सेक्टर -17 चण्डीगढ़: वास्तविकता और आधुनिकता की लड़ाई है ये

कल बड़े दिनों बाद कुछ घण्टे खरीददारी के बहाने चण्डीगढ़ का दिल कहे जाने वाले सेक्टर -१७ की बाजार में गुजारे। लोगो की भीड़ पहले से बहुत काम थी।  अमूमन भरी रहने वाली पार्किंग में कल बहुत सारे पार्किंग स्लॉट खाली थे। कहीं पर भी अपनी दुकान सजा लेने वाले लोग भी काम दिखे। ये सब देख ही रहा था की अचानक याद आया …… भीड़ कम है लोग एलान्ते मॉल गये होगे, पँजाब, हिमआँचल, और हरियाणा क्षेत्र का सबसे बड़ा मॉल। सुप्रसिद्ध कम्पनी लार्सन और टुब्रो द्वारा गया मॉल जहाँ अक्सर बॉलीवुड के सितारों का जमावड़ा लगा रहता है। आधुनिकता और वास्तविकता के बीच जंग का नायाब ज्वलन्त उदहारण मेरे सामने था। आगे जिक्र करते है चण्डीगढ़ के सेक्टर -१७ के बाजार का।  जिक्र अगर चण्डीगढ़ का तो सेक्टर -17 की मार्केट जिक्र लाजिमी है। यूँ तो हर शहर में छोटे और बड़े बाजार हुआ करते है। पर चण्डीगढ़ के सेक्टर -17 जैसा बाजार शायद ही कहीं है!! बेहद व्यवस्थित है, हर समय पुलिसिया सुरक्षा उपलब्ध, चण्डीगढ़ के मध्य में स्थित होने के कारण सुरक्षा का पुख्ता होना लाजिमी भी है। बात यहाँ पर ख़रीददारी के लिहाज से करे तो अन्तर्राष्ट्रीय पहचान वाले ब्राण्ड से शुरू होकर ठेठ देशी ब्राण्ड तक हर तरह का सामान इस बाजार में उपलब्ध है। धोती कुर्ते से शुरू होकर शूट-बूट तक हर तरह का सामान सहजता और किफ़ायत के साथ मिलता है। खाने की बात करे तो देशी पँजाबी ढाबों से लेकर बड़े रेस्ट्रॉन्ट की एक महफ़िल सी सजी हुयी है । आगे की आपकी जेब और चाहत की बात है!!! घूमते - घूमते थके तो पेड़ो की छाँव में बेन्च पर बैठ कर सुस्ता भी सकते है। आइसक्रीम पार्लर इत्यादि भी बहुतायत उपलब्ध है। चना मसाला, समोसा बेरी के बेर, फल इत्यादि बहुत सारे देशी खाने के सामान भी बैठे-बैठे हाज़िर हो जायेगे। हर तबके के लोगो को जगह देने वाला, समाहित कर लेने वाला बाजार। यहाँ साँस्कृतिक कार्यकर्मो का दौर यहाँ चलता ही रहता है। थिएटर के लोग, स्कूल कॉलेज के बच्चे, NGO के कार्यकर्ता देशहित दूरगामी संदेश देने के प्रयास भी यहाँ करते है। सांकेतिक धरना और प्रदर्शन के लिये भी सेक्टर -17 को चुनते है। संदेश दूर तक जाता है।





हर तरह का रोजगार करने वाले इस बाजार में आपको नज़र आयेगे। हर किसी को कमाने और खाने का मौका यहाँ मुहैय्या हो जाता है। चण्डीगढ़ प्रशासन भले ही कुछ रेड़ी और सड़क पर दूकान लगाये लोगो को मान्यता नहीं देता किन्तु फिर भी बहुत सारे है जो इसी बाजार के सहारे रोटी चला रहे है। ये तस्वीरें सेक्टर -१७ के बाजार का एक बहुत अदना सा नमूना दिखती है अन्यथा बाजार बेहद विशाल और अभूतपूर्व है। असंख्य लोगो को रोजगार देने वाला।


