बात की बात: फ्लॉप शो

आज के दौर में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले अधिकतम हास्य कार्यक्रम फूहड़ता का पर्याय है। ये उस गन्दे साहित्य की तरह होते जा है जो रेलवे स्टेशन के बहार जगह-जगह मिलता है। फिल्मे देखिये  तो वहाँ पर भी महिलाओं और उनके रिश्तों के  इर्द गिर्द ही हास्य होता है। व्यक्तिगत तौर पर मैं जब कोई हास्य कार्यक्रम देखता हूँ तो देखते देखते "जसपाल भट्टी जी" जी जरूर याद आते है। उनका फ्लॉप शो भी बहुत याद आता है। आज के कलाकार उनके आसपास ठहर भी नहीं सकते। जसपाल जी के ज़माने में पूरा परिवार एक साथ बैठ कर दूरदर्शन देखता था। अब बेहद मुश्किल है।  

नागरिक समस्या: दलाली दूर तक जाती है।

प्राथमिक शिक्षा देने वाले स्कूल NGO की तरह चलने चाहिये पर ऐसा नहीं है। स्कूल जब बनाये जाते है तब विभिन्न सरकारी विभागों से शिक्षा को आगे बढ़ाने के नाम पर तरह-तरह की छूट उपलब्ध करायी जाती है।इन सब के बावजूद स्कूल में  भारी भरकम फीस ली जाती है। तरह के शुल्क लगाये जाते है। बावजूद इसके वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षकों के हित भी सुरक्षित नहीं है!! उनकी पगार पर बट्टेमारी होती है।फीस का बड़ा स्कूल मालिकों के बैंक खातों में जाता है। बच्चों को लाने और ले जाने वाली बसों में माननीय उच्चतम न्यायलय द्वारा दिये गये निर्देश भी नहीं माने जाते। शिवाय इस बात के की बस पीले रंग की होगी। जाहिर है की प्राथमिक शिक्षा एक व्यवसाय बन गयी है।जहाँ भगवान का रूप कहे जाने वाले बालक बालिकाओं को शिक्षा दी जाती है। वहाँ व्यावसायिक माहौल खतरनाक है। प्रदेश सरकारे गहरी कुम्भकरणीय तन्द्रा में हैं। तन्द्रा में विघ्न नहीं पड़  रहा सो जाहिर है कि दलाली दूर तक जाती है।  

कटाक्ष: ईट से ईट बजा दूँगा ...

दो बन्दे एक दूजे से लड़ रहे थे
कुरुक्षेत्र की चढ़ाई चढ़ रहे थे 
एक ने कहा तू जानता नहीं मैं कौन हूँ
दूसरा बोला कम मत समझ अगर मैं मौन हूँ
ईट से ईट बजा दूँगा
तुझको गुस्ताखी की सजा दूँगा
पहला चिल्लाया अरे भाई
अगर ईट से ईट बजायेगा
तो पैसा क्या अपना घर बेच कर लायेगा?
अब एक ईट 7 रूपये की आती है!
मँहगाई ना तेरी ना मेरी साथी है
दूसरा सकपका गया
बिना बात बढ़ाये जमीन पर आ गया।
बिना बात बढ़ाये जमीन पर आ गया ।। 

मेरे शहर कानपुर के दस्तखत!

