आजकी शाम मैं फिर अश्क़ पी रहा हूँ ,

आजकी शाम मैं फिर अश्क़ पी  रहा हूँ ,
कोई मिला ही नही अपना ग़म सुनाने को
हर तरफ धुंद है न चिराग है न जुगनू है कोई
अब इस बस्ती में  नहीं है कोई शख्स  पहचानने को

सिर्फ कांटे ही बचे है मेरे गुलिस्तां में ,
फूल तो बिखरे हुए हैं तेरे आशियाने में।
अक्स पूछता है अब मुझसे मेरा बता कौन है तू
पह्चान तो वो ले गया मेरी अपने फ़साने मे

अब ग़मे जिंदगी जिए जा रहा हूँ
बिखर के लहू को सीए जा रहा हूँ
जिसने ताउम्र सच नहीं बोला
उसके वादे पे ऐतबार किये जा रहा हूँ
                                      
                                     - आशुतोष मिश्रा




नेता महात्म्य

नेता महात्म्य 

हे नेता अब दरस दिखा दो 
सूनी अखियों में अब एक आस का दीप जला दो 
हे नेता अब दरस दिखा दो। 

पहले स्वप्न हो खूब दिखाते 
जनता के प्रतिनिधि कहलाते 
फिर जनता कि निधि को अपना कोष समझ कर खूब उड़ाते 
पांच साल में तुम नर से नारायण हो बन जाते 
हम को भी ये रहस्य  बता दो 
हे नेता अब दरस दिखा दो। 

छलिया बनकर चार साल तक  खूब सताते 
चैन कि बंसी खूब बजाते 
 भैसों संग हो खूब इठलाते 
साल पांचवा आते ही 
कर्मयोगी बन गीता का पाठ पढ़ाते 
अब अपना ये मर्म बता दो 
हे नेता अब दरस दिखा दो 

आज मोक्ष का मार्ग सरल है 
तुमसे मिलना अति विकल है 
हम को भी ये पथ दिखला दो 
हे नेता अब दरस दिखा दो 

तुम रणछोर हो चारा चोर 
तुम से ही है पाप चहुँ ओर 
सदन में कुर्सी खूब चलाते 
अपने शत्रु को खूब छकाते 
जनता तुमसे होती त्रस्त 
इस पर भी तुम न सकुचाते 
तुम हो लज्जाहीन शिरोमणि 
हमको भी ये वरदान दिला दो 
हे नेता अब दरस दिखा दो 

समर्पित - श्री विक्रम प्रताप सिंह को जिनके सानिध्य में मैंने व्यंग्य कवितायेँ लिखना सीखा

चार बोतल वोडका .....और पाकीजा हसीना "सनसनी लियॉन"

यो यो हनी सिंह जल्दी ही बीमार बेहद बीमार होने वाले है। अगर बीमार नहीं भी हुए तो जेल तो जायेगे ही। चार बोतल वोडका डकार जाते है रोजका डकारने के बाद लडकियों  के आस मड़राते है। हरकरते ठीक नहीं है इन साहब की!! आजकल पीकर पाकीजा हसीना सनसनी लियॉन के आस पास मड़राये तो कोई बात नहीं,  ये पाकीजा हसीना है ज्यादा फील नहीं लेती या यूँ भी कह सकते है की फील ले भी तो किस चीज की? अब बचा ही क्या है। पर अगर किसी और अदाकारा के चंगुल में फस गये तो पक्का लपेटे जायेगे। मिक्का सिंह वाली हालत होगी कि किया धरा कुछ नहीं खर्चा हो गया सब कुछ। भला चार बोलत वोडका लगा कर कर भी सकता है आदमी फाइनली नाली में गिरने के शिवाय। चार बोतल वोडका मतलब परमानेंट नशा, चार बोतल रोज लगाने के बाद हैंग-ओवर उतरने का मौका ही नहीं मिलना भाई को स्विमिंग पूल में फेक दो तभी उतरे शायद !!

