जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध .....

कल शाम का अस्त होता सूरज मुम्बई की सड़ को की चीख और पुकार का गवाह बन गया। ये मर्म चीखें तब उठी थी जब सफ़ेद रंग से ये लिखा जा रहा था कि "आतंकवाद का धर्म होता है, होता है, होता है!!! "। कई मिथक, कई मान्यतायें धराशायी हो गयी कई झूठ बेनकाब हो गये। देश और मानवता से द्रोह का बिगुल भी कानों के पर्दो हिला गया। पर एक सच से अवगत करा गया!! ये सच हिन्दुस्तान को बहुत पहले ही स्वीकार कर लेना चाहिए था। जिक्र लाजिमी है, धन्यवाद आतँकी याकूब मेमन जाते-जाते तुम धर्मनिरपेक्षता के भ्रम दफ़न कर गये!!!!
चलते-चलते राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर याद आये। याद आया उनका ऐतिहासिक गीत।
"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।"

कलाम साहब अमर हो गये!!!

जैसे कुछ खो सा गया हो, मानो कोई अपना बहुत दूर चला गया हो, ऐसा एहसास दिल में घर कर गया है। कल उनके चले जाने की खबर पर यकीन नहीं हुआ। इधर-उधर ऑनलाइन अखबारों में बेसब्री के साथ झाँक कर देखा, तब आँखों के रस्ते दर्द दिल में उतर गया। काल की क्रूरता आभास हुआ, युगपुरुष चले गए!! डॉ कलाम साहब का चले जाना किसी परिजन के चले जाने जैसा दर्द देकर गया है। ऑनलाइन सामाजिक मंचों, दफ्तर के सहकर्मियों सभी में इसी तरह का दुःख देखा। देश का हर दिल शोकाकुल है। देश के हर घर में उनके सद्गुणों की चर्चा है। ये तथ्य एक व्यक्ति के व्यक्तित्व की गवाही देते है। महान वैज्ञानिक, निःस्वार्थ समाजसेवी, असाधारण नेता, एक साहसी व्यक्ति सारे देश को दुखी कर चला गया। डॉ साहब की सादगी और उनका पूरा जीवन देश को समर्पित रहा। ऐसा समर्पण,ऐसी सादगी देश के उन नेताओं में ही थी जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी। गाँधी जी, वल्लभभाई पटेल, शास्त्री जी, लोकनायक जयप्रकाश की श्रेणी का एक और व्यक्ति कल चला गया। सोचता हूँ की जब दशकों पहले जब शास्त्री जी चले गये थे, तब देश बिलकुल यही होगा। अपार दुःख की एक घड़ी में कलाम साहब के जीवन से जुड़े कुछ पहलू है जिनका जिक्र लाजिमी हो चला है।
साभार :गूगल इमेजेज

डॉ कलाम के हस्तक्षारों से जन्मी नयी ऊर्जा !!
सन 2002 में इंजीनियरिंग के दिनों में मेरे एक सीनियर थे "जयप्रकश कुशवाहा सर" उन्हें स्केच बनाने का शौक था। अमूमन माधुरी  प्रीति जिन्टा टाइप हिरोइनो के स्केच बना कर खुश हो जाने वाले जयप्रकाश सर को एक दिन ना जाने क्या सूक्षी उन्होंने डॉ कलाम का स्केच बनाने की ठानी, बना भी लिया और डॉ साहब का एड्रेस जुगाड़ कर उनको ये स्केच भेज दिया। उन दिनों डॉक्टर साहब राष्ट्रपति हुआ करते थे। भेजकर हम दोनों इस बात को भूल गये। करीब 20 -25 दिन के बाद जयप्रकश सर एक बेहद उत्साहित और उमंग से भरे मेरे कमरे में आये और बोले यार आज बड़ा दिन है।  तू देखेगा तो यकीन नहीं करेगा!! डॉ कलाम ने उस स्केच को अपने पास रख लिया और मुझे उसी की फोटोकॉपी पर साइन करके भेजा है। ये देख अपनी हाई स्कूल की मार्कशीट से भी ज्यादा नजाकत से उस कॉपी को पकड़े जयप्रकश सर एक सपने के पूरे हो जाने  ख़ुशी में डूबे नज़र आये। मैंने जयप्रकश को बधाई दी और इस बात को आगे प्राचार्य सत्यशील जी तक ले जाने का अनुरोध किया। प्राचार्य सत्यशील इस तस्वीर को देखकर जयप्रकश सर की कला के मुरीद हो गया। प्राचार्य ने इस काम को आगे कॉलेज स्तर तक बढ़ाने और ऐसे ही कई कलाकारों को खोज निकलने का अनुरोध किया। बाद में हमने कॉलेज में एक "कला बीथिका" का आयोजन किया। अमूमन इस तरह के कार्यक्रम इंजीनियरिंग कॉलेज में होने का कोई इतिहास नहीं था। किन्तु हमारे पास डॉ कलाम शाइन वाली तस्वीर थी। हर निराशा के क्षण में एक नयी ऊर्जा देने में सक्षम। हमने डॉ साहब की शाइन वाली तस्वीर के साथ गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज और गीडा के प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज सभी को निमन्त्रण दिया। कला बीथिका का आयोजन बेहद सफल रहा । बड़ी बात ये थी कि बेहद ही मितव्ययी प्राचार्य नाम जाने वाले प्राचार्य सत्यशील शुक्ल जी ने कार्यक्रम का पूरा फण्ड कॉलेज की तरफ से उपलब्ध कराया। इस तस्वीर को गोरखपुर के कुछ अखबारों ने भी प्रकाशित किया था।

लखनऊ की युवती को न्याय दिलाया। 
जब डॉ साहब राष्ट्रपति थे उन दिनों डॉ साहब का लखनऊ के पास एक कार्यक्रम था। कार्यक्रम के दौरान एक युवती सुरक्षा घेरे जो तोड़कर घुस गयी। सुरक्षाकर्मियों ने आगे जाकर युवती को धर लिया तब डॉक्टर साहब ने हस्तक्षेप कर उस युवती को बुलाया उसकी बात सुनी। युवती के पिता की जमीन पर कुछ दबंगो कब्ज़ा कर लिया था। जान से मारने की धमकी दी थी। पुलिस का रुख वैसा ही जैसा हमेशा होता है था। कलाम साहब ने  लेकर मुख्यमंत्री की सामने गम्भीर चिन्ता जाहिर की, अगले दिन की अखबार कह रहे थे की FIR दर्ज हो गयी और गिरफ्तारियाँ भी हुयी। ये सब होने के कई महीने बाद अखबार में जब ये खबर छपी की राष्ट्रपति महोदय ने राज्यपाल माध्यम से उस युवती की केस की ताजा जानकारी हासिल की और जरूरी कार्यवाही  निगरानी करने का अनुरोध किया, तो सुखद आश्चर्य हुआ, लगा जैसे इंसानियत आज भी जिन्दा है।

बेवाक: धर्म बड़ा या देश??