इंजीनियरिंग के दिनों में प्रथमवर्ष की शुरुआत में प्रोफेशनल कम्युनिकेशन के प्रोफेसर NP Shukla जी ने पहली क्लास ली तो सभी छात्रो का परिचय जानना चाहा। बोले एक एक कर अपना परिचय बताओ कहाँ से हो ये बताओ। मेरा रोलनम्बर अन्त में आता है वी से नाम होने के कारण ।सो मुझसे पहले मेरे शहर के कई लोगो का नम्बर आ गया। सब ने अपने अपने अंदाज़ में परिचय दिया।किसी ने कहा वो औधोगिक नगरी का वासी है किसी कहा की वो गंगा किनारे वाला है। किसी ने कहा दिल्ली के बाद हिन्दी बोलने वाले शहरो में हमारा शहर सबसेबड़ा है। खैर मेरा नम्बर भी आ गया । मैंने अपने शहर का परिचय कुछ यूँ दिया।
मैं उस नगरी का हूँ जहाँ आज़ादी की पहली लड़ाई लड़ी गयी। जहाँ रानी लक्ष्मी बाई ने जन्म लिया। जहाँ शालिग्राम शुक्ल शहीद हुये। मैं उस नगरी का हूँ जो चन्द्रशेखर आज़ाद की,गणेशशंकर विधार्थी जी की कर्म भूमि है मैं उस नगरी का हूँ जहाँ प्रथम महिला पत्रकार शीला झुनझुनवाला जी ने जन्म लिया । प्रोफेसर साहब ने मुझे रुकने का इशारा किया और कहा उम्दा दस्तखत !!!! मैं समझ गया की आप कानपुर के है। आपने गणेश जी का नाम ले लिया बस कानपुर का परिचय पूरा हो गया।

स्वान्तः सुखाय:- आज का दिन

आज बहुत दिनों बाद माइक पकड़ा। कार्यक्रम का संचालन किया। पदम् श्री आदरणीय शीला झुनझुनवाला का आशीष मिला। इंजीनियरिंग के दिनों के बाद ये पहली बार था। मालवीया के दिनों में मैंने कुल मिलाकर 18 दिन कमेंट्री की कॉलेज के वार्षिक खेलो में,मालवीया कप में, सांस्कृतिक कार्यक्रमो में। अन्य प्रतियोगिताओं में जहाँ एक हिन्दी टिप्पणीकार की जरूरत हुयी हर उस जगह मैंने अपने आप को आजमाया। बेहद अच्छे थे वो दिन जब होनूलुलु की हवाई यात्रा का ऑफर लोगो की तरफ से दौड़ में भाग लेने वाली छात्राओ को दिया करता था।

आज का कार्यक्रम था :दीपक श्रीवास्तव द्वारा भजन की प्रस्तुति
स्थान: अरविन्द सोसाइटी नोएडा सेक्टर -62
मुख्य अतिथि पदम् श्री शीला झुनझुनवाला जी
अध्यक्ष: साहित्यकार कनुप्रिया जी
विशेष अतिथि: कृष्ण कुमार दीक्षित जी
साथ : पदम् श्री  शीला झुनझुनवाला जी साथ: शीला ji देश की पहली महिला पत्रकार है।
कादम्बिनी,अंगजा धर्मयुग, हिन्दुस्तान जैसी पत्र पत्रिकाओं के सम्पादक pad par रही।  




बात की बात: मजदूर

जब आप अपने गृह नगर/प्रदेश से दूर रहते है, तब वो लोग जो जिनके शहर में आप है वो अखबारों के माध्यम से आपके शहर और प्रदेश को जानते है। उनका अपना नजरिया बना होता है। खासकर जब बात उत्तर प्रदेश की हो तो ये मान्यता आम है की उत्तर प्रदेश में अपराध बहुत होते है रोजगार के अवसर कम है। ऐसे ही एक मुद्दे पर किसी ने मुझसे कहा की "उत्तर प्रदेश में मजदूर हरियाणा,पँजाब में  आकर काम करते है। रोजगार नहीं वहाँ , हालाँकि बात में दम था किन्तु फिर भी प्रतिउत्तर में मैंने उन्हें जवाब दिया "जनाब मजदूरी तो सब करते है। छत्तीसगढ़ के मजदूर अधिक मेहनताना पाने की गरज में कानपुर में आकर काम करते है। कानपुर के मजदूर गुडगाँव और नॉएडा, पँजाब आकर काम करते है। पँजाब के मजदूर कनाडा जाकर काम करते है।" अन्ततः है तो सब मजदूर ही। उत्तर प्रदेश वाले बेहतर है क्यों की वो अपने ही देश में रहते है बाहर का रास्ता नहीं तलाशते। मित्र ने चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुये कहा सही बात।!!! 

