गिल्ली-डण्डा कन्चे जैसा, दोस्त पुराना याद आ गया .....

लम्हा-लम्हा जोड़ के
मैंने यादों के गलियारे से
वक्त की शाख पे
एक घरौंदा बना लिया

एक सीखचा खोला इसका
कुछ यादों ने दस्तक दी

एक दोस्त पुराना याद आ गया
वो गुजरा जमाना याद आ गया

कुछ शक्लों में मिला आईना
अपना चेहरा याद आ गया

हर ऊँगली पर पहन चुरमुरा
दोस्त चबाता याद आ गया

टिफिन-विफिन की अदलाबदली
और वो लंच पुराना याद गया

खट्टा चूरन,मीठा चूरन, इमली जैसा
दोस्त पुराना याद आ गया

गिल्ली-डण्डा कन्चे जैसा
दोस्त पुराना याद आ गया
साभार http://www.deepawali.co.in/childhood-memories-indoor-outdoor-games-read-in-hindi.html
कटी हुयी मूली पे लगता
नींबू मिर्च मसाला याद आ गया

वो वक़्त पुराना याद आ गया
गुजरा ज़माना याद आ गया

जो देहरी माटी पर छोड़ा था
वो एक खजाना याद आ गया

वो आल्हा उदल जैसा चलता
वो बरछी भाला याद आ गया

बैठ अकेले पड़ी रेत पर
शक्ल बनाना याद आ गया

थी लम्बी सी नाक किसी की
किसी की आँखों में गुस्सा

भावो कर्मो के मेलजोल से
नया नाम बनाना याद आ गया

कोई लम्बू कोई मोटा
भोले मन की तान बान
बना फ़साना याद आ गया

वो वक़्त पुराना याद आ गया
गुजरा ज़माना याद आ गया

------------विक्रम-------------

समूचा लोकतन्त्र स्तब्ध है ........

50 रुपये में ईमान
लाखों करोड़ों में ज्ञान
सिफारिश से सम्मान
और मुफ्त में अपमान 
देश में हर जगह उपलब्ध है

हर शहर में बड़े-बड़े नेता
तरह-तरह के अभिनेता
ताली बजाने वाले और
बिकने वाले श्रोता
देश में हर जगह उपलब्ध है

समूचा लोकतन्त्र स्तब्ध है
समूचा लोकतन्त्र स्तब्ध है

इस बार दीवाली ने मुझे, दगा हुआ ईगल छाप सीको बना दिया ....

इस बार दीवाली ने मुझे 
दगा हुआ ईगल छाप सीको बना दिया 
सुर्र -सुर्र करके मैं सुलगता रहा 
सुलगता रहूँगा 
जब मेरी सुलगन शान्त होगी 
तब तक अगली दीवाली आ जायेगी 
अब सुलगना मेरी नियति हो चली है

दीवाली के पहले और बाद भी सुलगता हूँ 
कोई श्याम बीड़ी से सुलगा रहा है 
कोई नेवीकट विल्स से 
तो कोई नशेड़ी गाँजे औरअफीम से 
तो कोई कार्बन डाई ऑक्साइड 
पेले पड़ा है वातानुकूलन से 


मेरी क्षमताओं का लिटमस टेस्ट,
हर रोज होता है ट्रैफिक लाइट्स पर 
सुलग सुलग कर एक दिन 
मैं सबको सुलगा दूँगा 
मैं वातावरण हूँ 
फिर शिकायत मत करना
दूसरा मौका देना मेरी आदत नहीं.... 

                       -----विक्रम ------



व्यंग: दीपावली की आधुनिकता और प्रभु की दुविधा

समय के साथ और आधुनिकता की बयार में लगभग हर चलन की चाल बदली है। दीपावली को ही ले लीजिये पहले दीपावली होता था अब नाम दिवाली हो गयी। दीपो के साथ पूजा के प्रसाद के रूप में बटने वाला सामान गिफ्ट में बदल गया। और दीपावली में गिफ्ट के चलन के साथ ही दीपावली पैसे वालो का त्योहार बन गया। ना दीपक का तेल ना आतिशबाजी के पटाके और ना गिफ्ट मे दिया जाने वाला सामान कोई भी गरीबो की जद में बचा है। अंग्रेज चले गये और अंग्रेजी छोड़ गये!! क्रिसमस वाली झालर दीपावली तक आ गयी। चीजे इतनी ही नहीं और भी। दीपावली दीपो को प्रज्जवलित करने का त्योहार है, घर में उजियारा लाने का त्योहार है। पर अब बिजली के यन्त्र-संयन्त्र का इस्तेमाल कर शक्ति और समृद्धता का प्रदर्शन करते है लोग।

जरा सोचिये जब भगवान दीपावली के दिन लैंड कर घरो की तरफ निकलते होगे तो मार्केट की भीड़ देख भगवान को रास्ता भी नहीं सूझता होगा लोगो के घरो तक जाने लिये। रोड पर सजी दुकाने देख प्रभु सोचते तो जरूर होगे है। पिछली बार तो ठीक था लगता इस बार लोगो ने रोड पर कब्ज़ा कर लिया है। गाड़ी पे गाडी सड़को पर खड़ी है कहाँ से जाऊँ इतने भीषण ट्रैफिक में। सारथी से विमर्श करते हुये बोलते होगे यार सब रूल -वूल तोड़ डालते लोग तो दीपावली के चक्कर में। आने को रास्ता देते नहीं और घर बुलाते है, कैसे जाऊँ? ये नगर निगम वाले छुट्टी पे है की वसूली में लगे हुये है? नियम कायदे और कानून सब ताक पर है। देखो पुलिस वाला बैठे बीड़ी पी रहा। काम छोड़ सब निष्काम हो चले है।
साभार:http://www.indolinks.com/websights/diwali/fireworks.htm

आधुनिक हो चुकी दीपावली में दीप की जगह लोग झालर लगाते है। भगवान जब आसमान से जमीन पर लैंड करते होगे घरो में जाने के लिये, तो हैरान और परेशान हो जाते होगे जब देखते होगे दीप गायब है दीप की जगह कुछ टिमटिमाता सा लगा हुआ है। छू लेते होगे तो बिजली का झटका दीपावली का उत्साह उमंग सब हवा हो जाता होगा। जब झालर देखते होगे तो सोचते होगे की अरे मैं भारत की जगह किसी और देश में तो नहीं आ गया? झालर तो चीन की बनी लगती है !!! शायद गलत जगह लैंड कर गये। उनकी शंकाओं को विराम तब लगता होगा जब अन्दर जाकर अपनी मूर्तियाँ देखते होगे। ओह सही जगह आये है नहीं तो फिर लैंडिंग करनी पड़ती।