कल शाम समाचार पढ़ते-पढ़ते नज़र एक खबर पर गढ़ गयी। माननीय सुप्रीमकोर्ट के एक निर्णय पर धर्म के कुछ जानकर और अग्रणी लोगो की प्रतिक्रियायें पढ़ कर झटका सा लगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने एग्जाम के दौरान हिजाब पहनने पर पाबन्दी लगा दी। इस्लाम के कुछ जानकार इसे धर्मिक स्वतंत्रता पर हमला मान रहे है, कुछ का कहना है की ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है अतैव पाबन्दी लगाना गलत है, कुछ इसे अल्पसंख्यकों को नीचा दिखाने वाला निर्णय भी मान रहे थे । कुल मिला कर हर जानकार ने कोर्ट के निर्णय को गलत ठहराया। ये सब पढ़ कर ना जाने कब मन के किसी कोने में एक बहस एक विचार का जन्म हुआ । "देश बड़ा कि धर्म!!!","संविधान बड़ा या धर्म !!" हम दुनिया के चुनिन्दा स्थायी लोकतन्त्रो में से है। भिन्न भाषा, भिन्न संस्कृति के लोग शान्ति और शौहार्द के साथ रहते आये है, ये सब सम्भव हुआ उस "संविधान" से जिसको लोकतन्त्र का ग्रन्थ कहते है, संविधान का सर्वोपरि होना ही लोकतन्त्र की सफलता का सूत्र भी कहा जा सकता है।

दुनिया के अन्य गणतन्त्रो का अध्ययन करेंगे तो हर जगह यही मिलेगा कि संविधान से बड़ा कोई नहीं। ऐसे में संविधान की रक्षक न्यायपालिका के निर्णय को धर्म पर हमला बताना क्या उचित है? क्या कोई कुरान, कोई बाइबिल, कोई गीता, कोई भी संविधान से बड़ा हो सकता है? या उसे किसी भी तरीके से होना चाहिए? सड़क पर चलने का नियम होता, स्कूल में पढ़ने का नियम होता है, और इन नियमों का पालन की धर्म होना चाहिये।  पहले देश का धर्म फिर अपना धर्म। किन्तु मामला इसके इतर हुआ जाता है? किसी एग्जाम में हिजाब पहनने का अधिकार क्या अन्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय नहीं है?? हालात चिन्ताजनक  चले है की एक न्यायिक आदेश में लोग धर्म की खूशबू सीख लेते है।

इस सब के बीच अचानक "शाह बानो जी" का ऐतिहासिक मसला याद आ गया। याद आया की किस तरह सन 1978 में एक 62 वर्ष की मुस्लिम महिला ने पति द्वारा मौखिक तलाक दिये जाने कोई अपने अस्तित्व की लड़ाई बना लिया।  गुजारे-भत्ते के अधिकार को उसने उसने पाना लोकतान्त्रिक अधिकार मान कर लड़ायी लड़ी। धर्म की सीमाओं ने उसे निराश नहीं किया हताश नहीं किया !!! धर्मावलम्बियों को धता बताते हुये शाह बानो मुकदमा जीत लिया था।  इसी मुक़दमे को आधार बना कर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने देश में हर नारी हर पुरुष को एक ही तरह के अधिकारों से लैस करने एक ही तरह के कानूनों के अंतर्गत लाने का प्रयास किया। सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय को भी धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया गया। सडको पर विरोध किया गया। 1986 राजीव गाँधी की सरकार दबाव में धर्म के लिये संविधान की आत्मा को ही बदल डाला।  संसद ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ख़ारिज कर दिया। उसी का दुष्परिणाम है की आज भी मुस्लिम महिलाये लोकतन्त्र होते हुये भी धार्मिक नियमो की जाल में है।

असफल लोकतंत्रों का इतिहास देखेंगे तो जानकारी जरूर मिलेगी की जो लोग धर्म की सत्ता को संविधान की सत्ता से ऊपर मानते है वो लोकतन्त्र को मार रहे है।  बहाना कोई भी हो!!! कुल मिला कर संविधान की सत्ता को मिली चुनौती का सख्ती से मुकाबला करना चाहिये। मुस्लिम विद्वानो को आगे आकर सम्प्रदाय के लोगो का ये बताना चाहिये की कुछ भी लोकतन्त्र से ऊपर नहीं संविधान से ऊपर नहीं!!!

Shaking News: जिन्ना की महत्वकाँक्षा के जिन्न की पैदाइश है, पाकिस्तान !!!

Shaking News संवाददाता:

हमारे कुख्यात आत्मघाती संवाददाता ने कल "कराँची" की एक सुनसान गली में पाकिस्तान के एक नामी-गिरामी इतिहासकार, पुरात्वविद् का साक्षात्कार लिया? पेश है इस सनसनीखेज साक्षात्कार के दौरान हुयी बातचीत के कुछ अंश। शुभ समाचार ये है की इस इंटरव्यू के दौरान कोई हताहत नहीं हुआ।

संवाददाता: सर, सबसे पहले जानना चाहुँगा कि शहर में इतने सारे होटल, काफी हाउस होते हुये भी आप इस सुनसान गली में ही साक्षात्कार देने लिये क्यों राजी हुये।

पकिस्तानी इतिहासकार: अमा मियाँ मौके की नजाकत जो समझो, भीड़ वाली जगह में कब कोई बम बनकर फुट जाये क्या पता। यूँ तो हमारी जवानी के दिनों में कब्रिस्तान में बड़ी शान्ति रहती थी। पर जिन्ना के बिगड़ैल बच्चे ने सब बर्बाद कर दिया। अब ऐसी ही सुनसान गलिया हमसफ़र है। नहीं कब हज़ारों डेसिबल का शोर पहले कान और फिर शरीर को फाड़ जाये क्या पता?

संवाददाता: सर, जिन्ना के बिगड़ैल बच्चे से आपका क्या मतलब? मेरी जानकारी के अनुसार तो जिन्ना साहब के कोई पुत्र..........
मियाँपकिस्तानी इतिहासकार: अमा मियाँ तुम्हे क्या लगता है? यहाँ की हवाओं फिजाओं और घटाओं में बारूद की खूशबू ऐसे ही थोड़ी है!! ये सब जिन्ना के महत्वकाँक्षा के जिन्न का ही तो किया धरा है। पकिस्तान उसी जिन्न की पैदाइश है। बचपन के दिनों में हिन्दुस्तान से 33 करोड़ का उधार लेकर जिन्ना ने स्कूल इस बच्चे का स्कूल में दाखिला तो करा दिया पर। महत्वाकांक्षाएँ और भी थी सो ध्यान ना दे सके। जवानी तक आते-आते लौण्डा फुल्ली बर्बाद। बर्बाद क्या मियाँ जवानी का जोर था और थोड़ा अब्बाजान के रसूख का दम, लड़का "कश्मीर की कलियों" की मुहब्बत में गिरफ्तार हो गया। पर अफसोस मुहब्बत परवान का चढ़ सकी, एक तरफ़ा जो थी!!! अब देखो 65 -70 का होने को आया।  "मुँह में दाँत नहीं पेट में आँत नहीं " पर अब भी मुहब्बत का दम भरता है। लड़का बागी हो रखा था पर जिन्ना साहब भी बड़े वाले थे। जोर जबरदस्ती लौण्डे का निकाह करा दिया, तालिबान के साथ, बाद में लड़का और शौक़ीन होता रहा, दहशत, आतन्कवाद, जेहाद जो  पसंद आया , उसकी को कबूल है कबूल है आया, जिन्ना साहब का लड़का था भला मना कौन करता निकाह से। अब सब बड़े के बच्चे हो गये, काबू बाहर आपस में ही पेले पड़े है। इनमें से कुछ उम्र  दराज अब्बा को ये सपना दिखाने से नहीं चूकते की जवानी में न सही बुढ़ापे में ही कश्मीर की कलियाँ तोड़ लायेंगे।
साभार: गूगल इमेज सर्च

संवाददाता: सर बड़ी दुखद कहानी है " प्यार के साइड इफ़ेक्ट इतने बर्बर होते है, सुनकर मेरे तो तोते ही उड़ गये।
खैर मुद्दे पर आते है। पिछले 65 सालों में यहाँ विकास और रोजगार इत्यादि में क्या प्रगति हुयी??

पकिस्तानी इतिहासकार: लो कर बात, लाहौल बिलकूबत बड़े गुस्ताख़ है आप, यहाँ विकास तो हुआ रोजागर भी खूब उपलब्ध है। देखो आपके तोते जो उड़े है, रास्ते में इंटरसेप्ट जायेगे तो आप भी उड़ जायेगे, उड़ती हुयी मिसलाईल आएगी!!!  अब आप ही बताये कि "मेड इन पाकिस्तान" क्या होता है? जरा सोचिये और बताईये अगर कभी कहीं कुछ देखा हो, सुना हो तो?? संवाददाता .......... सर खुजाते हुये … कभी कुछ देखा ही नहीं पाकिस्तान का बना हुआ संवाददाता ने बोला। अमामियाँ पत्रकार बने फिरते हो पर अपडेट नहीं रखते हो अपने आप को। कश्मीर में इतने बम फटे सब " मेड इन पाकिस्तान थे" ध्यान दिया करो यार!!! हाँ यहाँ के entrepreneur हाफिज भाई की "जमाते उतदावह",  सैयद सलाउद्दीन का "लश्करे तोइबा", आउट सोर्सिंग कम्पनी "अलकायदा" इत्यादि-इत्यादि नामी गिरामी लोग रोजगार है, अच्छा पैकेज भी मुहैया कराते है, onsite भी भेजते है। बाकी अफीम की खेती से काम में लोग लगे हुये है। 

इन सब के बीच अचानक धमाके की आवाज आयी, संवाददाता और इतिहासकार अपनी-अपनी धोती उठा कर भागे। संवाददाता सलामत है इतिहास कर का सुनते है अपहरण हो गया।

बेवाक: पुलिस की तूती बोलती रहे !!!