नागरिक समस्या: पते का संकट

जब एक वेतनभोगी जब आयकर भरता है तब वो कोई भी पता भर दे वो सरकार और आयकर विभाग को स्वीकार होता है। मतलब जो आपने भरा वो मान्य हुआ। पर वही वेतनभोगी जब गैस कनेक्शन के लिए जाता है, बच्चे के लिये स्कूल में प्रवेश चाहता है, बैंक में खाता खोलने के लिये जाता है, उससे पते का प्रमाणपत्र माँगा जाता है। ये हाल तब है जब व्यक्ति जन्म से भारतीय नागरिक है। क्या ये अफसोसजनक नहीं है कि एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाने पर, एक शहर से दूसरे शहर जाने पर आदमी पहचान और पते की समस्या से जूझता है। सरकार पैसा लेते हुये सब स्वीकार करती है और पैसा मिल जाने के बाद उसी व्यक्ति को अस्वीकार करती है।
 

नाम उम्र वल्दियत

मतदाता पहचान पत्र
गलतियों का दान पत्र
नाम उम्र वल्दियत
सब की सब गलत
फ़ोटो ऐसा
जैसे कोई गुमशुदा
ये पत्र गलतियों की खान है
फिर भी सबसे ज्यादा मान्य है
इसी लिये देश में जगह जगह
 स्थितियाँ असामान्य है ।

मियाँ मकबूल: दिल्ली में धरना लीगल हो गया।

"आज तो सरकार की हार हो गयी लज्जित कर  देने वाली !!!" रामलाल  ने जैसे ही ये बोला। मियाँ मकबूल गम्भीर हो उठे अन्दाज़ेबयाँ थोड़ा भारी करते हुये बोले, देखिये मियाँ गफलत मत पालिये!! अपनी आँखों का ऐनक बदलिये जरा और गौर से देखिये ले लज्जित कर देने वाली जीत नहीं बल्कि ये लोकतन्त्र को सुसज्जित कर देने वाली जीत है। अब दोनों सरकारों पर काम का दबााव बना रहेगा। एक दूसरे से आगे बढ़ने की चेष्टा रहेगी, तो अन्त में भला केवल हिन्दुस्तान का ही तो हुआ ना मियाँ। वो कहते है ना नज़र-नज़र का फेर है बस।

चलिये खैर लानत भेजिये उन नामाकूल लोगो को जो हार और जीत की बात करते है। जीतते तो हम सब है हर चुनाव में बस इस बार ख़ुशी थोड़ी ज्यादा है। खुशी इस बात की है, कि दिल्ली में अब "धरना लीगल हो गया मियाँ" आज़ादी के बाद से धरने के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हुआ। राष्ट्रपिता का मुख्य हथियार हुआ करता था धरना और देखो जिस धरने ने हमे आज़ादी दिलायी उसी धरने को हमने ठन्डे बस्ते में सरका दिया। अब धरना देने के लिये भी प्रसाशन की आज्ञा का इन्तज़ार करना होता है। आज्ञा ना मानी तो पुलिसिया लाठी के लिये तैयार हो जाईये बस किसी न किसी बहाने से पिटायी कर देंगे।  सामान्य आदमी अगर गाँधी प्रतिमा के नीचे भी अगर धरने पे बैठ जाये तो पुलिस उठा ले जाती है। धरना भूख और शरीर सब तोड़ देती है। अबकी बार सब लोकतन्त्र की बीन के आगे नाचे।  देखिये ना मियाँ दिल्ली में "धरना भी लीगल" हो प्रचंड बहुमत के साथ और देश को एक नयी दिशा भी मिल गयी। अब कुछ और लोग शायद इस निष्ठुर सरकारी तन्त्र से लड़ सकेंगे। धरने को वही पुराना रुतबा और सम्मान वापस मिलेगा जो गाँधी जी और अन्ना जी के धरने को कभी मिला था।

बस यही तो लोकतन्त्र की है। ये कहते हुये मियाँ मकबूल ने पान की पीक नाली पर मार दी। की तभी उनकी बेगम की आवाज़ गूँजी और वो घर की ओर कुछ कर गये।

जल्दी के जिल्दसाजो ने कर दिया जादू ...

