खतो-किताबत का सिलसिला बन्द हो गया है

खतो-किताबत का सिलसिला बन्द हो गया है
पहले था ढेर सारा प्यार, चन्द हो गया है

एक डोर से बँधे थे पहले कभी हम सब
अब हर आदमी बेहद स्वछंद हो गया है

माँ ने था पाला हर बेटे को बराबर
अब रहेगी कहाँ, इस पे द्वन्द हो गया
                      ----विक्रम------

कुम्भ मेले के दौरान हुये रेल हादसे के दिन प्लेटफॉर्म की कुछ तस्वीरें,वीडिओ

इतेफाक से कुम्भ मेले के अन्तिम दिन चण्डीगढ़ प्रस्थान हेतु "कालका हावड़ा एक्सप्रेस" के इन्तज़ार में पहले प्लेटफॉर्म १ पर लगभग ३ घण्टे, तत्पश्चात प्लेटफॉर्म २ पर २ घण्टे का समय रेल के विलम्ब के कारण मैंने इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गुजारे थे। भारी पुलिस बन तैनात था लेकिन 70% फ़ीसदी केवल प्लेटफॉर्म 1 पर बाकी के 30% बचे हुये प्लेटफॉर्म में।

                                      तस्वीरें प्लेटफॉर्म 1 पर ली गयी है।


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                    इलाहाबाद रेलवे स्टेशन बाहर का एक दृश्य : कुम्भ मेला ११ Feb २०१३

                              
                                  नीचे:   इलाहाबाद रेलवे स्टेशन प्लेटफॉर्म 1 का दृश्य
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हिल स्टेशन कसौली :एकान्त की तलाश यहाँ पूरी होगी ( Kasauli, Hill station in peace)

                          "सैर कर ले ग़ाफ़िल जिन्दगानी फिर कहाँ,
                          जिन्दगानी गर रही तो नौ जवानी फिर कहाँ "
                                                                - ग़ाफ़िल

मैदानी इलाकों में जब पारा 45 तक चढ़ चुका होता है और मौसम में व्याप्त आद्रता आपके तन-बदन में मिल कर जीवन बेहद कठिन बना देती है। ऐसे समय में पहाड़ो का जीवन जीने की इच्छा बलवती जरूर होती है। जब बात पहाड़ो की शुरू होती है ऐसे में देवभूमि हिमाँचल की याद आना तय है। मैदानी इलाको में सूरज की चढ़ती त्योंरियों के साथ पहाड़ो का रुख करने का चलन लम्बे अर्से से चला आ रहा है। जाहिर है जब इन्सान अपनी जरूरत पूरी करने के लिये जब कहीं जाता है तो अपनी आराम तलब प्रवृत्ति के कुछ निशान अपने पीछे जरूर छोड़ जरूर आता है। इसी इन्सानी फितरत ने पहाड़ो को भी अपना शिकार बनाया है। आप किसी भी चर्चित हिल स्टेशन पर चले जाये, "ऊटी","शिमला","मनाली"  इन सब जगहों पर आदमी अपने आवागमन के कई निशान छोड़ गया है जिसने व्यावसायिकता को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रकृति को भी उतना पवित्र और प्राकृतिक नहीं रहने दिया। लीक से हट कर चलने की प्रवृत्ति यदि आपमें है। और एक ऐसा हिल स्टेशन चुनना चाहते है जहाँ मौसम का मादक मिजाज शान्ति के लम्हे अपने साथ समेटे हुये हो तो यकीनन आपकी तलाश हिमाँचल प्रदेश के सोलन जिले के कसौली में खत्म हो सकती है। समुद्र तल से  लगभग 6110 फ़ीट की उँचाई पर बसे हिल स्टेशन कसौली में आनन्द का मूल श्रोत यहाँ की व्यावसायिक न हो पाने की प्रवृत्ति भी है।
Milestone @ Kasauli
कसौली से जुड़े कुछ तथ्य 
वैसे तो कसौली कई कारणों से भी जाना जाता है। इतिहास में एक किंवदन्ती है की जब हनुमान जी संजीवनी बूटी की खोज में निकले थे तो उन्होंने कसौली में भी एक कदम रखा था। जाहिर है की ये केवल एक किंवदन्ती ही है क्यों की इस प्रमाणिकता कर पाना सम्भव नहीं है।जाने माने कहानीकार "रस्किन बॉन्ड" का जन्म भी कसौली की हसीन वादियों में हुआ था। "रस्किन बॉन्ड"  को लगभग हम सभी में अपने पाठ्यक्रम में पढ़ा है। जाने माने पत्रकार और लेखक खुशवन्त सिंह का आवास यहाँ स्थित है। वो अक्सर अपना लेखन कार्य करने हेतु कसौली की वादियों में आया करते थे। वैसे कसौली कोन्टोमेंट है।

कसौली का यात्रा मार्ग
- चण्डीगढ़ से सड़क मार्ग पर लगभग 55 -60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कसौली है।
- सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है "कालका" .  कालका से कसौली की दूरी 27 से 30 किलोमीटर।
  कालका तक उत्तर भारत  वाली कई ट्रेंस डायरेक्ट जाती है। दिल्ली से चलने वाली "कालका शताब्दी", हावड़ा से चलने वाली "कालका एक्सप्रेस" तो दिल्ली के रस्ते से आती है कुछ मुख्य ट्रेन है।
कसौली में लगा एक दिशा निर्देशक : दिखायी गयी दूरियाँ हवाई मार्ग की है

