मुद्दा:करों का बोझ आम जनता पर ही तो है।

एक मुआयना करते आयकर और अन्य करो के परिपेक्ष में। कुल मिलाकर अधिकतम 33.99% टैक्स देना पड़ता है, और ये केवल शुरुआत है। इसके बाद हर सामान खरीदने पर 12 से 14.5 % VAT, उसके बाद restraunt में खाना खाने तक पर 15.5% का सर्विस टैक्स। सभी जानते है की पेट्रोल में आधे से ज्यादा टैक्स होता है जो हम जैसे लोग पेय करते है। सरकार लाइफ insurance देती नहीं और आप ले तो उस पर भी सर्विस टैक्स।
घर खरीदे बैंक से loan लेकर तो उसमे भी 3.6% की आस पास का टैक्स लगता है। रजिस्ट्री इत्यदि में तो टैक्स लगना ही है।

इतनी वसूली के बाद भी, जब किसी सड़क से गुजरते है तो toll टैक्स लगता है केवल आम लोगों बाकि exempted होते, पुलिस वाले गाली गलौज करके निकल लेते है। कहीं वाहन पार्क करो तो पार्किंग फीस निर्धारित राशि से ज्यादा वसूली जाती है, और टैक्स उस पर भी लगता है। फ़िल्म देखो तो एंटरटेनमेंट टैक्स लगता है। कभी पुलिस स्टेशन जाना पद जाये तो पुलिस टैक्स देना पड़ता है।खासकर वेतन भोगियों को पूरा टैक्स देना पड़ता है। क्यों की उनके पास बेईमान हो जाने का विकल्प नहीं है।
कॉर्पोरेट सेक्टर के लोग यूँ तो पिंक स्लिप और जबरदस्ती के वर्क प्रेशर के कारण 60 तक कम ही पहुँच पाते है अगर पहुँच गये तो पेंशन नहीं मिलती। बुढ़ापा खुद के हवाले। दूसरी ओर सरकार है की मंत्री संत्री सब ठाढ़ के साथ BMW पर चलते है। पूरे शहर का चक्का जाम कर भाषण देते है। आदर्श झाड़ते है। और ले दे के 100 रुपये की गैस सब्सिडी के पीछे पड़े रहते है।

मेरा भारत महान,
नेता ही काव्य नेता ही पुराण है ।

Odd even का फार्मूला आज नहीं तो कल लगाना पड़ेगा।

गुजारिश है राजनीति से ऊपर उठकर देखे। ........दिल्ली और आस पास के क्षेत्रो में प्राइवेट स्कूलों द्वारा अभिवावकों से अनाब-शनाब पैसा वसूला जाता है। नर्सरी और KG में फीस 1.5 लाख तक या उससे ज्यादा है। हद तब हो जाती शिक्षको को मानकों के अनुरूप पैसा नहीं दिया जाता और स्कूल के ट्रस्टी जो तरह तरह की सब्सिडी सरकार से लेते है वो ऑडी और BMW में सफ़र करते है। इस क्षेत्र में दिल्ली सरकार ने सुधार के जो प्रयास किये है वो सराहनीय है। मूर्त रूप में उतर आने पर सभी को फायदा होगा। शिक्षा माफिया के अलावा। इसके अलावा....

दफ्तर जाते हुये आकाशवाणी पर "Street Vendor livelivood and protection" को लागू करने, उनकी greivances को सुनने और सहायता उपलब्ध कराने में मामलात में बहुत विज्ञापन सुनें। कई बार दिल्ली के रेहड़ी वालो से बातचीत से ये भी पता चला की उनको काफी राहत हुयी है इस मामले में।NCR के किसी भी अन्य क्षेत्र में ये एक्ट बस अनाथ सा पड़ा है।यहाँ भी दिल्ली सरकार ने अच्छा काम किया।

कुल मिलाकर जनता से जुड़े मुद्दों पर दिल्ली सरकार का जो रुख रहा है काबिलेतारीफ है।odd even का फार्मूला लागू होने पर  पुरजोर विरोध हो रहा है। किन्तु शुरुआत कहीं न कहीं से तो करनी होगी।निर्णय अच्छा या बुरा हो सकता है।पर निर्णय के पीछे की निष्ठा सवालिया नहीं लगती।हज़ारो लोग आलोचना कर रहे है किन्तु ये नहीं बता रहे की odd even नहीं तो और क्या करना चाहिये? सकारात्मक आलोचना बेहतर विकल्प होता। व्यक्तिगत तौर पर बहुत से सन्देह मेरे दिमाग में भी किन्तु मैं सरकार के नजरिये और निर्णय का पुरजोर समर्थन करता हूँ।

दिल्ली की रगों में हैं बहती सियासत .......

दिल्ली की रगों में हैं बहती सियासत।
तो कैसे वो समझेगी लोगों जरूरत।।

वजीरों की बस्ती में रहता रसूख है।
पैदल की होती है ना कोई रियासत।।
                           -Vikram

कभी दीवार की दरारों में लिखा देखा......

इश्तिहारों में लिखा देखा
अखबारो में लिखा देखा
मजबूती का दावा
घर के किवारों में लिखा देखा
रंगीनियत का दावा
बहारों में लिखा देखा
खूबसूरती का दावा
नज़ारों में लिखा देखा
गर्मजोशी का दावा
अंगारों में लिखा देखा
जगमगाने का दावा
सितारों में लिखा देखा
अहसासों का दावा
इश्तिहारों में लिखा देखा।
हुकूमत का हक़
दरबारों में लिखा देखा
ये सब इंसान के साथी होते है
पद और प्रभाव के बाराती होते है।
मन के बदलाव की साथ ही
बदलती है इनकी फितरत
सच कभी इंसान के दिल पे
कभी दीवार की दरारों में लिखा
होते समझौते और करारों में लिखा देखा
सब के सब दावों कभी ना खरा देखा।
कभी ना खरा देखा।।

वहीें तो आसमानों में भी उड़ा होगा।

जो दूर तक जमीन पर चला होगा 
वहीें तो आसमानों में भी उड़ा होगा।

रही होगी गर्दो गुबार सहने की ताकत 
तभी तो जमकर तूफानों में खड़ा होगा।
                                   -विक्रम 


मुद्दा: सम्माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय के नाम एक प्रार्थना पत्र ............

सम्माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
 
विषय: "मुम्बई हिट एंड रन" केस में मुख्य गवाह "रवीन्द्र पाटिल" के साथ हुये अन्याय का सच सामने लाने हेतु !!

महोदय बड़े दिनों से मन में विचार आ रहा था की आपको पत्र लिखूँ। पत्र लिखने के कुछ कारण है और उसके निवारण की तलाश है। खैर आपको बताता चलूँ की मैं एक जनसाधारण हूँ। उसी संघीय ढाँचे का जनसाधारण जिसके मुख्य न्यायाधीश, दण्डाधिकारी आप है। भारत सरकार और उससे जुड़े संस्थान आयकर वसूली के समय ही हमे आदेश देते है। मतदान के समय अनुरोध भी करते है बस उससे ज्यादा कुछ और नहीं........ हाँ मुझे और मेरे जैसो को देश की दशा और दिशा के चिन्ता है। ये कभी-कभी बढ़ जाती है जैसे कि..........

पिछले दिनों के अखबार में पढ़ा कि मुम्बई कि "हिट एंड रन" केस में सलमान खान "सबूतों के आभाव में बरी"  हो गये और आज के अखबार से सूचना मिली कि  वो भूतपूर्व नाबालिग "अफरोज" "कानून के अभाव में" रिहा हो गया। सलमान के मामलें में सत्र न्यायलय में लगभग 13 वर्ष तक सुनवाई हुयी। सजा भी हुयी। फिर अचानक एक दिन पता लगा कि "सबूतों का आभाव हो गया"!!!! मैं समझ ही नहीं पाया की भला ऐसा क्यों हुआ? मैं और पूरा देश ये सुनता और पढ़ता आया था कि इस मामले में मृतक के आलावा तीन घायल और मुम्बई पुलिस का एक हवलदार चश्मदीद थे। फिर अचनाक सबूतों का आभाव और न्याय का पराभाव क्यूँ हुआ, कैसे हुआ?

फिर मुझे अचानक सत्येन्द्र दुबे जी याद आ गये। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना वाले सत्येन्द्र दुबे। पिछले बरस "The Hindu" नाम के अखबार में छपी छपी खबर ने सत्येन्द्र दुबे को "सच का सिपाही बताया" बताया की वो भ्रस्टाचार की लड़ाई में शहीद हुये मैंने उस समय भी लिखा था "http://bulbula.blogspot.in/2014/02/blog-post_23.html" पर दूसरे ही पल मुझे ये भी ध्यान आया की अदालत ने दशकों तक चली न्यायिक लड़ाई के बाद ये कहा था कि "सत्येन्द्र दुबे को भोर के लुटेरों ने मारा" कुल मिलाकर बहुत देर ये सोचता रहा कि जिसे देश शहीद मानता है। मीडिया शहीद मानता हैं। भला क्या कारण हो सकते है कि उसे न्यायलय महज एक लूट की घटना का शिकार मानती है??? तीनो मामलात में बस एक बात समान की देश के लोगों जो मानते है अदालत का मानना उससे अलग है !!!

"हिट एंड रन" केस का मामला दर्ज कराने वाले "रवीन्द्र पाटिल" को न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते ना जाने क्या हो गया? किसी को पता नहीं!!! 5 सालों में एक नौजवान पुलिस वाला पहले होते -होते खत्म हो गया!!ना जाने क्यूँ ? मरते मरते भी कुछ बोलता रहा। क्या हम सबने सुना नहीं? ना जाने क्यूँ ? रवीन्द्र पाटिल को मुम्बई पुलिस ने सस्पेंड भी कर दिया और न्यायलय के गिरफ्तार भी !!!!!!! ना जाने क्यूँ हुआ ये सब?? महोदय क्या न्यायालय और कानून से जुड़े लोगों की ये नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती थी की रवीन्द्र पाटिल के मुद्दे पर हर ना जाने क्यूँ का जवाब खोजती? क्यूँ ख़त्म हुआ वो नौजवान इसकी जाँच भी करती। मामले का मुख्य गवाह होने के नाते रवीन्द्र का मामला इसी मुक़दमे का हिस्सा बनता। इतना सब होता रहा  सलमान खान बेल पर घुमते रहे। क्या व्यक्तिगत तौर पर आपको नहीं लगता की जमानत पर छूटे सलमान मुक़दमे और गवाहों  प्रभावित कर सकते थे ?

13 साल में एक निपट गया और कुछ की गरीबी बिक गयी। बिकनी है थी!!! महोदय  13 बरस न्याय की लड़ाई लड़ने वाला आदमी अन्त में केवल समझौताकर सकता है बिक सकता है टूट सकता है। खैर क्या मान लिया जय की न्याय हो गया!!! न्याय मिल गया। खासकर रवीन्द्र पाटिल को !!!!!! ये अजीब बात है की जिस सचको सारा देश जनता है अदालतें उस सच को स्वीकार करती। ऐसा क्यूँ ? क्या सच में कानून अँधा है? महोदय के मुद्दे पर देश की निगाहें गड़ी रही। सबने देखा जो हुआ। "जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड" की बात को आधार बनाये तो अन्याय हुआ सभी के साथ।  इस मामले में और हज़ारों मामलात में ऐसा ही होता है। इस मामले की अन्त देखकर कोई किसी हादसें का गवाह बनना चाहेगा ? न्याय की आवाज़ उठायेगा??? क्या ये मामला उन हज़रो लोगो को हतोत्साहित नहीं करता जो किसी ना  किसी रूप से अन्य मुक़दमे में जुड़े है। क्या ये मामला ये नहीं दर्शाता की भारत की कानून और नये व्यवस्था में भरोसा रखने की बात करने वाले लोग सिर्फ छलावा करते है।

महोदय करबद्ध निवेदन है कि "हिट एंड रन" केस में "रवीन्द्र पाटिल" के साथ हुये अन्याय का सच सामने आना चाहिये। अनुरोध है कि आप " Suo Moto cognizance" ले। ये जरूरी की लोगों को पता चले कानून सब के लिये बराबर होता है, बिकाऊ नहीं , न्याय हमारा हक़ है मौलिक अधिकार इसके लिये यदि किसी को वर्षो तक थका देने वाली लड़ाई लड़नी पड़े तो अन्याय है।  भारत के सम्विधान  आत्मा के अनुरूप नहीं है।