देवदास बेवड़े हो गये दारू पी-पी निपट गये पर उनके पास असाधरण कारण था पारो के प्यार पमें रम, वोडका वोडका, व्हिस्की सब लपेटी पर पारो के पराये हो जाने का गम उनसे न सहा गया। अब यो यो साहब पी रहे है पर पता नहीं क्यों? क्या पाकीजा हसीना सनसनी लियॉन के प्यार में पड़ गयें है? अगर पड़ गये  है तो इनके बड़े ख़राब दिन आने वाले है , घर वाले पेलेंगे इनको वो अलग लोग भी बहुतय पेलेगे।  का प्यार करने के लिये और कोई मिला ही नहीं जो इस हद तक गिर गये , अब हर कोई महेश भट्ट थोड़ी ही है जो नारी सशक्तिकरण के नाम पर इनको मौका दे दे। मुहब्बत के में मशहूर होने की जुगत में यूँ तो मुगलेआजम शहज़ादा सलीम भी कई प्याला डकार जाते थे पर वो जिससे प्रेम कर रहे थे वो नाजनीन थी , महजबीन थी वो नूरेनज़र थी वो अनारकली थी उनके आगे यो यो की प्रेमिका सनसनी तो बस छिपकली ही है इनके प्यार में मरे तो संत वैलेंटाइन भी डण्डा लेकर वापस आयेगे और जोर का कन्टाप धरेंगे यो यो के, और बोलेगे अबे जब चश्मा लगा कर आँखें चौधिया जाती है तो काहे लगाते हो, सनसनी में का तुमको मधुबाला नज़र आ गयी? अबे कुछ तो शर्म करो मधुबाला से न सही किसी बाला से ही प्रेम करो ये सनसनी बाला नहीं बला है, तू पीछे पीछे हो लिया बहुत मनचला है। अगली बार वैलेंटाइन में आना पड़ा तो मार -मार ट्वी लाल कर दूँगा। चल निकल अब बेवड़ा कहीं का।

यम जब लेने आयेगे तो बहुत गलियायेगे, यो यो जब तुमको सनसनी के प्यार में पड़ना था तो पिए काहे मर वो वैसे ही जाते, पीकर जल्दी निपट गये साला टाइम से पहले आना पड़ा तुम्हारे चक्कर में चलो ऊपर देखता हूँ तुमको अपने भैसें के सामने बीन बजवायूँगा बिना रुके बिना थके और दारू की बात की अगर वो मार पड़ेगी  धरती पर मिलने वाली पुलिस की थर्ड डिग्री भी फेल हो जायेगी। मुहब्बत का मजाक बना कर रख दिया तेरे चक्कर में धरती में लोग मुहब्बत करना छोड़ देंगे चल साथ झिंगा ला ला हूँ भी खेला जायेगा तेरे साथ।