- हवाई मार्ग से चण्डीगढ़ एयरपोर्ट से आना बेहतर है वैसे भुंतर एयरपोर्ट से भी एक विकल्प है किन्तु वह सड़क मार्ग से दूर भी है और निःसंदेह  भुन्तर हवाई टिकट का किराया भी ज्यादा ही होगा।
कसौली से चण्डीगढ़ की दूरी ५५-६० कम है
सड़क मार्ग से यात्रा विवरण 
राष्ट्रीय राजमार्ग -22 दिल्ली से होता हुआ चण्डीगढ़ के सीमावर्ती जीरकपुर, पंचकुला होता हुआ शिमला की ओर अग्रसर होता है। जीरकपुर से परवाणु तक बेहद ही उम्दा किस्म की का हाईवे बना हुआ है। इसे हिमालयन एक्सप्रेसवे के नाम से भी जाना जाता है। इस हाईवे तो लगभग १ वर्ष पहले ही बनाया गया है ये पहाड़ी रास्ते को काट कर बनाया गया है। यह पिंजौर और कालका के हाई ट्रैफिक एरिया को बाईपास करने में मदद करता है। इस हाईवे पर गति सीमा का पालन अति आवश्यक है। इस हाईवे को पार करने के बाद पहाड़ी रास्ता शुरू ये रास्ता आपको ये अहसास दिलाने के लिये काफी है की आप प्रकृति की गोद में है। रास्ते के दोनों ओर "चीड़" के पेड़ो की भरमार है और पहाड़ो के घुमावदार रस्ते के बीच खाइयो के विहंगम दृश्य है। रास्ते में बन्दरों के झुण्ड खाने की तलाश में भटकते हुये मिल ही जाते। लगभग हर किस्म के बन्दर। जब आप इस रास्ते से गुजर रहे होगे तो देश की धरोहर बन चुके " नैरोगेज" रेल का मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग -२२ को लम्बवत काटता हुआ मिल जायेगा। ये अहसास करा देगा की आप कसौली नहीं इतिहास के पन्नो पर घूम रहे है। हर पल कुछ नया रचते हुये कुछ नया लिखते हुये आगे बढ़ रहे है। चूँकि आप राष्ट्रीय राजमार्ग पर चल रहे होगे अतैव सड़के दुरुस्त ही मिलेगी आपको। परवाणु से करीब २० किलोमीटर स्थित है धरमपुर। धरमपुर में भारत में निर्मित वाइन की दुकानो की एक लम्बी फेहरिस्त है। वाइन के साथ फलो से बनने वाले नाना प्रकार के भोज्य पदार्थ यहाँ उपलब्ध होते है। खुर्मानी, सेव, चेरी इत्यादि पहाड़ी फल बहुतायत मात्रा में यहाँ मिलते है। धरमपुर गये तो ज्ञानी जी के ढाबे पर तो आपको रुकना ही पड़ेगा। पर आप शुद्ध वेजिटेरिअन है तो ज्ञानी जी आपकी मदद नहीं कर पायेगे आपको दूसरे ढाबे की तलाश करनी पड़ेगी। धरमपुर शिमला और चण्डीगढ़ में लगभग मध्य में स्थित होने के कारण पर्यटकों के विश्राम हेतु बेहद ही उम्दा जगह है। अब धरमपुर का दामन भी आधुनिकता ने पकड़ लिया है। यहाँ कैफ़े कॉफी डे से लेकर कई मशहूर ब्रांड्स के खाने पीने की दुकाने मिल जायेगी।
धरमपुर से कसौली का रास्ता राजमार्ग से अलग हो जाता है। लगभग १२-१३ किलोमीटर का ये रास्ता ड्राइविंग के लिये थोड़ा सा मुश्किल होगा। इस रास्ते में कई जाने माने बोर्डिंग स्कूल के दिशा निर्देशक आपको रास्ता बताते हुये मिल जायेगे। कसौली में प्रवेश के पहले पहाड़ो में घर का सपना दिखाते हुये कुछ अपार्टमेंट में विज्ञापन भी मिल जायेगे।
कसौली में प्रवेश करते ही आपसे 50 -60 रुपये का टैक्स वसूला जायेगा। तत्पश्चात आप कसौली के अन्दर घूमने के लिये स्वतन्त्र हो जायेगे।


यदि आप निरुद्देश्य ३-४ किलोमीटर की वाक पर जाना चाहते है अपने किसी अजीज़ के साथ शान्ति के वातवरण और मौसम के अजीमोशान अंदाज़ के पोषण करते हुये तो यकीनन कसौली में आपकी तलाश पूरी होगी। कसौली में रुके सुबह सवेरे और देर शाम टहलने के लिये निकलने यहीं यहाँ की सुन्दरता है , यहाँ बर्फ़बारी कम होती है किन्तु घर वाला आनन्द पहाड़ों में मिल जाता है।

देखने की मुख्य स्थान
मनकी पॉइन्ट:
यह एक मन्दिर है तो एयरफोर्स स्टेशन के अन्दर स्थित है। 500 से ज्यादा सीढ़ियों की ख़डी चढ़ाई आपको करनी होगी यदि आप भगवान के दर्शन करने के इच्छुक है। कसौली के मुख्य बाजार से उतर कर यहाँ आना मुश्किल काम होता है रास्ता ख़राब है और सकरा भी। मन्दिर में दर्शन के लिये ४ बजे से पहले ही जाना है होता है। बीच में लन्च टाइम भी होता है उस दौरान कोई प्रवेश नहीं कर सकता। सुरक्षा की दृस्टि से आपको अपना इलेक्ट्रॉनिक सामान स्टेशन के अन्दर ले जाने की इज़ाज़त नही है।


सनसेट पॉइन्ट:
इस जगह से सूर्यास्त देखना श्रेस्कर रहता है। यहाँ से कसौली से दूरदराज के क्षेत्रो का भी उम्दा किस्म का नज़ारा पेश आता है।






गिल्बर्ट ट्रेल्स: बेहद रोमांचक पर खतरनाक ट्रेल है। सर्दी में मौसम में अधिक कोहरा होने पर दुर्घटनाये भी होती है।  सावधानी की आवश्यकता है यहाँ पर।


बापिस्ट चर्च

कसौली का मार्केट 
शाम के समय यहाँ चहल पहल देखने को मिलती है। यहाँ खाने पीने की दुकानो के आलावा। ऊनी कपड़ो का , पहाड़ों में इस्तेमाल होने वाले कपड़ों की दुकाने मिल जाती है। मार्केट छोटा है किन्तु अनूठी किस्म की चीजो से लब्बो -लुआब बना ही रहता है। मार्केट ख़त्म होते ही BSNL का दफ्तर है और बच्चो के खेलने के लिये पार्क भी है।



लवर पॉइन्ट
प्रेम एक ऐसा विषय है जिसका हर जगह पाया जाना अवश्यम्भावी है। वैसे भी एकान्त प्रेमी युगलों के लिये उत्प्रेरक होता है। सो जाहिर है की ये प्रेमी युगलों के लिये आदर्श स्थान है। और हर हिल स्टेशन की तरह यहाँ भी लवर पॉइन्ट है।


एक सफर डलहौज़ी की ओर ( A journey to Dalhousie )

वैसे तो पूरी की पूरी देव भूमि हिमांचल एक रमणीक स्थान है। आप जहाँ भी  कदम रखेंगे वहीं पर सुन्दरता पालक पाँवड़े बिछाये आपका इन्तज़ार कर रही होगी। पर जब सब अच्छा हो तो बेहतर और बेहतरीन तलाश होती है, ये इन्सानी फितरत है। इसी खोजी प्रवृत्ति से नयी सम्भावनायों का पता लगता है। ऐसी ही तलाश पँजाब के पठानकोट से लगे हिमांचल के सीमावर्ती इलाके में पूरी होती है।  पठानकोट से करीब ८० किलोमीटर की दूरी पर बसा एक हिल स्टेशन है डलहौज़ी जो अपने आप में एक दुनिया समेटे हुये है, वो दुनिया जो आपकी आँखों को पल कुछ मनोरम, रमणीक और अभिरम दृश्यों के साथ आपके बदन को भी तरोताजा देगी । एक पल धूप का एहसास होगा और दूसरे पल बादलो का झुण्ड आपसे आकर टकरा जायेगा। पहाड़ो का जीवन और अहसास वैसे भी भोगने योग्य होता है। होटल के कमरे पे बिस्तर पर पड़े हुये जब बादलों का एक झुण्ड आपको करीब आता हुये दिखे और अगले  सामने दिख रहे पहाड़ आँखों से ओझल हो जाये तो बादलों के बीच किसी उड़नखटोले जैसा अहसास तो होगा ही ना ,और शायद इसी की तलाश में लोग पहाडों का  करते है।डलहौज़ी हिमांचल के चम्बा जिले का हिस्सा है। यहाँ पहुँचने के रास्ते कई है पर अगर आपको केवल डलहौज़ी  यकीनन पठानकोट होकर जाना बेहतर होगा।