- विक्रम प्रताप सिंह सचान 
साभार:http://indianexpress.com

मुद्दा:राजनीति पैसे की हो गयी, राजनीति पैसे से हो गयी।

देश की राजनीति में जन्मे नये पुराने नेताओं की घोषित सम्पत्तियों का ब्योरा भी दाँतों तले अँगुलियाँ दबा लेने के लिये मजबूर करने वाला है। जितना अखबारों में पढ़ा उस आधार पर याद आता है कि मायावती,मुलायम,चण्डीगढ़ के पूर्व साँसद पवन बंसल, हिमांचल के मुख्यमन्त्री वीरभद्र, समूचा गाँधी परिवार, रॉबर्ट बाड्रा और  भारत सरकार के वित्त मन्त्री जेटली की सम्प्पतियाँ चन्द वर्षो में कई गुना बढ़ गयी। सनद रहे की बात केवल घोषित सम्पत्तियों की हो रही है।   ....... अब चुनाव के दौरान सम्प्पतियाँ घोषित करने से कम से कम ये तो पता चल जाता है कि किसके पास कितना है। किन्तु ये अब भी राज की बात है कि इस सम्पत्तियों का श्रोत क्या है??? लिहाजा ये जरूरी हो चला है कि घोषित सम्पत्ति के अर्जन का श्रोत भी पता चले। ये पता चले की वो कौन सा फार्मूला है जिसके सहारे सम्प्पतियाँ गुणोत्तर बढ़ती है।

ये दबा कुचला सत्य है कि अघोषित सम्पत्तियाँ भी होती है। जो घोषित से ज्यादा ही होती होगी। यूँ तो अरबों का हेर फेर करने वाला "यादव सिंह" भी अपनी सम्पत्तियाँ कुछ करोड़ों में बताता है। ये भी एक कड़वा सत्य है की अधिकतर अमीर राजनेताओं की सम्पत्तियाँ आय से ज्यादा होती है। माया,मुलायम और वीरभद्र पर मुक़दमे भी चल चुके है।  .......... चलते चलते इन मुकदमों ने डैम भी तोड़ दिया। सच गुजरे गवाही की मानिन्द थका हरा और निराश कुनबे में दुबका बैठा है!!! राजनीति देशसेवा के मिशन का रास्ता भटककर बैंक बैलेंस बनाने के रास्ते निकली। राजनीति पैसे की हो गयी, राजनीति पैसे से हो गयी। गाँव की प्रधानी का चुनाव भी लोग अब स्कार्पियो खरीदने के लिये लड़ते है। उसी स्कार्पियो के नीचे विकास सालों तक कुचला जाता है। CBI केजरीवाल के दफ्तर पर छापा मारे उनके सचिव को धरे, जेटली आरोपों की सफाई देते घूमे ये मात्र एक छलावा है ये मात्र दिखावा है।  हमाम में सब नंगे है। CBI आउट इनकम टैक्स वाले तो हथियार है। जिसके सर पर मुकुट हुआ वही तरकश से निकालकर धनुर्धर होने का दम भरने लगता है।

खुशियाँ आती है किलकारियों सी......

जिन्दगी तूँ है उसी की
जिसे जीने का सलीका आता है
खुशियाँ आती है किलकारियों सी
मातम अर्थी सा चला जाता है।
ना मजा है जिद में ना अहम् में
मजा तो बस इंसानियत में आता है
तमाम परेशानियाँ पल में हवा होती है
जब दुधमुँहा घर में मुस्कराता है।
-विक्रम

दिल्ली का प्रदूषण: precaution is better than cure

Court, सरकार और एनवायरनमेंट रेगुलेटर NGT सभी एक साथ जाग उठे। सब दिल्ली को सही करने पर उतारू हैं। हवाओं में घुलता जहर सब को अखर रहा है। इस दौर में कई नये फरमान भी जारी हुये। जैसे odd  और even नम्बर की गाड़ियाँ alternate days पर चलाने की बात है। जैसे डीज़ल की गाड़ियों पर प्रतिबन्ध लगाने की बात है। NGT द्वारा कई रिहायशी projects स्थगित कर देने की बात है। ये सभी घटनाये कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रतिक्रियावादी होने की बात को पुख्ता करते है। कमोवेश Newton के नियमों को जीवन्त करते है। ये प्रतिक्रियावाद का दर्शनशास्त्र है कि अचानक व्यवस्था परिवर्तन कर देने का की बात होती है। ऐसा माहौल बनता है की रातों-रात दीन दुनिया बदल जायेगी। सभ्यता बदल जायेगी, लोग बदल जायेगे और शहर एक नये शहर में बदल जायेगा। अक्सर प्रतिक्रियावाद short term measures लेने के लिये प्रेरित करता है। वही हो रहा है। अचनाक साइकिल पर चलने की बात हो रही है। carpool की बात हो रही है। ये जरूरी है किन्तु क्या ये कल्पना जमीन पर उतर सकती है? शायद नहीं!!!

जैसा की कहावत है "precaution is better than cure" उसी तर्ज पर चला जाये तो बेहतर। यदि अभी तक नहीं चले तो आगे चल सकेंगे इसके लिये प्रयास जरूरी है। अचानक हो हल्ला भी बस एक नए प्रदूषण को बढ़ाता है। यूँ तो हर शहर में प्रदूषण नियन्त्रण board है। किन्तु धरातल पर सब क्या है? आँकड़ो से खेलने वाले संस्थान!!! किसी शहर में गाड़ी चलने हेतु, फैक्ट्री लगाने हेतु, बिल्डर द्वारा घर बनाने हेतु प्रदूषण विभाग से NOC लेनी होती है। विडम्बना ये है की प्रमाणपत्र जारी तो होते है किन्तु प्रदूषण जस का जस बना रहता है, बढ़ता रहता है। फिर अचानक एक दिन सुरसा की भाँति मुह खोलकर लोगो को निगलने के लिये तैयार हो जाता है। कुल मिलाकर दिल्ली एक सबक है। इस सबक को अन्य शहरों में अभी से लागू किया जाना चाहिये। प्रदूषण नियन्त्रण के रेगुलेटर को सक्रियता से कम करने की सीख सरकार और कोर्ट दोनों को दी जानी चाहिये।

सबके सब मिलकर दिल्ली का रोना रोये उससे बेहतर है कि उन सभी शहरों की पहचान की जाये जहाँ भविष्य में प्रदूषण बढ़ने के आसार है। अभी से इसके लिये कदम उठाये जाये। शहर में साइकिल के चलन को बढ़ावा देने के प्रयास होने चाहिये, जो तभी सम्भव है जब साइकिल और रिक्शा के लिये अलग पथ बनाये जाये। साइकिल से चलने का मुद्दा सीधा सीधा सुरक्षा से जुड़ा है। सड़क सुरक्षा और दूसरी चोरो और लुटेरो से सुरक्षा। चार लोग शपथ लेकर दो दिन साइकिल से चले उससे बेहतर है की वृहद स्तर पर इसके लिये सुरक्षा के इंतजामात हो।  यही एक बेहतर और स्वाथ्य कल के लिए जरूरी है।

फिर पछताय होत का जब चिड़िया चुग जाये खेत !!!

सरकार में कुशल रणनीतिकारों की कमी साफ़ है। हर छोटी बड़ी लड़ाई अहम की लड़ाई बन जाती है।  खामियाज़ा भुगतना पड़ता है। मोदी सरकार को!! मोदी सरकार अच्छा काम कर जरूर रहे है।  किन्तु मुद्दो पर राह बेहद घिसा पिटा है। जैसे रेलवे ने कल जो कार्यवाही शकूरबस्ती से शुरू की वो किसी भी अन्य प्रदेश से शुरू की जा सकती थी। हर शहर ने रेलवे ट्रैक के अस्स पास कब्जे है।  बाद में दिल्ली भी इसके दायरे में आता और यहाँ भी कार्यवाही हो जाती। किन्तु बजाय इसके टकराव का रास्ता चुनना मँझे हुये नेताओं की तरफ से एक अपरिपक्व तरीका है। कुल मिलाकर टकराव के रास्ते में गम ही गम है।

CBI राजेन्द्र कुमार से पहले अनिल यादव के छापा मारती भ्रष्टाचार के मामलों में लंबित अन्य लोगो पर लगाम कसती तो बेहतर था।  जैसे  कि "यादव सिंह" के यहाँ समय रहते छापा मारा होता। जाहिर है अधिकतर बड़े बाबुओं पर कोई ना कोई मामला तो होता ही है। अन्य पर लगाम कसते और फिर राजेन्द्र सिंह पर तो बेहतर होता किन्तु ऐसा करने की जगह पर अहम को तवज्जो देना बेहद खतरनाक है।  ....... फिर पछताय होत का जब चिड़िया चुग जाये खेत !!!  बिहार में चिड़िया चुग चुकी है। गुजरात ने हार्दिक चुग चूका है खेत।

एक सेर ......

एक सेर ......
मालिक नींद की गोलियाँ लेकर भी जागता है रात भर
और नौकर सो जाता है बस यूँ ही चादर तानकर।
 -विक्रम 

मुद्दा: वो साजिशें करके अपराध से बरी हो गया

भाईजान की रिहाई, कानून के गर्भ में पलते 13 वर्षीय बच्चे का,न्यायपालिका द्वारा किये गये गर्भपात के समान है। गुस्ताख रवीन्द्र पाटिल रोता होगा कहीं यमलोक में ...... भावनायें व्यक्त है गौर फरमायें।

वो साजिशें करके अपराध से बरी हो गया
पहले एक नम्बरी था अब दस नम्बरी हो गया।

सबूत, गवाह और सच, है बन्द ताबूतों में
अर्थी काँधों पे उठाये वो भी शमसान तक गया।

वो पागल खानों में कराता इलाज़ फिरता है
जब से न्याय कानून के दरवाजों तक गया।

सोचता हूँ कर ही दूँ अपनी आँखें दान विक्रम
देख ले दुनिया वो कानून भी जो अन्धा हो गया।

-विक्रम

विचार: कार चलने से रोकने की जगह बैटरी ऑपरेटेड कारों पर ध्यान दे सरकार ..........

बीते दिनों दो पर्यावरण संरक्षण हेतु दो बड़ी घोषणायें हुयी और कुछ प्रयोग भी। प्रधानमन्त्री जी ने कार्बन उत्सर्जन कम करने का वादा विश्व से कर दिया। दूसरी ओर दिल्ली में सम (Even) विषम (Odd) नम्बर वाली कारों को हफ्ते में केवल alternate डे पर घर ही चला सकेंगे। कुछ दिनों पहले हरियाणा के गुडगाँव में उसके बाद दिल्ली के कुछ हलकों में कार फ्री डे भी मनाया गया। परिणाम आशा अनुरूप नज़र आये। कुल मिलाकर प्रयोग या घोषणाओं के तौर पर जो भी संकेत मिले है पहलेपहल वो सही दिशा में मालूम पड़ते है, किन्तु ये भी जाहिर है की जनमानस में भी चिंताए बढ़ी है। ये साफ़ करती है कि इस मुद्दे पर और अधिक चिन्तन और मनन की आवश्यकता है। विशेषज्ञों को साथ लेने की आवश्यकता है।

कारों को प्रतिबन्ध लगाना काम समयावधि के लिये एक अच्छी कोशिश जरूर हो सकती है। किन्तु दूरदर्शी नहीं लगती। सवाल उठेंगे कि जब कारों पर प्रतिबन्ध लगेंगे क्या सरकार पर्याप्त सुरक्षा के साथ पब्लिक ट्रांसपोर्ट देने की स्थिति में है कि नहीं? सरकार ने इस ओर क्या कदम बढ़ाये है? रोज चलने वाली कारों की सँख्या सडको काम जरूर होगी  किन्तु सड़क पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाले वाहनो की सँख्या तो बढ़ानी ही पड़ेगी। समाज के कुछ जागरूक लोग सरकार के फैसले के विरोध में अदालत भी जा सकते है। आखिर कार खरीदते हुये भरी भरकम टैक्स लिये जाते है। वैल्यू एडेड टैक्स से लेकर रोड टैक्स तक। अगर गाड़ी आधे दिन सड़क पर चलेगी तो क्या आधा टैक्स सरकार को वापस नहीं कर देना चाहिये?? कुल मिलाकर दूरगामी लक्ष्यों को साधना होगा।

लिहाजा, ये जरूरी हो चला है की सरकार गैर-परम्परागत ऊर्जा श्रोतो के इस्तेमाल पर जोर दे। जिसमें सौर ऊर्जा एक महती भूमिका निभा सकती है। प्रचुर मात्रा में उपलब्धता भी इसका मुख्य कारण है। बीते कुछ वर्षो में सौर ऊर्जा और विधुत से चालित वाहनो की सँख्या में इजाफा हुआ है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार ने शहरों में और ग्रामीण क्षेत्रों में मार्ग प्रकाश हेतु जिस गति से टेंडर निकाले है , जिस गति से दिन के प्रकाश का इस्तेमाल रात में करने की सोच को आगे बढ़ाया है वो उत्साहित करती है। प्रधानमन्त्री जी ने ये भी भारत में सौर ऊर्जा के उपयोग का प्रतिवर्ष गुणोत्तर दर से करने का विज़न सामने रखा और उसके लिये गम्भीर प्रयास भी किये। इस सब को देखते हुये बैटरीचालित( battery operated ) कारों को बढ़ावा देना प्रदूषण से लड़ने का एक महत्त्वपूर्ण उपचार बन सकता है।

