, मैं गदगद हो गया। मेरे दोस्त और भी ज्यादा गदगद हो गये। बाहर गेट पर पंचम के यहाँ जबरदस्त छोले समोसे चले। 251 रुपये चित्त हो गये, जो जेब से गये वो अलग। जेब से क्या गये!! खाते में लिखवाने पड़े पंचम के यहाँ। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया वाली कहावत चरितार्थ हुयी। खैर इस पुरष्कार की याद कुछ यूँ आयी की देश में वापसी का दौर चल रहा है। कहीं घर वापसी,कहीं पुरष्कार वापसी। सोचता हूँ कि आधुनिकीकरण के दौर में कॉलेज से हुये "पंचम के विस्थापन" के विरोध में मैं भी पुरस्कार वापसी की घोषणा कर देता हूँ। 251 रुपये ब्याज सहित वापस करता हूँ। प्रमाणपत्र भी। .........पर सोच रहा हूँ वापस करने के लिये सत्यशील और कि मणि सर को कहाँ खोजूँगा?

ग़ज़ल: तुम्हारे दर तलक आते-आते दम तोड़ देता हूँ।

पेशेखिदमत है सियासतदारो की बात .......

तुम्हारे दर तलक आते-आते दम तोड़ देता हूँ।
मैं हक हूँ और तुम हो गलियाँ हुक्मरानों की।

कभी दिलदार है, कभी बुझदिल बड़ी है ये
है कीमत क्या सियासत में जुबानों की।।

सर से पाँव तक है कर्ज में जो अन्नदाता है
दूर तक सूखा है, है हालात क्या किसानो की।

तुम्हारे दर तलक आते-आते दम तोड़ देता हूँ।
मैं हक हूँ और तुम हो गलियाँ हुक्मरानों की।

-विक्रम @copyright reserved

मुद्दा: एशिया की सबसे ताकतवर महिला क्यों हार रही है???

जो धर्म के नाम पर मार दिया गया। उसकी कीमत 45 लाख!!! जिसको थाने के सामने जिन्दा जला दिया गया उसकी कीमत 30 लाख रुपये । पर वो जो राष्ट्रीय धवज अपने हाथों से लहराते है, वो जो राष्ट्र का गौरव अपने कन्धों पर उठाये फिरते है, उसकी कीमत उपेक्षा केवल उपेक्षा !!! एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर की दौड़। आप यकीन माने ना माने यही उत्तम प्रदेश है और यही अच्छे दिनों की शुरुआत यहाँ विकास भी, उत्तमता भी है किन्तु सुनवाई नहीं है। सही समझे आप . . . . . . . . . . .

 "लोकतन्त्र घास चरने गया है।
 देश-सेवा का उपहास करने गया है
 देखिये और कौन-कौन भागीदार है
 यही तो अच्छे दिनों वाली सरकार है।"

चलिये मुद्दे पर लौटते है, आज मुझे भारत की उड़नपरी का चेहरा याद आता है। "पी टी ऊषा" का चेहरा। हम सब ने सरकार और सरकार के समक्ष उन्हें भी हार मानते देखा था। उन्हें रोते हुये देखा था। तन्त्र से हक़ की लड़ाई में हारते हुये देखा था। आज फिर वही हो रहा है फिर वही बात दोहरायी जा रही है बस नाम भर ही बदला है। "निधि सिंह पटेल" ,उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले से आती है। बेहद ही साधारण परिवार से। वो परिवार जो विदेश जाने का खर्चा उठा नहीं सकता। पॉवरलिफ्टर बेटी के लिये जरूरी पोषक तत्वों वाले खाने का खर्च भी नहीं। किन्तु फिर भी उस परिवार की बेटी देश का झण्डा जरूर उठाती है देश में विदेश हर जगह। कठिन परिस्थितियों में, उपेक्षा के साथ भी। उपलब्धियों की एक फेहरिस्त निधि के खाते में दर्ज है। सब की सब देश के लिये। आगे उपलब्धियों का भी जिक्र है।