जब भगवान लैंड कर घरो की तरफ निकलते होगे तो, रास्ते में जलते हुये तेज आवाज़ करते हुये पटाके भगवान को भी डराते तो जरूर होगे। जब आदमी राह से नहीं गुजर सकता और गुजरे तो गुजर जाने की सम्भावनाये प्रबल है। भगवान को लगता भी होगा की कहाँ आ गये जी। सारथी को डाट लगाते होगे और कहते होगे क्या जी कहाँ ले ले आये। पाकिस्तान है की इराक है !! दहशतगर्दी का माहौल है जी चारो तरफ। सब जगह आग और धुँआ है। आँखे तक नहीं खोल पा रहा इतना धुआँ है जी। सारथी भी सकपका जाता होगा प्रभु ने दीपावली के दिन डाँट लगा दी। प्रभु मुझे भी नही दिखा धुँआ आसमान तक प्रभु क्या करता लगता हो भारत ही है पर सन्देह तो ही सकता है ना। क्षमादान दे प्रभु। चलो जी ठीक है जी यहाँ तो छोटे बच्चो को ट्रेनिंग दे रहे है लोग क्या कहूँ इनसे। आज वापस लो सारथी किसी और दिन आयेगे उस दिन विजिबिलिटी की समस्या भी ना होगी और ना इतनी खतरनाक आवाजे। जल्दी निकलो सारथी  देखो पर भी निशाना साध रहे है लोग देखो ये खतरनाक राकेट बगल से गुजर गया यार अभी-अभी और भी आ रहे है। जल्दी टेक-ऑफ करो नहीं तो ये दहशत हम साथ ले कर जायेगे। दीपावली के दिन, दिन ख़राब हो लेगा।  

तो भैया जब तक शान्ति नहीं, भगवान आयेगे कैसे प्रभु ?? कितना भी बुलायो !!!!

तभी दीवाली आयेगी, तभी खुशहाली आयेगी .....

तभी दीवाली आयेगी, तभी खुशहाली  आयेगी

अहम को दूर बनाये रखना
ज्ञान को गले लगाये रखना
सेवा भाव जगाये रखना
अपनों को पास बनाये रखना

तभी दीवाली आयेगी, तभी खुशहाली आयेगी

पास कोई भूखा ना सोये
ना ही कोई दुःख से रोये
आभावो में अधिकार ना खोये
उसका सम्मान बचाये रखना 

तभी दीवाली आयेगी, तभी खुशहाली आयेगी

अपने-अपने कर्मो को समझे
अपने नैतिक धर्मो को समझे 
औरों के भी मर्मो को समझे 
बुजुर्गो का भी स्थान बनाये रखना 

तभी दीवाली आयेगी, तभी खुशहाली आयेगी








दीवाली में लक्ष्मी आयेगी जरूर, थोड़ा कम शोर शराबा कीजिये

माटी हूँ मैं मिटना नियति है मेरी
चाहे जो भी सूरत बना दीजिये

मैं दिया हूँ जलना मुकद्दर मेरा
उजाला कितना भी करा लीजिये

हूँ फूल मैं टूटना मुझे एक दिन
खुशबू मेरी चाहे जहाँ बिखरा दीजिये

हूँ तकदीर मैं बदलती नहीं
मेहनत से भले ही मिटा दीजिये

मैं दुआ हूँ लग ही जायूँगी बस
कशमकश अपनी मिटा दीजिये

सफलता हूँ चूम लूँगी कदम
बस इरादा जरा कड़ा कीजिये

गम का हूँ मिटना पड़ेगा मुझे
वक़्त मिले तो मुस्करा लीजिये

खुशियों का खजाना हूँ लूट लो
बैर भाव सब अपने मिटा दीजिये

दीवाली में लक्ष्मी आयेगी जरूर
थोड़ा कम शोर शराबा कीजिये

हो गयी हो फकीरी या आ गयी अमीरी, है सच आखिरी जो शमसान बोलता है ......

अल्लाह ना जीसस ना भगवान बोलता है
दुनिया में बस इंसान का ईमान बोलता है

बिन बात है झगड़ा बिन बात की लड़ाई
इंसान का इंसान को सम्मान बोलता है

मथुरा  का चक्कर ना हज को है जाना
समझ लो हर तथ्य विज्ञान बोलता है

पण्डित की पूजा ना मौलवी की चादर
इनसे जो बोलता है अज्ञान बोलता है

हो गयी हो फकीरी या आ गयी अमीरी
है सच आखिरी जो शमसान बोलता है


व्यंग: गुमशुदा लोकतन्त्र की तलाश है ......मदद की कर सकते है क्या?

साभार :http://www.amulyam.in/showHumourL.do?hid=158720&lan=Hindi
लोकतन्त्र गुमशुदा है। दिन-बदिन दर-बदर लोकतन्त्र की तलाश में प्रयासरत रहता हूँ। अथक प्रयासों के बावजूद सफलता कोशो दूर भी नज़र नहीं आती। हर उस जगह जहाँ सम्भावना हो सकती थी कोशिश की पर अफसोस। लोकतन्त्र की तलाश में तन से ज्यादा मन चलायमान रहता है,आशा और निराशा के भवँर में गोते लगाता रहता है। ख्यालो का पुलिन्दा अक्सर दस्तक देकर चला आता है। पर पुलिन्दा खुलते ही बहुतायत ख्याल धरातल में धूल चाटते नज़र आते है। ऐसा ही के ख्याल चन्द दिनों पहले ख्याल घर कर गया। मन के पावन विचारो और वास्तविकता के बीच भीषण गुथमगुत्था चली। ख्याल आया था कि गुमशुदा लोकतन्त्र के लिये शहर के पुलिस के किसी पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज करा देता हूँ। अगले ही पल ये ख़याल हवा होते देर नहीं लगती और जहन में कौंदते एक नये ख्याल से खून सर्द हो उठता है, थाने में, वो भी रपट लिखाने के लिये, ये आसान ना होगा!! किसी से सिफारिश लगवानी पड़ेगी, पर किससे लगवाऊँगा सिफारिश? कहीं थानेदार सिफारिश के बाद भी ना सुनी तो क्या?? थानेदार कहीं ये बोला की हमारे थाने में ही क्यों जी किसी दूसरे में लिखाओ जहाँ तुम्हारा लोकतन्त्र खोया हो!! हमारी सीमा में नहीं आता जी ये मामला। मान लो मैंने कानून का वास्ता देकर दुहाई देकर रपट लिखने का अनुरोध किया और थानेदार को कहीं गुस्सा आ गया तो? कई बार फिल्मो में देखा है की जब थानेदार गुस्सा हो जाता है तो अपना गुस्सा आपको जताने के लिये किसी दूसरे पीड़ित को जबरदस्त कन्टाप जड़ देता है, जी घबरा गया ये सब सोचकर!! नहीं-नहीं थाने गया तो बैरंग ही लौटना होगा। थाने गया तो कोर्ट कहचरी भी करनी पड़ जायेगी। तारीख-तारीख का हिसाब ना सम्भाला जायेगा, ये नौकरी क्या कम है जिन्दगी हराम करने के लिये। थाने जाने के ख्याल पर, आशंकाओं ने पूर्ण विराम लगा दिया था। 