गंगा स्नान

उस दिन जब अरविन्द ने गंगा स्नान किया और दूसरे दिन समाचारों के माध्यम से स्वस्थ्य दिखे, उसी समय मुझे अरविन्द की आन्तरिक प्रतिरोधक क्षमता का लोहा मान लेने के लिये मजबूर होना पड़ा। गंगा स्नान करना नाको चने चबाने से कम नहीं है। कानपुर में चमड़ा उधोग ने माँ गंगा पर इतना कहर बरपाया है कि जब कानपुर के शुक्लागंज घाट कोई श्रद्धालु नहाता है या अपने पाप धोने आता है तो दूर कहीं चर्म रोग की किसी क्लीनिक में कोई डॉक्टर ठहाके मार कर रूपया गिनने में मसगूल होता है। "पिलको दाद काट", कुआडीडर्म, "जालिम लोशन" जैसी कई मशहूर मरहमों के कर्मचारियों को ओवरटाइम करना पड़ता है। अरविन्द नहा कर सही सलामत रहे ये अदभुत है, भले ही उन्होंने काशी में नहाया हो पर गंगाजल बनारस कानपुर से हो कर ही जाता है। अरविन्द पहले से ही खाँसी पीड़ित है और इस बात का शोर है चहू ओर। जरा सोचिये अगर चर्म रोग का शिकार हो जाते तो मीडिया तो दूर उनके स्वजन उनके कट्टर समर्थक भी कन्नी काट लेते, छुआ-छूत और संक्रामित होने वाले रोगो के बारे में लोगो की राय पहले से ही है  सो यकीनन मतदान करने से पहले भी आदमी एक बार तो सोचता ही की कहीं वोटिंग मशीन में झाड़ू का बटन दबाने से चर्म रोग ना हो जाये, मतदान तो दूर की बात हो गयी यदि आम आदमियों को पता चल जाता तो अरविन्द जनसम्पर्क अभियान तक न चला पाते। अरविन्द तो बच लिये वोट भी शायद उनको मिल ही जाये पर "जब कभी आप गंगा नहाये तो पहले पिलको दाद काट लगाये" 

एक सलाह और यदि आप कभी गंगा नदी में नौकायन करने की इच्छा रखते है तो पहले कुछ जरूरी सावधानियाँ जरूर बरते ना बरतने पर बड़े खामियाजे भुगतने पड़ सकते है। नाव के पास किनारों में जाने से पहले आस-पास देखे फिर पाँव रखे यदि जूते और अपने आपको को साफ़ रखना चाहते है तो। जब नाव पर बैठे तो नाक और आँख बन्द करना ना भूले, अगर भोल जाते है तो शतप्रतिशत आप भी गंगा को थोडा और गन्दा करके लौटेगे। नौकायन के उपरान्त जब रात में बिस्तर पर जाये तो कोशिश करे की आप भगवन बजरंगबली की चालीसा का जाप जरूर करे।  "भूत पिशाच निकट नहीं आवे महाबीर जब नाम सुनावे" क्यों कि ये लगभग तय की गंगा में नौकायन आप के पीछे कुछ भटकती आत्मायों को लगा सकता है, ये आत्माये वैसे तो मनुष्य या जानवर किसी की भी हो सकती है किन्तु दोनों ही स्थिति में आत्माये अशान्त होने की सम्भावनाये भरपूर है।
साभार - ज़ी न्यूज़



















 माँ गंगे का जल कभी पवित्रता का मानक हुआ करता था, शुद्ध जल की परिभाषा भी यहीं से शुरू होती थी, एक रसायनविद की भाषा में कहे तो रंगहीन, गन्धहीन हुआ करता था, आवर्तसारणी के कुछ जरूरी तत्व जैसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात सहज सरल हुआ करता था, पर वक़्त बेहद क्रूर था और आदमी मगरूर था, इसी गहमागहमी में माँ गंगे क्रोमियम युक्त हो गयी, पानी का रंग स्याह हो गया जगह और लोगो के हिसाब से कई और बदलाव भी आये. हर छोटी नदी और नाला अपना रंग लिए माँ गंगे में समाहित होता चला गया। यकीन मानिये माँ गंगे अब तक खुद के भी अभिलाक्षणिक गुणो को भी भूल चुकी होगी। गंगाजल के नाम से फिल्मे बन गयी हिट भी हुयी पर माँ गंगे और दूषित ही हुयी। अब तो वही हाल है जो रन फ़िल्म में पेटीकोट बाबा का हुआ था, "साला छोटी गंगा बोल के नाले में कुदा दीस" एहसास यही होना है भले ही किसी भी रिहायशी इलाके से प्रवाहित होने वाले घाट पर स्नान कीजिये