जब बैटरी चालित वाहनों के इस्तेमाल की बात आती है तो अगला विषय होता है सौर ऊर्जा का संरक्षण। इसके लिये उपयोग में आने वाली बैटरी और की बात आती है। बेहतर बैटरी बेहतर ही कारों को ज्यादा दूर तक चलने में मदद कर सकती है। बीते सालो सौर ऊर्जा को इकठ्ठा करने की एफिशिएंसी बढ़ी है। जुड़े  हुये पूरे के पूरे हार्डवेयर की लागत में भी भरी कमी आई है। जिससे आम-जनमानस की पहुँच सौर ऊर्जा के उपकरणों तक बढ़ी है। ऊर्जा को इकठ्ठा करने वाली बैटरी के भी कम जगह घेरते हुये अधिक ऊर्जा इकट्ठी करने की तकनीति के साथ आई है। हम LED -ACID जैसी बैटरी से निकल कर LI-ION बैटरी का इस्तेमाल हुआ है। मोबाइल में इसका भरपूर इस्तेमाल हुआ है। समय के साथ LI-ION बैटरी की तकनीति भी सुधरी है। बैटरी की नयी तकनीकि जैसे Nikil-Cobalt बैटरी, Solid-State बैटरी पर भी काम काफी आगे बढ़ चुका है।
बैटरी पॉवर्ड कार साभार :https://www.google.co.in/?gws_rd=ssl#q=reva+car


जरूरी हो चला है की हमारी सरकार भी इस क्षेत्र में अन्वेषण( Research) के ध्यान दे। हम "मेक इन इंडिया" जैसे प्रयासों में इस क्षेत्र में खोज को बढ़ावा दे। बैटरी चलित कारों को बढ़ावा देने के लिये लगने वाले टैक्स को काम करें सम्भव हो तो सब्सिडी पर विचार करे। यदि एक अभियन्ता के दृष्टिकोण से कहूँ तो मार्केट में बिकने वाले किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सामान की कीमत उसके खरीदार कितने है इस पर निर्भर करती है। अधिक मात्रा में उत्पादन ना केवल दाम काम करता है बल्कि उस क्षेत्र में नयी खोजो को बढ़ती गुणवत्ता को भी जन्म देता है। सो जरूरी है दूरगामी प्रयास किये जाय। मार्ग प्रकाश( Road Light ) और गाड़ियों दोनों में सौर ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल हो। कार्बन उत्सर्जन रोकने में भारत अग्रणी हो, इस क्षेत्र से जुड़े सभी विषयों पर उसके उपयोग में हम सबसे आगे निकले। सारा संसार हमसे सीखे, हमारा उदहारण दे। LED लाइटिंग के क्षेत्र में "Make In India" कुछ ऐसा ही प्रभाव दिखा है।

रामखिलावन लड़े प्रधानी.........

अबकि अच्छी बारिश आयी
रामखिलावन ने मस्त फसल उगायी
और बेच-बाच के करी कमायी
जेब गर्म थी, दिमाग भी गरमाया
दोस्तों ने उसको समझाया
देखो चुनाव का मौसम आया
करोड़पति बनने का रास्ता बतलाया
प्रधानी में नामांकन करवाया
रामखिलावन लड़े प्रधानी
ओढ़े फिरते चादर धानी
हाथ जोड़ फ़ोटो खिंचवाये
जगह-जगह पोस्टर चिपकाये
मुर्गा काटा दारू पिलवायी
नब्ज लोगों की समझ ना पायी
हुआ मतदान और परिणाम जब आया
राम खिलावन ने धक्का खाया
उधार वापसी के आये तगादे
रामखिलावन बोले राधे-राधे
खेत बिका बिका खलिहान
बचा खुचा गया सम्मान

संस्मरण: कानपुर में दंगे का दर्द समझ आया

.....1995 के आस पास की बात है। कनपुरिया भोकाल काला बच्चा को तड़के निपटा दिया गया। मुस्लिमों ने निपटाया ....पुरानी हिन्दू मुस्लिम रंजिश के चलते। बाबूपुरवा के हिन्दू बाहुबली की हत्या की खबर आग की तरह फ़ैल गयी। फिजाओं में तनाव पसर गया ..... दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरे और उसी तेजी से शहर की सडको पर खून भी .....DM ने कर्फ्यू की घोषणा कर दी। पुलिस और अर्धसैनिक बल गस्त करने लगे।

पर बच्चों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी..... अनिश्चित कालीन अवकाश .... खूब बैडमिंटन चटका .. चिड़िया खत्म होते ही बैट बाल चटका .... रंगारंग कार्यक्रमों की मानिन्द जीवन मस्ती से भर गया। हमारी तरफ पुलिस वाले कम ही आते थे और वैसे भी सुना था की सेना वाले बच्चों को कुछ नहीं बोलते सो निडर निर्भीक खेल प्रयियोगिताये चलती रही .....सुना था की एक अंकल ऑन्टी स्कूटर से बैठ बाईपास के दूसरी ओर निकल गये थे। सेना ने धर लिया अंकल को मुर्गा बना दिया कुकड़ूकू बुलवाया और ऑन्टी से ताली बजवाई। ..... इस घटना के बाद घूमने के शौक़ीन घरों में दुबक गये थे।

एक रोज दनदनाते हुये एक खबर आ धमकी पडोसी सूरज नारायण पाण्डेय जी   बदहवास दरवाजा खटकाये जाते थे। दरवाजा खोला तो लगा नाको चने चबाकर आये हो .....बोले पापा से बोले वकील साहब हरी मस्जिद में 2000 हथियार बन्द मुस्लिम आ गये है। आप ही बचा सकते हो ..... बन्दूक निकालों हम लोग आप के घर ही रुकेंगे ..... पापा ने धीरज बंधवाया बोले अमा यहाँ कहाँ से 2 हज़ार लोग आ जायेगे सेना लगी हुयी है .... और आ भी गये तो एक बन्दूक से क्या हो लेगा ..... तब तक एक पडोसी और आ धमके .... उनका भी यही तर्क था खैर बन्दूक निकाली गयी और लोड करके,कुछ ईंट, कुछ पत्थरो के साथ छत पर जा बैठे .... उस रात हमारी बन्दूक कुछ पड़ोसियों जे लिये बीरबल की खिचड़ी वाले दीये जैसी थी...... आशंकित बातों ...डर और मच्छरों के कहर से रात आँखों आँखों में कट गयी। ........ सुबह सवेरे ... अख़बार से पता चला की हरी मस्जिद में कुछ 300  मुस्लिम जान बचाने के लिये छुपे बैठे थे....... रात के समय उन्हें हमले की आशंका हुई और डर के चलते उन्होंने एक को निपटा दिया।........ उस रात साड़ी मस्ती निकल गयी .... दंगे का दर्द और डर दोनों समझ आ गये.....

जिन्दगी ऊँची इमारतों में , खिड़कियों से झाँकती है कभी कभी.....

जिन्दगी ऊँची इमारतों में 
खिड़कियों से झाँकती है कभी-कभी।

वापस जमीन पर चलने को
रास्ते तलाशती है कभी- कभी।

सूरज यूँ तो करता है उजाला बहुत 
जिन्दगी अँधेरो में नज़र आती है कभी-कभी ।

ऊँचाईयाँ अक्सर बन्दिशों के साथ होती है
घुट-घुट के जीते है अरमान कभी- कभी।

विचार: कुत्ते की मौत ............

बचपन में गाँव में पडोसी के घर डकैतो का हमला हुआ। उनको चुनौती देने के उद्देश्य से एक ग्रामवासी ने फायरिंग की जैसे ही फायरिंग की आवाज़ गूँजी, डाकू जोर से चिल्लाये "अबे लोहा सिंह बच्चों के खिलौने से खेलना बन्द कर नहीं तो कुत्ते की मौत मारा जायेगा", स्कूल कॉलेज के दिनों में जब कई बार विवाद की स्थिति आयी तो बतेलोबाजी में "कुत्ते की तरह मारे जाओगे", "कुत्ते की मौत मार दूँगा" टाइप के वाक्य प्रयोग अधिकाधिक होते रहे। फिल्मों में धर्मेन्द्र कुत्तो का खून पीने का इरादा जाहिर करते हुये पाये गये और भी अन्य आदमी को कुत्तों के मानिन्द कूटने की धमकियाँ देते मिले। मैं अक्सर सोचता की अरे भाई ये कुत्ते की मौत क्या है? आदमी को कुत्ता कहने के क्या मायने? व्यवहारिक जवाब कभी नहीं मिला।  

वैसे कुत्ता पाये जाने वाले जीव-जन्तुओ में सबसे वफादार प्राणी है। प्रेमचन्द जी की कहानी " पूस की रात" में हल्कू के कुत्ते का चरित्र बेहद दमदार और वफादार किरदार है। ग्रामीण परिवेश में रात्रिपहर में कुत्ते इंसानो की रक्षा के लिये आगे खड़े नज़र आते है । घर का पालतू कुत्ता घर के सदस्य की तरह अहमियत रखता है। अमूमन ये सब देशी कुत्ते हुआ करते है। विदेशी नस्ल के कुत्ते सहरी जीवन में लोगो के घरों के रक्षक, और एकाँकीपण दूर करने के साधन है। साहित्य में श्लोकों में कुत्ते की तरह सोने का उद्धरण दिया जाता है। " .... काक चेष्टा, वको ध्यानम्, श्वान निद्रा ....... एक आदर्श विद्यार्थी के लक्षणों में आते है। कुल मिलकर हमारे समाज में कुत्ते बेहद की विश्वसनीय और परिवार के सदस्य के रूप में जाता है।

किन्तु फिर भी  "कुत्ते की तरह पीटने", "कुत्ते की मौत मारने", कुत्ता होने के वाक्य प्रयोग लड़ाई के समय होने वाले शास्त्रार्थ में ना जाने क्यों प्रयोग किये जाते है। कई बार इस बारे में गम्भीरता से सोचा और पाया की कभी इस बात का समुचित जवाब सका। आज से करीब तीन वर्ष पहले जब मैं चण्डीगढ़ से कानपुर की यात्रा पर अपने व्यक्तिगत वहां से निकला उस दिन मुझे इस सवाल का जवाब एक हद तक मिला। NH24 , NH-1 , फिर यमुना एक्सप्रेसवे, और फिर NH2 पर इलाहाबाद तक यात्रा लगभग 1700 किलोमीटर की यात्रा के दौरान रास्तों कई जगह नज़र सड़क पर टिकी रह गयी। जब रास्ते में सैकड़ो जगह कुत्ते पोस्टर की तरह सड़क पर छपे नज़र आये। वाहन दर वाहन कुत्तों के ऊपर से अविरत निकलते रहे। कुत्ते की लाश सड़कों पर बिखरती चली गयी। यही कुत्ते की मौत थी शायद !!!! यही वजह है शायद जो उन जुमलों को जन्म देता है। जो हकीकत में क्रूर है। कुत्ते मतलब वो प्रजाति जिनको जब चाहों इस्तेमाल कर लो जब चाहे टरका दो। अन्तिम क्रिया करने हेतु ना जमीन की आवश्कयता ना आग की न ही परिजनों की। कुत्ता वाकई कुत्ते की मौत मरता है।