पठानकोट से डलहौज़ी का यात्रा मार्ग  
पठानकोट से डलहौज़ी की दिशा में लगभग 30 -35 किलोमीटर का रास्ता तो अमूमन  मैदानी इलाकों जैसा ही है, शायद पठारीया कहना बेहतर होगा पर आगे चलते हुये पहाड़ी रास्तों से गुजरना होता है । ये पहाड़ मिट्टी और छोटे पत्थरों से मिल कर बने हुये पहाड़ है, इस प्रकार के पहाड़ों में अमूमन बरसात के मौसम में खिसकाव थोड़ा ज्यादा होता है। ध्यान देने वाली बात ये है की कई जगह ड्राइव करते हुये बेहद सावधानी की जरूरत होती है। सड़क के किनारों पर इक्का -दुक्का दुकाने आपको मिल जायेगी आपकी जरूरत का सामान ले आपकी मदद कर सकती है। खैर आगे जाते हुये NHPC का पावर प्लांट मिलता है और साथ टोल की भी वसूली होती है। NHPC प्लांट के साथ के साथ लगा हुआ पेट्रोल पम्प है जरूरत के हिसाब से ईधन ले लेना जरूरी है क्यों कि इसके बाद चम्बा जाकर ही मिलता अगला पेट्रोल पम्प मिलता है। २-३ किलोमीटर चलते के बाद बनीखेत नाम की जगह मिलती है। बनीखेत में सड़क किनारे सजे हुये बाजार किसी कस्बे में आ जाने का अहसास करा देते है। जहाँ दैनिक जीवन से लेकर भोग और विलासिता का भी कमोवेश हर साधन मिल जाता है। आपकी गाड़ी के लिये मेकैनिक भी। थोड़ा और आगे बढ़ेंगे तो यहाँ पर आपके ड्राइवर होने की कड़ी परीक्षा होगी , गलती के लिये कोई गुन्जाइश नहीं होती यहाँ, आपको अगर आने बढ़ना है तो कुशल चालक होना ही पड़ेगा। हैण्डब्रेक का इस्तेमाल एक जरूरत होगी और अपनी लेन में ही आगे बढ़ने से आपकी सुरक्षा और सुविधा दोनों के लिये बेहतर होगा। वैसे पहाड़ों में ड्राइव करने का मूलमन्त्र भी यही होता है की धीमे चले, अपनी लेन में चले, हैण्डब्रेक का उत्तम इस्तेमाल करे, और यदि कभी ओवरटेक करना जरूरी भी हो जाये घुमावदार रस्ते पर कभी न करे , कोशिश यही होनी चाहिये सामने 300 -400 मीटर की क्लियर विसिबिलटी हो। अन्धे मोड़ पर हॉर्न देना बेहतर होता है। अगर आप पठान कोट की तरफ से ही गये है तो आपको डलहौज़ी का बस स्टैण्ड मिलेगा, कुछ नामचीन बैंक्स के ATM भी। थोड़ा ऊपर चढ़ेंगे तो लगभग 1 किलोमीटर तो आपको मिलेगा गाँधी चौक, यही है डलहौज़ी का दिल

 

डलहौज़ी पहुँचने पर 
वैसे तो पहले से योजना बनाने पर ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा  लगभग हर बड़े होटल है।  यहाँ हिमांचल टूरिज्म के दो होटल भी है एक इकॉनमी दूसरा लक्ज़री इनको भी चूज किया जा सकता है। इनका दाम मौसम के हिसाब से फिक्स होता है। मोलभाव की सम्भावना ना के बराबर होती है। अगर खुद चल कर खोजने के इच्छुक है तो और भी बहुत सारे होटल मिल जायेगे मोलभाव की सम्भावनाये भी अपार। 
पार्किंग की समस्या अमूमन हर हिल स्टेशन में होनी ही होती है। डलहौज़ी में आपको पार्किंग होटल के साथ ही मिल जाएगी और घूमने जाने पर गाँधी चौक के पास पार्किंग के लिये व्यवस्था है। अगर आप खोज न पाये तो ट्रैफिक पुलिस से जानकारी ले। गाँधी चौक से कुछ कदमों की दूरी आपको यहाँ  बाजार भी दिख जायेगा।
शाम के समय यहाँ पैदल घूमने का आनन्द बेहद खुसनुमा होता है। घुमते -घुमते  नज़र किसी जलेबी स्टाल  पर पड़े तो स्वाद जरूर लीजियेगा, या फिर किसी कोने में कोई भुट्टे वाला दिख जाये तो पैदल घुमते हुये भुट्टा खाना बेहद खुसगवार हो जाता है

डलहौज़ी पब्लिक स्कूल:
पहले पहल DPS का बोर्ड देख कर लगा कि दिल्ली पब्लिक स्कूल की शाखायें बड़ी दूर -दूर तक है। पर भ्रम के बदल तब छटे जब स्कूल के प्रवेश द्वार पर नाम दिखा "डलहौज़ी पब्लिक स्कूल". पहाड़ों पर बना सुख सुविधयों से लैस स्कूल जब आप डलहौज़ी से चम्बा जाने के लिये रास्ता पकड़ेंगे तो "डलहौज़ी पब्लिक स्कूल" का प्राँगण शुरू होते ही आस रोड के दोनों तरफ दीवारों पर उम्दा किस्म के रंग है साथ  दीवारों के साथ लटके हुये गमले भी उन्नत किस्म का अहसास दिलाते है। लगभग ५००-७०० मीटर लम्बा ये रास्ता आपको ये सोचने को मजबूर  काश आपका बचपन यही गुजरा होता। काश आपकी स्कूलिंग भी यही हुई होती।
Near Dalhausie Public School
आस पास घूमने की जगह:
वैसे तो असीमित सम्भावनाये है किन्तु डलहौज़ी के आस-पास की ही बात करते है।

खाजिहार : मिनी स्विटज़र लैंड 
डलहौज़ी से करीब 25 किलोमीटर दूर है खाजिहार, डलहौज़ी और खाजिहार के बीच घुमावदार पहाड़ी रास्ता है। बीच में रुक-रुक चाय पानी करते हुये आगे बढ़ेंगे तो ऐसा लगेगा मानो प्रकृति स्वयं आपके स्वागत में खड़ी है। अठखेलियाँ करती हुयी। कभी सूरज की किरणों से रोशन होकर आपको अपने पास बुलाने की चेष्टा में रत होगी। तो कभी पास ही घुमड़ते बादलों में छिप कर आपको परेशान करेगी। धूप छाँव की जंग आपको एकटक ताकते रहने को विवश कर देगी। बिना तारीफ किये आपसे नहीं रहा जायेगा। खाजिहार हरी भरी बनस्पतियों से आच्छादित पहाड़ो के बीच एक जगह जो समतल है बेहद हरी भरी, ये मान ले की एक फुलबाल स्टेडियम के बराबर का मैदान जो चम्बा वैली का मुख्य आकर्षण है। बर्फ गिरने के बाद इस मैदान को देखने से स्विटज़र लैंड का नज़ारा मिलता है, इसी लिये इस जगह को मिनी स्विट्ज़रलैंड बोलते है। यहाँ घुड़सवारी आनन्द लिया जा सकता है।  सुरक्षा केवल और केवल आपकी जिम्मेदारी होती है। हालाँकि दावे बड़े होते है किन्तु अन्त आकि सुरक्षा अपने हाथ। खजिहार स्कीइंग के लिये भी जाना जाता है खास कर जब सर्दियों के मौसम में जब बर्फ की एक चादर समूची प्रकृति को आच्छादित देती है। जब उत्तर भारत के मैदानी इलाको में ग्रीष्म ऋतु चरम पर होती होती है ऐसे मौसम में खाजिहार में लगे पानी के हैण्डपम्प किसी भी कम्पनी के रेफ्रिजरेटर ज्यादा चिल्ड वाटर बहार निकालते है।