पुलिस वालों को ठुल्ला कहना राष्ट्रीय अपराध घोषित होना चाहिए, हर थाने में कम से कम एक FIR ठुल्ला कहने वाले के नाम पर लिखी चाहिये!!! क्यों कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल पुलिस के मनोबल को कमजोर करता है। इतना कमजोर कब वो अवसाद ग्रस्त हो जायेगे पता ही नहीं।

हाँ सही बात है, थाने में दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज करने की जगह पीड़ित को गालिया कर भगा देना, हर पीड़ित का SSP ऑफिस तक गुहार लगाना, अधिकतर मामलात में केवल अदालत के निर्देश पर FIR दर्ज होना, पत्रकार को जिन्दा जला देना, पति की रिहाई के लिये आई महिला हो थाने में आग के हवाले करना। तमन्चे की नोक पर किसी के घर जाकर दुष्कर्म करना, पुलिस वेरिफिकेशन में वसूली, पससोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन में जबरदस्त वसूली, रेड़ी लगाने वालों से वसूली।  ये सब तो पुलिस का नैतिक अधिकार है।  जनता!! … जनता क्यों? भीड़ कहो भीड़  … का मनोबल होता ही कहाँ है जो गिर जाये।  लोग थाने बड़ी खुशी-खुशी जाते है , और बहुत ही अदब और सम्मान के साथ उनकी खिदमत की जाती है। बैकग्राउंड में जरूर " बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले का म्यूजिक बजता रहता है"। फर्जी एनकाउंटर पुलिस कहाँ करती है वो तो बस आसमानी और रूहानी ताकते कर जाया करती है। आगे क्या कहे बस। ……      लोकतन्त्र तुम जिंदाबाद .......... तुम जिन्दाबाद।

            पुलिस की तूती बोलती रहे 
            लोकतन्त्र के घूँघट-पट खोलती रहे
            पीड़ित की जान डोलती रहे
            दर्द को पैसे से तोलती रहे 
            पुलिस तुम्हारी तूती बोलती रहे !!!!

जिक्र लाजिमी हो चला है इंजीनियरिंग के दौरान प्रथम वर्ष की एक घटना का।

आप तो पुलिस वालों से भी गन्दी-गन्दी गालिया देते है !!!!!
छात्रावास विश्वेशरैया भवन में लंच के उपरान्त, एक छात्र फर्स्ट फ्लोर में खड़ा दूसरा हॉस्टल के मध्य में एक दुसरे को गालियों का आदान-प्रदान कर रहे थे, भीषण रचनात्मक गालिया, दर्शक कान और मुह खोले तल्लीन थे। इतने में छात्र अधिष्ठाता ( डीन) का प्रवेश होता है। हॉस्टल के मध्य में उनको खड़ा देख, माहौल एक दम शान्त, जैसे कुछ हुआ हो ही नहीं रहा था। आदान-प्रदान किये गये विशेषणों में मानो कुछ ने उड़ कर विश्वेशरिया भवन की दीवारें फाँद ली हो और कुछ धड़धड़ाते हुये कमरे में घुस कर इधर उधर छिप गये हो। डीन साहब की आवाज ने ख़ामोशी को चीर दिया।  " गुप्ता जी आप तो पुलिस वालो से भी गन्दी- गन्दी गालियाँ देते है!!!!" अब मैं वार्डेन रहूँ ना रहूँ क्यू!! पर आप छात्रावास में नहीं रहेंगे। अगला पल तब हुआ जब छात्र डीन साहब के चरणों में गिर पड़े। गुप्ता जी के तोते उड़ रहे थे. सर, गलती हो गयी माफ़ कर दीजिये, हम तो बस ऐसे ही …… डीन साहब की भृकुटिया तन उठी।  " क्या इसी लिये भेजते है आप लोगो के माँ बाप यहाँ???? उनकी मेहनत को पानी करते हुये शर्म नहीं आती।  डाँट फटकार का सिलसिला काफी देर तक चलता रहा।  दोड्नो छात्र सस्टांग दण्डवत!!! रोते रुलाते, माफ़ी मिल गयी, सख्त कार्यवाही और आगे होने पर माँ-बाप तक सूचना भेज देने के निर्देश के बाद।

कहानी की सीख:
पुलिस वालो की गालिया मानदण्ड ( बेंचमार्क) ऐसा मान लेना गलत नहीं होगा की उनसे ज्यादा गन्दी गालिया शायद ही कोई दे पाये !!!

बेवाक: पूर्वान्चल की उपेक्षा

एक शातिर नकलची अगर सूक्ष्मदर्शी लेकर भी नाम लिखना शुरू करे तो का पूरा पेज भर जाये। इतनी सँख्या में इंजीनियरिंग कॉलेज उत्तरप्रदेश में उग आये। ये सब बीसवी शताब्दी की शुरूआती दौर में हुआ। बात यहाँ तक आ पहुँची है की अब इण्टरकॉलेज कम इंजीनियरिंग कॉलेज ज्यादा है प्रदेश में देश में। पर विडम्बना देखिये!!! कॉलेज के साथ यूनिवर्सिटीज के खुलने का दौर भी अमरबेल की मार्फ़त फैलता चला गया। कॉलेज हो या यूनिवर्सिटी सबने  लखनऊ-कानपुर होते हुये नोयडा तक रास्ता शानोशौकत के साथ तय कर लिया। पर पूर्वान्चल पीछे रह गया। कोई पूछ नहीं कॉलेज तो ले दे एक एक आध खुल भी गये पर यूनिवर्सिटी बस दूर से ही दर्शन देती रही। पूर्वान्चल के एक मात्र सरकारी वित्त पोषित इंजीनियरिंग कॉलेज को "MMMEC" से MMTU होने में 50 वर्षो से ज्यादा का समय लग गया। केन्द्रीय, प्रदेशीय और प्राइवेट सब तरह की कुल मिलाकर 53 की यूनिवर्सिटीज प्रदेश में है किन्तु पूर्वान्चल के हिस्से २-3 वो जोड़ गाँठ कर। जो है वो पहले से है नयी बस MMMTU है। शिक्षा की जरूरत सबको है जी। फिर ये जबरदस्त भेदभाव क्यों? और लिये? ये शिक्षा की विषमता ही है की पूर्वान्चल में आर्थिक विकास का कोई केन्द्र भी आज़ादी के बाद न बन सका।

बेवाक:बजरंगी भाईजान हीरो कैसे?

सुना है बजरंगी भाईजान की दुकान में जबरदस्त बिक्री हो रही है। सो हॉउसफुल जा रहे है और भाईजान राष्ट्र के हीरो बन कर उभरे है। भारत पाकिस्तान के खिलाफ गलत फैमी दूर करने का दुष्कर कार्य कर रहे है। इन सब के बीच अचनाक यादों का एक दरवाजा सा खुल जाता है, अचानक रवीन्द्र पाटिल याद आते है।  ....... हाँ हाँ कॉन्स्टेबल रवीन्द्र पाटिल, मुम्बई पुलिस के कॉन्स्टेबल रवीन्द्र पाटिल। जिनका वजूद बजरंगी भाईजान की कद और काठी, रसूख, रुतबे के आगे के पिस गया, गेंहूँ में घुन के समान। ना जाने क्यूँ और कब मेरे देश के जागरूक लोग, बड़े और बजरंगी भाईजान जैसे लोगो के संज्ञेय अपराधों को माफ़ कर देते है। उन्हें अपना हीरो बना लेते है।  पिक्चर की टिकट खरीद कर सर आँखों में बैठा लेते है। कानून तो अन्धा है। पर हमारे और आप की आँखों में रोशनी है देख भी सकते है समझ भी सकते है। तो फिर क्यों ये भूल जाते है कि वो जो सड़क पर कुचल कर मर गये वो फुटपाथ पर सोते थे इसलिये चले गये। किन्तु वो जो भाईजान की रक्षा के लिये साथ था। जो कानून का हरकारा था।  जिसने हिम्मत की सच की लड़ाई की। उसकी अकाल मौत एक साजिश थी!!! 