परम्परायों और मान्यतायों के अधीन रहना तो हर नागरिक ने सीखा है, वो मान्यतायों को दरकिनार ना कर बला से भी बचना चाहता है पर अफसोस अपने पर हावी आभाषी और भौतिक बलाये वहीं छोड़ आता है जहाँ स्नान करता है। अपने घर को सब साफ रखना चाहते है, अपने घर में जो गंगा जल रखना चाहते है वो भी साफ़ ही रखना चाहते है, पर दोनों सम्भव नहीं है। सरकारों ने समाजसेवियों ने यूँ तो बड़े प्रयास किये की गंगा साफ हो जाये पर पर लोगो के रहते ये कैसे सम्भव है लोग तो लोग है "अपन काम बनता भाड़ में जाये जनता" वाला राग आलाप रहे है। अपने स्वजनो को मरणोपरान्त गंगा में तैरा देते है, शान्ति की तलाश में, अरे भाई शान्ति तो खुद ही बह कर ठिकाने लग गयी होगी गंगा के प्रचण्ड बहाव में इंसान की क्या विसात। कुछ लोग नित्य क्रिया कर्म भी माँ की गोद में ही कर लेते है, जहमत नहीं उठाते दूर जाने की, जब गणेश चतुर्थी आती है, जब दुर्गा माँ का पूजन होता है तो अत्यधिक भार माँ गंगा को सहना पड़ता है वो सहती तो है पर चुप रहती है  हाँ कोई विकल्प भी शेष नहीं है, करे तो क्या करे? सरकारों ने ऐसे प्रयास किये की गंगा के पानी के साथ -साथ रुपया भी पी गये, देखना ये है की वो सब जो गंगा को गन्दा कर रहे है उस सबको स्वर्ग मिलता है नर्क !! काश किसी को नर्क मिला होता और इस बावत कोई खबर अखबार में चाप गयी होती तो माँ गंगा थोड़ी साफ़ होती।

राजनाथ जी, सहने की भी सीमा होती है

माननीय राजनाथ जी
अखिल भारतीय अध्यक्ष भाजपा,

पिछले कुछ दिनों से अख़बार और समाचार पढ़ कर मन में एक प्रश्न लगातार दस्तक दे रहा है। सोचा आप से पूछ ही लेता हूँ, आप और आपकी टीम जब कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीन दयाल उपध्याय की प्रतिमायों का अवलोकन करती है, पुष्प चढ़ाती है, उनके समाज के प्रति योगदान की चर्चा करती है तब क्या आप के दिल उनके लिए कितना सम्मान होता है? क्यों होता है? इसलिये की आप उनके पद चिन्हो पर बढ़ना चाहते है या फिर इसलिये की जिस धरातल पर आप खड़े है ये उन्होंने ही बनाया था? ये वो लोग हैं जो पहले थे पर अब नहीं है। आपको महसूस नहीं कर सकते, आपको चुनौती भी नहीं दे सकते क्या इसीलिये इनका सम्मान कायम है? जो अब भी है, जो भाजपा का पर्याय रहे है पर संगठन में उतने ताकतवर नहीं जितने की हुआ करते थे उनका कितना सम्मान करते है आप? ये बात आपको सन्देह की स्थिति खतम करने के लिये खुद आगे आकर बतानी चाहिये। शायद आपको याद हो अटल जी ने कहा था "सहने की भी एक सीमा होती है" …