साभार:http://petattack.com/top-indian-breeds-pet/
सच पूछों तो कुत्ता मरता भले कुत्ते की मौत कहीं ना कहीं इंसानो से बेहतर होता है। जिसका होता है उसका होता है। पाला बदलने की आदत नहीं होती इनको। खैर ये लिखते-लिखते एक वाक्या याद आ गया। कुत्तों के सम्मान से जुड़ा है लिहाजा जिक्र लाजिमी है। एक बार दफ्तर जाते हुये सड़क पर एक कुत्ते को घायल अवस्था में देखा, दफ्तर पहुँचकर, अपने सहकर्मी और करीबी मित्र "कनिष्का सिंह" से इस बात का जिक्र कर दिया। मेरी बात सुनकर वो व्याकुल हो उठे, उनकी नज़रे मुझसे सवाल पूछने लगी, आपने कुछ किया क्यों नहीं? उस घायल कुत्ते के लिये? मैंने इस सवाल की कल्पना तक ना की थी। कहिर "कनिष्का" ने घायल कुत्ते के एक्सॅक्ट लोकेशन पूछी और बगैर कुछ बोले दफ्तर से निकल गये। करीब 1.5 घण्टे भर बाद वापस लौटे। संतुष्टि की भावना के साथ, बोले मैंने उस कुत्ते डॉक्टर के पास पहुँचा दिया, उसकी मरहम पट्टी करा दी। उन्होंने मुझे बताया की वो एक सँस्था से जुड़े है।"people for animal" जिसकी सर्वेसर्वा मेनका गाँधी जी है, और वो डॉक्टर भी इस सँस्था के सदस्य है। इलाज़ के बाद कुत्ते को उचित जगह पहुँचा दिया गया। "कनिष्का की सम्वेदनाओं को देखकर मुझे खुशी भी हुयी" अपने कुछ ना  करने पर ग्लानि भी। खैर कुछ लोग है जो "कुत्ते की मौत के" जुमले को झुठलाने का दुष्कर कार्य करने से भी पीछे नहीं हटते। आपको भी कभी जरूरत महसूस हो तो सम्पर्क कर सकते है।
http://www.peopleforanimalsindia.org/contactus.php


    

यमुना एक्सप्रेसवे: दुर्घटनाओं का कारण और निवारण

यमुना एक्सप्रेसवे आगरा और नोयडा के बीच सीमलेस कनेक्टिविटी के उद्देश्य के साथ बनाया गया। यात्रा करने वाले लोगों का समय और सुविधा दोनों बढे। किन्तु इन सब के बीच दुर्घटनाये भी बढ़ी। उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से रफ़्तार बढ़ी। नोयडा के जागरण के प्रकाशित एक खबर को आधार बनाया जाय तो यमुना एक्सप्रेसवे में रोज औसतन दो दुर्घटनाये होती है। जाहिर है दुर्घटना का मूलकारण तेज रफ़्तार है। ये भी दीगर है की एक्सप्रेसवे पर होने वाली कोई भी दुर्घटना शायद ही जान लिये बगैर नहीं जाती। इस महीने के गुजरे दिनों में कई छोटे और बड़े हादसे हुये और दर्जनों को असमय काल-कलवित कर दिया। 

बढ़ती दुर्घटनाओं के मद्देनज़र यमुना एक्सप्रेसवे के विकास प्राधिकरण ने कई कदम उठाये किन्तु वो ज्यादा कारगर साबित नहीं हुये। इस बीच ये जरूरी हो चलता है की दुर्घटना के कारणों का पुनः मुआयना किया जाय और कारगर कदम उठाये जाय। यमुना एक्सप्रेसवे के दुर्घटनाओं की खबर पढ़कर और एक्सप्रेसवे पर ड्राइवर करने के अनुभव तथा यमुना विकास प्राधिकरण द्वारा उठाये गये कदमो को आधार बना कर ये दुर्घटनाओं के कारणों बड़ी आसानी से समझा जा सकता है।

यमुना एक्सप्रेसवे का बहुतायत भाग सीमेंट का उपयोग करके बनाया गया है। सीमेन्ट से बने रोड गाड़ी चलाने के लिये आदर्श नहीं होते और कंक्रीट की रोड की अपेक्षा टायर्स में अधिक घर्षण पैदा करते है। जो टायर्स को उत्तरोत्तर गर्म करने के लिये काफी होता है। अधिकतर दुर्घटनाओं में ये देखा जाता है कि दुर्घटना टायर फट जाने के कारण नियन्त्रण हो देने से होती है। ऐसे अनियन्त्रित वाहन बगल में चल रहे वाहनो को भी दुर्घटनाग्रस्त कर देते है। कुल मिला कर टायर में हवा का अधिक प्रेशर और घिसे हुये टायर दुर्घटना को दावत देने के लिये काफी है। यमुना एक्सप्रेसवे के सफ़ेद सीमेंटेड रोड पर, टायर फटने के बाद से ब्रेक लगने और गाड़ी के रुकने तक के बीच सड़क और टायर के बीच घर्षण के कारण बने निशान आड़े तिरछे निशान, इस बात की गवाही देते है की चालक ने गाडी को नियन्त्रित करने का भरपूर प्रयास किया होगा । किन्तु हर कोई भाग्यशाली नहीं होता। अधिक स्पीड में चलने और टायर्स के फटने की दास्तान कहते है ये निशान । हर बार बारिश से एक हद तक धुल जाते है किन्तु बारिश के बाद फिर अंकित होते है। कई जगह खून के निशान भी एक्सप्रेसवे के कातिलाना अन्दाज़ की गवाही देते है।

यमुना एक्सप्रेसवे पर ड्राइव करके आये कई लोगों से जब भी बात हुयी। अधिक से अधिक लोगों ने अधिक स्पीड में चलती अपनी गाड़ी की परफॉरमेंस और उससे होने वाले चिलिंग अनुभव के बारे में बताया। कई लोगों का ये भी कहना था की यमुना एक्सप्रेसवे में रफ़्तार की लिमिट 120-130 KM/HR है। यही कारण है की वो तेज रफ़्तार चलते है। जाहिर है की कई बार लोग अधिकतर स्पीड के पैमाने को जानबूझ कर अनदेखा कर देते है। तभी तो जहाँ १०० KM \HR की अधिकतम रफ़्तार है वहाँ 140 -150 चेतक की भाँति हवा से बाते करते हुये दौड़ा जाता है। ये दीगर है की सुरक्षा के लिहाज से भारत में चौपहिया वाहन बेहद निचले स्तर के होते है। यूरोप और अमेरिका में जिस तरह के सुरक्षा मानक गाड़ियों में होते है उनकी कल्पना भी भारत में नहीं कर सकते किन्तु रफ़्तार हम भी वही चाहते है चलाते है जो बाहरी देशों में है। कुल मिलाकर मजे या फिर अनजाने में अधिक रफ़्तार सुरक्षा मानकों पर खरे न उतरने वाले वाहनों में केवल और केवल दुर्घटना को दावत देती है 
फोटो: www.bulbula.blogspot.com: यथार्थ

यमुना एक्सप्रेसवे में एक ख़राब खड़े वाहन को दूसरा वाहन टक्कर मार गया ऐसा बहुतायत होता है। जाहिर है की चालक अमूमन एक्सप्रेसवे पर लिखे निर्देशों का पालन नहीं करते है। ख़राब वाहन को पार्क करने के लिये बने अंतिम लेन( जो कच्ची है ) पर रोकने की बजाय तीसरी या चौथी लेन पर रोक लेते है। घुमावदार जगहों पर ये दुर्घटना का कारण होता है। यहाँ वाहन चालक की गलती साफ़ है। कल की ही खबर है एक ख़राब कड़ी बस से दूसरी बस टकरा गयी और ३ लोग असमय चले गये।  कई गम्भीर रूप से घायल हो गये। 

यमुना एक्सप्रेसवे पर रात के समय मार्ग प्रकाश की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में एक्सप्रेसवे में चलते पुराने वाहन जो पिछले हिस्से में रेडियम का इस्तेमाल नहीं करते दुर्घटना की असीमित सम्भावनाये अपने साथ लेकर चलते है। खासकर उन दोपहिया वाहनों के लिये जो अमूमन चौथी लेन पर चलते है तेज रफ़्तार के साथ। 
फोटो: www.bulbula.blogspot.com: यथार्थ

एक्सप्रेसवे में दुर्घटना बहुत क्षेत्रों को चिन्हित नहीं किया गया है। ऐसा होना चाहिये। अधिकतर राष्ट्रीय राजमार्गो आप दुर्घटना बहुल क्षेत्रों के होर्डिंग लगे देखते है और ये कारगर है। जागरूक वाहन चालक अपनी रफ़्तार को काम कर दुर्घटना से बच सकते है।



यमुना एक्सप्रेसवे में जगह- जगह इस बात का जिक्र किया गया है कि आप निगरानी में है ओवर स्पीडिंग ना करें। किन्तु फौरी तौर पर पिकेट लगाकर कोई चेकिंग और चालान नहीं किये जाते। सम्भव है की एक्सप्रेसवे होने के नाते पिकेट लगाना खतरनाक हो ऐसे में स्पीडगन से वाहनो की पहचान कर टोल प्लाजा में चालान पकड़ाया जा सकता है। किन्तु एक्सप्रेसवे की ऑथरिटी और इलाके की पुलिस के बीच किसी तरह का कोई समन्वय ना होने के कारण ऐसे हो नहीं पाता। कुछ दिनों पहले इस तरह के प्रयास किये जरूर गये लेकिन बिना समय ही उनकी हवा निकल गयी। 

हालाँकि कुछ मामलों में ओवरस्पीडिंग करते वाहनों को पिक्चर लेकर घर चालान भेजा जाता है किन्तु ऐसा यात्रा पूरी होने के कई दिनों बाद होता है। जो निहित उदेश्यों  पूरा करता नज़र नहीं आता। फौरी तौर पर चालान एक बेहतर उपाय है चूँकि हम प्रतिक्रियावादी समाज के नागरिक है।

सनद रहे की अधिक टोल और दुर्घटनाओं के कारण यमुना एक्सप्रेसवे पर काम वाहन चलते है। बावजूद इसके दुर्घटनाओं का अनुपात बेहद अधिक है। यमुना एक्सप्रेसवे का फेल होना देश में चल रही अन्य एक्सप्रेसवे परियोजनाओं को भी प्रभावित करता है। सो कुल मिलकर ये कहना उचित ही होगा की यमुना एक्सप्रेसवे कुछ एक तकनीकि खामियों के बावजूद देश एक बेहतर मार्ग है। यदि सावधानी से चला जाय, नियमों का पालन किया जाय तो बहुत सर्री जिन्दगियाँ बचायी जा सकती है। ध्यान रहे की प्रशासन के साथ-साथ ये हमारी जिम्मेदारी भी है। "स्पीड चिल्स बट किल्स" ये जगह-जगह लिखा होता है। बस जरा सा ध्यान देने की बात है। 

रफ़्तार के साथ जिन्दगी के सौदागर:
 

रियल स्टेट बिल्डर की मनमानी और ग्राहकों की दुश्वारियाँ

क्या आपको मुम्बई का कोका-कोला कमपाउण्ड याद है? बिल्डिंग पर चलता सरकारी बुलडोजर याद है? घर बचाने की जद्दोजहद करते लोग याद है? पूरे मामले में गलती किसकी थी? बिल्डर की और नियामक संस्थाओं की ना? पर सजा किसे मिली खर के खरीददार को? देश में कोका-कोला की तर्ज कमपाउण्ड पर ही आज भी कारोबार चल रहा है। हाँ तरीके थोड़े बदल गये है।

अपना एक आशियाना बनाना, उसे दुनिया की हर खूबसूरती बख्श देना हर आम और खास का सपना होता है। अमूमन घर का सपना पूरा करने के लिये बुजुर्ग लोग अपने जीवन की समूची कमायी और नौजवान, हो सकने वाली अनुमानित कमायी लगा देते है। कर्जदार होने और किश्ते चुकाने का सिलसिला चल पड़ता है। किन्तु बावजूद इसके घर कब मिलेगा? मिलेगा भी या नहीं? सौदे की शर्तो के आधार पर ही मिलेगा या नहीं? ये सवाल हमेशा जहन को कचोटते रहने वाले होते है। इतना सब करने करने के बाद भी अगर घर मिल जाये तो नसीबवाला समझे। अन्यथा ऐसे लोगो की कमी नहीं जिनकी आँखें पोसेशन के इंतज़ार में पथरायी जाती है, जो घर का किराया और खरीदे घर की किश्ते दोनों भर रहे है। जो बिल्डर से कानूनी लड़ाई में उलझे अपनी किस्मत को कोश रहे है। एनसीआर, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई , पुणे, चण्डीगढ़ में लाखों लोग इस दर्द के पीड़ित है। किन्तु इनका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं। जिन संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती वो इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। 

बीते दशक में जमीने सोने के भाव बिकी शायद यही कारण था घर बनाना, बेचना एक कारोबार में बदल गया। व्यावसायिकता ने जोर पकड़ा और साथ ही साथ घर की कीमतों ने। कारोबार में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोगों ने पाँव जमाये। रफ्ता-रफ्ता बाजार बड़ा होता चला गया। हालत यहाँ तक आ गयी की बिना किसी तरह निर्माण हुये भी घरों की खरीद फरोख्त होने लगी। घर इन्वेस्टमेंट के इंस्ट्रुमेंट के तौर पर उभरा। घर बनने की खबर से बन कर मिल जाने तक की बीच में कई बार खरीद फरोख्त होती और अनन्तः जरूरतमन्द तक पहुँचते-पहुँचते दाम आसमान छूने लगे। इस सब के बावजूद सरकार ना कोई नियामक सँस्था ला सकी। ना ही किसी अन्य तरीके से ग्राहकों का दर्द काम कर सकी। 