सोचा कोई दूसरा हाहाकारी तरीका खोजता निकलता हूँ लोकतन्त्र की तलाश हेतु। इसी कोशिश में सुबह-सुबह अखबार खोला देश-विदेश, प्रदेश, नगर,शहर, गाँव,मोहल्ला हर जगह की खबर पर गिद्ध दृष्टि डाली। नेता जी के लुभावने वादो, चोरो हत्यारों के बढ़ते मंसूबों, रियल स्टेट में होते घोटालो सभी पर नज़र गयी। पर मन उदासीन ही रहा। यकायक नज़र एक फ़ोन का विज्ञापन देख का टिक गयी। एक ख्याल हवा के मानिन्द सरसराता हुआ दिमाग में दाखिल हुआ। देश में इतना सब कुछ अखबार के माध्यम से बिक जाता है। अखबार लोगो की शादियाँ करवा रहे है। लोगों को किराये के घर दिलवा रहे है। संस्थानों को मजदूर और मजदूरों को संस्थान से जोड़ रहे है। तो क्या ये एक लोकतन्त्र को भी खोज लाने में मदद ना कर पायेगे? अखबार को फिर से एक बार छाना और पाया कि एक कोने में ५-६ लाइन छपी है। बिलकुल उतनी ही जगह पर जितने में किसी साइकिल सवार के कार से टकरा कर खर्च हो जाने में छपती है। ये खबर उन लोगों के बारे में जो लोकतन्त्र की तलाश में है, कुछ चण्डीगढ़ के सेक्टर -१७ में धरने पर है कुछ दिल वालों की दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर धरने में है। सोचा से इन्ही जुड़ जाता हूँ। अखबार में खबर छपेगी तो स्वतः सत्तासीन लोग लोकतन्त्र को खोज निकालेंगे, पर ये निष्ठुर शंकायें इनका क्या करूँ ये हर कदम दम भरती रहती है। भला अखबार हमारी खबर क्यों छापने लगे? हमे जगह मिलेगी भी कहाँ, मुख्य पृष्ठ पर तो विज्ञापन ही होगा। आधे से ज्यादा अखबार में विज्ञापन ही होगा। पेज-३ में सितारे रहेंगे और गर्दिश में केवल हमारे ही तारे रहेंगे। नगर पन्ने में शायद थोड़ी सी जगह मिल जाये पर उससे क्या बात बनेगी? लोकतन्त्र तो देश के किसी भी कोने में हो सकता है। मान लो हिन्दी अखबार वालों ने मदद कर भी तो क्या अंग्रेजी अखबार से सहारा मिल पायेगा। इस टाइप देशी खबरे अंग्रेजी अख़बार में न छप पायेगी बाबूजी प्रयास कितना भी कर लो। वैसे भी देश के जागरूक लोग अक्सर ये कहते सुने जाते है की चौथा स्तम्भ गिरवी पड़ा है बड़े बड़े राजनीतिक घरानों के यहाँ पर। हाँ कोई अन्ना जी साथ होते तो शायद सकता था, अरविन्द साथ होते तो भी।  … अन्ना तो बूढ़े हो गये है भला वो क्यों आने लगे साथ? और अरविन्द तो नेता बन गये उनकी मदद से तो बस झाड़ू ही लग पायेगी किये कराये पर। आशंकाओं से भयभीत मन इस इरादे से भी मुकर ही गया। इसका हासिल भी क्या होगा कुछ नहीं होना। कुछ और करते है।

विचार मग्न बैठा ही था की फ़ोन की आवाज़ ने ध्यान भंग किया, ख्याल आया की शायद फेसबुक का कोई नोटिफिकेशन होगा, शायद sms होगा … व्हाट्स-अप भी हो सकता है। मेरी पेड़ रुपी विचारधारा से एक और टहनी की कोपले फूट निकली। लगा इतनी देर से नाहक परेशान था, अपना फेसबुक कब काम आएगा। ये तो वही वही वाली बात हो गयी की जिसको खोजा गली वो घर के पिछवारे मिली।  दीपक तले अँधेरे वाली बात थी। सोचता हूँ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्ड-इन, व्हाट्स-उप, क्विकर, OLX पर और देश के जाने माने अखबारों में जहाँ से सुबह सुबह लोकतन्त्र की तलाश शुरू करता हूँ पर इश्तिहार डाल देता हूँ की मुझे लोकतन्त्र की तलाश है। किसी को मिले तो खबर करे और खबर करने वाले को कुछ नगद पारितोषिक की घोषणा कर देता हूँ। लोग फेसबुक से प्रेमिकाएँ खोज लेते हैदोस्त खोज लेते है। तो बहुत सम्भव है कोई ऐसा मिल जाये कि जो लोकतन्त्र को जानता भी हो। फेसबुक में सभी हैं नेता से अभिनेता तक। किसी न किसी को लोकतन्त्र के बारे में पता होगा आसान रहेगा। मन को शांति मिली की अंत भला तो सब भला। 


फेसबुक में एक पोस्ट डाल ही दी कि भैया लोकतन्त्र लापता है। पहले तो संविधान की किताब में रहता था अभी गायब है। आखिरीबार उसको संविधानसभा के सदस्यों ने 1950 के आस पास देखा था। मैंने केवल सुना है इसलिये कद काठी और सूरत के बारे में नहीं बता सकता देख लो कोई भला मानुष अगर जानता हो तो मदद कर दो। खोज निकालो आजकल फेसबुक देश का प्रधानमन्त्री बना देता है। मुख्यमंत्री को हटवा देता है। चलो एक बार फेसबुक की ताकत को सिद्ध करने में मदद करो। अगर जरूरी हो तो व्हाट्स-अप और ट्विटर की मदद लेने में कोई गुरेज ना करना बस मूल ध्येय यही हो की लोकतन्त्र की तलाश पूरी हो सके।

जब से ये पोस्ट फेसबुक पर डाली है। तब से अलग अलग शहरों और प्रदेशो से बहुत सारे कमेंट्स और शेयर साथ साथ अनगिनत पिंग भी आ चुके है। बिहार के एक व्यक्ति का दावा है की आखिरी बार लोकतन्त्र लालू यादव जी के ज़माने में दिखा था। दूसरे का दावा था की उसने लोकतन्त्र को पडोसी राज्य में कुछ दिन पहले ही देखा है मोमता दीदी के इलाके में कोलकाता की रायटर्स भवन में देखा था। पर सुना हैं की वर्धमान में हाल फिलहाल जो बूम विस्फोट हुआ था उसमे लोकतन्त्र घायल हो गया है और पुलिस के डर से आजकल भूमिगत है। कुछ का दावा है की तमिलनाडु में था लोकतन्त्र कुछ दिन पहले जब जया अम्मा जेल में थी। अलग अलग पृष्ठभूमि के लोगो के अलग -अलग दावे थे। उत्तर प्रदेश के कुछ बुजुर्गो ने कहा की जी 1991 में लोकतन्त्र अयोध्या में था फिर सुना की सरयू नदी में बह गया, दिल्ली के कुछ लोगों ने दावा किया की 1984 में दिल्ली में लोकतन्त्र जल कर मर गया। कुछ लोगों का दावा है की १९९० के दशक में काश्मीर से लोकतन्त्र विस्थापित होकर इधर -उधर बिखर गया। कुछ ने दावा किया की मुम्बई में उसका एनकाउंटर हो गया है तो कुछ ने कहा नहीं जी वो तो गैंगवार में मारा गया। खैर पुख्ता सूचना प्राप्त नहीं हुयी अभी तक, आपको मौका मिला तो खोजने का प्रयास करे और ना मिले तो काम से फेसबुक, ट्विटर और वाहट्स -अप के माध्यम से शेयर कर मेरे दुःसाहसिक प्रयास को फलीभूत करे।

व्यंग: कालजयी मच्छर और मेरी मारक रणनीति .......