कुल मिलाकर क्या ये देश की जिम्मेदारी नहीं है कि निधि को जरूरी सुविधायें मुहैया करायी जाय? देश में खेल के नाम पर चल रहे, पल रहे सरकारी संगठनों की जिम्म्देदारी नहीं है की देश की इस बेटी को वित्तीय सुविधाये मुहैया करवायें? जिसकी वो हर हाल में हकदार है। ये दुर्भाग्य ही है की निधि निरन्तर उपेक्षा की शिकार रही है। खेल विभाग के औहदेदारो से जब भी अनुरोध किया गया वह ठण्डे बस्ते में चला गया?

इसी घर में रहती है एशिया की सबसे शक्तिशाली महिला
ओमान से आगमन पर स्वागत  तस्वीरें
अन्तराष्ट्रीय मंच उसे "एशिया की सबसे ताकतवर" महिला कहता है। बीते दिनों ओमान में पदक जीतकर ये गौरव हासिल किया। पर देश में ये पावरलिफ्टर यहाँ के तन्त्र का बोझ उठा पाने में असमर्थ है। दफ्तरों के चक्कर लगाते- लगाते। केवल गहरी निराशा ही तो हाथ लगी है। अखबार की कतरन नीचे चिपकी है देखिये निधि क्या कहती है। उपलब्धियाँ और उपेक्षा दोनों आपको दिख जायेगी। जाते-जाते ये बताता अखबार में छपे निधि के विचारों से मैं सहमत नहीं हूँ। मेरा मानना है की जिसके निधि चन्दा कह रही है, वो देश के प्रति समर्पित कुछ लोगों का छोटा सा योगदान है। उनका प्यार और आस्था आपकी योग्यता पर, आपकी निष्ठा पर। हाँ चन्दा तो हम सरकार को देते हर महीने की पगार से।

शायद अगले महीने निधि को कॉमन-वेल्थ गेम्स की लिये जाना है। यक्ष प्रश्न फिर वही है। वित्तीय सहायता कहाँ से उपलब्ध हो? सरकार की कुम्भकरणीय तन्द्रा अभी भंग होती नहीं दीख पड़ती। कुछ मित्र और अन्य सहयोगी प्रयासरत है की निधि को सहयता उपलब्ध सके। सरकार तो अभी व्यस्त और अभ्यस्त भी। 

मुद्दा :धर्म के नाम पर देश का अहित मत कीजिये!!!

बात कुछ यूँ शुरू करते है कि भारत को कभी ना कभी ये मलाल जरूर होगा।  कि भारत में आज़म और ओवैसी तो कई पैदा हुये। पर "युसूफ जई मलाला "एक भी नहीं पैदा हुयी। हाँ शाह बानो जरूर थी और उनका योगदान हमेशा याद रखेगा।

प्रदेश में सरकार है सपा की। कद्दावर मन्त्री है आजम खान, मुस्लिमो के सबसे बड़े हितैषी माने जाने वाले सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह। बावजूद इसके आजम खान साहब "बन की मून" साहब को पत्र लिख रहे है। गोलमेज सम्मलेन में भारत में मुस्लिमो और ईसाईयो की सामाजिक स्थिति पर चर्चा करना चाह रहे है? इसके दो ही मतलब हो सकते है।पहला ये की समाजवादी सरकार में कैफियत नहीं रही। छोटे मोटे मुद्दे भी हल करने में दम निकल जाता है। दूसरा ये जी जानबूझ कर मामले को संयुक्त राष्ट्र तक ले जाने की कोशिश है, ये कोशिश, ये दर्शाने के लिए काफी है की। भारतीय सम्वैधानिक व्यवस्थाओं न्याय व्यवस्था से उनकी आस्था पूरी तरीके से उठ चुकी है। या फिर कभी थी ही नहीं। सनद रहे की इसी सम्विधान की शपथ लेकर इसी सम्विधान के सरकारी वाहन में चलते है।