घर की खोज में निकले एक ग्राहक के सामने सबसे जो बड़ी चुनौतियाँ होती है आइये उनके बारे में समझते है।

1. प्री -लॉन्च जैसे कांसेप्ट का दोहन, बिना किसी कानूनी इजाजत के लोगो से पैसा वसूल करना और प्रॉपर्टी की ट्रेडिंग को बढ़ावा देना।
2. बिल्डर और प्रमोटर्स के बारे में कोई वित्तीय जानकारी ना उपलब्ध होना। इस कारण से एक स्वस्थ वित्तीय कम्पनी की जानकारी कर पाना मुश्किल होता है। यदि कम्पनी की वित्तीय जानकारी उपलब्ध भी हो तो उस प्रोजेक्ट विशेष की जानकारी नहीं होती। 
3. बिल्डर द्वारा जिस जमीन पर निर्माण कार्य करने का प्रस्ताव है, उसके मालिकाना हक़ के बारे में जानकरी ना होना। जो दस्तावेज उपलब्ध कराये जाते है, उनकी प्रमाणिकता ही सवालों के घेरे में होती है। इस कार्य के लिये जो नियामक संस्थाये है उनसे जानकरी निकलवा पाना दुष्कर कार्य है।  सो अधिकतर समझौते बिना पूरी जानकारी के हो जाते है।
- ग्राहकों से पैसा लिया जाता है किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिये और बाद में अन्य प्रोजेक्टस में लगा दिया जाता है। बिल्डर्स द्वारा पोजेसन में देरी का मूलकारण भी यही होता है। 

इन सब दुश्वारियों के उपरान्त घर का सौदा हो जाता है उसके बाद तरह की समस्याएं ग्राहकों के सामने आती है।
बिल्डर की तरफ से समय-समय कई अन्य तरीकों से वादाखिलाफी की जाती है। ग्राहकों का शोषण किया जाता है।
१. समय पर पजेशन न मिलना
२. डील फाइनल होने के बाद फ्लैट का एरिया चेंज करना उसके एवज में पैसे की मांग करना 
३. कन्स्ट्रशन क्वालिटी का घटिया होना, इसकी गुणवत्ता केवल और केवल बिल्डर की श्रद्धा पर निर्भर करती है। यदि आप कंस्ट्रक्शन क्वालिटी से संतुष्ट नहीं है तो मनमसोस  कर रह जाने के अलावा कोई अन्य तरीका नहीं होता।
४. कई मामलात में किसी और की जमीन को अपना दिखा कर बेचा जाना
5 . अथॉरिटी से बिना परमिशन के कंस्ट्रक्शन का कार्य शुरू होना,  6 . कुछ टावर बन जाने पर पजेशन देना , जबकि सोसाइटी रहने योग्य नहीं होती
7 . बिल्डर का कानूनी कार्यवाही से न डरना
9 .  नंबर ऑफ़ फ्लोर्स में परिवर्तन पूरे के पूरे फ्लैट का ले-आउट चेंज करने के उद्देशय
१०. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के सहारे घर में दाम बढे हुए दिखाने का यत्न
११. ब्लैक मनी को बढ़ावा देना 
१२. एंड यूजर की जगह किसी एक ही व्यक्ति को ग्बहुत सारे फ्लैट उपलब्ध करना बाद में उन्ही फ्लैट्स को ऊँचे दामों पर बेचना। 

चण्डीगढ़ के जीरकपुर में एक नामी गिरामी बिल्डर ने 1500 फ्लैट्स की बिल्डिंग का पोसेशन २ साल देर से दिया। ग्राहकों की पीड़ा तब और बढ़ गयी जब उन्हें ये पता लगा कि बिल्डर ने करीब आधे फ्लैट किसी दूसरी एजेन्सी को बेच दिये है। अब पोसेशन के लिये उस एजेन्सी की से बात करनी होगी। जो ना निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार है और ना ही विलम्ब की पेनाल्टी देना चाहता है। कुछ लोगो ने जब विरोध दर्ज कराया। तो ये कह कर जाने को कहा की जाओ मुकदमा लड़ लो। 


दूसरी ओर हरियाणा के पंचकुला में भी देश बेहद नामी गिरामी बिल्डर के ऊपर वन विभाग ने मुकदमा कर दिया और ग्राहकों का पैसा सालों तक फँसा रहा। चण्डीगढ़ के IT पार्क में नामी बिल्डर ने ग्राहकों को प्लॉट्स बेचकर पैसा ले लिया किन्तु चण्डीगढ़ प्रशासन और बिल्डर के बीच कानूनी लड़ायी का खामियाजा लोगों ने करीब 8-9 साल तक भुगता। नोयडा के नवनिर्मित सेक्टर्स में 90 % फ्लैट्स का पोसेशन सालो से ज्यादा डिले हुआ है। कई ऐसे बिल्डर भी है जिन्होंने बिना रजिस्ट्री के ही लोगो को पोसेशन दे दिया। गैर कानूनी ढंग से लोग रह रहे है। ये बिना सरकारी नुमाईंदों की मिली भगत के सम्भव नहीं।

ज्ञात हो की बिल्डर या इस तरह की एजेंसीज के पास कानूनी लड़ाई के लिये स्थापित सिस्टम होता है। जबकि ग्राहक के लिये मुकदमा लड़ना एक दुस्वप्न की तरह है। जो अन्ततः ग्राहक को बिल्डर की शर्तो पर मानना होता होता है या फिर कानूनी लड़ाई की मानसिक और आरती प्रताड़ना झेलनी होती है।

चलो इस बार मिलकर दीवाली मनाई जाय


रावण के अवगुणों को हर बार जलाया जाय।
पर फिर से ना सीता को घर से भगाया जाय।।

धुन्ध कोहरे की रिश्तों से हटाई जाय।
चलो इस बार मिलकर दीवाली मनाई जाय।।

अज्ञानता अशिक्षा हर घर से भगायी जाय।
ताकत ज्ञान की इस बार आजमायी जाय।।

सारगर्भित हो हर कदम जो उठाया जाय।
जीवन में मायनों का फिर से जगाया जाय।।

महकने लगे हर क्यारी फूल ऐसा लगाया जाय।
हर दिशा में एक नया उजाला फैलाया जाय ।।
-विक्रम

Concept: How to understand Smart Cities

In recent past, the term "smart city" was in headlines in news papers and websites. I found several queries posted on various forums hovering around this terminology. I have given a thought that how one can present the Picture of" Smart City" in layman language? What should be the right approach and thought process for this. I thought of various things which are associated with term "Smart", a smart man, smart women, Smart phone, Smart light, smart car, Smart home. The one thing which is common in all is these thing manages available resources to optimum use and in terns productivity and efficiency which benefits them in various ways.  For example a person whose time management is good, is called smart man, A lady having very good dressing senses scores over others to affect the audience is also consider smart lady. There are several examples which we can drive out of our daily life and associate them with the use of term called smart. In total 

What is Smartness:  
To my mind “Smartness is all about utilizing available resource for optimum level” either it is device or a human being. In nutshell another definition of smartness can be “smartness is about managing various key parameter efficiently even when situation is adverse” Similar lines to human being, a device can be called smart when it knows how to utilized resources optimally.

How to understand Smart Cities:
1. Smartness in term of Smart Phone:
Now a days most of us spend significant time in browsing using various social media platform via Smart phone. Explaining the way how phone is termed as Smart phone is very much parallel to understand understand concept of smart city.  In piece of hardware, smartness is instrumental via inbuilt intelligence which is nothing but sensing the required information taking some decision which leads us to automation. A smart phone has various capabilities which makes it a smart phone 

- Sensing management 
- Power management 
- Connectivity management 
- Processing Capability
- Security management

Based on instruction from human being, Phone can decide which application are not in use and shuts-them down to enable optimum battery usages. It present analysis of battery, CPU and memory usages.Smart phone understand proximity via proximity sensor and takes decision to shutdown display when user is talking over phone. It senses available light level to dim-down light level of screen. It understand that data is important and its takes several measures to pass it on safely. There lot of application which takes smartness to great level. 
Sabhaar: Google Images


Smart Cities
By discussing about smart phone we have made base to understand what a Smart City may be. First lets understand what facilities a city offers to its resident which needs to be managed smartly. If below services are enabled with artificial intelligence that is via sensing---> analyzing -->acting then we can achieve smartness. These smart component will collectively form a Smart City.

   1. Water Distribution 
-          2. Energy Distribution and management 
       3. Traffic management 
       4. Road-light management
       5. Security 
       6. Governance/Public services 
       7. Waste management
       8. Robust IT Connectvity
       9. Heath and education
       10. Others- Parking management

    Energy Management: 
     Think of a situation, at late evening you decided to go for walk in a park, as you started walking light started following you as soon as you moved away light backside going to background level that is 10% of  full glow and eventually if no presence detected it goes off. This way light is there when it is needed and it is with-out manual intervention. In similar lines based on presence street light can also be implemented. I light goes off at dawn and goes on at dusk. In terns enabling us to save power and resources that can be termed as smartness and this is where journey of smartness of a city start.
 
    Waste management: A dust bin which caters a sector notifies the waste picking vehicle that it is full, waste is ready to be picked. So the resources can be utilised up-to satisfaction level.

    Water Distribution and management: Water distribution management is one of the key amenity in city. Quality of water is nerves of human life. Quality of water is manageable by deploying sensors in water at designated places. In similar lines as done in water purifiers. Water leakage can be identified via pressure sensor, flow sensor and it can be notified to relevant authority is leakage is on.
  
     Security: The network of light is the one of the densest present in todays world. in coming time this can be used to apply security measures by deploying Web-cams and and connecting them to cloud to mark some incident. In come countries in Europe. Traffic lights are such that if they detects crowed over a acceptable limit then they starts flashing and blow security alarms to notify besom mishapping.

    Energy Distribution and management: Identifying pattern of use of energy in day time frame, detecting tampering in energy meters and notifying accordingly. Cutting household power when load exceeds than permissible limits. Uploading realtime data rather than waiting for a person for distribution company to avoid misdeeds.

 Others- Parking management:
    Available parking spaces notification with in area or vicinity can also be achieved via smart parking system.  

    Traffic management:  Identifying over speeding vehicle, take picture and sending to concerned authorities to impose penalty. This is in practice in some part of Yamuna expressway.

     There are enormous possibilities when we talk of smart cities. To realize these possibilities certain level of infrastructure development has to be attained. Discussed key thing may implemented based on their priority and available resources. 


मन में डर भर गया, एक और घर बिखर गया।

ये अक्सर होता है कभी मेरे शहर में कभी तेरे शहर में। कभी भीड़ आकर कर जाती है। कभी अपराधियों का एक झुण्ड ऐसे मन यही बोलता है कि  " जुर्म होता रहा  और मेरा शहर सोता रहा" पेशे खिदमत है कुछ पंक्तियाँ जो दंगे जैसी स्थिति में जीवित हो उठती है ……

अफवाहों की एक शाम थी
शंकायें भी जवान थी
हलक तक आई जान थी
जिन्दगी हलकान थी
व्यवस्था बेजुबान थी
झूठ सज सँवर गया
              मन में डर भर गया
              एक और घर बिखर गया।

स्वप्न सब बिखर गये 
लोग सब सिहर गये
खौफ में हर पहर गया
शोर का गुबार था
धधकता अँगार था
ताण्डव घर-घर गया
               मन में डर भर गया
               एक और घर बिखर गया।

नफरते पसर गयी
प्यार सब बिखर गया
रक्त का रंजन हुआ
मौत का गुन्जन हुआ
मोहल्ला शमसान था
गिद्धों में घमासान था।
फ़ज़ाओं में जहर भर गया
                मन में डर भर गया
                एक और घर बिखर गया। 
                एक और घर बिखर गया। 

नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित है। बिना लेखक की जानकारी के किसी इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही को आमन्त्रित करता है।

अच्छे दिन दिखला दो बाबू, रोजगार दिलवा दो बाबू ........