पिछले हफ्ते कानपुर प्रवास पर था। मौसम में व्याप्त आद्रता से मन चिपचिपा सा गया था । बिजली जाने का जितना भरोसा होता है ना आने का उससे कहीं ज्यादा!! मौसम की इस मार के बीच एक दूसरी आशंका जो मन को खाये जाती। वो आशंका जो सूरज की चढ़ती त्योंरियो के साथ-साथ मारक हो जाती है, शाम जब सूरज ढल रहा होता ऐसे में वो आशंका और विकराल रूप धारण कर लेती है। मन भयभीत हो उठता है आने वाले खतरे से!!खूनी मच्छरों का झुण्ड सर पर मड़राने लगता है। जिधर जाओ साये की तरह आपके साथ -साथ घात लगा कर हमला करने वाले में कौन सा मलेरिया वाहक है कौन सा डेंगू पता नहीं। अन्दर से जितना डरा हुआ इन्सान होता वो उतना ही शोर मचाता है। उपाय करता है। इस बार मैंने भी मच्छरों से लोहा लेने की ठान ली सोचा कुछ भी हो जाये ईट से ईट बजा दूँगा। एक बदले अनेक का संकल्प ले लिया था मैंने। इस बार रणनीति का खाका तैयार किया।

इस बार पूरी तैयारी के साथ गया, असलहों से लैस, कई लोगो से गम्भीर चर्चा की गहन चिन्तन भी किया। योजनाबद्ध तरीके से असलहे खरीदना शुरू किया।
- मच्छरमारक यन्त्र - के बैडमिन्टन के राकेट जैसे आकार का यन्त्र जो दो एल्युमीनियम प्लेट्स के बीच उच्च विभव पैदा कर मच्छरों का तत्काल प्रभाव से अन्तिम सँस्कार कर देता है। ये यन्त्र यूँ तो पूरे कानपुर के लगभग हर घर में मिल जायेगा पर मैंने इसका भरपूर और बुद्धिमत्तापूर्ण इस्तेमाल का इरादा किया था
- मच्छर सुरक्षा क्रीम - त्वचा में लगाये और मच्छरों से छुटकारा पाये, बिना किसी हानि के ऐसा दवा क्रीम बनाने वाली कम्पनीज के विज्ञापन करते है
 
- जाना पहचाना यन्त्र मच्छरदानी


शाम जब छत बैठा था तभी मच्छरों का एक झुण्ड सर के ऊपर भिनभिनाने लगा। तीव्र आवृति की आवाज़ कानो को चीरने लगी। मच्छरों की भिन- भिन से दिमाग में असर करने होने लगी थी। पर मैंने योजनाबद्ध तरीके से इन्तज़ार किया। देर आये दुरुस्त आये वाले अन्दाज़ का नज़ारा देखना चाहता था। थोड़ा समय गुजरा और मच्छरों की भीड़ भयानक हो चुकी थी । मैंने हमला बोला मच्छरमारक यन्त्र के साथ, यन्त्र को चंगेजी तलवार की तरह हवा में लहरा दिया। तेज चिंगारियाँ उठी और मच्छरों के कई अग्रणी नेता हमेशा के लिये रुखसत हो गये। मैं मन ही मन इतराया, सूरवीर होने का डैम भरने लगा। मैंदान साफ़। पितामह भीष्म की तरह एक ही वार दुश्मन के चौके और छक्के सब छुड़ा दिया। पर अपनी वीरता का समूचा भान हो पता इससे पहले ही कई और फिदायीन दस्ते गोलमन्द हो गये, पहले से ज्यादा और मारक मच्छरों की सेना ने सर को घेर लिया। उनमे से कुछ ने हमला बोला। मैं वीरता पूर्वक लड़ा सैकड़ो का शिकार कर लिया। ये दौर कई बार चला। मैं पुलेला गोपीचन्द और साइना नेहावाल के जैसे रैकेट चलाये जा रहा था। पर मच्छरों की भीड़ मँहगाई भ्रस्टाचार की तरह भीमकाय होती रही और चार्जिंग के आभाव में ब्रम्हास्त्ररुपी मछारमारक यन्त्र की शक्तियाँ क्षीण हो गयी थे और मैं असहाय।

प्रथमचरण के मुकाबले के बाद देखा बिलजी हमेशा की तरह लापता थी। मैंने रणनीति का दूसरा पहलू पर अमल किया, पूरे शरीर में मच्छरमारक क्रीम मल डाली और फिर एक सूरमा के मानिन्द अपने बंकर से बाहर निकला। चेहरे पर वीरता के भाव प्रभावी थे। मन ही मन मुस्करा रहा था। मच्छरों को अघोषित चुनौती दे रहा था आओ अब काट कर देखो!!!30 -३५ मिनट का समय ही गुजरा था की पंजो और पैरो में कई जगह खुलजी का एहसास सा हुआ। हाथ लगा कर देखा तो होश फाख्ता थे। फिदायीन दस्ता मुझे शिकार बना चुका था पैरो पर पड़े चकत्ते मुझे चिढ़ा रहे थे और मैं सूरवीर से दानवीर बन चूका था। अनचाहे ही मैंने रक्तदान का श्रेय तो मुझे मिल ही गया। अब करे तो करे क्या भागे भूत की लँगोटी ही सही।
साभार :http://www.annieink.com/2012/05/mosquito-buffet.html

एक ख्याल फिर कौंदा अभी शिकार हो गये कोई नहीं रात गये मच्छरदानी का भरपूर इस्तेमाल करुँगा और जीत ही जायूँगा। पहले पहल मेरा रुख हमलावर था दूसरे चरण में शान्तिपूर्ण अब अंतिम चरण की लड़ायी रक्षात्मक रुख में थी। अपने को बचाने की कोशिश थी अब। सधे अन्दाज़ में मच्छरदानी लगायी और लगभग बन्कर सरीखा सुरक्षा घेरा बना लिया। तन कर सोया …… पर रात गये लघुशंका निवारण की जरूरत आन पड़ी। बस यही वो मौका था जो निर्णायक हो गया। नींद में वापस आकर सो तो गया। सुबह जब आँखें खुली तो चारो खाने चित्त हो चुके थे। कुछ पेटू मच्छर काले से लाल हो चुके थे और मच्छरदानी के अलग -अलग कोनो में आराम फरमा रहे थे। बाजीगर बनने की मेरी हर कोशिश धूल चाट रही थे और मच्छर मन ही मन मुश्का रहे थे ....... आया मजा हमको मारने चले थे  …… बेटा ये कानपुर है यहाँ हमारा ही राज चलता आया है और हम आगे भी कायम रहेंगे। हमने गंगा तक में ही अपना घर बना लिया तुम जैसे लोग हमको का गंगा क्या ले जायेगे ......