Khajihar
Hotels at Khajihar

An evening view at Khajihar

Traditional Himanchali dress @ Khajihar


कालाटोप सैंक्चुअरी :
डलहौज़ी और खाजिहार बीच में स्थित है। घूमने के लिये लगभग आधे दिन से ज्यादा का समय चाहिये। कालाटोप तक पहुँचने के लिये ५-६ किलोमीटर का कच्चा रास्ता तय करना पड़ता है और इस रस्ते में ड्राइविंग बेहद दुष्कर है। रास्ता बेहद सकरा। यदि आपने पहाड़ों पर पहले गाडी नहीं चलायी तो बेहतर है कि एक ड्राइवर हायर कर ले। यहाँ भी घूमने और देखने के लिये केवल प्राकृतिक सुन्दरता ही है। ये भी एक फुटबॉल स्टेडियम के बराबर की जगह है और यहाँ का मौसम डलहौज़ी में सबसे बेहतर, यहाँ रुकने के लिये कुछ पुराने कॉटेज भी बने हुये है।  जिनकी बोक्किंग चम्बा से होती है या फिर सम्भवता ऑनलाइन भी। यहाँ छोटी -छोटी २ कैंटीन है। मौसम के मदहोश कर देने वाले मिजाज में कुर्सी में बैठ कर टमाटर, मटर और प्याज पड़ी मैगी खाकर दिमाग एकदम फुर्तीला हो उठेगा।  अगर आप यहाँ रुकने का फैसला लेते है तो फैसला सही हो सकता है। पर अमूमन लोग रुकते काम ही है शायद लिये की यहाँ के कॉटेज बड़े पुराने अन्दाज़ के बने हुये है।  २-३ परिवार साथ में हो तो रुकना अकेले रुकने से कहीं बेहतर होगा।

डलहौज़ी की क्लिनिक के पास :
डलहौज़ी में क्लिनिक भी इसे हॉस्पिटल कहना शायद बेहतर होगा। क्लिनिक के थोड़ी दूर पर कुछ घर बने हुये है। घरो की बीच से एक रास्ता अन्दर की ओर निकलता है। सामने कुछ चाय और मैगी दुकाने है। रास्ते के मोड़ पर एक संगमरमर का पत्थर है जिसमे रवीन्द्र नाथ टैगोर के डलहौज़ी प्रवास के बारे में जानकारी दी गयी है। ये रास्ता वैसे तो किसी आश्रम की ओर जाता है किन्तु यहाँ पर भी निरुद्देश्य चहलकदमी करते हुये भरपूर लुत्फ़ उठाया जा सकता है।

अख़बारों के सम्पादकों के नाम के पत्र; कुछ सवाल

आप लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ है, लोकतन्त्र की व्यवस्था में लोकतन्त्र की साँसे चलाते रहने का दायित्व चौथे स्तम्भ का ही है। जब आपातकाल के दौरान कानपुर से प्रकाशित "दैनिक जागरण" ने अपने सम्पादकीय स्तम्भ को प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ खाली छोड़ दिया वो एक बिगुल था आपातकाल के खिलाफ! लोकतान्त्रिक मूल्यों के लिये, और तब भी जब "इंडियन एक्सप्रेस" के सम्पादक "अरुण शौरी" को ताऊ देवीलाल ने गालियाँ दी थी और दूसरे दिन वही गालियाँ अक्षरश: अखबार में प्रकाशित हुयी थी वो भी एक प्रयास था लोकतन्त्र में बढ़ते राजनीतिक दबदबे को ललकारने का। अखबार कभी लोगो को जागरूक करने का माध्यम बने है तो कभी लोगो की आवाज शासन तक पहुँचाने का जरिया। ये सफर आज़ादी के पहले से भारत में चलता आ रहा है कम से कम "गणेश शंकर विद्यार्थी" जी के ज़माने से तो ये संघर्ष तो जारी ही है।

जाहिर है की समय के साथ मीडिया के कार्य करने के तौर-तरीकों में भारी बदलाव आये है। व्यावसायिक हो जाने के साथ -साथ निहित समस्याओं ने भी अपने पाँव जमाये। इसी लिये शायद ये मान लेना अनुचित न होगा कि पत्रकारिता अब अखबार प्रकाशित करने वालें घरानों के लिये अब इक मिशन से ज्यादा व्ययसाय ही है। तभी तो अलग-अलग मीडिया घरानों पर समय-समय पर किसी विशेष राजनीतिक दल को समर्थन के आरोप भी लगते रहे है। किन्तु मीडिया घरानों से अलग हटकर कई पत्रकारों ने नयी मिशाल भी कायम की है। और शायद उन्ही की वजह से आज भी मीडिया के चौथे स्तम्भ होने का दर्जा कायम भी है।

जब कोई अखबार किसी "दुर्गा शक्ति नागपाल" के समर्थन में खबरे प्रकशित करता है तथ्यों के साथ, तो सारे देश को अच्छा लगता है। सच के लड़ाई को एक नयी ऊर्जा मिल जाती है। समाज में व्याप्त विसंगतियों के खिलाफ खबरें लिखता है उन्हें मुद्दा बनाता है तो ये पत्रकारिता  को और बल देता है। एक पाठक की तरह मैं अखबार पढते हुये ये महसूस करता हूँ की जब किसी अपराधिक घटना पर खबर प्रकाशित होती है तो आप दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका देते है, दोनों पक्षों की बात प्रकाशित करते है। ये सुखद होता है। पत्रकरिता का मूलमन्त्र भी यही है शायद," ख़बरों को निष्पक्ष रूप से पाठकों तक पहुँचाना" और खबर लिखने वाला एक माध्यम होता है ताकि खबरों की मूल और आत्मा संरक्षित रहे।


पता नहीं क्यों २-३ दिन पहले के कई अखबार पढ़ कर मुझे बड़ा अजीब सा लगा। मानो किसी व्यक्ति ने अपनी राय अखबार के बिहाफ़ पर प्रकाशित खबरों में थोप दी हो। न जाने क्यों लगा की मानों अख़बारों ने केवल एक ही पक्ष की बात को हेडलाइंस में समेट दिया। खबर जो न्यूज़ एजेंसी से आयी उसमे भारी बदलाव कर दिया अपनी व्यक्तिगत सोच को जिन्दा रखने के लिये? खबर कि निष्पक्षता जिस भी दृष्टिकोण से देखा बस सवालिया ही लगी। अख़बारों का पाठक होने के नाते जहाँ तक मेरी जानकारी है व्यक्तिगत राय किसी भी मुद्दे पर हो उसे सम्पादकीय में जगह दी जाती है? न की अखबार के मुख्य-पृष्ठ अखबार के बिहाफ़ प्रकाशित खबर में? क्या किसी व्यक्ति विशेेष को ड्रामेबाज कहने का हक़ अखबार को मिलता है किसी भी तरीके से? किसी भी आधार पर? और अगर किसी को ड्रामेबाज कहना भी था तो सर्वप्रथम आपको उसी खबर के साथ मामले के विशेषज्ञों की राय भी प्रकाशित करनी नहीं चाहिये थी? बिना विशेषज्ञ की राय जाने निर्णायक हो जाना किस हद तक सही है? आप ने शायद ध्यान नहीं दिया कि आप किसी को ड्रामेबाज कहने का हक़ नहीं। जब हक़ नहीं तो ड्रामेबाज कहने पर उस व्यक्ति की भी मानहानि ही हुई ना !!! मुक़दमा तो यहाँ पर भी बनता है। यहाँ पर शायद मजिस्ट्रेट साहिबा को सुओ-मोटो के तहत ही मुकदमा दायर कर देना चाहिये था पर ऐसा हुआ नहीं। आपको निर्णायक होना भी था तो केस की पृष्ठभूमि भी प्रकाशित की जा सकती थी। जिस व्यक्ति विशेष के साथ मुकदमा है उसके कार्यकलापों को भी जनता तक पहुँचाना भी आपका ही दायित्व है। खाकर जब इंटरनेट  दुनिया में आरोपों की फेहरिस्त मारी -मारी घूम रही हो ??  दुनिया में सब कुछ रिलेटिव है ये तो आइंस्टीन ने बहुत पहले बता दिया था। आपने ना जाने क्यों इस बात ही नहीं दिया कि ये लड़ाई सिद्धान्तो की है। ऐसी लड़ाईयाँ राष्ट्रपिता ने भी लड़ी थी। आप ना जाने क्यों भूल गये जिसे आप ड्रामे बाज कह रहे है उसने सतत संघर्ष किया है लोगो के बीच,एशिया के विशेषज्ञ उसे "एशिया का नोबल" देते है आप ड्रामेबाज कहते है। अजीब है ना ????