रोजगार के कई तरीको में से एक ये भी 













बीते वर्ष सेक्टर -17 के मशहूर बाजार के लिये अच्छा नहीं रहा है। आधुनिकता और वास्तविकता की जंग छिड़ गयी और सेक्टर -17 का बाजार पिछड़ गया। चण्डीगढ़ के इन्डस्ट्रियल एरिया में एलान्ते नाम का मॉल खुल गया, बेहद विशाल, कमोवेश भारत में एक विदेश जैसा मॉल। यहाँ पहली बार जिसने लापरवाही के साथ में पार्किंग में गाड़ी लगायी वो जब वापस लौटा तो गाडी खोजता ही रह गया। किस फ्लोर में कड़ी की, किस तरफ खड़ी करी, किस फाटे से आये थे, इन सब सवालो के जवाब मिलने की बाद आखिर सेन्ट्रल लॉकिंग सिस्टम की मदद से गाडी लोकेट हो ही गयी। एलान्ते में जायेगे तो बच्चो और बड़ो के ;खेल के नाम पर एक आभासी दुनिया है। छोटे बड़े लोग बर्गर चबाते हुये प्ले स्टेशन टाइप के बड़े- बड़े कंप्यूटर गेम्स के साथ उछलते है। खुश भी होते होगे शायद पर ये है रो सब कुछ आभासी ही। सेक्टर -१७ के बड़े मैंदान का मुकाबला कैसे कर सकते है, संभव ही नहीं। यहाँ कभी सलमान अाये तो कभी इमरान और एलान्ते गुलज़ार हो गया। पिछले वर्ष अखबार में प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार सेक्टर -17 में आने वाले लोगो की सँख्या में ५० फ़ीसदी गिरावट दर्ज हुयी। वो सारी की साड़ी भीड़ एलान्ते की तरफ गयी। आधुनिकता लोगो को लुभाती है सो एलान्ते मॉल भीड़ भी लाजिमी है। पर पूरे प्रकरण में दुःख इस बात का की सेक्टर -17 के बाजार में लोगो की भीड़ के साथ-साथ उन लोगो का रोजगार भी आधा और आधे से भी कम हो गया जिनकी रोटी यहाँ से चलती थी। वो बाजार जो चंडीगढ़ की संस्कृति का प्रतीक थी आज रुसवा सी हो गयी है। सेक्टर -17 का नीलम सिनेमा हाल अभी भी कायम है। पर हताहत है मल्टीप्लेक्स के ज़माने में अपना आस्तित्व भी बचा कर रख सका यही बड़ी बात है।
सेक्टर -१७ नीलम सिनेमा हॉल: अभी कायम है संघर्षरत है















पार्किंग चार्ज : ४ घण्टे के 5 रुपये , ५ रुपये में पार्किंग चण्डीगढ़ के अलावा कहीं नहीं मिलती 











 ये सेक्टर -17 की एलान्ते मॉल से लड़ाई नहीं है ये लड़ाई है आधुनिकता की और वास्तविकता की। ये लड़ाई इस  बात की की हमे देश पर तो गर्व है पर देशी पर नहीं। ये लड़ाई है  कुर्ते पायजामे(पारम्परिक परिधान) जीन्स से। ये लड़ाई भारतीय सज्जन की डूड वाली संस्कृति से है। ये लड़ाई आज भी है कल भी जारी रहेगी किन्तु पानी संस्कृति पर पाँव रख कर दुसरे की पास जाना पड़े तो ये दुःख देता है .......

उत्तर प्रदेश बीमार है!! बहुत बीमार है .....