दादी, नानी की कहानी सी, एक नयी दुनिया बनानी है ......

साभार: http://www.4to40.com/poems/index.asp?p=bachpan


दादी, नानी की कहानी सी
एक नयी दुनिया बनानी है

अब रिमझिम सी बारिश में 
कागज की कश्ती चलानी है

नीम के पेड़ो में झूले डाल कर
फिर दूर तक पेंगे बढ़ानी है

गोबर से लीपी हुयी बखरी में
सब के संग बैठक लगानी है

बुझ चुके चूल्हे में फिर वहीं 
एक नयी लकड़ी जलानी है

रह सके सब साथ में मिलकर 
ऐसी एक तरकीब आजमानी है

जो मौसम सी सुहानी थी
वही जिन्दगी खोज लानी है 

बात इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क की घटना की ......

इलाहाबाद जाये तो संगम जाये ना जाये, मन्दिर,मस्जिद और गुरूद्वारे जाये ना जाये, देश के सबसे पुराने उच्च न्यायलय जाये न जाये पर अल्फ्रेड पार्क जरूर जाये। ऐसा मेरा मानना। भगवान और अल्लाह हर मोहल्ले और हर शहर में मिल जायेगे, उन पर मरने और मिटने वाले भी, पर अल्फ्रेड पार्क केवल और केवल इलाहबाद में ही मिलेगा। जब भी इलाहबाद जाना हो एक बार कम से कम उस दिशा में सर जरूर झुका ले जिधर अल्फ्रेड पार्क है। भारतीय इतिहास और भारत की आज़ादी का पुख्ता प्रमाण यहाँ मौजूद है। वर्षो पहले यहाँ आज़ादी की वो जंग लड़ी गयी थी जो अनन्य है अतुलनीय है। अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद जी ने पूरी की पूरी बर्तानिया हुकूमत को अपने अदम्य साहस के सामने झुका दिया था। जिक्र अल्फ्रेड पार्क का है सो एक अल्फ्रेड पार्क से जुड़े पुराने अनुभव का जिक्र लाजिमी हो चला है।
साभार : www.hiwikipedia.org

आज से कुछ ३  साल पहले परिवार के सदस्यों साथ अल्फ्रेड पार्क घूम कर घर की तरफ रवाना होने जो ही थे की गेट से लगभग १०० मीटर पहले 6 -7 लड़को का झुण्ड अाया और पार्क की रेलिंग से सटे खड़े एक लड़के पर लात और घूसों की बौछार कर दी। लडको के उस झुण्ड में सभी 15 -16 की उम्र के रहे होगे और पिट रहे छात्र की उम्र भी इसी दायरे में थी। मैं लड़को से करीब २०-२५ मीटर की दूरी पर था। देखते ही देखते पिट रहा लड़का जमीन पर था घूसों की तीव्रता बढ़ चुकी थी, मैने दौड़ लगायी और बिना किसी विचार के हस्तक्षेप किया। आवाज़ ऊची करते मैंने सवाल किया, क्या हो रहा है ये? छोड़ो इस!!! तरुणों के उस हिंसक झुण्ड में से कुछ सकपका गये। कुछ अभी भी मारने में व्यस्त थे। मार रहे एक लडके को मैंने पकड़ लिया, हड़बड़ाहट में बोला भाईसाहब ये शाला मेरी बहन को छेड़ता है। और फिर जमीन पर गिरे उस लडके पर टूट पड़ा। मैंने तेज आवाज़ में पुलिस को आवाज़ लगायी। पुलिस शब्द सुनते ही हिंसक तरुणों का वो झुण्ड एक-एक कर नौ दो नौ दो ग्यारह हो गया। मैंने लड़के को उठाया तभी एक पुलिसवाला दौड़ता वहाँ पहुँच गया। पिटे लड़के को पानी इत्यादि पिला कर सवाल जवाब किया। लड़का बिहार से इलाहबाद पढ़ने आया था। बातें सुन कर समझ आया की मामला क्लास में पढ़ने वाली किसी लड़के से मुहब्बत का था। लडके के अभिवावक को फ़ोन किया गया।

जब ये सब बातें चल रही थी तब उस जगह काफी भीड़ लग चुकी थी। भीड़ पहले भी थी जब उस लडके पर हमला हुआ लोग कई थे पर मूकदर्शक, शायद उनके घर का कोई नहीं पिट रहा था इसी लिये हस्तक्षेप नहीं किया!! शायद उन सबको एक तरह की दुनियादारी से कोई मतलब नहीं था। शायद वो सब जानबूझ कर अनजाने बन रहे थे, अनचाही मुसीबत को टालने की कोशिश कर रहे थे। हस्तक्षेप ना करने के कई कारण हो सकते है। मरती जा रही संवेदनाये भी और अपनी सुरक्षा की चिंताए भी। सनद रहे की इस भीड़ में इलाहाबाद के रसूखदार और सम्भ्रान्त लोग भी। इलाहाबाद न्याय की नगरी है ऐसा माना जाता है की यहाँ हर चार कदम पर एक वकील और हर दस कदम पर एक न्यायाधीश मिल जाता है। उस भीड़ में भी रहे होगे पुलिस के आने के उपरान्त सया भी सक्रिय थे उसके पहले न जाने क्यूँ निष्क्रिय थे। जिस पार्क में उच्च न्यायलय के न्यायाधीश शाम की सैर के लिये आते हो। अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता की कितनी कड़ी सुरक्षा होगी वहाँ पर हर गेट पर पुलिस लगी हुयी क्या फिर भी सुरक्षा एक सवाल हो सकती है?? परिवार के सदस्यों ने मेरी इस त्वरित प्रतिक्रिया पर की समीक्षा जरूर की शायद नाराज़ भी हुये हो।

ये तो मेरे अपने विचार थे। इस पूरे प्रकरण में मेरी भूमिका को कुछ साहस कहेंगे कुछ दुःसाहस पर इस सब से दूर मैं ये सोच रहा था की आज़ाद जी इसी पार्क में सो रहे है। इस समय वो क्या सोच रहे होंगे? इस घटना के बारे में! या लोगो के ना बोलने की दुर्घटना की बारे में !! या ये सोच रहे होगे की आज़ाद का आज़ाद भारत कितना आगे निकल आया शायद अब लोगो के पास समय नहीं बचा ना इन्सान के लिये न इन्सानियत के लिये!!!!

लखनऊ के डॉक्टर साहब ........