ये अकसर देखा जाता है कि बहुत सारे मामलात में कानून अन्धा भी हो जाता है, जाहिर है की कानून का परम्परागत दृष्टिकोण है,कानून किताबों में लिखी व्याख्यों से चलता है, और व्याख्या में बहुत सारे बुद्धजीवी विशेषज्ञ एक मत नहीं हुआ करते। पर आप चौथे स्तम्भ है, आपको अपना नजरिया बदलने में कोई रुकावट नहीं है, नये तरीकों को भी आज़माने में को व्यवधान नहीं है। शर्त बस एक ही है कि खबर निष्पक्ष रहे और व्यक्तिगत राय खबरों में न थोपी जाय बस, बाकि खबर का प्रस्तुतीकरण आपके हवाले है , व्यक्तिगत राय सम्पादकीय में बेहतर लगती है। आज जो सवाल मैं आपसे करने की कोशिश कर रहा हूँ यही गणेश जी की आत्मा भी कर रही होगी। निर्णायक न होना और निष्पक्ष रहना आपकी नैतिक जिम्मेदारी है और यही पत्रकारिता में ऊचे मानदण्ड बनाये रखने का जरिया भी।
                                                                                आपके अख़बारों के नियमित पाठक
                                                                                            -विक्रम     

नोट: कानून को अन्धा कहने के पीछे उसका परम्परागत दृष्टिकोण है। नीचे कुछ खबरें पढ़ी जा सकती है ऐसे बहुत से मामलात होते है बस चन्द ही सामने आते है।

१. Read Shamshuddin Fakruddin case of theft of 200 rupees.
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Boy-spends-one-year-in-jail-for-stealing-Rs-200/articleshow/9401616.cms
2. Kanpur: 28 year long battle of postman
http://ibnlive.in.com/news/up-postman-falsely-booked-for-pocketing-rs-57-let-off-after-29-years/437227-3-242.html

अन्धा कानून: शमशुद्दीन फकरुद्दीन केस: 200 रूपये के लिये काटी थी साल भर जेल।

शमशुद्दीन फकरुद्दीन केस:
मामला: 200 चोरी का केस
सजा का प्रावधान: २०० रुपये की चोरी के लिये 3 महीने से ज्यादा नहीं
गिरफ़्तारी के लिये सबूत क्या:
क्राइम पेट्रोल को देखे, अखबार पढ़े तो यकीन आ जायेगा की मामले में केवल और केवल शक के आधार पर लडके को जेल में रखा गया। कोई पुख्ता सबूत कभी था ही नहीं।
1 साल तक जेल में क्यों रहा :
बेगुनाही का दावा करता रहा, सरकारी वकील का इंतज़ाम होने में देरी हुयी, बेल नहीं ले सका क्यों कि बेल बॉन्ड की कीमत INR १०००० थी।
छूटा कैसे : गैर सरकारी संगठन ने मदद की, लगभग हर पहलू पर किन्तु अन्ततः न्याय व्यवस्था से थक हार कर, लडके को ये समझाया गया की वो अपना अपराध मान ले, वो अपराध जो उसने कभी किया ही नहीं था।
उसने अपराध मान लिया न्यायालय ने उसे चेतावनी दी और छोड़ दिया क्यों की वो निर्धारित ३ महीने से ज्यादा की सजा पहले ही काट चुका था।

गलत कहाँ हुआ :
1. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ, जिसमे ये कहा गया है की किसी मामले की निर्धारित सजा से ज्यादा पहोने पर बेल देनी ही होगी। पर बेल इस लिये नहीं दी गयी क्यों कि १०००० रूपये ही नहीं थे।
२. लडके के घर वालों का पता नहीं लगाया जा सका, जबकि लडके को घर कैसे जाना है ये पता था।
मतलब साफ़ है की न पुलिस ने न ही न्यायालय ने लडके के घर का पता जानने का ईमानदार प्रयास किया।
३. गिरफ्तारी के बाद घर वालो को खबर दी जानी चाहिये थी नहीं दी गयी।  जब घर का पता ही नहीं था तो खबर कैसे दी जाती?
४.  निर्धारित सजा से 9 महीने ज्यादा की सजा जेल में काटी, कोई हर्जाना नहीं दिया गया , दिया गया अपराधिक होने का तमगा
५. शुरू के ४ बिन्दुओं में न्याय प्रक्रिया से जुड़े लोगो की जिम्मेदारी बनती है। पर कोई जवाब नहीं तालाब किया गया। न कोई शिकायत दर्ज हुयी ,न कोई कार्यवाही। जबकि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना भी हुयी साथ-साथ मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन।

न्याय व्यवस्था जिम्मेदार कब होगी? जो गुमराह कर रहे है या जिनके पास पूरी जानकारी नहीं है वो  दुरुपयोग ही तो कर रहे है। पुलिस के दकियानूसी तौर तरीकों का क्या होगा?
सामाजिक बहस इन मुद्दों पर बनती है पर अफ़सोस अख़बारों  और बड़े मुद्दे है
Shamsuddin  Fakruddin: case aise bhi hote hai


http://timesofindia.indiatimes.com/india/Boy-spends-one-year-in-jail-for-stealing-Rs-200/articleshow/9401616.cms

समाजवाद यादव!!!

हिन्दी की एक चर्चित कहावत है "खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे !!" आजकल उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में कई खम्भे नोचे जा रहे है। बहनजी और भाईसाहब सब ताव में है है बड़े-बड़े मठाधीशों के छक्के छूट गये । कल तक लाल बत्ती का साया सर पर था आज साइकिल में भी जगह नहीं मिल रही। कल लखनऊ में मथुरा के एक आदरणीय नेता जी का स्वागत लात और घूँसे से हुआ। नेता जी खम्भा समझ कर नोचे गये, और नोचा बिल्ली बहन के बिलौटे भाइयो ने। नुचे-नुचाये  नेता  जी आज अख़बारों छा गये, चुनाव के बाद ही सही सुर्खियों में आ गये।