साभार : दा हिन्दू
आडवाणी जी भाजपा है, भाजपा ही आडवाणी ऐसा का कम से कम आपके मुखिया बनने से पहले तो था ही आडवाणी ने रथ निकाला तब भाजपा बड़ी हुयी, आडवाणी साम्प्रदायिक हो गये बाकी बच गये, "रामलला हम आयेगे मन्दिर वहीं बनायेगे" ये आडवाणी के युग में ही हुआ था जो भाजपा के उदय का सूत्रधार भी था। आज से साल भर पहले की भाजपा के पाँच बड़े नेतायों का जिक्र आपसे करने को कहा जाय तो कौन से नाम लेगे आप? आडवाणी जी, जोशी जी और जसवन्त सिंह, सुषमा स्वराज, आप या कोई एक और अन्य ही आयेगे। ये मान लेना भी उचित होगा की नेता न केवल भाजपा के बड़े नेता थे बल्कि देश के भी सर्वमान्य नेता थे, नेहरू और गाँधी परिवार के पैदाइशी नेतायों की बात छोड़ दे तो सेल्फ मेड नेता यहीं तो थे? पर न जाने क्यों यकायक स्थितियाँ इतनी बदल गयी की ये नेता प्रसंगहीन हो गये। जोश एक चीज है अनुभव दूसरी दोनों का सन्तुलन नितान्त आवश्यक है, नहीं होने पर दुष्परिणाम जाहिर है। वैसे बी वृद्धजनो के पुनर्वास हेतु तो सरकारें भी प्रयासरत रहती है आपको भी कोई ना कोई योजना तो भाजपा में भी लागू करनी चाहिये क्यों कि आज जहाँ आडवाणी जी है  जसवन्त जी है ,जोशी जी है वहाँ कल आप भी होगे, समय बड़ा बलवान होता है और कहते है की इतिहास अपने आपको दोहराता है। जो शिक्षा आज भाजपा के युवा मोर्चा को आप और आपकी टीम दे रही है वहीं कल आप पर भी लागू होगी।

आप भौतिक विज्ञान के अध्यापक रहे है, क्रिया प्रतिक्रिया के नियम को आपसे बेहतर भाजपा के अन्दर और कौन समझ सकता है। आपको मान लेने(Assume That) का महत्व बेहतर पता है बिना इसके भौतिक विज्ञान है ही नहीं, कोई भी इति सिद्धम तभी हो सकता है जब शुरूआत में आपने कुछ मान लिया हो। आपको ये मान लेना चाहिये था की इस तरह की माँगे और विरोध तब जरूर होगे जब आप स्थापित नेतायों के चुनाव क्षेत्रों से छेड़- छाड़ करेगे। अब जब दौर चुनावी है तब आप बड़े और बूढ़ों का आशीर्वाद खोते दिखायी दे रहे है। ये कहना बेहतर होगा की आप उनसे बैर ले रहे है इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते है। ये रणनीतिक खामी है और मुखिया होने के नाते ये आपकी ही जिम्मेदारी थी कि पार्टी का अनुभव बिखरने ना पाये। इससे पहले की बहुत देर हो जाये आप कोई अच्छा निर्णय ले, जसवन्त सिंह भारतीय राजनीति में बड़ा नाम है लोग भाजपा के चेहरे की कल्पना जब करते है तो आप से पहले जसवन्त जी की तस्वीर आती है। उनका पार्टी से दुखी होकर जाना भाजपा के लिये वाटर लू भी साबित हो सकता है, सहानुभूति में बड़ी ताकत होती है ये तो आप समझते ही है। अब तो सुषमा जी भी अपनी नाराजगी जाहिर कर चुकी है उनसे बेहतर और ओजस्वी वक्ता फिलहाल भारतीय राजनीति में तो नहीं है, उनका एक बयान हलचल मचा सकता है। आगे कुछ हुआ तो स्थितियाँ नियन्त्रण से बाहर हो जायेगी और कहावत मशहूर है की "तब पछताय होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत"