आज से कुछ 5 साल पहले की बात रही होगी। उस दिन लखनऊ प्रवास पर था गोमती नगर के पास टाइम पास करने की गरज में सड़क पर इधर उधर के नज़ारे देख रहा था। देख रहा था एक विकसित होते लखनऊ को एक विकसित होते गोमती नगर को। सड़क के आस पास बनी बाजार को। वैसे उत्तर प्रदेश कितना भी विकसित हो पर वो पान की पीके और वो गुटखे के पैकेट इधर उधर दिखने तय होते है। पान की दुकानों पर होती देश की राजनीति की चर्चा कई बार बेहद गम्भीर और निर्णायक होती है। पद और रसूख कितना भी बड़ा क्यों ना हो पर पान की दुकान सभी का अड्डा होती है। पद और रसूख के हिसाब से पान का टाइप अलग जरूर होता है। जैसे सादे लोगो के लिये सादा पान, शौक़ीन लोगो के लिये मीठा पान और बेहद शौक़ीन लोगो के लिये पान के साथ-साथ तुलसी चाप भी। चूना और कत्था भी थोड़ा ज्यादा। खैर मुद्दे पर लौटते है एक घटना का जिक्र लाजिमी हो चला है।

गोमती नगर इलाके में एक बड़े हॉस्पिटल के सामने एक लम्बी गाड़ी रूकती है, सड़क के लगभग आधे हिस्से पर। गाड़ी की विपरीत दिशा से एक रिक्शा मध्यम गति से चला आ रहा है की अचानक गाड़ी का दरवाजा खुलता है और रिक्शे वाले की लाख कोशिशो के बाद भी रिक्शे का पिछला हिस्सा लम्बी गाड़ी के दरवाजे को टक्कर मार ही देता है। रिक्शे वाले ने बचने और बचाने का पूर्ण प्रयास किया इसी कोशिश में रिक्शा मोड़ा, रिक्शा लगभग ४५ से ५५ डिग्री के बीच कोण पर रिक्शा तिरछा कर लिया, सो यूँ समझिये की रिक्शा तेजगति में गाडी के दरवाजे से  घर्षण करता हुआ निकल गया।रिक्शेवाला सुरक्षित, गाड़ी वाले भी सुरक्षित, हाँ गाड़ी के दरवाजे पर चन्द खरोंचे आयी और दरवाजा रिक्शे से लगे धक्के से तेजी से लगभग बन्द हो गया। रिक्शे वाला रुक गया चेहरे पर अफ़सोस जताने वाले भाव साफ़ थे। लगभग इसी समय गाड़ी का दरवाजा पुनः खुलता है गाड़ी का ड्राइवर और साहब दोनों निकलते है। गाड़ी वाले साहब 55 से 60 की बीच रहे होगे। या यूँ कहे की वरिष्ठ नागरिक बनने की कगार पर थे। सर के पर गिनती के बाल थे और आँखों पर मोटा चश्मा। गाड़ी के साहब आगे रिक्शे वाले की तरफ बढ़ते है और झन्नाटेदार कन्टाप रिक्शे वाले के रसीद कर देते है। साथ में साहब के मुँह से कुछ विशेषण भी रिक्शे वाले को इंगित करते हुये निकलते ही। जाने कहाँ से चले आते है साले दिखाई भी नहीं देता सालो को …… इतना मारुँगा की अन्धे की साथ-साथ बहरा भी हो जायेगा ………  रिक्शे वाला लाचारी के भाव से अपने लगभग शून्य हो चुके गाल को सहलाता है और साहब के श्री मुख से निकले विशेषणों को सहर्ष स्वीकार कर लेता है। कोई विकल्प भी नहीं था। ज्यादा बोलता तो शायद साहब का ड्राइवर भी टूट पड़ता।

इतने में साहब का ड्राइवर दौड़ा रहने दो डॉक्टर साहब, गाडी का हॉस्पिटल की तरफ वाला और दरवाजा खुला और २५-२६ वर्ष की लड़की निकली साहब की तरफ बढ़ती हुयी बोली रहने तो पापा चलो अन्दर मरीजों की लम्बी लाइन दिख रही थी। इसके मुँह लगने से क्या हासिल?? मैं पूरे प्रकरण का चश्मदीद था और डॉक्टर साहब से भी बेहतर मैं ये समझता था की उस गलती जिसकी सजा रिक्शे वाले के गाल छपी हुयी थी वो असल में वो गलती साहब के ड्राइवर की थी सड़क पर आगे से कौन आ रहा है ये देखे बिना दरवाजा खोल देना। यही तो था पूरी कहानी की जड़। मैं बीच में कूद पड़ा इससे पहले की डॉक्टर साहब रुखसत होते मैंने बोला डॉक्टर साहब गलती आपके ड्राइवर की थी आपने रिक्शे वाले को मार दिया क्यों ? डॉक्टर साहब की भृकुटिया तन गयी। उनका अगला सवाल मेरी तरफ था "Who are you?" डॉक्टर साहब का वार अपेक्षित था और इसके लिये मैं मुस्तैद था मैंने डॉक्टर साहब वाली भाषा में ही जवाबी कार्यवाही की "Does not matter!! but my concern is why you have beaten Riskhaw Puller with-out evaluating facts and even if the he guilty you do not have any right beat him, you should have approach concerned authorities". शायद डॉक्टर साहब को अपने ऊपर हुआ हमला नागवार गुजरा इन सब डॉक्टर साहब ने अगला तीर चलाया "You do not know what am I!!" मैंने पलटवार किया मातृभाषा में, महोदय कानून और व्यवस्था से ऊपर कोई नहीं चश्मदीद मैं हूँ, एक बार को अगर ये मान भी ली जाय  कि गलती किसकी थी ये आपको नहीं पता, किन्तु फिर भी रिक्शे वाले को मारने का हक़ पुलिस वाले तक को नहीं है। फिर आपने मारा क्यों? आपसे कमजोर इस लिये? या आप जहाँ खड़े वहाँ आपके पास ज्यादा समर्थन इस लिये? कारण स्पष्ट करे? ये मानवाधिकारों का उल्लंघन है और साथ ही अपराध भी।