ये कविता केन्द्रित है उस मजदूर पर जो अपना घर छोड़ कर परदेश जाता है। खासकर शहरी क्षेत्रो में बहुमंजिला भवनों के निर्माण में कार्य करने वाले लोग जिन्होंने हर जगह हक़ की लड़ाई लड़नी पड़ती  घरबार अधिकार शिक्षा सभी सवालिया है। एक मजदूर का अनुरोध है सरकारों से असरदारों से …… ध्यान से पढ़े 

अच्छे दिन दिखला दो बाबू
रोजगार दिलवा दो बाबू
दो जून की रोटी का हमको 
अधिकार दिल दो बाबू

शिक्षा दीक्षा तो हम पा न सके
गीत ज्ञान का गया न सके
पर मंज़ूरी तो करवा लो बाबू
मौलिक हक़ दिलवा दो बाबू

                रोजगार दिलवा दो बाबू। 
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू। ।

छोड़ छाड़ के घर बार अपना
दूर देश से आये है
2 जोड़ी कपडे और
साथ स्वप्न भी लाये
रहने का जुगाड़ करा दो बाबू
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू । ।

पुलिस प्रशासन दूर की कौड़ी
स्वस्थ्य डॉक्टर हर की पौड़ी
पहचान तो दिलवा दो बाबू
आधार कार्ड बनवा दो बाबू 
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू। । 

हम जन्मजात मजदूर जो ठहरे
लगाते अंगूठा जैसे अन्धे बहरे 
शोषण तो रुकवा दो बाबू 
दर्जा इंसान का दिलवा दो बाबू।
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू । ।
साभार:http://www.cec-india.org/

बच्चों को पढ़वा दे बाबू 
फटी कमीज सिलवा दो बाबू
हुआ कुपोषण अब बेकाबू
कोई दवा दिलवा दो बाबू 
                 रोजगार दिलवा दो बाबू।
                अच्छे दिन दिखला दो बाबू । ।

काम काम में रपट गया था 
एक साथ का निपट गया था।
उसकी रपट तो लिखवा दो बाबू
मुजावजा तो दिलवा दो बाबू
                रोजगार दिलवा दो बाबू।
               अच्छे दिन दिखला दो बाबू ।

मुद्दा: Let them roar but we should ignore!!

मुम्बई की सारी पुलिस किंग खान के घर में लगा दे तो उन्हें सोशल मीडिया में असहिष्णुता मिलेगी। सारी साइबर पुलिस उन्ही के अकाउंट की निगरानी में लगा दे तो उन्हें सपने में असहिष्णुता दिखेगी। लाख यत्न कर लो। पीर औलियो से झाड़ फूक करा लो तो भी असहिष्णुता का ये असाध्य रोग ठीक होने वाला नहीं। क्यों की भैया "मन के हार है मन के जीते जीत"

लिहाजा किंग खान और उनके हमख्याल लोग जो केवल और केवल "लकीर के फ़कीर" है।उन्हें "लकीर पीटने दो"। क्यों की लकीर हर हाल में पिटनी है। तब तक जब तक सरकार नहीं बदलती। हाँ समाजवाद आ जाये या कांग्रेसवाद इनकी बीमारी तुरन्त हवा हो जायेगी। चूँकि इनकी बीमारी ठहरी लाइलाज सो बेहतर है कि let them roar and we must ignore. फालतू का भाव दोगे तो और रायता फैलेगा। 

व्यंग: दाल के भाव!!

जब से इंजीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो गया है तब से पेशे की सामाजिक स्वीकृति कम हुयी है।खासकर 2005 के बाद खुले असंख्य कॉलेजो की वजह से। कई बार कई ऐसे लोगो से मिलना होता है। जो मेरी पगार (सॉफ्टवेयर इंजीनियर टाइप का होने के नाते) के बारे में विस्तृत जानकारी चाहते है।मेरे बैंक अकाउंट में झाँक लेना चाहते है।

इस तरह के सवाल का जवाब मैं अक्सर कुछ इस तरह देता था की "दाल रोटी चल जाती है, कभी कभी पनीर और राजभोग भी नसीब हो जाता है:)" ये जवाब आज से महीने भर पहले तक चलता रहा है। पर 2-3 रोज पहले जब एक सज्जन ने जानना चाहा तो मैंने कुछ इस तरह जवाब दिया "भाईसाहब पनीर अक्सर खा लेता हूँ और कभी कभी दाल भी नसीब ही जाती है :)"

मुद्दा: जानलेवा यातायात व्यवस्था में हमारी जिम्मेदारियाँ और शिक्षा की भूमिका।

व्यक्तिगत या सार्वजनिक साधन से यात्रा करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। सुबह,शाम आप या आपका कोई प्रियजन शहर के यातायात का हिस्सा होते है। सुबह हर पारिवारिक व्यक्ति का सबसे प्राथमिकता वाला काम बच्चों को स्कूल या स्कूल बस तक ले जाना होता है।अक्सर देखने में आता है कि स्कूल बस में बच्चे को जरा भी असुविधा हो जाये तो माँ बाप बस वाले के ऊपर,बस स्टाफ के ऊपर गुस्सा करते है। बस में जो भी बच्चे होते है हर एक के माँ बाप अपने बच्चे के लिए एक समान ही चिंतायें रखते है।बच्चे की सुविधा,सुरक्षा स्कूल में स्कूल बस में माँ बाप की चिंताओं का सबब होता है। यदि बस ड्राईवर स्कूल बस को गलत दिशा में गलत तरीके से, अधिक गति से चलाता है और ये आपकी नज़र में आ जाये तो बस ड्राईवर की शिकायत होती है। स्कूल प्रशासन से,हल्ला गुल्ला मचाया जाता है। हर कोई ये चाहता है स्कूल बस का ड्राईवर बिल्कुल आदर्श तरीके से गाड़ी चलाये। किन्तु ये बात खुद पर लागू हो सके ऐसे किसी ख्याल से दूर ही रहते है लोग। ये 60% से अधिक लोगों की बात है।

इन्ही में से अधिकाँश माँ बाप जब घर से दफ्तर के लिये निकलते है। बहुत व्यस्त नज़र आते है। समय इतना कम की एक हाथ में स्टीयरिंग और दूसरे में मोबाइल होता है। व्यस्तता इतनी की गाड़ी चलाते हुये और सड़क पार करते हुये उन्हें ये बात ध्यान नहीं रह जाती की वो अपनी जान और साथ ही अपने ही जैसे किसी की जान खतरे में डाल रहे है। जाहिर है की बात जल्दी गाडी चलाने और फ़ोन पर बात करने तक ही सीमित नहीं है। गाडी तेज चलाना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, हाई बीम पर गाड़ी चलाना इतनी जल्दी कि 1-2 मिनट बचाने के लिये रेडलाइट क्रॉस करने से भी बाज नहीं आते। शायद ये ख्याल भी दिमाग के किसी कोने में शायद नहीं आता की जिस बच्चे की सुरक्षा के लिये वो खुद बस के ड्राईवर से लड़ जाते है स्कूल प्रशासन से झगड़ा करते है। वही आदते वो खुद जीते है, और इत्तेफ़ाकन कभी अपने से कोई गिला शिकवा नहीं करते। यदि कोई यातायात नियमो का हवाला दे तो दोष दूसरे के मत्थे मढ़ कर पल्ला झाड़ लेते है।जब आप अपनी जान खतरे में डालते है तब साथ ही साथ आप अपने बच्चे का भविष्य भी खतरे में डालते है। यातायात के नियमो का पालन करना और करवाना केवल स्कूल बस,ऑटो चालक और ट्रैफिक पुलिस के हवलदार की जिम्मेदारी नहीं है । ये हमारी, हम सबकी जिम्मेदारी है। अक्सर देखिये लोग पूरे परिवार को साथ बिठाकर गलत दिशा से यू टर्न ले रहे होते है। गलत दिशा में चल रहे होते है। ये अपनी जिम्मेदारियो से भागने जैसा ही है। जल्दी सभी को है तो क्या इस जल्दी को जानलेवा बना लेना उचित है? ये बात भी सनद रहनी चाहिये। की यातयात के नियम तोड़ने की बात यदि किसी दुर्घटना में सिद्ध हो जाए तो पीड़ित किसी तरह के मुआवजे का हकदार नहीं होता।

सड़क दुर्घटनाओं का आँकलन करे यो ये साफ़ हो जाता है कि अधिकार मामलात में, शराब पीकर गाड़ी चलाना, गलत दिशा में गाडी चलाना, तेज गति से गाड़ी चलाना रेडलाइट करना। किसी के लिये 2 मिनट की जल्दी दुसरे को अकाल मौत दे गम्भीर अपराध ही तो है।यमुना एक्सप्रेसवे में होने वाले हादसे तेजगति के जानलेवा होने का उदहारण है। किन्तु फिर भी रफ़्तार के सौदगर है की थमते ही नहीं। कई बार के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहूँ तो हर आदमी दूसरे से आगे निकल जाने की चेष्टा रखता है। सड़क पर चलने की अधिकतम रफ़्तार क्या है ये मुद्दा होता ही नहीं है। कुछ लोग ऐसा मजे और दूसरो पर रौब ज़माने के लिये भी करते है।
भारत में चण्डीगढ़ की यातायात व्यवस्था को अपेक्षाकृत अच्छा माना जाता है। चण्डीगढ़ के कई चौराहो पर स्पीकर लगे हुए है जो यात्रियों को ये बताते रहते है की "दुर्घटना से देर भली", "कहीं कोई है जो आपका इंतज़ार कर रहा है"। ये बात बहुत सारे लोगो के कानो से बस होकर गुजर जाती है। किन्तु हाथ जब गाडी के एक्सीलरेटर पर जाता है तो सब नियम कायदे कानून हवा हो जाते है। ये प्रवत्ति बेहद चिन्ताजनक है। ये जरूरी है की भी नियमो का पालन करे और जो नहीं करता उसकी शिकायत करे। चण्डीगढ़ के अखबारो में ये खबर आम रहती है की किसी ने ट्रैफिक नियम तोड़ने वाले की तस्वीर खीचकर फेसबुक डाल दी और पुलिस ने उसका चालान कर दिया।

सरकारों को भी ये चाहिये की ट्रैफिक पुलिस को प्रॉपर ट्रेनिंग मुहैय्या करायी जाय। उन्हें पेशेवर तरीके से काम करने की हिदायत जी। नोयडा के चौराहो में जहाँ ट्रैफिक पुलिस कभी-कभी मिल जाती है। मैं आज तक कभी नहीं देख पाया की पुलिस वाला प्रोफेशनल तरीके से आगे बढ़ने का इशारा करता हो। इसके इतर चण्डीगढ़ में अक्सर ये पाया है की पुलिस का बर्ताव ज्यादा पेशेवर है। यातायात कर्मी बाकायदा सीटी बजा कर चौराहे के बीच नियम के अनुसार सिग्नल देता है। खासकर जब ट्रैफिक का कण्ट्रोल किसी कारणवश मैन्युअल हो।

यातयात के नियम स्कूली बच्चों की शिक्षा का अंग होने चाहिये। पढ़ाई के शुरुआती दिनों से ही। बालमन में जो एक बार छप जाता है उसका असर दूरगामी होता है। एक बेहतर और सुरक्षित समाज के लिये ये बहुत जरूरी है की अच्छी गणित और अच्छी विज्ञान के साथ साथ अच्छी नागरिक शास्त्र भी पढ़ाये और अच्छे नागरिक बनाये।

व्यक्ति विशेष: नोयडा का छोटू आशीष

नोयडा का जल बड़ा कठोर है!!! जल की कठोरता 1700 TDS के आसपास, बर्तन में अगर आयरन कंटेंट है तो यकीन मान लिजिये की जंग लगना तय है। महिलाओं के बाल गिरने की समस्या भी बेहद गम्भीर है। पीने के लिये वाटर फ़िल्टर से काम चल जाता है। किन्तु बाल धोने के लिये पानी किसी ब्राण्डेड कम्पनी का ही चाहिये होता है। इसी के चलते नोयडा में पानी बेचने व्यवसाय चरम पर है। पानी उपलब्ध करना एक व्यवसाय के रूप में जन्मा है ब्राण्डेड से लेकर लोकल कई तरह के पानी की बोतलें मार्केट में उपलब्ध होती है। इस इंडस्ट्री में जो लोग पानी की डिलीवरी की काम में लगे हुये है। उनमें कुछ बालिग और अधिकाँश नाबालिग बच्चे है। 10 -15 साल की उम्र के बच्चे। जिन्हे हम जैसे लोग छोटू कहते है। शिवम मिश्रा जी ने एक बार ब्लॉग बुलेटिन में लिखा था। कि होटलों और ढाबो में काम करने वाले ये छोटू अक्सर अपने घर के बड़े होते है। छोटी सी कमाई से अपना घर चलाते। 