आपको याद दिला देता हूँ कि उत्तर प्रदेश में भाजपा किस तरह खतम हुयी थी। १९९० के दशक में जब उत्तर प्रदेश में भगवा लहराता था तब लाल कृष्ण आडवाणी जी, कल्याण सिंह, उमाभारती भाजपा के सबसे बड़े नाम थे कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के सबसे बेहतर मुख्यमंत्रियों में से गिने जा सकते है। वो निर्विवाद थे पाक और साफ भी थे पर व्यक्तिगत अहम के टकरावों के चलते परिस्थितियाँ विषम हुयी और उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी , उमा भारती को भी कमोवेश इन्ही कारणों के चलते पार्टी से निकला गया। परिणाम स्वरुप भगवा परचम उड़ गया भाजपा 58 से १० सीटों में सिमट गयी।  वर्षों बाद आपने मन्दिर की बात छोड़ कर विकास की बात की अच्छा किया, देश को सुशासन देने की बात किया अच्छा किया, विकास पुरुष मोदी को आगे किया अच्छा किया। पर जो अब हो रहा है वो अच्छा नहीं, अति आत्मविश्वास आत्मघाती है।

आप अच्छी हिन्दी बोलते है, जब बोलते है तो आपके उच्चारण और हिन्दी की मौलिकता काबिले तारीफ होती है। आपका साक्षात्कार भी देखा है कई बार, बड़ी  साफ़गोई से जवाब देते है आप, आप जब उत्तर प्रदेश के शिक्षामन्त्री थे तब आप नकल आध्यादेश लाये थे, एक बेहतर और जरूरी प्रयास था इस सब के चलते आपका प्रसंशक हूँ और हितचिंतक भी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुये आपको सलाह प्रेषित कर रहा हूँ। बेहतर होगा की आप २-४ सीटों के मोह में अपनों का साथ ना छोड़े। 

डूड - दा मर्द ( Dude the Mard)

वो एक डूड था
दिखने में क्यूट था
बॉडी में टी शर्ट थी
पाँव में नुकीला बूट था
डूडीयत के साथ बन्धन अटूट था

दफ्तर में डूड के क्यूबिकल के पास
एक दिन बहार आ गयी
कुछ कलियाँ खिली
कुछ फूल भी
फूल भाति-भाति के
कुछ सूरजमुखी के
कुछ गुलाब के

डूड के दिल में ख्याब था
उसे चाहिये पूरा गुलाब था
जब आस पास फूल खिलने लगे
डूड के दिल में दिये जलने लगे

डूड जल्द ही महने लगे
गैरैया की तरह चहकने लगे
डूड ने खूब किया साज श्रृंगार
केश सज्जा की बार-बार
इधर उधर चान्स मारा
लगे खोजने जहाँआरा

डूड ने कलियों को लुभाया तो
अपना साथी बनाया तो
पर कालियों और फूलों के
इतर थे विचार

उनका फंडा था, डूडीयत तो ठीक है
पर डोले शोले होते तो ही होती बात
सुन कर फूलो की बात
बिखर गये डूड के जज्बात
पर टूटा नहीं डूड
बदल  कर मूड
पुनः प्रयास का मन बनाया है

डूड आज कल जिम जा रहे है
डूड अब डोले शोले उगा रहे है
फूलों की चाह में
दा ढूढ से दा मर्द बने जा रहे है

क्या आपने "फूलपुर" का नाम सुना है?

बड़े चेहरे बड़े नाम हमेशा बड़े काम नहीं करते ये लोगो को तब जरूर याद रखना चाहिये जब वो लोकतान्त्रिक मेले में अपना मत दान करे। अमूमन राजनीति में जनता का महत्व और रायशुमारी प्रत्यक्ष रूप से चन्द दिनों की ही होती है। आचार सहिंता लागू होने से खत्म होते तक ही शायद। हालाँकि कहने को राजनीति की जनार्दन जनता ही होती है और नेता जनता का नुमाइन्दा होता है पर तब तक जबतक चुनाव सर पर होता है। उसके बाद सर पर लालबत्ती लग जाती है और नेता राजनेता बन जाते है। विजय श्री का वरण करने के बाद ताकत भी मिलती है ये ताकत कई बार कई मालमात में असीमित भी होती है। पर नेता जो वादे करता है वो किस हद तक पूरे किये जा सकते है? कई बार बड़े चेहरे लोगो को लुभाते है इसलिये शायद लोग उन्हें वोट दे दिया करते है। पर चुनाव के बाद हवा हो जाते है। अब की बार जब घर पर कोई घर पर वोट माँगने आये तो एक सवाल जरूर करियेगा की अगली बार कब आयोगे? हो सके तो उनके वादे सेल फोन पर रिकॉर्ड कर लीजियेगा। कम से कम अगले चुनाव में काम आयेगे। मत उसी को दान कीजियेगा जिसने कभी आपके क्षेत्र के लिये थोडा ही सही पर संघर्ष किया हो। बड़े चेहरे अक्सर चुनाव जीतने के बाद और भी बड़े हो जाते है। आम चेहरों थोडा ही सही पर वापस आने का डर तो होता ही हैं। जिक्र लाजिमी हो चला है कुछ बड़े चेहरों का उनके चुनाव क्षेत्रों का …