ये दुःख का विषय है कुछ लोग हर बात में साजिश देखते है। मुख्य न्यायाधीश को, प्रधानमन्त्री को, भारत के विभिन्न मानवाधिकार और अल्पसंख्यक आयोगों को पत्र लिखने की जगह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बात उठा कर भारत को भारतवासियो को सवालिया बनाने की कोशिश मात्र है। दूसरी ओर शिया धर्म गुरु "कल्बे जब्बाद" ने इसी मुद्दे जो एक हादसा बताया और न्याय व्यवस्था पर आस्था जताते हुये मामले को कानून तौर पर आगे ले जाने की सलाह दी। देश हित और इंसानियत के हित में ये एक सराहनीय वक्तव्य था।  कुल मिलाकर आजम खान साहब के इरादे जाहिर है।

जो ग्रेटर नोयडा में हुआ उस पर सारा देश शर्मिंदा है। ऐसी घटनाये जब भी होती है हर उस बार मानवता के नए मायने और नए पैमाने सोचने की जरूरत होती है। आगे क्या किया जाय कैसे किया जाय? कैसे देश में सभी को बराबर अधिकार मिले। बेहतर होता की खान साहब उत्तर प्रदेश में ही मुस्लिमो की शिक्षा और सुरक्षा में काम करके एक उदहारण प्रस्तुत करते। मुस्लिम समाज में व्याप्त आदिकालीन प्रथाओं और महिलाओं की स्थिति में सुधार के प्रयास करके। देश के हिन्दुओं को भी ये सोचने पर मजबूर कर देते की क्या सही क्या गलत।

मुद्दा: मरुस्थलों सी प्यास है इंसानियत में भी......

हिन्दू मुसलमान की लड़ाई चल रही है। इन्ही पर केन्द्रित राजनीति भी। आपको क्या लगता है? देश केवल हिन्दू राष्ट्र बन जाये या केवल मुस्लिम राष्ट्र बन जाये तो लड़ाई न होगी, फसाद ना होंगे?

जब हम केवल हिन्दू होंगे तो लड़ाई के नए मोर्चे खुलेंगे। हम सवर्ण और दलित में विभाजित होंगे। वर्चस्व की लड़ाई तब भी होगी। स्थिति हरियाणा के मिर्चपुर की मानिन्द होगी। अगर केवल सवर्ण रह गये तो नया खाका खिंचेगा। हम तब राजपूत होंगे, ब्राह्मण होंगे, पटेल होंगे, कायस्थ होंगे फसाद तब भी होगा। फसाद कारण जरूर बदल जायेगे। बेहतरी की लड़ाई कभी न कभी हिंसा के रास्ते पर आ ही जायेगी। ज्वलंत उदहारण सामने है। हम नेपाल को देख सकते,हम नेपाल से सीख सकते है।

यदि केवल मुस्लिम हो जाये, तो कुछ ही समय लगेगा शिया और सुन्नी होने में। मक्का का शैतान लखनऊ के नक्खास चौक पर शिया को सुन्नी और सुन्नी को शिया नज़र आयेगा। पत्थर तब भी बरसेंगे। केवल सुन्नी राष्ट्र हो गया तो एक तबका अहमदी हो जायेगा दूसरा उसका विरोधी!!! पकिस्तान साक्षात् उदहारण है। देख और सीख सकते है।

कुल मिलाकर इंसान के इंसानी खून की भूख कभी न मितबे वाली है। कितना भी मिले कम है। ये मरुस्थलों (रेगिस्तान)की प्यास से भी भयानक प्यास है। जितना भी जल दो उन्हें निर्जल ही रहना है। इसी लिये बेहतर है की हम सब मिलजुल कर रहना सीखे। कहते है ना की जहाँ चाह वहाँ राह है। नेता गिरी को विराम से, सभ्य समाज को स्थान दे।

निन्दक नियरे राखिये !!!!