एक दर्द शहर में उधार ले लिया
अच्छा भला शख्श बीमार ले लिया ।

हर शह में हो गयी है कशमकश
हल्की थी जिन्दगी,भार ले लिया ।

खो गयी वो आदत पहले आप वाली
बिगड़ा हुआ कोई सँस्कार ले लिया ।

जल्दी के जिल्दसाजो ने कर दिया जादू
चैनोअमन  और करार ले लिया ।

 किराये के घरों में चलती है ज़िन्दगी
अपना बसा बसाया घर बार ले लिया ।

दफ्तर में अन्तिम कार्यकारी दिन सहकर्मियों को लिखा पत्र

Infosys में 52 महीने  सेवारत रहने के उपरान्त वहाँ विदा लेते हुये मैंने अन्तिम कार्यकारी दिन ये पत्र अपने सहकर्मियों को लिखा।  हालाँकि हिन्दी में पत्र लिखना यहाँ एक चलन नहीं है। किन्तु अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को आगे रखते हुये मैंने हिन्दी में ही लिखा।  कुछ ने तारीफ की और कुछ ने सवाल भी उठाये। जिन्होंने सवाल उठाये उनसे करबद्ध क्षमा याचना कर ली। 

व्यंग: मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ।

मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। "मुल्ला की दौड़ मस्जिद" वाली कहावत को चरितार्थ करने वाला निरीह प्राणी!! जिसका होना न होना समाज के लिये ज्यादा मायने नहीं रखता। मेरे गुण और धर्म के आधार पर तरह-तरह की मान्यताये और भ्रान्तियाँ समाज में व्याप्त है। कस्बों, गाँव और उन छोटे शहरों में जहाँ आधुनिकता ने ढंग से पाँव नहीं पसारे वहाँ आम और खास लोगो की ये मान्यता होती है की मैं कंप्यूटर, प्रिंटर और मोबाइल इत्यादि से जुडी सारी समस्याओ का समाधान जनता हूँ। प्रसंगवश जब कभी इस बावत बात छिड़ती है तो उनकी मान्यताये मेरे जवाबो के आगे धराशायी करती है। वो लोग मेरे कार्य के बारे में सुनते-सुनते सर खुजलाते हुये कह बैठते है कि भैया आखिर तुम करते क्या हो? हमारा रेडियो सुधारो तो जाने। पहिले के इंजीनियर सब कुछ कर लेते थे और एक तुम हो बता तो ना जाने का का रहे हो पर रेडियो सुधरता नहीं तुमसे!!!!

वैसे तो किसी भी कम्पनी के लिये मैं एक संसाधन मात्र हूँ। पर अलग-अलग तरह का व्यवसाय करने वाली कम्पनी मेरे रूप और स्वरुप को अपने हिसाब से देखती है । हज़ारो लोगो को रोजगार देने वाली सर्विस बेस्ड सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री के लिये एक टीम लीड या एक डेवलपर हूँ जो मुझसे किसी भी तकनीकि के काम को आसानी से करवा सकते है। किसी भी रोल में फिट बैठा सकते है और जब फिट बैठ ही गया तो डॉलर्स की गंगा अपनी रफ़्तार से बहने लगती है। एक प्रोडक्ट बेस्ड कम्पनी के लिये मैं एक फर्मवेयर/एम्बेडेड  इंजीनियर हूँ। जो हार्डवेयर की समझ रखता है और c/c++ कोडिंग को अंजाम दे सकता है।