मेरे वार से डॉक्टर साहब अवाक से रह गये। मेरे प्रतिउत्तर से डॉक्टर के चेहरे के भाव बदल गये। क्रोध का भाव ठण्डा पद चुका था। कहीं ना कहीं डॉक्टर साहब को अहसास हो चला था की कुछ तो गलत हुआ। शायद वो मेरे इस वार से अपने क्रोध और आवेश बाहर आ चुके थे। क्रोध के आगोश से बहार आने सीधा मतलब एक बेहतर इन्सान हो जाने जैसा था। डॉक्टर साहब ने ड्राइवर की तरफ निशाना साधा यार देख कर दरवाजा खोला करो!!! मुझे तो लगा की तुमने दरवाजा पहले से खोल रखा था और रिक्शे वाले ने टक्कर मार दी। ड्राइवर सावधान की मुद्रा में जी साहब कह कर खड़ा हो गया। शायद डॉक्टर साहब को उनका अहम रोक रहा था अन्यथा डॉक्टर साहब का रुख बेहद सकारात्मक और गलती मान लेने वाला था। साहब की बेटी फिर हरकत में आयी चलो पापा देर हो रही है। डॉक्टर साहब ने ड्राइवर समेत हॉस्पिटल का रुख कर लिया। चलने से पहले डॉक्टर साहब ने रिक्शे वाले की तरफ ग्लानि भाव से देखा आगे बढ़ गये। मैं भी अपने रास्ते आगे बढ़ने लग गया की पीछे से रिक्शे वाला आया बोला कहाँ जा रहे है आप मैं छोड़ देता हूँ मैंने पैसे जानने चाहे पर उसने जवाब दिया जो आपको ठीक लगे दे देना। रिक्शे वाले ने रास्ते में बताया कि वो डॉक्टर साहब उस हॉस्पिटल के मालिक थे। मैंने रिक्शे वाले से उसका नाम पूछा , जवाब में वो बोला साहब हमारा कहाँ कोई नाम होता है हम तो बस रिक्शे वाले है। शायद डॉक्टर साहब की हिंसक व्यवहार का मलाल अभी तक उसके दिल से निकला नहीं था। 

व्यंग: सिकन्दरेआज़म सेंट बिलावल भुट्टो के नाम एक पत्र

पिछले कुछ समय में आपने खूब रायता फैलाया है। देश विदेश के हास्य कलाकार आपके फैलाये रायते से अपनी हँसने और हँसाने की दुकान चला रहे है। इससे और कुछ हो ना हो पर आपको अनचाही समाज सेवा करने का श्रेय तो मिल ही जाता है। पहले-पहल आपके श्रीमुख से प्रस्फुटित हुयी चन्द ओजस्वी बातें सुनकर मैं मन्त्रमुग्ध हो चला था की अचानक आपको जाने क्या हुआ आप बेकाबू हो गये, आपके के अन्दाज़ और भाव को समझने की कोशिश में मैंने ना जाने कितनी बार यू-टूब खोला और बन्द किया बार -बार देखा लगातार देखा, मैंने सर पीट लिया लेकिन समझ नहीं सका की बोलते बोलते आपको अचानक क्या हो गया। आपको समझने की कोशिश में मैंने आपका इतिहास खोजना शुरू किया की वो शुरू होते ही खत्म हो गया। भारत के किसी पण्डित की बनायीं कुंडली होती तो शायद आपको समझ पाने की कोशिश सफल हो पाती।

कोई आपको बेबी बिलावल कहता है तो कोई कुछ और पर आपके गुणधर्म का गहन अध्ययन करने के उपरान्त मैंने आपको "जलेबी बिलावल बाई" कहने का अहम फैसला लिया है । आपके क्रियाकलाप भारत की आइटम सांग स्पेशलिट्स जलेबीबाई से मेल खाते है। जिस तरह जलेबीबाई फ़िल्मी संगीत के माध्यम से ये दावा पेश करती है की उनके अनन्त आशिक है वो जिस को जब चाहे अपने इशारों पर नचा सकती है, लोगो की नींद उड़ा सकती है। कुछ उसी अन्दाज़े बयाँ में आप भी झण्डे गाड़ने कला का दावा करते है। ट्विटर विद्या के फन का इस्तेमाल करते हुये हाल- फिलहाल आपने दावा किया की आपके बयानों से भारत की रातों की नींद उड़ गयी है। आपका ये महान दावा जलेबी बाई के दावों से मेल खाता है जलेबी भी भारत के लोगो की खासकर पुरुषों की उड़ाने का दावा एक लम्बे अरसे से करती चली आयी है, जलेबी बाई सुरीले अन्दाज़ में ये दवा पेश करती है पर आप दावा पेश करते हुये आपकी आवाज़ बेसुरी हो कर फटे हुये स्पीकर की तरह भर्राने लग जाती है। आप बेसुरे राग अलापने लग जाते है। सो आपके नाम में पुनः परिवर्तन की जरूरत आन पड़ती है। सो आपका फाइनल नाम "जली हुयी जलेबी बिलावल बाई" रखना बेहतर होगा। मुझे लगता है की आप को आवर्तसारणी के नये तत्व के रूप में जगह मिलनी चाहिये। बेसुरा राग अलापते समय आपके अन्दर होने वाले रासायनिक परिवर्तनों का अध्ययन आपके देश और दुनिया के लिये मील का पत्थर साबित हो सकता है।


आपके के कश्मीर प्यार की मैं दाद देता हूँ। पर समझने में असमर्थ हूँ की ये अचानक जग कैसे?क्या वजह रही होगी। हाँ वजीरेआज़म बनने की इच्छा तो आपकी है, सभी भली भाति परिचित भी है। आप ही चिल्ला चिल्ला कर कहा रहे थे अगला वजीरेआज़म भुट्टो ही होगा। पर एक सलाह है आपको कि आपके जैसे ऊँची कद काठी वाले वक्ता और नेता को ये शोभा नहीं देता की आप छोटे लक्ष्य साधे। वजीरेआज़म बनना तो आपका खानदानी हक़ है ये तो आपके कदमो पर आज नहीं तो कल होगा ही होगा।  सो आपको वजीरेआज़म का मोह छोड़ सिकन्दरेआज़म बनने का लक्ष्य साधना चाहिये। फिर कश्मीर तो नाचीज है, भारत भी क्या चीज है, आप तो पूरी महाभारत जीत लेंगे। दुनिया में बहुत सारे  खूबसूरत स्थान है जहाँ आप राज कर सकेंगे। जरा सोच कर देखिये की बराक ओबामा आपके सामने झुक कर नज़कत और नफासत के साथ जब आपको सर सिकन्दरेआज़म कह कर बुलायेंगे तो क्या बात होगी। जब आपको विश्व जीतने का और उसको लूटने का नोबेल पुरस्कार दिया जायेगा तब क्या बात होगी। केवल कश्मीर के चक्कर में आप परेशान हो ये शोभा नहीं देता। और इसमें एक बड़ा रिस्क भी है। जिस कश्मीर को आधी सदी में आपके वलिदान आपके देश की अशान्त सेना और सेनानायक नहीं ले पाये उस कश्मीर को लड़ कर लेने में आपको कितनी मुश्किलात का सामना करना पड़ेगा। आपकी उम्र गुजर सकती है लड़ते-लड़ते फिर धोखे मिल भी तो क्या बुढ़ापे में आचार डालोगे आप कश्मीर का। कहने का तात्पर्य ये है की आप इतिहास उठाये पढ़े फिर लक्ष्य साधे । ये सच्ची सलाह है की कश्मीर आपके लिये वॉटरलू साबित होगा। बेहतर है आप सिकन्दरेआज़म के मानिन्द आगे बढे और कश्मीर आपको भेट स्वरुप प्राप्त हो जाये। लड़ कर नहीं जीत सकते तो क्या सप्रेम भेंट ही स्वीकार कर लेना।