अफ़सोस की हम अपनी संतानो को आने वाली पीढ़ियों को अपराधी, हैबिटुअल अपराधी( फुट पाथ पर लोगों को कुचलकर मारना, रवीन्द्र पाटिल की मौत का जिम्मेदार, राजस्थान के संरक्षित काले हिरण के शिकार मामले में अभियुक्त) को एक हीरो के तौर पर दिखा रहे है। अगर भाईजान की दुकान की टिकट खरीद रहे है तो पुनर्विचार जरूर करे। सच, अभिनय  की दुनिया से बड़ा होता है। गाँधी, वल्लभभाई, नेताजी आजाद और भगत सिंह के देश में राष्ट्रीय हीरो बजरंगी भाईजान होंगे सोचा ना था। मेरा हीरो रवीन्द्र पाटिल है आपका भी होना चाहिये किन्तु आपका निर्णय आपके हाथ है। निर्णय ले और अपराधियों से दूरी बनाये।

"बातें छौंकने" की बहुप्रचलित कला पर एक निबन्ध

समाज के विभिन्न क्षेत्रो में होने वाले प्रयोग को आधार बनाकर पर ये कहा जा सकता है कि "सामान्य जीवन में बातों के माध्यम से किसी व्यक्ति-विशेष, समूह-विशेष को प्रभावित, सम्मोहित, प्रलोभित, क्रोधित और दुःखी करने की कला को बातें छौंकना कहते है। बातें छौंकना एक क्रिया है और इस क्रिया में पारंगत लोगों को बतोलेबाजकहा जाता है।

"बातें छौंकना" एक कला है। "बातें छौंकने" का आशय मूलतया बातों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करने से होता है। हालाँकि बातें छौंकने की कला और उसका प्रभावक्षेत्र, उस समय के प्रसंग और संन्दर्भ पर निर्भर करता है। यहाँ संन्दर्भ और प्रसंग की भूमिका उत्प्रेरक की होती है। अमूमन संचार की यह विधा, फुल डुप्लेक्स और हाफ डुप्लेक्स संचार के माध्यमों उपलब्ध है। "अतिश्योक्ति अलन्कार" बातें छौंकने की कला का मूूल तत्त्व है। बिना अतिश्योक्ति अलन्कार के बातें छौकने की कला, बिन जल की मछली के सामान है। बतोलेबाज को एक पल में अर्श से फर्श पर ल सकती है। अमूमन ये पाया जाता है कि तुलनात्मक ज्ञान और अतिश्योक्ति अलन्कार का भरपूर इस्तेमाल करने वाले सफल बटोलेबाजों की श्रेणी में गिने जाते है। आकाशवाणी के "रेडियो जॉकी" हाफ डुप्लेक्स, बतोलेबाजी की संचार विधा में पारंगत कहे जा सकते है। हालाँकि समाज के हर क्षेत्र में बतोलेबाज पाये जाते है।
 
बातों में रस घोलना, बतोलेबाजी करना, भोकाल टाइट करना, फेंकना इत्यादि बातें छौंकने के पर्याय है। ये कहना भी उचित होगा कि ये सर्वमान्य और प्रचलित विधायें है। इनके आधार पर व्यक्ति विशेष अपना, शौर्य, पराक्रम प्रभाव क्षेत्र, रसूख, हनक, रुतबा, पहुँच इत्यादि प्रदर्शित करने के लिये चेष्टारत रहते है। बातें छौंकने की कला में निपुण व्यक्ति को कलाकार, रंगबाज, फेकू, छोड़ू इत्यादि नामों से सम्बोधित किया जाता है।

हिन्दी साहित्य में उपलब्ध तमाम अलंकारों, रसों, कारकों, पर्यायों, मुहावरों, लोकोप्तियों इत्यादि का प्रयोग बातें छौंकने की क्रिया में किया जाता है , उदहारण स्वरुप " अबे, जानते नहीं हो हमको हम कौन है, २ मिनट में बोलती बन्द कर देंगे" यह प्रयोग एक फेंकू बतोलेबाज किसी व्यक्ति को भयभीत करने के उद्देश्य से कर रहा है। इसमें कई तरह के भाव और अलन्कार समाहित है।

बातें करना एक क्रिया है, और इस क्रिया के साथ विशेषण और क्रिया-विशेषण का इस्तेमाल बातों में छौंका लगाने का पवित्र कार्य करता है। फ़िल्मी इतिहास के प्रसिद्ध दस्यु "गब्बर सिंह" जब ये कहते है कि "दूर-दूर तक जब किसी गाँव में जब कोई बच्चा रोता है, तो माँ कहती है बेटा चुप हो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा। " ये दस्यु गब्बर द्वारा की गयी बतोलेबाजी है, इस बतोलेबाजी के पीछे अपने सह दस्युओं के डराने, उनकों अपना प्रभाव क्षेत्र, प्रसिद्धि और पहुँच बताने के निहित उद्देश्य के साथ के बातें छौंकी गयी है। दूसरे शब्दों में इसे मनमोहक अन्दाज़ में भय का भाव जाग्रत करने का प्रयास भी का सकते है। यहाँ उपमा अलन्कार भी जीवित हो उठता है। इसी क्रम में गब्बर का एक अन्य प्रयोग "अरे ओ साम्भा कितने का इनाम रखे है ये सरकार हमपे??" पूछने का तरीका गब्बर उच्चकोटि के बतोलेबाज होने, और अपनी इस कलाकारी के माध्यम से एक बेहतर लीडर होने की पुष्टि करता है।

प्रेम-प्रलाप की उपलब्ध विधाओं में बातें आदिकाल से छौंकी जा रही है। इन्हे दूसरे पर्याय के नाम जाना जाता है। " बातों में रास घोलना।" हालाँकि दूरसंचार के क्षेत्र में क्रान्ति के बाद से बातें छौंकने का सिलसिला अनवरत चलता आया है। इस तरह की बातों में श्रृंगाररस की मात्रा का समावेश अधिकाधिक मिलता है। श्रृंगाररस के माध्यम से प्रेमी प्रेमिकाओं की तुलना, सदियों से "सौन्दर्य की ब्राण्ड" उर्वशी या अभिनेत्री मधुबाला से भी करता है। दिल्ली के लोधी गार्डन, रोज गार्डन और मेट्रो में स्वछन्दता के साथ प्यार पींगे बढ़ाते प्रेमियों में बतोलेबाजी का सिलसिला चल निकलता है।

अन्य सामाजिक क्षेत्रों स्कूली छात्र बतोलेबाजी के माध्यम से एक दूसरे पर अपना प्रभाव छोड़ने की कोशिश में नज़र आते है। उदहारण स्वरुप एक छात्र दूसरे से कहता है "क्रिकेट में वो बड़े बड़े गेंदबाजों के छक्के छुड़ा देता है, बात भीम के गदा की तरह चलाता है" तो यहाँ बातें छौंकने क्रिया शुरू हो जाती है। अमूमन ये छात्रों, मित्रों के बीच ये परस्पर सहयोग से चलती है। "फुल डुप्लेक्स" कम्युनिकेशन का उदहारण प्रस्तुत करती है। पुलिस और अपराधी के बीच, वकील और मुअकिल के बीच, दो स्त्रियों के बीच छौंके जाने वाली बातों का जिक्र इस निबन्ध को अन्तहीन बना सकता है। सो उन्हें रहने देते है। यद्यपि मैंने समाज में पाये जाने वाले प्रचलित बतोलेबाजो के मजबूत और जीवन्त उदहारण आपके समक्ष रखे।
                                                                                      धन्यवाद 
                                                                                      आपका शुभेक्षु
                                                                                      कनपुरिया बतोलेबाज