एक मकान मालिक के लिए जितना चाहे उतने पैसे ऐठने का श्रोत हूँ। बैंक वालो के लिये मैं होम लोन,पर्सनल लोन बाटने का केंद्र बिन्दु हूँ। हमारे पास अधिकतम फ़ोन कॉल्स उन्ही के आते है । उन्हें भी पता है ये लोन लेगा तो वापस भी आराम से दे देगा भाग कर कहाँ जा सकता है!! सामाजिक मुद्दों में मेरा अस्तित्व सवालिया है। अब केवल रिश्तेदार ही हम जैसो को जानते है। बाकि सारी सामाजिकता फेसबुक और व्हाट्सअप जैसे साधनो के लाइक और क्लिक तक सिमटी है। भारत सरकार के लिये मैं आयकर का श्रोत हूँ, और हमारा सम्बन्ध यही तक सीमित है। आयकर के आलावा व्यावसायिक कर, कम बेसिक सैलरी और ज्यादा ctc के साथ आयकर सर्विस टैक्स की अपार सम्भावनाये सरकार हममे खोज लेती है। 

मैं उस भीड़ का भी हिस्सा हूँ जो बड़े-बड़े शहरो की ऊँची इमारतों में रहती है,किराये के मकानों में इस आस में की एक ना एक दिन जो फ्लैट बुक किया था वो रहने के लिये मिल ही जायेगा। कुछ इस आस में होते है की कब सैलरी बढे और कब वो अपने बैंक के कर्ज को emi बढ़ाकर जल्दी उतारे। पर इस बीच कोई यादव सिंह आकर सब लूट जाते है।  यादव सिंह नहीं आये तो मंदी  दौर चला आता है। इसी बहाने रोजगार मुहैया कराने वाले पगार न बढ़ाने  बहाना खोज लिया करते है। कुछ मौके पे चौका लगाते है और बाहर रास्ता दिखा देते है। चूँकि अधिकतर मामलात में हम रहते कहीं और है और मतदाता कहीं और के होते है अतैव हमारा कोई राजनीतिक खैर ख्वाह नहीं होता। बस इतनी सी है मेरी कहानी !!!!!

साक्षात् छल साक्षात् कपट !!!

दिल्ली के राजनीतिक हालातो पर एक कल्पना।

मैं समय हूँ। रोज के रोज राजनीति के गिरते स्तर का चश्मदीद बन गया हूँ । मैं रोज देखता हूँ दिल्ली के चुनावी दलदल में धँसते हुये नैतिक मूल्यों को। रोज एक नया षड़यंत्र देखता हूँ रोज नया रण देखता हूँ । रोज व्यक्तिगत हमलो को देखता हूँ,यूँ कहे की नियमो का चीरहरण देखता हूँ। धनुर्धर अपना गाण्डीव लिये एक दूसरे पर ताने खड़े है। शिखंडियो और दुः शासनों की एक कतार रोज बनती चली जा रही है । शैया पर लेते पितामह बस कराह रहे है कह रहे है राजनीति पहले कभी ऐसी ना थी । दिल्ली पहले कभी ऐसी ना थी। पर मैं तो समय हूँ मौन रह सकता हूँ किन्तु आँखे नहीं बन्द कर सकता। मैंने पुरातन काल से देखा है कि सत्ता का नशा सर चढ़कर बोलता हैं। देखिये ना बोल रहा है साक्षात् छल साक्षात् कपट !!!

इन्सानी जुजून में ...

एक दरख़्त और कट गया
इन्सानी जुजून में
आधुनिकता के मजमून में
दरख्तो के कटने का सिलसिला
बदस्तूर चलता रहा ...
पर्यावरण जलता रहा।

संस्मरण: कानून गुजर गया!!!

पँजाब में ऐसा अकसर होता है, कम से कम मोहाली और उसकी सीमाओं से जुडी जगहों पर। कि आप प्रदूषण उत्सर्जन का प्रमाण पत्र लेने जाये और दुकान वाला बन्दा आपको देखते ही आपके पास आये, आपकी गाड़ी की नम्बर प्लेट को कैमरे में कैद करे, और बस फिर कानून और उसके उद्देश्य बस एक प्रिन्ट कमाण्ड के मोहताज हो जाये। ये अघोषित सत्य है। ऐसा अमूमन हर शहर हर प्रदेश में होता है। चण्डीगढ़ में ऐसा पहली बार हुआ था गुजरे 4. 5 वर्षो में। भीषण धुँआ उड़ाती हुयी कोई गाडी आपके पास से निकल जाती है। उसे ना कोई कानून ना कानून का कोई पहरुआ रोक पाता है। क्यों कि उसके पास प्रमाणपत्र होता है। प्रमाणपत्र !!!

