पुरानी दिल्ली के पास

पुरानी दिल्ली के पास
एक बेहद ठण्डी सुबह
पुल के नीचे
एक आदमी लेटा था
नीचे बोरा था
ऊपर फटा हुआ कम्बल लपेटा था
अकड़कर सिकुड़कर
पेट और पीठ सपाट मालूम हो रहे थे
मेरा दिमाग सन्नपात
विचारो के झंझावात
लगातार अविरत
घूम घूम कर मानसपटल पर
वार कर रहे थे
दूरदर्शन में होने वाले बड़े-बड़े वाद विवाद
बड़े-बड़े नेताओं के अभिभाषण भाषण
संसद के बहस मुहाविशे
सन्न सन्न करके मेरे मेरे दिमाग को चीर रहे थे
राजपथ जनपथ सब के सब लथपथ
जानकारों से विचारो से
पर सब के सब घरो में
मखमली रजाई में विचारमग्न थे
की कल किस जगह किस सभा में क्या वादे करने है
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