लैपटॉप बाटने वाले भाईसाहब भी आग बबूला है।  36 को रास्ता दिखा दिया पर खुद जमे बैठे है!! वैसे इस्तीफ़ा दे भी तो क्यों उत्तर प्रदेश में कोई मुख्यमन्त्री है ही कहाँ?? उत्तर प्रदेश में तो भाईसाहब के धर्म भाई की सरकार है। अरे वही धर्म  भाई जिसका नाम "समाजवाद यादव" है। "समाजवाद" जी  80 के दशक में जन्मे थे लोहिया जी और जय प्रकाश जी के घर में , यहाँ शुरू में पालन पोषण उत्तम था बाद में लैपटॉप वाले भाई साहब के  अब्बा ने "समाजवाद" को गोद ले लिया। तभी से समाजवाद, "समाजवाद यादव" हो गया, और बिगड़ गया, इतना बिगड़ गया कि सम्भाले नहीं सभल रहा, "समाजवाद यादव" चुनाव का जश्न कुछ यूँ मनाता है कि गोलीबारी में ही २-४ को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। कभी मुजफ्फर नगर में होली खेलता है राम को भी मारता है और रहीम को भी।  कभी मजे लेने के लिये कानपुर के मेडिकल कॉलेज में घुस जाता है। जम कर इलाज़ करता है डॉक्टर्स का, सर से पाँव तक भयंकर इलाज़। कभी-कभी समाजवाद यादव भैसो के प्रति अपने प्यार को जाहिर करते हुये, प्रशासन की पुंगी बजा देता है। समाजवाद यादव जब घूमने निकलता है तो हाईवे पर बने टोल बूथ में भी जूता चलाता है, समाजवाद यादव का टशन, सबसे अलग रुतबेदार है, पर अभी-अभी समाजवाद यादव की  साइकिल पंचर हो गयी है पंचर कोई जोड़ नहीं रहा है। जोड़े भी तो कैसे समाजवाद यादव भाई ने पंचर जोड़ने वाले की कनपटी पर कट्टा लगा दिया है।

समाजवाद को हाल ही में बनारस जाना पड़ा नौका में बैठे ही थे की नाव पलट गयी। हुआ यूँ की जाने कहाँ से एक भीषण तूफान आ गया नाविक को दिखा ही नहीं किनारे पर दूसरी नाव से टकरा गया। तब तो जैसे तैसे जान बचा कर भागे थे पर अब जब होश आया है तो बनारस को सजा देने उतारू है, तूफान में पूरे बनारस के बिजली वाले तार भी हिल गये थे अब रिपेयर नहीं हो पा रहे सुना है की बनारस के बिजली घरों में समाजवाद यादव और उनके चट्टे और बट्टे फिर कट्टा लिये बैठे है। बोल रहे है कि साला नाववाला जान बूझ के डूबा दिस रहा हमको अब हम किसी को भी नहीं छोड़ेगे। हमरे पास कट्टा है बहुत सारे चट्टा और बट्टा है हमसे कोई  नहीं टकरा पाया तुम का टकराओगे, रुको बस थोड़े दिन और बस अगले 5 साल, अब्बाजान जब प्रधानमन्त्री बनेगे तब हम पूरे देश नाकाबन्दी करवा देंगे!! बुड़बक कहीं के हमको गंगा में जब से गिराया है ना तब से खुजली मची है पूरे बदन में और दूसरी तरफ शाला  हमरे सब के सब खेत इटावा तक चिड़िया चुग गयी ……  

नरेन्द्र मोदी जी और राजनाथ जी के नाम एक ध्यान आकर्षण पत्र ...

श्री नरेन्द्र मोदी जी/राजनाथ जी
सबसे पहले आप को आपकी शानदार जीत पर बधाईयाँ !! विगत चुनाव में आपकी जीत ने भारतीय राजनीति में व्याप्त कई मिथक तोड़े, उम्मीद करता हूँ की आप स्वयं आगे चलते हुये कई और मिथक तोड़ कर देश और देशवासियों को और आगे ले जायेंगे। जाहिर है कि आपकी सफलता यूँ  नहीं आयी इसके पीछे आपकी कुशल रणनीति और जीतोड़ मेहनत भी है। कल ही अखबार के माध्यम से जाना कि आपने और राजनाथ जी ने मिल कर विगत चुनावों में धरती से चाँद के बीच की दूरी से ज्यादा दूरी तय की। चुनावो के दौरान आपने जनता से जो संवाद किया उसके आधार पर मैं मान चुका हूँ की राजनीति आपके लिये मिशन है। आप शासक नहीं सेवक है!!आगे जाते हुये आप मेरे और मेरे जैसो की धारणाओं को सही साबित करेंगे ऐसा मेरा मानना है। जाहिर है की आगे चलते हुये विकास के मूलमन्त्र के साथ आप लोकतन्त्र और उसकी व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ करेंगे। 

जब चुनावों का दौर चल रहा था तब अख़बारों में पढ़ा की कई चुने हुये सांसद पिछले चुनाव के बाद अपने क्षेत्र में  दुबारा ५ साल बाद लौटे, सीधे चुनाव प्रचार के लिये!! बीच के पाँच सालों में जनता से मतलब,जनता से जुड़ाव ना के बराबर था। सब अपने कामो में लगे हुये थे। कोई फिल्मो की शूटिंग में तो कोई अपने व्यवसाय में। चुनाव के समय जब जगह-जगह वादों का दौर चल रहा था उस समय मैं ये जानने की कोशिश में लगा हुआ था कि एक सांसद के चुने जाने के बाद उसके कर्त्तव्य और जिम्मेदारियाँ क्या होती है? काफी खोजबीन के बाद पता लगा की इस मुद्दे पर कोई प्रतक्ष्य व्याख्या उपलब्ध नहीं है। चुनाव आयोग और लोकसभा स्पीकर के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार चुने गये सांसद जिस दल के है वो दल उन्हें दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। लोकतन्त्र के इतिहास में कई ऐसे लोग भी है जो लगातार जनता की सेवा में लगे रहे और कुछ ऐसे भी है जो एक बार चुनाव में हाथ जोड़ कर गये उसके बाद 5 साल तक मुड़ कर नहीं देखा। लोकतन्त्र को जन्मे ६५ बरस से ऊपर हो गये पर अभी तक इस मुद्दे को शायद ही कभी नहीं अहमियत दी गयी।

एक चुने गये सांसद को वेतन का प्रावधान है अर्थात सांसद भी वेतनभोगी हुआ। अमूमन वेतनभोगी लोगो के लिये ये जरूरी होता है की वो दफ्तर में एक नियत समय जरूर गुजारे। तो फिर ऐसा सांसद के लिये क्यों लागू नहीं होना चाहिये? ऐसा क्यों नहींभी ये होना चाहिये की कम से कम ६ महीने का समय सांसद अपने क्षेत्र में गुजारे? जनता समस्याये जाने और समझे!! जब सांसद के क्षेत्र में कोई निर्माण कार्य चल रहा हो तो वो उसका निरीक्षण करे। काम समय पर हो, काम के काम में कोई कोताही ना बरती जाये ये सुनिश्चित करे? इलाके  की सरकारी मशीनरी को मोबिललाइज करे, हर वर्ष वेबसाइट के माध्यम से या फिर किसी अन्य माध्यम से कराये गये कार्यों की जानकारी जनता को मुहैया कराये। शायद मेरी बातें थोड़ी अटपटी लगे लेकिन उस लोकतन्त्र का मतलब सार्थक नहीं हो सकता जिसमे जनता से संवाद 5 वर्षों में हो। जो आपके नाम पर आपकी पार्टी के नाम पर जीत कर आया है उसे आपके जैसा ही होना चाहिये काम से काम  मामले में।ये सुनिश्चित करना भी आपकी जिम्मेदारी है। 