पिछले हफ्ते कानपुर प्रवास पर था, लखनऊ होते हुये कानपुर जाना हुआ। इसी बहाने उत्तरप्रदेश की दिशा, दशा और दुर्दशा का भान हुआ। लखनऊ चण्डीगढ़ एक्सप्रेस में ७ रूपये वाली चाय १० रुपये में बिकती है। मान लीजिये की कोई विरोध के स्वर उठाये भी तो किन-किन से लड़ेगा पता सबको है की क्या हो रहा है पर सभी अनजान है। खैर ये तो ट्रेन के सफर की हल्की सी झलकियाँ थी . चारबाग स्टेशन पर उतरकर आलमबाग के बस स्टॉप की तरफ कूच किया। ऑटो रिक्शाओं  का अव्यवस्थित जाल कितना विशाल था।  बगैर चोट खाये पैदल भी निकल पाना एक उपलब्धि ही थी। जहाँ भी देखा वहाँ बस अतिक्रमण देखा। शहर के मुख्य मार्ग ४ लेन से २ लेन के हो चले है। जो मार्ग १ लेन वाले थे वो गायब हो चले है या यूँ कहें की विलुप्तप्राय हो चले है। हुँकार भर्ती लाल बत्तियाँ तो बहुत गुजरती देखी  इन मार्गो से पर काले शीशे वाली गाड़ियों से बाहर कहाँ कुछ दिखता है! शहर की भीड़ में जितनी भी बड़ी गाड़ियाँ देखी जिन्हे अंग्रेजी में SUV कहते है, हर गाड़ी वाला राजनीतिक पहुँच वाला दिखा। किसी में सपा का झण्डा किसी में बसपा, भाजपा किसी में कॉंग्रेस का झण्डा बुलन्द था। जब हर आदमी ताकतवर हो तो कद्दावर हो तो फिर सडको पर घमासान होनी है। यातायात के नियम और सिपाही दोनों मानों मोर्चा छोड़ कर भाग गये हो। लखनऊ कानपुर हाईवे के रास्ते उन्नाव में एक ओवर ब्रिज बन रहा न जाने कब से !! बस बन ही रहा है बन पायेगा ये कहना आम आदमी के लिये सम्भव नहीं। इस पुल की नीचे चल रही यातयात की जद्दोजहद से लोगो की चालकों की व्याकुलता का अन्दाज़ा सहज ही लग जाता है। आस पास  घरों में मिट्टी की मोटी चादरें बिछी हुयी थी। पर फिर बात हर आती जाती SUV राजनीति या राजनीतिज्ञों से जुडी थी हर गाड़ी पर झण्डा लहराता देखा। ये झण्डा रसूख का प्रतीक था शायद, दबदबे का भी 
कानपुर की सडको पर यातायात अपनी मर्जी से चलता है। हर किसी के नियम अलग है। हाँ पर हेलमेट कोई नहीं लगाता। आप कानपुर की गलियों में इक शाम गुजारिये कभी। मक्छरों का प्रकोप झेलिये कभी, बिन बिजली के शहर को देखने का मजा ही कुछ और है। ये मजा ना आपको गुजरात के कच्छ मिलेगा और ना मध्य प्रदेश के खजुराहो में। 
80 फ़ीट की सड़क हौले कैसे २० फ़ीट की रह जाती है ये देखिये कभी , देखना है तो कानपुर तो आना ही होगा आपको। हर सड़क के किनारे कचरों के ढेर है। पर न नगर निगम को पता है ना नेता जो को। सडको पर लोगो ने छद्म घर बना लिये घरो के बाहर लटकते छज्जे सड़क की कम से कम २० प्रतिशत जगह तो घेर ही लिया करते है। पर ध्यान देने वाली बात ये भी की हर घर का नक्शा "कानपुर विकास प्रधिकरण" से पास है। घर फिर भी सड़को पर बने है। कमोवेश पूरे शहर की हालत यही है। रिहायशी के लिये बने घरों में कारोबार चल रहे है। पर नक्शा "कानपुर विकास प्रधिकरण" से पास है। चन्दा हर जगह हर दिया जाता है तभी तो हर आदमी खास है हर नक्शा पास है :)
कानपुर और लखनऊ का जिक्र कमोवेश पूरे उत्तर प्रदेश की दास्तान कह देता है। समझ गये होगे आप हालात कैसे है। पिछले १०-१५ सालो में कानपुर बाद से बदतर हो चला है और साथ ही साथ उत्तर प्रदेश भी। कुछ पंक्तियाँ पेशे खिदमत है।