Shaking News: व्यापम, पर यमलोक के "चीफ जानलेवा ऑफिसर" की सफाई

मुख्य गुप्त संवाददाता:
हमारे गुप्त और बेहद की रहस्यमयी संवादाता को  विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, व्यापम घोटाले की जाँच सीबीआई के हाथ सौंपे जाने के बाद से ही यमलोक का माहौल अस्थिर है। वहाँ एक अजीब सी खलभली है। यमलोक में हाई अलर्ट जारी किया गया है!! खबर है की व्यापम घोटालों आज शाम यमलोक के "चीफ जानलेवा अधिकारी" ने आनन-फानन में एक प्रेस-कॉन्फ्रेंस को सम्बोधित किया, उन्होंने यमराज को क्लीन चिट देते हुये कहा कि व्यापम घोटाले में जा रही जानों को लेने में हमारा कोई हाथ नहीं। मैंने या मेरे अधिकार प्राप्त समूह के किसी भी अधिकारी ने व्यापम से जुड़े किसी भी व्यक्ति की जान लेने की किसी प्रकार की कोई प्रक्रिया शुरू करने का कोई आदेश नहीं दिया। "कल तक" न्यूज़ के एक सवाल का जवाब देते हुये चीफ जानलेवा ऑफिसर ने कहा कि चूँकि धरती पर व्यापम मौतों का सिलसिला लगातार चल रहा है। सो हम इस बात से भी इन्कार नहीं सकते की यमलोक का कोई षड़यंत्रकारी "जानलेवा अधिकारी" हमे बिना जानकारी दिये ही अपना इस क्वार्टर का टारगेट पूरा करने के लिये शिकार पर निकल गया हो। इस सम्भावना के मद्देनज़र ,हमने सावधानी बरतते हुये पूरे के पूरे  यमलोक में  हाई-अलर्ट जारी कर दिया है और व्यापक स्तर पर छापेमारी कर व्यापम से जुड़े, यमलोक पधारें लोगों को खोजने का अभियान जारी है। यमवाहन, लैंड करने वाले सारे गड्ढो  के आस-पास कि जगहों पर निगरानी बढ़ा दी है। मौत के सभी बही खातों की ऑडिटिंग के आदेश सीधे परम आदरणीय यमराज के दफ्तर "Y. O" से जारी किये गए है। हमे ये कहने में कोई संकोच नहीं है की व्यापम घोटाले में गयी जानों ने यमलोक में ही एक बड़े घोटाला होने की सम्भावनयो  दिया है। यकीन कीजिये की जिम्मेदार लोगों को जल्द ही गिरफ्तार किया जायेगा और न्याय होगा। कल "स्वयं यम" यमलोक की संसद में इस मुद्दे पर बयान जारी करेंगे।

यमलोक निवासी एक वरिष्ठ नागरिक ने नाम  छापने की शर्त पर बताया है कि पिछले वित्तवर्ष में यमलोक का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) बहुत ख़राब रहा है। यमराज ने पिछले वर्ष घाटे का बजट पेश किया था। कुल मिलाकर यमलोक की हालत ग्रीस जैसी हो गयी थी।  ये इस वित्त वर्ष का पहला तिमाही है सो यमलोक के जानलेवा अधिकारियों पर भारी दबाव है, धरती से मोटी चर्बी वाले लोगों को लाने का दबाव था। इसी के चलते हो सकता है की कोई अधिकारी फिसल गया हो और व्यापम के लोग मोटी रकम रखने वाले लोग थे सो हो सकता है शिकार कर लिया हो किन्तु ये साफ़ है की यदि ऐसा हुआ है तो दोषी को पकड़ कर कार्यवाही होगी।

कलतक न्यूज़ पंचलाइन - आपके बाद आपकी खबर दूसरों  तक, कलतक !!!!

EPFO: Why one should not consider withdrawing PF

There are many EPF subscriber, who considers withdrawing their PF rather than transferring it to new employer. Decision to withdraw PF may have been triggered due to various reason or myths which prevails due to slow government machinery in EPFO.Until and unless there is dire requirement of money it never suggested to withdraw PF accumulations. As by withdrawing these accumulations as subscribers always end up with loosing either a part of money or benefits of long term association. Transferring is bit time taking but offers long term benefit and security.


Repercussion of withdrawing PF:

  •   With less than 5 years of PF membership   PF withdrawal attracts tax based on your current income slab.Tax is deducted either by PF trust, RPFC or it handover amount  to you and subscriber has to declare this income from extra income for that financial year and interns tax.
  • Subscriber also losses EPS - pension benefit as part of withdrawal, note that pension certificate can only be issued post a subscriber complete 10 years of association with EPFO/Exempted Trust, This guarantee minimum INR 1000 pension post retirements  to subscriber or his dependent in case of causality happens to him.
  • This pension amount can be max around INR 8000 if person completes maximum number of membership. Minimum amount is usually review by governments and can change to higher value at later stage and if basic salary for EPS calculation is increased from existing amount that will also cause positive effect on maximum value. Basic salary for  EPS calculation as of now is INR 15000 per month. In UPA regime it was INR 6500 from long time.  Now maximum contribution of INR 1250  can be made by subscribers having basic salary higher than INR 15000 per month
  • And obviously retirement corpus is going to go less that will be the time when one require it most.


Benefits of transferring PF accumulations:

  • It appends in number of year of PF membership, interns probability of getting minimum and maximum pension.
  • No tax  levied  post 5 years membership
  •  PF fund can act as emergency funds in case of financial requirement in case of medical emergency, there is no bar for number of membership for this case.
  • Post 5 years of membership one is eligible to withdraw funds for various possible requirement, i.e. site purchase, Housing loan re-payment, Daughters marriage, Education of Kid. In some of these case PF membership requirement may be maximum up to 10 years as well.
  • In all above withdrawal cases your pension amount kept intact.

With the introduction of UAN-Universal account no. Transferring PF and EPS is just the matter of awareness. Online facilities to transfer can be utilized in deterministic way.

Stay aware and cautious when it comes to your benefit.  I personally withdrawn fund for site purchase post 5 year of membership, though it was a exempted trust and process was very smooth.

EPFO: UAN क्या है? जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पहलू, एक्टिवेट करने का तरीका

 निजी संस्थानों से जुड़े कर्मचारियों के लिये रिटायरमेंट फंड्स के तौर पर प्रोविडेंट और पेन्शन के लिये नियोक्ता द्वारा किये गये योगदान का बड़ा महत्व है। ये मान लेना ही सही होगा कि रिटायरमेंट पर बहुतायत लोगों की कुल जमा नकदी प्रोविन्डेन्ट फण्ड से मिलने वाला पैसा ही होगा। इस एक मुस्त जमा पूँजी के आलावा पेन्शन कैश फ्लो में योगदान करेगी। गुजरे समय में पेन्शन और प्रोविडेंट फण्ड का पैसा निकलवा पाना एक टेढ़ी खीर होती थी। आदमी को ये भी नहीं पता होता था की पेंशन कितनी और कहाँ से मिलेगी। PF ऑफिस दौड़ दौड़ का लोगों के चप्पलें घिस गयी। घूस का दौर भी चला। आज भी चलता है। लेकिन पहले की अपेक्षा अब पारदर्शिता अधिक और इसी के चलते अधिकारों की लड़ाई आसान, अपना पैसा निकलवाना आसान। सम्भव हुआ है UAN - Universal Account Number तथा EPFO की जानकारी ऑनलाइन होने के बाद। UAN के हानि लाभ से जुडी बहुत साड़ी जानकारी इन्टरनेट पर उपलब्ध है। किन्तु फिर सोच रहा की अपने व्यक्तिगत अनुभव और जानकारी आपके साथ बाट ही लेता हूँ।