सत्ता पाने कीमत हर उस आदमी को पता होनी चाहिये जो उससे जुड़ा है। मेरे क्षेत्र का सांसद मेरी बात आप तक पहुँचाने का माध्यम होना चाहिये एक सेवक की तरह। क्या आपकी सरकार और आपकी पार्टी इस पर कोई नियम लागू करेगी? क्या आप ये निर्देश देंगे की चुने जाने के उपरान्त सांसद का प्राथमिक कर्त्तव्य जनता के बीच जाकर काम करना है न की सत्ता सुख  मदहोशी में खोये रहना। आपको लोकतन्त्र के बन चुके मायने बदलने होगे। जनता को भी ये बताना होगा की आप अपने सांसद को ट्रैक करे कितने दिन काम किया? क्या काम किया? लोकतन्त्र जब दोतरफा संवाद का जरिया बन जाये तो बेहतर होगा आपके लिये भी देश के लिये भी। कृपया सांसदों और उनके माध्यमो से सरकारी तन्त्र की जवाब देही तय  करने का प्रयास शुरू कर दे। जब किसी थाने में कोई fir नहीं लिखी जाये तो जवाबदेही जन प्रतिनिधियों की भी होनी ही चाहिये। सड़क जब बन का एक बारिश में टूट जाये तो जिम्मेदारी जान प्रतिनिधि की भी होनी ही चाहिये!!!

                                                                                             समस्याओं से त्रस्त नागरिक 
                                                                                                    ---विक्रम---

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक पत्र

अरविन्द जी,
मैं भी एक आम आदमी हूँ और आपका शुभ चिन्तक भी,  इसी नाते कई बार सोचा की आपको खत लिखूँ , अपनी  भावनाओं से अवगत कराऊ, पर लिख नहीं पाया। हर बार बस अपने मन की पीड़ा को, व्यथा को सहता रहा। वैसे भी सहने की आदत है मुझे चूँकि मैं आपकी तरह आम आदमी हूँ ना।  मैं वो आम आदमी हूँ जो जनलोकपाल आन्दोलन के दौरान आपका और टीम का साथ देने के लिये कभी दफ्तर का काम छोड़ कर चला आता था तो कभी खुद ना आ पाने की स्तिथि में परिवार के लोगो को भेज देता था। दफ्तर के बाहर भी सहकर्मियों के साथ आन्दोलन करता था। वीकेंड्स पर परिवार साथ खड़े होकर अपने शहर के चौराहों पर जनलोकपाल के समर्थन में नारेबाजी करता था। कैंडल मार्च  भी खूब किया, घरों में सो रहे लोगो को माइक पर बोल कर जगाने का प्रयास भी किया। मेरी कार में आज उस पोस्टर के निशान बाकी है जो मैंने जो मैंने जन लोकपाल आन्दोलन के दौरान चिपकाये थे। "मैं भी अन्ना तू भी अन्ना"

मैं पिछले २-३ वर्षों में आप से और जनलोकपाल आन्दोलन जुडी कई घटनाओं को लेकर बड़ा व्यथित हुआ। तब मैं बिलकुल दृढ़ था जब आप और अन्ना जी बारी-बारी से अनशन पर गये, पर  सरकार ने आपको अनसुना दिया। मैं तब व्यथित, विचलित तब हुआ जब जन लोकपाल आन्दोलन में सेंध लग गयी। मुझे नहीं पता की "इंडिया अगेन्स्ट करप्शन" टीम क्यों टूटी पर उसका टूटना हर हाल में गलत था। देश के लोगो की उम्मीद टूटने से काम नहीं था वो!!! आप ने राजनीति चुनी शायद ही अच्छा किया। लोगो ने 10 रुपये  "आप" के खाते में जमा कर अपना मूक समर्थन भी दिया। आप ने दिल्ली में जीतोड़ मेहनत की, आपने सत्ता बदल दी। आपने दिल्ली में सरकार बनायीं तो लोगो को अपने सपने साकार होते हुये लगे।आपने कर्मठता दिखाते हुये स्थापित नेताओं और राजनीतिक परम्पराओं को एक नयी दिशा दी। आप की जीत से पूरे देश में नयी लहर दौड़ी थी ऐसा लगा था मानो अब देश बदल जायेगा। प्राथमिक विद्यालयों को धन मुहैया करवाया अच्छा किया। आपने बिजली की दरे काम की , बिजली कम्पनी का ऑडिट करवाने का प्रयास किया। आपने भ्रस्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए हेल्पलाइन शुरू की अच्छा किया। आप ने अच्छी शुरुआत की पर दूरदर्शी नहीं लगे आप, आगे चलते हुये परिपक्वता का परिचय देने में थोड़ा सा लड़खड़ाये।जन लोकपाल के मामले में आप भावावेश में बह गये आप आपने पद त्याग दिया।लोगो की उम्मीद टूटी देश की उम्मीद टूटी!!!

मैं तब भी व्यथित हुआ था जब आपने लोकसभा चुनावो में लड़ने का मन बनाया पहले तो लगा की आप दिल्ली में लड़ेंगे, वो शायद ठीक भी होता। पर आपको न जाने क्या हुआ की आप देश भर से लड़ने के लिये तैयार हो गये!!! ना संगठन, ना धन, ना ही बड़े चेहरे और सबसे बड़ी  बात कोई अनुभव भी नहीं और कोई अनुभवी साथ भी नहीं। यहाँ पर आपका फैसला अतिमहत्वाकांक्षी लगा। आप धीरे-धीरे कछुये के मानिन्द चलते तो अच्छा होता पर आपने खरगोश वाली चाल चली, कदम कहीं ना कहीं लड़खड़ाने तो थे ही। ये तय था की दिल्ली जैसी सफलता तो आपको नहीं मिलेगी। आपने बनारस में मोदी को चुनौती दी वो गलत नहीं था । पर आपने चुनौती दी बिना किसी नीति के बिना किसी ठोस आधार के, बिना किसी जमीनी आधार के, एक तरफ 13 का सिद्धहस्त मुख्यमन्त्री था जिसकी पीठ अमेरिका के राजनीतिज्ञ भी विकास के लिये तपथपा चुके है। दूसरी तरफ आप ५० दिन की सरकार वाले आपने काम शुरू तो बहुत किये, पर मूर्त रूप किसे दे पाये आप? ना जनता की उम्मीदों को और न ही भ्रस्टाचार के खिलाफ लड़ायी को !! भला आपको लोग वोट क्यों देते? वो उस विरोधी के सामने जो अपने प्रदेश का विकास मॉडल बेच रहा था। जिसके खरीददार भी सब जगह थे। बनारस वालों ने आपको फिर भी स्वीकार किया, बनारस वालों ने आपको ससम्मान हारने का मौका तो दिया। 