Taken from wikipedia



फूलपुर का नाम हममे से बहुत से लोगों ने शायद सुना ही ना हो पर मुझे ये नाम सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ पिछले कुम्भ मेले के समागम में, इलाहाबाद के पास होने के कारण फूलपुर से भारी भीड़ का आवागमन पूरे कुम्भ के दौरान होता रहा। किसी ने बातों ही बातों में बताया की फूलपुर "जवाहर लाल नेहरू का लोकसभा क्षेत्र रहा है। आज़ादी के बाद पहले चुनाव के बाद से जब तक नेहरू जी जीवित थे तब तक वो लोकसभा के सदस्य के रूप में फूलपुर का प्रतिनिधित्व करते रहे। ये बात मुझे तब से आज तक खटक रही है। मैं हैरान भी हुआ ये सोच कर की फूलपुर का नाम  इसके पहले सुनने में क्यों नहीं आया? ना ही राजनीति में न काजनीति में ना ही विकास नीति में !!! नेहरू तो विकासपुरुष थे ऐसा कहाँ जाता है, खासकर चण्डीगढ़ को करीब से देखने के बाद इस ऐहसास को बल मिलता है। फूलपुर में भी नेहरू जी ने वोट माँगते हुये कुछ तो वादे किये ही होगे, नहीं भी किये होगे तो कुछ ना कुछ जिम्मेदारी तो बनती ही होगी उनकी वहाँ के लोगों के प्रति, तो कुछ हुआ क्यों नहीं? देश के राजनीतिक मानचित्र पर दशकों तक छाया रहने वाला फूलपुर आज भी नेहरू के नाम के सहारे अपने अस्तित्व को तो बचा लेगा पर तब क्या होगा जब हम भारत का भूगोलिक मानचित्र तैयार करेगे या फिर देश में विकास का मानचित्र तैयार करेगे, क्या तब भी नेहरू की राजनीतिक विरासत की राख, फूलपुर के माथे की आभा बन पायेगी? इसका जवाब फूलपुर के उन बुजुर्गों के पास भी नहीं होगा जिन्होंने कभी गर्व के साथ नेहरू को मत दिया होगा, अब जब कभी ये बुजुर्ग अपने परिवार के युवा सदस्यों को रोजगार की तलाश में बाहर जाते हुये देखते होगे तो दिल में एक दस्तक जरूर होती होगी, मन भी बेचैन तो जरूर होता होगा हो भी क्यों ना जब कभी आप राजनीति के शीर्ष पर रहे लोगो के साथ रहने का दम्भ भरते रहे हो। मौका मिले तो फूलपुर के बारे में पढियेगा जरूर। नेहरू जी के बाद तो फूलपुर बस दरकिनार ही हो गया। राष्ट्र निर्माण के. लिये कसरतें जरूर हुयी पर केवल कुछ नये शहर बना कर .