 जब से आया है भैया जी का शासन 
 पैदा हो गये है यू पी में ढेरों दुःशासन

 हर जगह बट रहे है समाजवादी लैपटॉप
 बस नहीं मिल पाता खाने को राशन 

 अँधेरा घना है, गर्मी में सोना मना है
 बिजली, बिजलीघरों में है लगाये आसन

 सत्ता में मगरूर है जनता से दूर है 
 भैया जी दिये जा रहे है भाषण पर भाषण


उन्हें नमन, उन्हें नमन

वतन की राह जो शहीद हो गये
उन्हें नमन , उन्हें नमन

वो वतन की चाह थी
कठिन राह थी
रात स्याह थी
मगर लड़े
रहे खड़े
खुद गये
दिया आजादी का जो जला गये
उन्हें नमन, उन्हें नमन

मातृ प्रेम था
वो राष्ट्र प्रेम था
सर्वस्व कुर्बान था
देश का ही ध्यान था
बहुत दमन सहे
पर रहे खड़े 
हवा क्रान्ति की जो चला गये
उन्हें नमन, उन्हें नमन

उनके बाद ही सही
बस उनकी याद ही सही
एक नयी उषा खिली
एक नयी दिशा मिली
वो १५ अगस्त था 
जब नयी शमा जली
हमारे लिये जो सब कुछ लुटा गये
उन्हें नमन उन्हें नमन
------विक्रम--------

ऐ मेरे दोस्त, मैं तुम्हे भूला नहीं!!!!!

वो १३ अगस्त-2006 की ही एक शाम थी जिस रोज तुम मुझे छोड़ कर चले गये। काल के क्रूर हाथों से ना मैं और ना अपने और अजीज मित्र तुम्हे बचा सके।यूँ तो तुम्हारी याद हर बार आती है, बार-बार आती है और जब भी आती चुपके से तुम्हारी ऑरकुट प्रोफाइल पे जाकर कुछ पुरानी तस्वीरें, कुछ पुराने अंदाज़, कुछ पुराने एहसास समेट कर चला आता हूँ। पर जब से खबर आम हुयी की ऑरकुट बन्द हो रहा है तब से दिल रुँधा सा है। अब जब याद आएगी तो कैसे समेट पायुगा तुम्हारी यादों को?? यही सोच रहा था की याद आया की कल 13 अगस्त है। तो सोचा की कुछ यादें कुछ आँसू संजो का लेता हूँ ……
समर्पित और श्रद्धांजलि -

अमित वर्मा    - MMMEC-2004
सुशील सिंह,  - MMMEC-2005
मनीष त्रिवेदी  - MMMEC-2005
--------------------------------------
ऐ मेरे दोस्त
मैं तुम्हे भूला नहीं
तुम्हे अक्सर याद करता हूँ
तुम्हे अक्सर खोजा करता हूँ
कभी दूर आसमान में
तारों की बीच
कभी खुद में
कभी आस-पास
हवाओं फिजाओं और घटाओं में
हर तरफ
हर जगह बेसुध बेचैन सा
खोजता हूँ तुम्हे मैं आज भी

आज भी कभी-कभी 
कॉलेज के पीछे वाली
रेलवे लाइन पर
१० पैसे, २० पैसे के सिक्के
रखकर चला आता हूँ
दुबारा फिर जाता हूँ
सिक्का वही पाता हूँ
पिचका सा बढ़ा हुआ सा
पर अफ़सोस जब सुबह-सुबह
नींद टूट जाती है
तो तुम्हे पास न पाकर
बेचैन हो उठता हूँ
गटक जाता हूँ
पानी के कई गिलास
और फिर रफ्ता-रफ्ता
दर्द और बढ़ जाता है
जब तू याद आता है
सुशील सिंह  1982 -2006