एक ऐसा ही छोटू हमारी सोसाइटी में पानी की डिलवरी देने आता है। नाम है "आशीष" उम्र 13 साल के आस-पास है। आशीष नोयडा के सर्फाबाद का मूल निवासी है। सर्फाबाद बाहुबली DP Yadav और उनके पुत्र "विकास यादव" के गाँव के तौर पर पहचाना जाता है। कुल मिलकर छठवीं जमात तक पढ़ाई का दावा करता है। आशीष के पिता 3-4  साल पहले चल बसे तो उसे और उसकी माँ को परिवार का बोझ उठाना होता है। उसके पिता के देहान्त के बाद पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। कुल मिलाकर आशीष की पढ़ाई छूट गयी और अब उसे पूर्णकालिक तौर पर काम करना पड़ रहा है। आशीष की आँखों में कभी-कभी रंगीन दुनिया को जीने के सपने दिखते है, किन्तु वो जी नहीं सकता है। बात करके ये भी पता लगता है की वो कभी पढ़ाई नहीं छोड़ना चाहता था।  किन्तु जीवन की दुस्वारियाँ उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं देती। 

आशीष से बात करते-करते अचनाक मुझे ये याद आया की आशीष जो कर रहा है वो तो बाल मजदूरी के अंतर्गत आता है। किन्तु फिर भी आशीष को पढ़ाई छोड़ कर काम क्यों करना पड़ रहा है? क्या किसी की नज़र आशीष और आशीष जैसे हज़ारों बच्चों पर नहीं जाती क्या? प्रशासन की क्या जिम्मेदारी है। इस मुद्दे पर? हालाँकि मुझे नहीं पता की बाल मजदूरी करते बच्चों को बाल मजदूरी छुड़वाने के क्या उपाय है? ऐसे उपाय जिससे उसका घर भी चलता रहे और उसकी पढ़ाई भी चलती रहे? मान लीजिये की बच्चे ने मजदूरी छोड़ दी उसके उपरान्त कानून क्या कहता है? घर कैसे चलेगा? आर्थिक सहायता का प्रबन्ध कैसे होगा। जिम्मेदार अधिकारी कौन होता है? मुझे कैलाश सत्यार्थी भी याद आये किन्तु आगे क्या इसका पता नहीं चला? आपको पता हो तो बताईये।  शायद हम मिलकर आशीष जैसे बच्चों के लिये कुछ कर सके।

तकनीकि: Wi-Fi जायेगा तभी तो Li-Fi आयेगा

तकनीकि( technology) एक ऐसी चीज है जो पूर्णतया डार्बिन के सिद्धान्त "सर्वोत्तम की उत्तर जीविता( Survival Of Fittest) का पालन करती है। देखिये मोबाइल संचार में पहले डाटा की तकनीकि आई "GPRS" उसके बाद थोड़ी सी तेज डेटा स्पीड वाला "Edge" आया। उसके बाद  3G और अब 4G  एक का आना दूसरे के जाने के तौर पर देखा जा सकता है। ये विश्व के परिपेक्ष में देखे ना की केवल भारत के। इसी तरह हम टीवी एन्टीना से निकल कर सेटअप बॉक्स तक आ गये। एन्टीना चला गया।

कम्प्यूटर से एसोसिएटेड डिवाइस से कम्युनिकेशन के क्षेत्र में। कॉमपोर्ट(DB-9) से हम USB तक आये अब USB के भी नये वर्शन उपलब्ध है। आजकल Wi-Fi का उपयोग चरम पर है। किन्तु हमेशा तो नहीं रहने वाला। तो आगे  क्या? जैसा की प्रतीत होता है।  आगे आने वाला समय पूर्णतया ऑप्टिकल कम्युनिकेशन की ओर जाता लगता है। उदहारण के लिये Wi-Fi की लोकप्रियता को २०२० तक ऑप्टिकल कम्युनिकेशन हर लेगा। आपके मोबाइल और लैपटॉप( यदि बचे रहे तो) पर ऑप्टिकल पोर्ट दिखेगा। जो LED लाइट के इस्तेमाल कर आपके पर्सनल डिवाइस से कम्यूनिकेट करेगा। यकीन माने की ऑप्टिकल कम्युनिकेशन से आने वाला डेटा रेट आपको चौका देगा। अभी तक 10 GB का डेटा रेट हासिल किया जा चुका। इसके आगे भी सम्भावनाये है।

कुल मिलाकर किसी technology का भविष्य दो चीजो पर निर्भर करता है। एक तो technology द्वारा प्रद्दत features और दूसरा अपने प्रतियोगियों के अपेक्षा उसका दाम। आज Wi-Fi जिस दाम है। उससे 1/4 कीमत पर LIi-Fi उपलब्ध होगा। Li-Fi की बात करते हुये ये ध्यान रखना जरूरी है की दुनिया में अभी तक का सबसे बड़ा नेटवर्क है लाइटिंग नेटवर्क। हर घर में लाइट है। लाइट वहाँ पर भी है जहाँ लोग नहीं है। लाइटिंग का existing infrastructure यदि उपयोग में आ गया तो ये मान मान लेने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिये की। ना दिल्ली में केजरीवाल को ना देश में मोदी को अलग से Wi-Fi देने की जरूरत पड़ेगी। Li-Fi  सस्ता और टिकाऊ होगा। किन्तु पूरी बात कहने के उपरान्त ये कतई नहीं भूलना चाहिये की। तकनीकि अमेरिका और यूरोप से शुरू होकर भारत भारत आती है सो। LI -FI जब प्रयोगशाला से निकालकर रियल वर्ल्ड मई आयेगी तब भी भारत तक आते आते बहुत देर लगेगी। लेकिन जब भी आयेगी क्रान्ति लायेगी।


साभार: http://www.lificonsortium.org/tech2.html
कुछ ऐसा दिखेगा ऑप्टिकल कम्युनिकेशन
ये भी समझ लेना जरूरी है की देश-विदेश में एलेक्ट्रिक्सिटी measurement( Household/Industrial  energy consumption) में optical coupling का इस्तेमाल बहुत दिनों से होता आया। किन्तु इसका उद्देश्य था। Light के द्वारा संचार को बहुत मोटे अर्थो में उस संचार से समझा जा सकता है। जो रेलवे स्टेशन पर खड़ा के गॉर्ड torch के इशारे से ट्रेन के ड्राइवर को करता है।

बीते दिनों "Lighting" की सर्वश्रेष्ठ कम्पनी Philips ने "Visible Light Communication-VLC" का उपयोग करके फ्रांस के एक शॉपिंग मॉल में "Light Positioning System" का डिप्लॉयमेंट किया। यहाँ किसी प्रोडक्ट के पास लगी LED लाइट आपको ये सूचना दे सकती है की। वहां पर रखे प्रोडक्ट्स पर क्या-क्या ऑफर है। क्या प्राइस है। इसके लिये बस आपको मोबाइल फ़ोन का कैमरा ON करना होगा। ये Li-Fi के क्षेत्र में बढ़ते हुये कदमो की ओर इशारा करते है।  
"Philips Light Positioning System" के video का You-Tube लिंक https://www.youtube.com/watch?v=uQw-o6bjrec

मुद्दा: कन्नौज में इत्र की जगह आग क्यों?

कन्नौज से फसादों की खबर है। खबर पढ़ते ही "कफ़ील आजर" याद आये। उनकी नज्म भी याद आयी 

"अब फसादों की खबर सुनकर मैं लर्ज जाता हूँ, 
 घर में एक ही है बेटा कमाने वाला"

अपनी इत्र और उसकी खुशबू के लिये मशहूर कन्नौज की फिजायें आजकल आग की लपटों और तनाव की हमसफ़र है। प्रतिमा विसर्जन जुलूस में उड़े गुलाल ने कहर बरपा दिया। एक की अकाल मौत और कई घायल। ये बेहद दुखद है की आग लपटे दूर चली गयी और शहरों को छावनी में तब्दील करना पड़ा। कुल मिलाकर बेहद जरूरी हो चला है की इन फसादों के  मूल कारणों की पहचान की जाय और उन्हें उखाड़ फेका जाय।

मुजफ्फरनगर, काँठ, सहारनपुर, बरेली, दादरी अब कन्नौज और आस पास के इलाके। इसके अलावा भी कई फसाद पिछले वर्षो में प्रदेश में हुये। हर बार आरोप प्रत्यारोप की बाद कुछ भी ठोस उपाय ना हो सके। प्रदेश सरकार केन्द्र पर आरोप मढ़ती है और केन्द्र इंकार करता है। कुल मिलाकर ये दीगर है की प्रदेश की पुलिस व्यवस्था राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। प्रदेश का ख़ुफ़िया तन्त्र अगर किसी तरह की सम्भावित साजिश जो सूँघ नहीं पाता तो विफलता का श्रेय प्रदेश सरकार का ही है। ये भी जाहिर है कि प्रदेश में सरकार बदलते ही लोगो के काम के तरीके बदल जाते है।अमूमन  प्रदेश सरकार को किसी न किसी वर्ग विशेष की समर्थक/ प्राथमिकता देने वाला माना जाता। उदहारणस्वरुप उत्तर प्रदेश में जब भाजपा की सरकार आ जाती है लोग ये मानते है कि हिन्दूवादी सरकार है। जब बहुजन पार्टी की सरकार आती है तो ये माना जाता है की ये दलितों के मुद्दे को प्राथमिकता देने वाली सरकार है। जब समाजवादी पार्टी की सरकार आती है तो लोग ये मान लेते है कि सरकार समाजवादियों, यादवों और मुस्लिमों को प्राथमिकता देने वाली सरकार है। 

ये जाहिर है की उत्तरप्रदेश की सरकार अपनी मुस्लिम समर्थक नीतियों के लिये जानी जाती है। ये भी जाहिर है की किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष को ये लगे की सरकार उसके मुद्दे पर उसके साथ खड़ी है तो इस तथ्य का उपयोग और दुरूपयोग करने वाले दोनों बहुतायत मात्रा में उपलब्ध होते है। बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल को दलितों के उत्थान के तौर पर जरूर देखा जा सकता है किन्तु ये भी एक कड़ुआ सच है की इसी शासनकाल में दलितों को दिये गये कानूनों का जबरदस्त दुरुपयोग भी हुआ। व्यक्तिगत रंजिश और बदले की भावना से। अदालत तक ने सरकारों को चेतवानी दी। कुछ देर के लिये अगर राजनीति की बात छोड़ दी जाये। बात देश में महिलाओं की जाय तो महिला अधिकारों का कितना दुरुपयोग हुआ ये इसी बात से जाहिर है की। स्वयं माननीय सुप्रीम कोर्ट को दहेज़ के मामलात में पहले एक सक्षम अधिकारी से जाँच तत्पश्चात मुकदमा या गिरफ्तारी के निर्देश दिये। 

खैर मुद्दे पर वापस लौटते है। उत्तरप्रदेश में भूमाफियाओं, असमाजिक तत्वों का बोलबाला इस समय अन्य सरकारों से कहीं अधिक है। उत्तर प्रदेश में यदि आपकी जमीन पर कोई मुस्लिम कब्ज़ा कर ले ये ये मान लेना चाहिये उचित ही होगा की अपनी जमीन पाने के लिये आपको प्रदेश सरकार से लड़ाई लड़नी है। कानपुर और आसपास के इलाको में बहुतायत मात्रा में ये चल रहा है। प्लाट पर कब्जे का केस भी तब साम्प्रदयिक रंग ले लेता है। सहारनपुर में सिक्खों धर्मस्थल पर हमले में कोर्ट के आदेश को नज़रअंदाज़ कर भीड़ ने हमला किया क्यों? उस हमले में भी कई लोगों की हत्या हुयी प्रदेश सरकार ने उनको मुआवजा क्यों नहीं दिया? उनकी खोज खबर क्यों नहीं ली? कन्नौज के दंगे क्या केवल गुलाल गिरने से हो गये? किसने किसके साथ मारपीट की ये अखबारों में क्यों नहीं आया? सरकार ने बयान जारी क्यों नहीं किया? अगर तथाकथित अल्पसंखयक के साथ ज्यादती हो तो उसका प्रचार प्रसार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर किया जाना। और यदि किसी बहुसंखयक समुदाय के साथ ज्यादती हो तो कूड़े के ढेर में। मुआवजे की जरूरत सबको होती है। ये हिन्दू और मुस्लिम देख करने की जगह गलत और सही देख कर करना चाहिये। अन्यथा आग की लपटे पसर जाने के तनिक देर भी नहीं लगती। ये पक्षपात है। सरकारी पक्षपात जब तक चलता रहेगा, तब तक कभी कन्नौज कभी सहारनपुर जलता रहेगा"


साभार:गूगल
कुलमिलाकर प्रदेश सरकार को ये आत्मचिन्तन करना ही पड़ेगा की आखिर क्यों उसके ही शासनकाल में दंगो का गुबार क्यों आ जाता है? क्यों नहीं थमती आग की लपटे? जब की धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े फरमाबरदार इसी सरकार में है। जब सत्ता आपकी है दोष दूसरों पर कैसे और क्यों? सरकार को पक्षपात और जातपात की राजनीति से उठना होगा। जहाँ एक तरफ हाईकोर्ट बड़े सम्वैधानिक पदो पर की गयी नियुक्तियों पर सवाल उठा चुका है। निरस्त कर चुका है। वहीं दूसरी ओर तथाकथित अपराधियों को विधान परिषद् भेजने से राज्यपाल इन्कार कर चुके है। ये सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिये काफी है।

कविता: यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई .....दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई।

यहाँ दिल्ली का तात्पर्य दिल्ली में चलने वाली साजिशो से है। सत्ता की बदनीयती से है। ये शहर प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े नहीं करती। पेशेखिदमत है एक और सच ..........