मैं आज भी विचलित हुआ, जब "आप" चुनाव हार गयी, मुझे ये पता था कि आप हारेंगे!! पर ये भी उम्मीद थी की "आप" कुछ करेगी  शायद इसीलिये आप की हार की पीड़ा हुयी। चुनाव के कुछ दिन पहले जब २ लोग मेरे आवास पर आम आदमी पार्टी की टोपी और पोस्टर लेकर आये थे और निवेदन किया था की बदलाव के लिये वोट कीजिये। उस दिन भी मैं विचलित हुआ था सोच रहा था कि मैं "आप" को वोट न देकर शायद गलत करुँगा। मैं हर उस आम आदमी का दोषी बन जाऊँगा जो जनता और उससे जुड़े अधिकारों की लड़ायी के लिये उठ खड़ा होता है। मैं दुविधा में था की क्यों और कैसे मैं भूल सकता हूँ की आप मेरे मूलभूत अधिकारों के लिये लड़ायी लड़ी है। पर जब भावनायों का गुबार थमा था तब मैंने वो किया जो देशहित में उचित था। पर फिर भी आम आदमी होने के नाते आप के लिये पूरा सम्मान तब भी था अब भी है। शायद इसीलिये जब चुनाव परिणामो के उपरान्त ना जाने क्यों लगा की विकास के बड़े-बड़े नारों के बीच ईमानदारी कहीं दब सी गयी। विकास देश के लिये जरूरी है पर साथ-साथ आदमी के अधिकार भी बेहद जरूरी है जिनके लिये आपने कई लड़ाईयाँ लड़ी। आप विपक्ष में होते तो बेहतर होता विकास के साथ-साथ अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो जाती। हालाँकि अभी आप पूरी तरीके से हारे नहीं है, और ऐसा मानियेगा भी मत। चिन्तन करिये, मनन करिये और किताबी ज्ञान वाले लोगो से दूर रहिये आगे नये रास्ते खुलेंगे। परिवर्तन लड़ायी एक ईमानदार ग्राम प्रधान से भी शुरू हो सकती है और एक ग्राम प्रधान को जागरूक करने का काम आप से बेहतर कौन कर सकता है। आप जैसे लोग सत्ता में भले ना हो पर आपकी उपस्थिति जरूरी है। आपको देश की राजनीति को नयी दिशा देने का श्रेय देना भी बनता है। आपने बदलाव लाये है। पर कई मौकों पर आपने गलत फैसले लिये। फैसले हमेशा सही नहीं होते पर फैसला लेते समय दूरदर्शी होना बेहतर होता। क्षणिक भावावेश में बह कर निर्णय लेने वाले के लिये देश चलाना मुश्किल होगा ये सब समझते है और मानते भी है।

आपको दिल्ली में इस बार विधानसभा चुनावों की अपेक्षा ज्यादा वोट मिले लगभग ३३%, पहले मिले मतों से ज्यादा है ५% ज्यादा ये हार नहीं जीत है आपकी। जब वोट राष्ट्रीय मुद्दों पर पड़ रहे थे तब भी दिल्ली के लोग आपको नहीं भूले। ये बात अलग है आप के लोग जीत नहीं पाये। आपको पँजाब में भी लगभग २५% मत मिले और संसद में प्रवेश का द्वार भी खुला। ये नयी सम्भावनाये है। आगे के चुनावो में जब भी मौका मिले तो सत्ता के माध्यम से लोगो को ये जरूर बताइये की आप क्या कर सकते है। लोग फिर से आपको स्वीकार करेंगे आज नहीं कल सही समय के साथ बदलाव आता ही है। एक नये सिरे से खड़े हो जाईये देश को भी खड़ा कर दीजिये , क्यों की देश में राजनीति स्वच्छ रखने के लिये आप जरूरी है आपका प्रखर व्यक्तित्व भी। राजनीति में जीत और हार के कई कारण होते है पर किसी की सामाजिक स्वीकार्यता चुनावी परिणामों पर निर्भर करे ये जरूरी नहीं। समाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक स्वीकार्यता दोनों अलग है। कम से कम "मेधा पाटकर" जी की हार तो यही कहती है, ताउम्र लोगो के लिये लड़ने वाली आन्दोलन करने वाली मेधा ताई चुनाव हार गयी। हालाँकि ये मानने में अन्दर से बड़ा प्रतिरोध होता है पर सच यही है।

                                                                                     आपका शुभेक्षु
                                                                                       --- विक्रम -----

                         

समाजवाद नहीं बस केवल यादव परिवार जीता


उत्तर प्रदेश में समाजवादियों का हाल, समाजवाद नहीं बस केवल यादव परिवार जीता !!
5 सीट जीते
2 - पर खुद मुलायम सिंह
1 - बहू डिम्पल यादव
1 - पर भतीजा धर्मेन्द्र यादव
1  - भतीजा अक्षय यादव - पुत्र रामगोपाल यादव
बस गिनती खत्म!!! मतलब साफ़ है मुलायम के अलावा  ३ सीट मिली उनके परिवार के युवा सदस्य जीते, शायद मुलायम सिंह के परिवार के होने का लाभ मिला और थोड़ा बहुत लाभ युवा होने का।

Azamgarh69MULAYAM SINGH YADAVSamajwadi PartyRAMAKANT YADAVBharatiya Janata Party63204Result Declared
Badaun23DHARMENDRA YADAVSamajwadi PartyVAGISH PATHAKBharatiya Janata Party166347Result Declared
Firozabad20AKSHAY YADAVSamajwadi PartyPROF. S.P. SINGH BAGHELBharatiya Janata Party114059Result Declared
Kannauj42DIMPLE YADAVSamajwadi PartySUBRAT PATHAKBharatiya Janata Party19907Result Declared
Mainpuri21MULAYAM SINGH YADAVSamajwadi PartySHATRUGHAN SINGH CHAUHANBharatiya Janata Party364666Result Declared
                                      चुनाव परिणाम: चुनाव आयोग की वेबसाइट से


गृहमन्त्री शिन्दे साहब भी शोलापुर से हार लिये!!

ये हैं देश के गृहमन्त्री जो अपने बड़े बोलों के लिये जाने जाते है। कभी भी किसी भी बात का दावा कर देना इनकी आदतों में शुमार था।  गृहमन्त्री बनने के बाद आपने दावा किया कि "स्वयं सेवक संघ" हिन्दू आतंकवाद कप बढ़ावा दे रहा है . ऐसा इन्होने गृहमंत्रालय को प्राप्त रिपोर्ट्स के हवाले से कहा।  बस आरोप भर लगाया प्रमाणित नहीं किया? गृहमन्त्री रहते हुये किसी भी प्रकार की जाँच का आदेश दे सकते थे पर ऐसा करने के बजाय केवल आरोप मढ़ते रहे। ये देश के गृहमन्त्री को किसी भी हालत में शोभा नहीं देता के वो राजनीतिक फायदे के लिये बिना सर पैर की बात बोले।  पर जिसके वोट हासिल करने के लिये ये सब किया उसी जनता ने नकार दिया। मन्त्री साहब हार गये।

आदर्श सोसाइटी घोटाले की रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार ने आप जैसे बड़े लोगो को बचाने  लिये ही ख़ारिज की थी शायद। मतलब सच आपके राजनीतिक वजन नीचे गया अब शायद करवट बदले ……

चुनाव परिणाम: शोलापुर संसदीय क्षेत्र

शिन्दे साहब का छोटा सा परिचय

देश के गृहमन्त्री के दावे: जाँच नहीं करवायी जब की करवा सकते थे ??

नेशनल कॉन्फ्रेस जीरो, जनता हीरो !!

नेशनल कॉन्फ्रेस जीरो??? छोटे और बड़े अब्दुल्ला साहब कहाँ गये? भाई हार की नैतिक जिम्मेदारी तो ले लो, मुख्यमन्त्री पद से त्यागपत्र तो बनता है है भाई :)
जम्मू -काश्मीर में  भाजपा की उपस्थिति का जिक्र इस लिये कि वो लोग जो लोग ये मानते है की काश्मीर भारत का अभिन्य हिस्सा नहीं है उनको ये जान लेना चाहिये की जनता क्या चाहती है !!

भाजपा ने ६ में ३ सीट पर जीत दर्ज की।
   १. ऊधमपुर  से भाजपा जीती




 2.  जम्मू -काश्मीर से भाजपा


३. लद्दाख से