UAN क्या है? 
UAN, एक कर्मचारी, एक अकाउंट नंबर की संकल्पना है, इसके तहत देश के सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र के ६ करोड़ से अधिक कर्मियों को 12 डिजिट का एक अकाउंट नम्बर दिया गया/जायेगा। इसको PAN कार्ड नम्बर की तरह भी देख सकते है। जिस तरह एक कर्मचारी का केवल एक पैनकार्ड हो सकता है उसी तरह केवल एक UAN होगा। आगे चलते हुये कर्मचारी अपने नये और पुराने PF अकाउंट को UAN के साथ जोड़ कर अपना PF ट्रांसफर के लिये आसानी के साथ अप्लाई कर सकता है। मतलब समूचा PF और EPS का पैसा एक झोले में और झोले का नाम UAN, इस पूरी प्रक्रिया में कप्म्यूटर का ज्ञान जरूरी होगा।
UAN  तले जुड़ेंगे सभी PF अकाउंट

UAN जुड़े महत्त्वपूर्ण पहलू:
- UAN १२ डिजिट का नम्बर है,
- एक कर्मचारी का एक का एक UAN ही होगा
- आपका UAN केवल आपका नियोक्ता ( Employer ) ही उपलब्ध करा सकता है।
- आपका UAN का स्टेटस क्या है ? मतलब नियोक्ता ने उपलब्ध कराया है कि नहीं इसकी जानकारी ऑनलाइन हासिल की जा सकती है। जानकरी हासिल करने के लिये अपना PF अकाउंट नम्बर तैयार रखे।
- UAN  मिलने पर उसे एक्टिवेट करना होता है। एक्टिवट UAN के पोर्टल पर जाकर किया जा सकता है।
- ध्यान रखे एक UAN के साथ जो मोबाइल नम्बर जुड़ गया वो दूसरे UAN के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है।
- यदि employer ने आपके तात्कालिक और पुराने PF अकॉउंट को UAN से लिन्क कर दिया है तो ट्रान्सफर स्वतः हो जायेगा।
- किसी भी नये एम्प्लायर को ज्वाइन करने पर नया PF Account पुराने प्रोसेस से ही खुलेगा , किन्तु यदि आप UAN नंबर मुहैया करवाते है  employer जिम्मेदारी है की वो नये PF अकाउंट को अप्पके द्वारा दिये गये UAN से लिन्क कराये।
- यदि  आप नये एम्प्लायर को UAN होने के बावजूद  उपलब्ध नहीं कराते ये लापरवाही दूसरा UAN allot होने का कारण बन सकती है जो की कानूनी तौर पर गलत है।
- UAN सक्रिय होने और सभी अकाउंट लिंक होने से आपकी पेन्शन और pf का पैसा मिलने की सम्भावनाये बढ़ जाएगी।

नीचे UAN की उपलब्धता का और एक्टिवेट करने का तरीका विस्तार पूर्वक दिया गया है।


UAN बना की नहीं ये कैसे चेक करे?
१.  यहाँ क्लिक करे - https://uanmembers.epfoservices.in/

   नीचे दी गयी स्क्रीन खुलेगी


२. "Know your status" पर क्लिक करने के बाद नीचे दी गयी स्क्रीन खुलेगी , इसमें पाना अभी का ( Current ) PF अकॉउंट नो. दर्ज करे। यदि आपका PF Account नंबर : WB/11576/2965 है तो नीचे दिखाये गये तरीके से  दर्ज करे।

३. ऊपर दिये गए निर्देशों का पालन करने  UAN मिल जायेगा , यदि नहीं मिलता तो आप आपने Employer से सम्पर्क करके जानकारी हासिल करे, कारण जाने निवारण करवाये।

UAN  कैसे एक्टिवेट करे करे?
यदि UAN  मिल गया है तो उसे एक्टिवेट करने के लिये  URL -  https://uanmembers.epfoservices.in/ को खोले  नीचे दी गयी स्क्रीन को के अनुसार आगे बढे।

यदि आपका UAN नंबर - 100406552070 है तो इसे नीचे दी गयी स्क्रीन के आधार अपर अंकित कर और साथ ही साथ अपना मोबाइल नम्बर भी दर्ज करे। OTP या इस्तेमाल कर आपका UAN एक्टिवेट हो जायेगा।

  


4. एक्टिवेट होने के बाद आप लोगिन कर अपने खातों की जानकारी स्वयं लिन्क कर सकते है।   employer द्वारा लिन्क अकाउंट ही साथ में ही दिखेंगे। 
पफ अकाउंट नम्बर UAN  इस स्क्रीन से जान बूझ कर मिटा दिए  गये है :)
PF ट्रान्सफर कैसे करे इसकी जानकारी अगली पोस्ट में दी जाएगी। ध्यान रहे की PF ऑनलाइन ट्रांसफर के लिये उसका UAN  से लिन्क होना आवश्यक नहीं है। यदि एम्प्लायर द्वारा अकॉउंट UAN से लिंक कर दिया गया है तो ट्रांसफर अपने आप हो जायेगा, PF  trust  के मामले में प्रोसेस अलग है।

व्यंग: कंटाप पर एक ललित निबन्ध

कंटाप हिंसा की एक ऐसी विधा है जो गतिमान हाथ की ऊर्जा सम्पर्क में आने वाले गाल पर स्थानान्तरित करती है। गालों की धमनियों में रक्त का श्राव बढ़ा देती है, और ह्रदय में भय के भाव को तत्काल प्रभाव से जाग्रत करती है। पीड़ित के गालों पर कांग्रेसी चुनाव चिन्ह की लालिमा छोड़ जाती है। गाल बैलेट मालूम होता है। 

कंटाप एक संज्ञा है। कांटापिकरण क्रिया है।
आम इस्तेमाल की भाषा में कंटाप के साथ विशेषण का भी बहुतायत प्रयोग मिलता है, ये प्रयोग भय के भाव की तीव्रता को मापने का यत्न करता है। उदहारण स्वरुप एक वाक्य प्रयोग निम्नलिखित है: हपक के कंटाप देंगे, कानपुर कलकत्ता नजर आयेगा!!! यहाँ हपक एक विशेषण है जो कंटाप की लगने की तीव्रता का भान कराता है।इस वाक्य में अनुप्रास और उपमा अलन्कार का भी प्रयोग होता है । 

कानपुर का कलकत्ता नज़र आने का एक वैज्ञानिक कारण भी है। हपक के लगने वाला कंटाप सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ता है। रक्त का बढ़ा हुआ श्राव और दबाव चक्कर लाने के लिये काफी होता है।अतैव तात्कालिक तौर पर निकट दृष्टिदोष उत्पन्न होता है जो कानपुर को कलकत्ता दिखाने के लिये काफी होता है।

कंटाप के साथ अन्य विशेषण भी उपलब्ध है। जैसे कंटाप मारेगे पटक के, झटक के।

कई बार कंटाप को लेकर ऐसे वाक्य प्रयोग भी होते है जिनमे कंटाप सांकेतिक रूप से उपस्थित होता है। 
- अभी कान के नीचे रसीद देगे दो बिलबिला जाओंगे ससुर के नाती।
- देंगे मिला के तो चौराहा हो जायेगा
- दे देंगे अभी तो कन्ने टाइट हो जायेंगे चले आते मुँह उठा के 

कनपुरिया डॉक्टरों ( स्वयं भू मानद उपाधि या gsvm के प्रशिक्षु डॉक्टर)का कंटाप का अपना विश्लेषण है। वो कंटाप में होने वाली प्रचुर हिन्सा और भय के भाव को कम करने वाले तकनीकि शब्दों का प्रयोग करते है। "थप्पड़ थेरेपी" कंटाप का दूसरा नाम है या यूं कह ले की कंटाप का वैज्ञानिक नाम है।


कंटाप कानपुर नगर कानपुर देहात के क्षेत्रो में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। स्कूल कॉलेज के आस पास के इलाको में प्रचुरता में उपलब्ध है।

शिक्षा व्यवस्था: चण्डीगढ़ की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था और दिल्ली सरकार के प्रयास