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई ।

दिल्ली जहन में जहर घोलती है
धर्म के तराजू में इंसा तोलती है
दिल्ली का दिल भी फरेबी भाई
सत्ता भी होती किसकी लुगाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली के दलदल में ताकत आजमाना
सन के जो निकले वो नेता सयाना
दिल्ली में सच बस दवाई सा है भाई
झूठ का टेम्पो हमेशा हाई है भाई।

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली में ताकत है नोटों से वोटों से
अदालत में आर्डर आर्डर की चोटों से
दिल्ली से हुयी है जिसकी सगाई
उसकी तो बस निकल पड़ी है भाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई

दिल्ली की दहलीज में लड्डू बताशे
यहाँ लोग ससटांग हो हो के आते
दिल्ली सियासत का संगम है भाई
धन्य है वही जिसने डुबकी लगाई

दिल्ली दलाली का सेन्टर है भाई
यहाँ झूठ सच का मेंटर है भाई।

दिल्ली लुभाती है दिल्ली बुलाती है
सरेआम ईमान को फाँसी लगाती है
दिल्ली के चक्कर में आना ना भाई
दिल्ली ना सुनती किसी की दुहाई।

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।

दिल्ली का दिल भी बड़ा बेअदब है
पहले जो माँगो वो मिलता वो सब है
आने पे मौका रास्ता दिखाती है दिल्ली
फिर नंगा नाच नचाती है भाई

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।

फसादों की आग लगाती है दिल्ली
फिर लपटों में रोटी पकाती है दिल्ली
और देर तक मुस्कराती है दिल्ली
फिर सान्त्वना भी जताती है भाई

दिल्ली तो दलाली का सेंटर है भाई
सत्ता भी होती है किसकी लुगाई।
-विक्रम

नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित है। बिना रचनाकार का नाम लिखे, बिना इजाजत लिये प्रकाशित करना कानूनी कार्यवाही को वाध्य करता है।

गज़ल: लड़ाई है बस आदमी बनाम आदमी की

जीसस मोहम्मद राम पहचान आदमी की
सस्ती बड़ी है संसार में जान आदमी की

है रिश्ते मिटाता है खुद को जलाता
माया की गुत्थी में जान आदमी की

जीवन डगर में हर एक पहर में
बहुत कीमती है जुबान आदमी की

खुद को सम्हालो दिल दिल से मिला लो
लड़ाई है बस आदमी बनाम आदमी की

आपाधापी छोड़ो पल फुरसत के जोड़ो
रुककर मिटेगी थकान आदमी की ।


नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित

मुद्दा : Builder और authority के nexus से .... अच्छे दिनों की तलाश है

अभिषेक ने आज से चार साल पहले नोयडा के एक्सप्रेसवे में घर बुक करवाया। 3C नाम के एक International बिल्डर के यहाँ। अपने  स्तर जितना भी वेरिफिकेशन हो सकता था किया और फिर नोयडा के लाखो लोगो  की तरह कुछ कैश बाकी लोन लेकर बिल्डर को चुकाना शुरू कर दिया। बिल्डर ने वादा किया था कि 2014 के पहले क्वार्टर में घर का possession देगा। किन्तु ऐसा हुआ नहीं।  अभी तक possession  इन्तजार चल रहा है।  कुल मिलाकर लाखों वेतन भोगियों की तरह अभिषेक भी इक तरफ घर किराया दे रहा है, दूसरी तरफ लगभग उतनी ही EMI भी। दोहरी मार झेल रहा है। 

ये मार कितने दिन झेलनी पड़ेगी पता नहीं। बिल्डर ने करीब १.5 साल पहले ही बिल्डिंग का स्ट्रक्चर रेडी कर दिया था, पर उसके बाद अचानक काम रोक दिया। काम रुकने का कारण फण्ड का ना होना बताया गया है। अभिषेक 95 % payment कर चुका है। अभिषेक और कई अन्य खरीददारों ने मिलकर बिल्डर के खिलाफ कोर्ट में गुहार लगायी। पर अभी तक नतीजा ढाक के तीन पात है। राहत मिलती नहीं दिखायी देती। ये भी गौरतलब है की बिल्डर के कई प्रोजेक्ट चल रहे है। अमूमन हर प्रोजेक्ट का स्ट्रक्चर खड़ा होने के बाद वह फण्ड का रोना रोने लगता है। किन्तु दूसरे की launching भी नहीं रूकती और  लोगों से होने वाली उगाही भी। 

अभिषेक और उसके साथी खरीदार कोर्ट  में गुहार लगा चुके है। धरना और प्रदर्शन भी कर चुके है। मामला समाचारपत्रों और दूरदर्शन ने भी चुका है। इन सब के बाद भी ना नोयडा का प्रसाशन जागा और ना सरकार के कानों में जूँ रेंगी। ना कोई एडवाइजरी जारी  गयी ना ही कोई धर-पकड़ की गयी। एक तरफ white कॉलर गिरोह है। खुले आम चुनौती देकर लूट होती है। बिल्डर और development authorities का बड़ा nexsus है। लूट सहभागिता हो रही है परस्पर सहयोग से हो रही है। 

अभिषेक केवल एक नाम है। अभिषेक जैसे लाखों लोग नोयडा में, चण्डीगढ़ में , बैंगलोर में, हैदराबाद में, चेन्नई में और भी कई शहर है जहाँ ये सब रहते है। जहाँ लूट का धन्धा खुले आम चलता है। जीवन भर की जमा पूँजी के साथ जुआँ खेलता है। जो भी कमाता है कुछ बिल्डर को कुछ बैंक को देकर अपना सारा हिसाब किताब खत्म कर लेता है। इस पूरे प्रोसेस दलाल तो बहुत मिलते है। हलाल भी बहुत करते है पर सरकार सोयी रहती है।  घिसट -घिसट कर जब घर का possession मिल जाता है तब सरकार स्टाम्प ड्यूटी का चार्ज लेना नहीं भूलती सरकार। एक्सटर्नल डेवलपमेंट का चार्ज लेना नहीं भूलती सरकार। 

कुल मिलाकर अभिषेक और अभिषेक जैसो को अच्छे दिनों की तलाश है। देखिये कौन देता अच्छे दिन कानून व्यवस्था या प्रदेश सरकार या फिर केन्द्र सरकार!!!! 
साभार : गूगल 

मुद्दा: PINK SLIP, और Corporate Sector की use and throw नीति

जब तक आप कमा रहे है, सरकार आपकी साथी है, हमकदम है हमनमा है । "आयकर विभाग" आपकी मदद को हरकदम तैयार दिखता। ये बताने के लिये की एडवांस टैक्स कब भरे, ये बताने के लिये कि कर भरने की अन्तिम तिथि क्या है, इत्यादि इत्यादि। ये भी बताया जाता है कि यदि कर नहीं दिया तो पुलिस आपके घर आ सकती है, जेल-दर्शन भी हो सकते है।
साभार: The Economics Times

किन्तु जब आपको "PINK SLIP" मिल जाती है, आप किसी "गम्भीर बीमारी" के शिकार हो जाते है, या किसी "दुर्घटना के शिकार" हो जाते है। एक ऐसी स्थिति जब आप चाहते हुये भी काम नहीं कर सकते तब सरकार एक स्वार्थी प्रेमिका की तरह आपसे मुँह फेर लेती है। ना कोई खोज लेती है ना कोई खबर। जब तक हाथ पैर चल रहे है। तब तक इस सरकारी प्रेमिका को खिलाते रहिये वर्ना फाँके कसना तो आपकी नियति है।

कुल मिलाकर सरकार हर तरह की बात करती है। किन्तु कॉर्पोरेट सेक्टर के लोगों की सामाजिक सुरक्षा की बात नहीं करती। जिन शहरों में कॉर्पोरेट सेक्टर की नौकरियाँ मिलती है वहाँ के आसमान छूते खर्चे पहले की कमरतोड़ होते है। जो कमाया जाता है लगभग सभी, कभी सरकारी टैक्स, कभी बिल्डर टैक्स, कभी शॉपिंग मॉल टैक्स, कभी बच्चों के स्कूल के टैक्स के रूप में चुका देना होता है। दीगर है खुली लूट है। खुली लूट है जो जितना ले पाया ले गया। हर चीज का २ दोगुना दाम लगता मेट्रो शहरों। हाँ ये बात अलग है की सरकार मेट्रो भी अधिक महँगे शहरों को मेट्रो मानने के लिये तैयार नहीं है।

हाल फिलहाल सैमसंग का नाम आ रहा है। साल भर पहले टाटा कंसल्टेसी सर्विसेज -TCS ने कहर बरपाया था। ये सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता। कारण साफ़ है। सरकार की ढील कम्पनी को "यूज़ एंड थ्रो" पद्धति को अपनाने की इजाजत देती है।  किन्तु रोजगार ना होने पर कोई बन्दोबस्त नहीं करती। कभी कम्पनी की "CODE OF CONDUCT"  की बात करके कभी "performance" की बात कर नौकरियों की बलि ली जाती है। 15 साल तक अच्छा perform करने वाला १६वे साल अचानक bad performer कैसे बन जाता है। ये मुझे तो आज तक नहीं समझ आया। सरकार कैसे समझ जाती है पता नहीं?

ये बात भी गौरतलब है की जो भी कम्पनीज pink slip बात रही है। कोई भी घाटे में नहीं है!!! मुनाफा थोड़ा काम हुआ। तो रायता फैला दिया। कुल मिलाकर सरकार को कानून में संसोधन करने चाहिये और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये।  अमेरिका की तर्ज पर , जर्मनी की तर्ज पर। नहीं तो  भगवान भरोसे तो चल ही रहा है। 

मुद्दा: गुजरात में दाल काली लग रही है .......

देश ने जाट आन्दोलन देखा, पिछड़ा वर्ग में शामिल होने हेतु, सड़के जाम हुयी, रेल की पटरियां उखाड़ी गयी। बसे तोड़ी गयी और जाहिर है कानून भी। जाट भी सलामत रहे और नेता यसपाल मलिक भी।फिर देश ने गुर्जर आन्दोलन देखा, पेड़ काटे गये, सड़के जाम हुयी, सार्वजानिक सम्पत्ति पर तोड़फोड़ आगजनी हुयी, राजस्थान बन्धक बना रहा। लोकतन्त्र सिहर गया। प्रदेश और केन्द्र सरकार नतमस्तक हो गयी। कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुयी। गुर्जर नेता किरोड़ी लाल बैसला का रसूख और ग़ालिब हुआ।कोई बदले की कार्यवाही नहीं हुयी। देश ने गुजरात में पाटीदार आन्दोलन देखा। शान्ति पूर्ण धरना करते पाटीदारो के नेता हार्दिक को गिरफ्तार किया गया। लाठी बरसाई गयी। कमोवेश हिन्सा उकसाई गयी!!! नाबालिक श्वेतांग पटेल को हिरासत में मार दिया गया। अब पाटीदारो को देशद्रोही घोषित कर दिया गया !!! तिरंगे का अपमान करने वाला बताया। वल्लभ भाई पटेल के वंशज तिरंगे का अपमान करने लगे है!!! देखिये देश कहाँ जा रहा है!!! कौन ले जा रहा है। दाल काली लग रही है। सत्ता मतवाली लग रही है!!!
जग जाहिर है। गुजरात की मुख्यमन्त्री शीर्ष नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करती है। उन्ही के द्वारा चुनी गयी है। जाहिर है रबर स्टाम्प है। बिलकुल उसी तरह जैसे राज्यपाल होते है।साफ़ है सरकार कौन चला रहा है। इसी गुजरात से मोदी ने सफ़र शुरू किया। केशुभाई पटेल को पदच्युत किया। यही से उडान भर दिल्ली के बजीर बने। यही से पतन का रास्ता भी खोल रहे है। पुलिस कैसे काम करती है ये भी देश को दिखा रहे है। बदले की भावना कभी किसी का भला नहीं करती ये बात सभी को सनद रखनी चाहिये। इतिहास अपने को दोहराता है। गुजरात में जो रहा है वो भी इतिहास दोहराएगा। विनाशकाले विपरीत बुद्धि का नारा चरितार्थ नज़र आयेगा।