पाकिस्तान का वजीर बनने में कितना रिस्क पता है ना आपको पद से हटने के बाद मुकदमा भी चलता है वो भी देशद्रोह का, देश निकाला भी दिया जाता है, जेल भी जाना पड़ता है। वजीरेआज़म बनने का दर्द आप नवाज शरीफ साहब से भी पूछ सकते है। अरब देशो की शरण में कई साल गुजारे है उन्होंने। मुशर्रफ साहब का हाल भी देख ही लो आप। मैं तो भूल ही गया की आप के वलिदान को ही देख लो आप और फिर सोचो क्या करना। सिकन्दरेआज़म बनना बेहतर है की वजीरेआज़म बनना। अगर दोनों मुश्किल लगे तो एक और आसान तरीका है। शान्तिदूत बनो आपके देश की बच्ची है मलाला उसी के सानिध्य में चले जाओ ज्ञान भी बढ़ेगा और सुरक्षित भी रहोगे। वक़्त के साथ आपको सेंट बिलावल की उपाधि तो मिल ही जायेगी सोचो आपके बाद आपके नाम पर पाकिस्तान में कई स्कूल चल रहे होगे, 
१. सेंट बिलावल पाकिस्तान पब्लिक स्कूल
२. सेंट बिलावल पाकिस्तान पीपल पब्लिक स्कूल 
३. सेंट बिलावल कश्मीर ड्रीम पब्लिक स्कूल 
४. सेंट बिलावल वजीरेआज़म ड्रीम पब्लिक स्कूल
५. सेंट बिलावल कॉमेडी पब्लिक स्कूल 
६. बेबी सेंट बिलावल इंटरनेशनल स्कूल 
७. सेंट बिलावल जली जलेबी बाई पब्लिक स्कूल

सोच कर देखो और करो बोलने से क्या होगा सेंट बिलावल साहब!!!!!!!

सँस्मरण: मुल्ला जी ........

समय दिन और वर्ष ठीक से याद नहीं पर हाँ 90 दशक था शायद 96 -97 के आस-पास , ये जरूर याद है की उस दिन लोग सुनसान गलियों में छायी ख़ामोशी को घर के सीकचों से आँखे फाड़े देख रहे थे। कयासों और अफवाहों का बाजार गर्म था। ऐसा लग रहा था मानों रोज शान्ति से दाना चुगने वाले कबूतरों को किसी ने धोखे से बारूद के दाने खिला दिये हो। गर्मी नहीं थी पर शहर जल रहा था। कानपुर का मिजाज ही कुछ ऐसा है … अफवाहों की गर्मी से ही सुलगने लग जाता है। शुरू किसने किया ये बहस का मुद्दा है पर खत्म कहाँ हुआ ये बड़ा सवाल हमेशा रहा है इस बार भी था। उस दिन सुबह जब अखबार खोला था तभी अन्देशा हो गया था की बाबूपुरवा,यतीमखाने, बजरिया में जो आग लगी है उसकी आँच बर्रा तक जरूर आयेगी। शहर के नामी गिरामी काला बच्चा की हत्या देर रात हुयी थी और शहर आग की लपटों में था। हिन्दू और मुस्लिम एकता रक्तरंजित हो चुकी थी। पर धर्म की ये आग और आहुतिया माँग रही थी, सुरसा सा मुह खोले एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे मोहल्ले में जंगल में आग के मानिन्द फैलती जा रही थी। ये आग की लपटे करीब २ बजे बर्रा तक पहुँच गयी। 

बगल वाली गली में एक मुल्ला जी रहा करते थे, ठेलिया में चप्पल बेच कर अपना और अन्य लोगो का पेट पालते थे। मुल्ला जी जब भी ठेलिया लेकर घर से सामने से निकलते पिताजी से दुआ सलाम जरूर होती। पर उस दिन जब हम सब घरों की छतो पर थे किसी के भागने की आवाज़ आयी लपक कर छज्जे पर गया तो देखा २-३ लोग अबाध गति से भाग रहे थे, मन के किसी कोने में एहसास हो चला था की मुल्ला जी ही होगे। पड़ोसियों की मदद से पुलिस को फ़ोन घुमाया पर उस रोज बिजी टोन की टू-टू करती आवाज़ कानों और दिल दोनों को चीर गयी। चन्द लम्हे ही गुजरे थे की तेज विस्फोट हुआ, मानो कान में कुछ सनसनाता सा तेज गति के साथ घुस गया हो। कुछ देर तक मामला सन्नपात था, फिर बगल वाली गली से धुये का गुबाार सा उठा और वातावरण में चप्पलों के जलने की महक हावी हो गयी। पडोसी की छत पर से झाँक कर देखा तो पूरी गली में चप्पल बिखरे हुये थे कई तरह के रंगों से लबरेज, आज ना उन चप्पलो का कोई दाम था ना दाम लगाने वाला। एक पल को लगा की मानों ये चप्पल आसमान से उन इन्सानो पर बरसे थे जो ना जाने कहाँ से आये और मिनटों में आग लगाकर विलुप्त हो गये। ना जाने धरती निगल गयी की आसमान खा गया।














मन आशंका से भर गया था मुल्ला जी कितनी दूर तक जा पाये होगे उनके परिवार का क्या हुआ होगा सवाल जहन में लगातार कौंद रहे थे? उठते धुएँ का गुबार आशंकाओं को नये आयाम दे रहा था। शाम होते खबर आयी की मुल्ला जी और उनका परिवार विस्फोट से पहले ही भाग निकला पर आगे क्या हुआ इसकी खबर ना अखबारों से मिली और ना आस पड़ोस के संदेशवाहको से। ये सवाल दशकों तक जहन में शूल की तरह चुभता रहा खास जब बगल वाली गली पर नज़र जाया करती। पर उस पिछले हफ्ते उस रोज मैं साकेत नगर की सब्जीमण्डी से गुजर रहा था तो चप्पल की ठेलिया पर नज़र पड़ी और ठेलिया को धक्का लगा रहे व्यक्ति पर निगाहे टिक गयी। जहन को दशकों पुरानी घटना झकझोर गयी पर सुखद अन्दाज़ में। वो मुल्ला जी ही थे, जीवित थे उसी पुराने अन्दाज़ में।  मन में आया की रुक कर पूछू कैसे है आप कहाँ थे आप उस दिन क्या हुआ था? फिर अचानक लगा पूछ कर क्या करूँगा जख्मों को कुरेदने से भला हासिल ही क्या होगा ! पूरी तरह से बिखर चुकी जिन्दगी समेट कर फिर से पुराने अन्दाज़ में खड़े हो पाना इतना आसान भी नहीं रहा होगा भला क्या मिलेगा जख्मो को कुरेद कर। ये सलामत है इससे बेहतर क्या। गाड़ी रोक कर थोड़ी देर तक ठेलिया पर धक्का लगा कर आगे बढ़ते हुए मुल्ला जी को देखा एहसास हुआ वर्षो पुराना जहन में चुभा शूल आज थोड़ा कम कष्टदायी लग रहा था। यही सोचते-सोचते गाड़ी आगे बढ़ा ली।