दिल्ली सरकार प्राइवेट स्कूल्स को जवाबदेह बनाने की कोशिश में लगी हुयी है। कानून में संशोधन को लेकर बहस- मुहबिसे का दौर चल रहा है और आरोप प्रत्त्यारोप का भी!! इस बदलाव पर बहस की जरूरत एक लम्बे अरसे से थी। किन्तु मामला केवल अख़बार की रिपोर्ट और कुछ स्तम्भकारो द्वारा मामले को उठाने से लेकर शुरू होता और वहीं खत्म। गम्भीरता से शायद विचार कभी किया ही नहीं गया, या दूसरा पहलू ये भी हो सकता है की कुछ निहित स्वार्थो के चलते मामले को गम्भीर माना ही नहीं गया। अच्छी शिक्षा का अधिकार अब कानून है  किन्तु फिर भी, निजी विद्यालय BCCI की तरह बेलगाम है और अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग वाली कहावत को चरितार्थ करने में लगे हुये है। अदालतों की अपनी मजबूरियाँ है, अभिववकाओं की अपनी मजबूरियाँ है।  इन सब के बीच राज्य सरकारे पूरे मामलें की टोह तक नहीं लेती। ऐसे माहौल में दिल्ली सरकार के प्रयासों को गम्भीरता से देखें, एक अभिवावक होने के नाते हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। बदलाव बयार अगर दिल्ली में आई तो प्रभाव क्षेत्र बढ़ भी सकता है।
आईये इस मुद्दे के अन्य पहलुओं पर विचार करते है कि निजी स्कूल्स पर नकेल कसना जरूरी क्यों है। मैं व्यकिगत अनुभवों के चलते चण्डीगढ़ में लागू मॉडल को अच्छा मानता हूँ  आईये देखते है की वह मॉडल क्या है??? 
गाजियाबाद के स्कूल की एडमिशन फीस का विवरण


चण्डीगढ़ के निजी विद्यालयों का मॉडल: 
केंद्रशासित, चण्डीगढ़ में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था और उसमे प्रवेश को लेकर जो मॉडल चल रहा है उसमे काफी कुछ सीखने लिये है, जिसे जस का तस अन्य जगहों पर लागू किया जा सकता है। शुरूआती कक्षाओं में एडमिशन के लिये चण्डीगढ़ के शिक्षा विभाग के निर्देशनुसार वर्ष के अंतिम महीने में निर्धारित समयावधि के लिए पंजीकरण किये जाते है। किसी भी निजी स्कूल में केवल 50 रुपये देकर पंजीकरण कराया जा सकता है। पंजीकरण के उपरान्त स्कूल लॉटरी निकाल कर बच्चों को एडमिशन के बुलाया जाता है। सनद रहे की "Right To  Education" के तहत 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर( EWS ) छात्रों के लिये आरक्षित है।

चण्डीगढ़ में RTE के तहत लागू मॉडल की खूबियाँ :
- कुल मिला एन्ट्री लेवल पर किसी तरह का कोई इंटरव्यू नहीं लिया जाता।
- पंजीकरण की फीस हर स्कूल में समान 50 रुपये है
- 25 सीट्स EWS के लिए है
- लॉटरी निकाल कर प्रवेश का फैसला किया जाता है
- उम्र की सीमा तय है, प्रे-नर्सरी( Play ) में ३ साल, नर्सरी में एडमिशन ४ साल से कम उम्र में एडमिशन नहीं लिया जाता।
- प्री-प्राइमरी में क्लास का नाम स्कूल में कुछ भी हो किन्तु बच्चा 6+ में पहली कक्षा में आ जाता है।

चण्डीगढ़ में RTE मॉडल दिक्कते:
- EWS साबित करने वाले डक्यूमेंट्स के लिये स्कूल कई बार अभिवावकों  परेशान करते है, EWS प्रायः खाली रह जाती है।
- स्कूल्स में लगने वाली एडमिशन और टूशन फीस पर प्रसाशन का कोई नियन्त्रण नहीं है।
- फीस अधिक होने के बाद भी शिक्षकों को मिलने वाली पगार हमेशा संदेह के घेरे में रहती है।
- स्कूल्स बच्चों के ट्रान्सपोर्ट सिस्टम को कॉन्ट्रैक्ट पर देकर कागजी तौर पर जिम्मेदारी अभिवावकों पर छोड़ देते है। और इसमें माध्यम से माननीय सुप्रीम कोर्ट के स्कूल बसों को लेकर दिये गए निर्देशों का पालन करने से भी बच जाते है। किन्तु बच्चों की सुरक्षा ताक पर हो जाती है खासकर जब बच्चे नौनिहाल हो ( छोटे बच्चे)

उत्तर प्रदेश के प्राथमिक शिक्षा मॉडल के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु:
- एंट्री लेवल पर प्रवेश की कोई उम्र का दायरा स्कूल खुद तय करते है , सरकारी मानदण्ड अगर कुछ है भी तो उन्हें किनारे कर दिया जाता है
- एन्ट्री लेवल पर बच्चों और अभिवावकों का साक्षात्कार (Interview) लिया जाता है।
- स्कूल एडमिशन फॉर्म के लिये मनमानी फीस वसूल करते है जो 500 रुपये  लेकर 1500 -2000 रुपये तक जाती है। एडमिशन फॉर्म में अभिवावक की आय के बारे जानकारी माँगी जाती है। अन्त में यही एडमिशन का आधार भी बन जाता है।
-  फॉर्म भरने की तिथि हर स्कूल का अपना राग ताग है।
- स्कूल में मिल रही शिक्षा तुलना में फीस बहुत ज्यादा है।
- EWS के छात्रों  RTE तहत कोई व्यवस्था नहीं।
- स्कूल टीचर्स  पगार संदेह के घेरे में है, सरकारी मानदण्डों होता।
-  साथ ही चण्डीगढ़ में RTE मॉडल दिक्कते की सभी दिक्कते आगे जोड़ी जा सकती है।

देश के लगभग हर प्रदेश में,  कुल मिलाकर ये साफ़ दिखाई देता है कि निजी स्कूल्स "प्रॉफिट मेकिंग" संस्थायें हैं । बावजूद इसके की अधिकतर निजी विद्यालय किसी ना किसी तरह सरकार से सब्सिडी लेते है। स्कूल में बिकने वाली किताबों, ड्रेस, ट्रान्सपोर्ट सिस्टम से लेकर भारी भरकम फीस सभी में मुनाफा देखा जाता है। शिक्षा को तरजीह देने की जगह मुनाफा सर चढ़ कर बोलता है। शिक्षकों को मिलने वाली पगार कागज़ों में बड़ी पर हाथ में छोटी होती है। जब एक स्कूल प्रॉफिट मेकिंग सँस्था है जो अभिवावकों से " डेवलपमेंट फीस" वसूलने का क्या औचित्य ? एनुअलफीस वसूलने का क्या औचित्य?"

एक ऑटो चालक के बच्चे को अच्छी शिक्षा से केवल इसलिये वंचित किया जा सकता है क्यों की उसका पिता स्कूल द्वारा लिया जाने वाला इंटरव्यू पास नहीं कर सकता, उसकी माँ पढ़ी लिखी नहीं क्या उसे इस आधार पर शिक्षा से वंचित किया जा सकता है ? क्या नौनिहालों का इंटरव्यू करना नैतिक आधार पर गलत नहीं है ? जो उम्र सीखना शुरू करने की है उसमे इंटरव्यू!! तंग हो चुके मानवीय मूल्यों और बढ़ती मुनाफाखोरी का उदहारण नहीं है ? आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी शिक्षा का अधिकार कानून देता है, चण्डीगढ़ में इसका पालन कुछ हद तक हो भी रहा है। अतैव कानून में बदलाव कर निजी स्कूल्स पर नकेल कसना सरकारी जिम्मेदारी है। निजी स्कूल्स का अकॉउंट पब्लिक होना चाहिये किसी भी तरह की ली जाने वाली फीस केवल और केवल बैंक अकाउंट के माध्यम से ली जानी चाहिये। व्यक्तिगत तौर पर दिल्ली सरकार के शिक्षा कानून बदलने के प्रयासों को सराहनीय मानता हूँ। साथ ही साथ उम्मीद करता हूँ के अन्य सरकार भी इस मुद्दे की सुध लेगी और भारत सही मायने में लोकतान्त्रिक देश बनाने में मदद करेगी।