 

ऐ मेरे दोस्त वो १० पैसे का सिक्का
पिचक गया है
बिल्कुल वैसे ही आकार में
जैसे की तुम कभी कल्पना करते थे
जैसे की तुम साधना करते थे
आओ और ले जाओ अपनी साधना को

वो बास्केट बॉल कोर्ट
जहाँ कई बार
अपने, अपनों और सपनो के बारे में
बात करते हुये हमने सुबह कर दी
वहीं पर आ मिल लो मेरे दोस्त


मनीष त्रिवेदी - 1981 -2006








 



तुम्हारे मुख निकलती हुयी गालियाँ 
जो फूल बन कर बरसती थी
याद है मुझे
मुझे तुम्हारे आचार का डिब्बा भी याद है
तुमने लाख मना किया
पर मैं कहाँ माना
वो प्यार जो उस आचार में था
वो नहीं मिलता दोस्त
जमाना तेरे बाद बहुत बदल गया है

खोराबार के जंगलो में
आज भी तुम्हारे कदमो के कुछ निशान
बाकी है
वो रातें जब
एक रोमाँच के सफर में
हम सब निकल पड़ते थे
डरते डराते एक दूसरे के साथ
सफर हर बार पूरा ही हुआ
हम सब लौट आये
पर जिन्दगी के सफर में
तुम ऐसे गए की अब तक नहीं लौटे

तुम्हारे बाद ही,
मैं बनारस गया था
तुम्ही को देखने
देखा भी पर तुम बदल गये थे
तुमने न कोई बात की
न कोई मुलाकात की
बस वो मैं ही था कि
जो तुम्हारे पीछे-पीछे
ना जाने क्यूँ दूर तक चलता रहा
तुम ऐसे रूठे की आज तक नहीं माने
आज 8 बरस हो गये
तुम रूठे रहे
दूर जाने कहाँ बैठे रहे
पर मैं तुम्हे आज भूला नहीं
भूल भी कैसे सकता हूँ
आखिर तुम दोस्त थे
आखिर तुम दोस्त थे  

बदल गयी जो थोड़ी सी शह मिली, फिजायें शहर की दलाल हो गयी

साभार: NDTV
















कल शब शहर में फसाद हो गया
घर खबर मिली माँ बेहाल हो गयी

पत्थर गोलियों के बोल तेज थे
जमीन हरकदम लहू से लाल हो गयी

कैद थे लोग अपने ही घरों में
सरेआम जिन्दगी बेहाल हो गयी

बदल गयी जो थोड़ी सी शह मिली
फिजायें शहर की दलाल हो गयी

हाथ उठे सब मदद की पुकार में
पर सुरक्षा वहाँ सवाल हो गयी

कुछ घर जले कुछ दिल जले
असमय दिवाली बबाल हो गयी

घर जले सब में थी आग एक सी
इन्सानियत एक अकाल हो गयी

हर जख्म में भी था लहू एक सा
जंग चलती रही काल हो गयी

कुछ जल गये कुछ दफ़न हो गये
माएँ और बहाने कंगाल हो गयी

ये दौर चला था बस चन्द दिन
और फिर स्थिति बहाल हो गयी

छोटी मोटी बातो पर बटते, चुल्ल्हा चौका और आँगन ...

साभार: flickr
















छोटी मोटी बातो पर बटते
चुल्ल्हा चौका और आँगन

ना जाने वो किधर गये
दादा दादी, रिश्ते मनभावन

अब अख़बारों में पढ़ लेता हूँ
क्या झूला है, क्या है सावन

किस पर दोष लगाये अब हम
जब खुद गंगा बची ना पावन

------विक्रम----------