कल की तो बात है । चण्डीगढ़ में राष्ट्रीय राजमार्ग -3( दक्षिण मार्ग ) पर आगे बढ़ते हुये ट्रिब्यून चौक को लम्बवत काटने वाले पूर्वमार्ग को नापना शुरू ही किया था की लालबत्ती पर खड़े पुलिसिया रंगरूटों को देख  याद आया की प्रदूषण उत्सर्जन का प्रमाण पत्र समाप्ति की ओर है सो एहतियातन नया बनाने की बात ने दिमाग में जोर डाला और थोड़ी ही देर में पूर्व मार्ग के सुखना फिलिंग स्टेशन पर वाहन खड़ा हो गया। प्रदूषण की दुकान वाले भाईसाहब ने इशारा किया की  करके लगायो। आज्ञा का पालन हुआ और गाड़ी पिछला सिरा दुकान की ओर कर गाड़ी खड़ी कर दी। गाड़ी को बन्द नहीं की जैसा की अपेक्षित होता है। उतर कर आगे होने वाली प्रक्रिया का चक्षुदर्शी बन जाने की चेष्टा में नज़रे गड़ा कर खड़ा हो गया।

दुकान वाले भाईसाहब ने नम्बर प्लेट की तस्वीर को कैद किया, और मेरी तरफ एक सवाल लहरा दिया। किस साल की है, ईयर ऑफ़ मैन्युफैक्चरिंग क्या है जी? सहसा आकर कानो से टकराये इस सवाल के लिये मैं कदापि तैयार नहीं था। मैं इस इंतज़ार में था की भाईसाहब किस समय उत्सर्जनमापक यन्त्र गाडी में लगायेगे और ये बतायेगे की उत्सर्जन की मात्रा सही है या नहीं। खैर सवाल का जवाब दिया। जवाब के साथ ही साथ प्रिन्ट कमाण्ड कम्प्यूटर के कीबोर्ड से होता हुआ प्रिंटर से बाहर निकलने लगा। मैं सोच ही रहा था की प्रदूषण का उत्सर्जन तो नापा ही नहीं जनाब ने। सोच को नयन आयाम मिल पाता उससे पहले ही दुकान वाले का हाथ तेजी से घूमा वो हस्ताक्षर का रहा था। प्रमाणपत्र पर !!! उसके हावभाव को देख कर लगा की मानों वो ताजीरातेहिन्द के तहत कोई फैसला सुनाकर इस कलम से अन्तिम हस्ताक्षर कर रहा हो। उसके बाद कलम का अन्जाम टूट जाना ही होगा। मानों वो कहा रहा हो कानून को आज दफा ३०२ के तहत सजाये मौत की सजा सुनायी जाती है। कानून का आचरण निन्दनीय था और इसका पालन घोर अपराध। न्यायाधीश दुकान वाले के सामने हर शह बेकार थी। उसका हाथ आगे बढ़ा प्रमाण पत्र के साथ। एक आवाज़ ने फिर मेरी कल्पनाओं को भंग किया। 40 रुपये !!! मैंने जेब से रुपये निकाले और आगे बढ़ाते हुये दुकानदार को थमा दिये। दूसरे हाथ से प्रमाणपत्र पकड़ा। एक पल को ऐसा का कि ये कानून का मृत्यु प्रमाणपत्र है। गाड़ी में बैठा और हलकी सी मुस्कान के साथ धर्मपत्नी  से कहा "कानून गुजर गया!!!" हँसते हुये हम फिर सड़क नापने लगे।