बैंक खातों के एकीकरण और पोर्टिंग से बदलाव की जरूरत

बैंक खातों की आधार कार्ड से लिंकिंग की जरूरत :
3 जुलाई 2015 से नेशनल मोबाइल नम्बर पोर्टेबिलिटी ( National MNP) की शुरुआत के साथ ही, "एक व्यक्ति एक नम्बर" की दिशा में हम एक कदम और आगे बढे। इसकी जरूरत लम्बे अरसे से थी। खैर देर आया दुरुस्त आया। आगे चलते कुछ और भी जरूरी कदम दिशा उठाने होगे। उदहारण लिये बैंक के बचत खातों को भी एक नम्बर से जोड़ना होगा, यदि वो एक नम्बर आधार नम्बर हो तो बेहतर। खाता किसी भी बैंक में हो, कितने भी हो सब आधार से लिंक हो तो पारदर्शिता का एक नया दौर आएगा, इस प्रक्रिया को आवश्यक घोषित कर देना चाहिये।

जिस तरह LPG की सब्सिडी के लिये हर वर्ग के लोगों ने अपने LPG खाते आधार से लिंक कराया उसी तर्ज पर, बचत ,कर्ज ,सावधि जमा खाते, demat अकाउंट के लिये भी लिंक करने चाहिये। साथ ही साथ हर नये खुलने वाले अकॉउंट में हर हाल में आधार आवश्यक होना चाहिए। इससे जन-धन दोनों की सुरक्षा को भी बल मिलेगा।आगे चलते हुये डिजिटल इंडिया के माध्यम से सभी कहते एक ही ID के अंतर्गत हो जायेगे।

ज्ञात हो की देश के सरकारी और गैर सरकारी बैंक्स में हज़ारों करोड़ रुपया अनक्लेम्ड पड़ा हुआ। यही हाल LIC और PPF अकाउंट भी है। बैंक खाते में वर्तमान पता इत्यादि अपडेट ना होने के कारण, बैंक खाता धारक और उसके परिवार तक नहीं पहुँच पाता। इस तरह की के अनेक मामले सामने आते रहते है, जिनमे या तो परिवार के लोगों को बैंक खाते , LIC इत्यादि जानकारी ही नहीं होती। एक बड़ी धनराशि जरूरत को मिलने से रह जाती है।

बैंक अकाउंट लिंकिंग का एक फायदा और भी है की इससे धन लेनदेन में पारदर्शिता आएगी। ये पता लगा पाना मुश्किल ना होगा की बड़े अमाउंट के ट्रांसक्शन कहाँ और किसके बीच हो रहे है।  हालाँकि बड़े में पैनकार्ड का देना अनिवार्य है किन्तु यह प्रक्रिया पूरी तरह से सफल नहीं हो पायी।

बैंक खाता पोर्टेबिलिटी की जरूरत:
ग्राहक को बैंक खाता पोर्ट करने की सुविधा देने दिशा में यदि सरकार प्रयास करती है और पूरी प्रक्रिया का सरलीकरण करती है तो बैंक द्वारा लिये जाने वाले ब्याज और सुविधाओं को सरल और सहज बनाएगा। उदहारण स्वरुप आप अगर आज किसी बैंक से होम लोन ले तो एक ही बैंक, एक ही क्षेत्र में दो अलग अलग लोगो को कई बार अलग दरों पर लोन देती है। अलग-अलग प्रदेशों में अलग - अलग ब्याजदर पर पैसा देता।  ऐसा होने पर यदि  प्रकिया के तहत यदि बैंक की किसी भी तरीके के खाते की पोर्टिंग होने का प्रावधान होता है तो बेहतर पारदर्शी सेवाओं की दिशा में  मील का पत्थर साबित हो सकता है।

शब्दावली:
एकीकरण: To Link with unique number 

बेवाक: व्यापम की युद्धभूमि शमसान में तब्दील

जाँच का प्रस्ताव खानाबदोशों की तरह इधर-उधर डेरा डंगर उठाये घूम रहा है। व्यापम की युद्धभूमि शमसान में तब्दील हो चुकी है। मानों परशुराम स्वयं फरसा उठाये व्यापम से जुड़े वीरों का आखेट करने पर आमादा हो! आधे रणबाँकुरे वीरगति को प्राप्त हुये, शेष भय की गति को प्राप्त हुये। मतलब गवाही, तबाही में तब्दील हो गयी है। वैसे भी फैसला युद्धभूमि में ही अच्छा!! जो लोग वीरगति को प्राप्त हुये मरते वो वैसे भी। अन्तहीन जाँचों और मुकदमों ने व्यापम के रणबाँकुरों का मुकद्दर उसी दिन तफ़सील से लिख दिया था जब व्यापम का घोटाला सामने आया था। मचा लो हो हल्ला अब चिड़िया आधा खेत तो चुग गयी है। आधा पानी में डूब गया!!

                              पक्ष-विपक्ष हमाम में सब नंगे है,
                              सो अब मुकदमा खत्म समझों भाई!  
                              अब कौन और कैसे देगा गवाही?
                              जाँच का सिलसिला तो यूँ ही चलता रहेगा
                              पाप, दुर्योधनों के घर पलता रहेगा
                              शकुनियों की चाल से न्याय जलता रहेगा।

व्यंग: करोड़पति बनाऊ फैक्ट्री


सांसदों की सैलरी का मुद्दा जेरेबहस है। पता नहीं क्यों? सैलरी बढ़वा क्या करेंगे? राजनीति वैसे भी करोड़पति बनाऊ फैक्ट्री है, जो भी अन्दर गया करोड़पति बन कर ही बाहर निकला। ना जाने कौन सा जादू करती है यह फैक्ट्री, इस फैक्ट्री की मशीन है  कि "रोड़" एक आध साल में ही "करोड़" बन जाते है !!! मजेदार बात ये है कि इस फैक्ट्री की मशीन "मेड इन इंडिया" वाली है। ऐसी गज़ब की मशीन बस अपने देश में बन सकती है और कहीं नहीं । जो सियासी गलियारों का सिपाही बन गया वो दूसरी फैक्ट्री में चला जाता है जहाँ लोग करोड़ से अरब का मुकाम हासिल करते है !! सो पता नहीं कि लोग क्यों पिद्दी भर की पगार को मुद्दा बनाये हुये है???

यूँ तो सांसद जनता का सेवक होता है। जहाँ तक मेरी जानकारी है एक सांसद का काम है, अपने क्षेत्र के लोगो की समस्याएं समझना, उनके समाधान के लिये संसद में उनका प्रतिनिधित्व करना, कानून इत्यादि बनाने में शामिल होना और किसी कानून के बनते समय उसके व्यवहारिक पहलू को अपने क्षेत्र के लोगो महत्तम उपयोग के लिये प्रभावी बनाना। सांसद निधि का उपयोग उस जगह करना जहाँ उसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो। इसमें अपने विवेक का इस्तेमाल भी कर सकते है। पर भैया अब लाल बहादुर शास्त्री का जमाना तो है नहीं। अतैव अब राजनीति दिल्ली से होती है। हल्दीराम देश और दिल्ली में जगह जगह  फैक्ट्री लगाकर करोड़ो में खेल पाये। किन्तु सांसद, विधायक, और राजनीति में अन्य तरह के गणमान्य, बस राजधानियों तक की दूरी तय करते ही ये चमत्कार  कर दिखाते है।

भैया, हल्ला ना मचाओ, बेहतर है की पगार बढ़ा दो। अब जरा सोच कर देखिये, क्या गुजरती होती एक सांसद स्तर के नेता पर जब उसके इलाके के गाँव का प्रधान मिड डे मील खा-खा कर उससे से अमीर दिखता होगा, सांसद से ज्यादा बैंक बैलेंस रखता होगा।उनकी हालत मरता क्या ना करता वाली ही हो जाती होगी। इसी लिये तो करोड़पति बनाऊ फैक्ट्री में घुस जाते है, और निकलते है एकदम विजेता की तरह।

परिन्दे हमे जीना सिखाते है।

आँधियाँ ताकत दिखाती है 
आँधियाँ फैसले सुनाती है 
आँधियाँ घोसलें गिराती है
पर परिन्दे फिर चहचहाते है
फिर से हौसला दिखाते है 
परो की ताकत आजमाते है
फिर से घोसला सजाते है 
परिन्दे मेहनत सिखाते है
परिन्दे नयी राहें दिखाते है
परिन्दे हमे जीना सिखाते है।