मोदी अच्छा काम कर रहे है। कई मामलात में उनकी प्रशंसा भी करनी चाहिये। किन्तु हर मामले में नहीं की जा सकती।  केन्द्र सरकार में बहुत सारे मंत्रालय है। सभी से काम लेना चाहिये। सत्ता का विकेन्द्रीकरण भी जरूरी है। १ ऊँगली व काम नहीं कर सकती जिसे मुट्ठी कर सकती है।  कुल मिला कर टीम वर्क गायब ही  बस पीएमओ वर्क है। ये देश में सुधार की रफ़्तार को काम करता है। विकास की सम्भावनाये आई है नयी आशाये आई है ये कहना उचित और जरूरी भी।  किन्तु अच्छे दिन आ गए, जब भी कहा जाता है तब ये अतिशयोक्ति सा लगता है। जब तक मूलभूत अधिकारों का संघर्ष जारी है तब तक कैसे अच्छे दिन।

भूखे पेट ना भगवान की भक्ति होती है न देश की। जन साधारण के रोजमर्रा के जीवन में जब परिवर्तन आएगा तभी अच्छे दिन भी आयेगे। अच्छे दिन तब आयेंगे जब पुलिस FIR लिखने लगेगी, तब आयेगे जब कोर्ट में मुक़दमे का निपटारा सही से होने लगेगा समय पर होने लगेगा , जब सड़क पर चलते हुये बेटी को डर नहीं लगेगा, जा रेड़ी वालो से पुलिस, नगर निगम, फ़ूड इंस्पेक्टर पैसा वसूली बन्द देंगे। जब VIP वाहनों की कतार के कारण शहर का यातायात जाम नहीं होगा। कश्मीर का मुद्दा,कालेधन का मुद्दा, ये सब अच्छे है , भावनाओं और सोच को मजबूती देते है अच्छे दिन नहीं।  अच्छे दिनों का वो टीवी विज्ञापन याद करिये जब राजस्थान के गाँव की एक महिला पानी भरने जाते हुए कहती है की अच्छे दिन आने वाले है। .......... हमको मिल कर पता करना चाहिये क्या उसे साफ़ पानी घर के आस पास मिलने लगा क्या ?

कानपुर के बूढ़े बरगद की कहानी।

आज बुजुर्ग दिवस है सो जिक्र लाजिमी हो चला है।  कानपुर में बड़े चौराहे के पास स्थित है "कम्पनी बाग", इसे "नानाराव पार्क" के नाम से भी जाना जाता है। "नाना राव पार्क" में एक बूढ़ा बरगद हुआ करता था। बरगद में दिन के समय हरे पत्तो से ज्यादा चमगादड़ लटके नज़र आते थे। 1857 की क्रान्ति के दौरान जब कानपुर नाना साहेब के हाथ से निकल कर अंग्रेजो के हाथ चला गया था। तो अंग्रेजो ने बीबीघर का बदला लिया। करीब 140 लोगो को बरगद के पेड़ पर उल्टा लटका दिया और नीचे आग लगा थी। ये 1857 का प्रतिशोध का प्रतीक बरगद कुछ 6 -7 साल पहले धराशायी हो गया। अब इस कहानी का दूसरा पहलू देखिये।

कानपुर नगर निगम ने इसे लगभग 20 हज़ार रुपये की कीमत पर बेच दिया , राष्ट्रीय धरोहर 20 हज़ार में नीलाम हो गयी। खैर कुछ समाज सेवी संस्थाओं ने चिंता जाहिर की कुछ सडको पर उतर आये और एक पत्रकार के रूप में मेरे बड़े भाईसाहब ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। विरासत सड़क पर जाने की बात से तत्कालीन महापौर को अगवत कराया। तब जाकर प्रशासन के ओहदेदारों को ये पता लगा की पेड़ नहीं इतिहास था। प्रशासन जागा और फिर भागा। बरगद का जो हिस्सा मिला सका संग्रहालय में रखा गया। बरगद जिस स्थान पर था वहाँ थोड़ा सा निर्माण करा कर बरगद की कहानी संक्षिप्त तौर पर लिखी गयी। ऐसा ही तमाम अन्य जगहों पर भी हुआ। जैसे शहीद शालीराम शुक्ल की प्रतिमा के नीचे चाय का खोखा चलाया जाता था ……