Taken from wikipedia
कमोवेश यही कहानी रायबरेली की है। कुछ दिनों पहले रायबरेली के एक कामगार से मुलाकात हुयी, वो मेरे घर पर गैस सिलिंडर की बदली करने आया था। उसकी भाषा ने मुझे ये ऐहसास तो करा दिया की वो उत्तर प्रदेश से है। मैं उत्सुक्तावस पूछ बैठा कहाँ के हो? … यू पी से है।  मैंने जवाब दिया ये तो हमको भी पता है  शहर कौन सा है जवाब था रायबरेली जवाब में एक जवाब विश्वास था थोडा ही सही पर था।  जवाब सुनने के बाद मेरे जहन में फिर वही सवाल आया मैंने कामगार से कहा यार आपकी मैडम की तो सरकार है देश में वहाँ कोई काम नहीं मिला क्या? मनरेगा वगैरह भी चल रहा है वहाँ पर कोशिश नहीं की क्या? युवक ने हताशा भरा जवाब दिया। अरे सर जी वोट लेने के बाद कोई देखने थोड़े ही आता है। आप मनरेगा की बात कह रहे है मनरेगा में एक तो काम कम ही मिलता है और काम मिल भी जाये तो पैसा उससे भी कम। पैसा तो साहब लोग की डकार जाते है। फिर मैडम को वोट क्यों देते हो? .......  काम न सही थोडा नाम तो है। जहाँ जाते है कम से कम लोग मैडम के बहाने ही सही जगह तो पहचान लेते है। एक गिलास पानी पीकर वो कामगार तो चला गया पर कई अनसुलझे सवाल छोड़ गया। रायबरेली की भी स्थिति जगजाहिर है कमोवेश फूलपुर से भी बदतर, ऐसा इसलिये क्यों की रायबरेली में आजतक वो लोग काबिज है जो सत्ता के शीर्ष पर है।
अमेठी के एक कामगार के साथ भी लगभग एक ऐसी ही मुलकात हुयी जैसी की रायबरेली के कामगार साथ हुयी। फूलपुर, अमेठी, रायबरेली का जिक्र इस लिये क्यों कि यहाँ के प्रतिनिधि सत्ता शीर्ष पर रहे है पर विकास में नाम पर हमेशा चवन्नी से ज्यादा कुछ भी नहीं मिला।

जिक्र बलिया का भी होना चाहिये चन्द्रशेखर जी के कारण, फतेहपुर का भी राजा माण्डा विश्वनाथ के चलते, वैसे जिक्र तो पूरे के पूरे उत्तर प्रदेश का हो सकता है कई बड़े नेता अपने चुनाव क्षेत्र में विकास की गंगा तो छोड़ो मूलभूत सुविधाये तक उपलब्ध नहीं करा पाये। अब की बारी जब वोट दे तो चेहरे और नाम से तनिक भी प्रभावित ना हो।

इस बार के चुनावी दंगल में फूलपुर से क्रिकेट सितारे मुहम्द कैफ मैदान में है अखिल भारतीय कांग्रेस के टिकट पर देखना ये है कि मुहम्द कैफ कितनी दौड़े पूरी कर पाते है यहाँ से नाबाद पारी खेलते है या फिर गिल्लियाँ बिखर जाती है। रुचिकर ये भी देखना रहेगा की क्या की क्या मुहम्द कैफ, कैटरीना कैफ को चुनाव प्रचार के लिए बुला पाते है की नहीं :)

देश में भीषण महिला सशक्तिकरण हो रहा है ......

आज कल मियाँ मकबूल का मिजाज बिगड़ा हुया है। कल यूँ मियाँ मकबूल ने मोहल्ले के कुछ बच्चों को गाना गाते सुन लिया "ये दुनिया पीतल दी, मैं बेबी डॉल सोने दी" तभी से बस मियाँ के मिजाज में हरारत सी है। एक अजीब सी बेचैनी भी, बस हमने मिजाज जानने की कोशिश ही की थी कि मियाँ बिफर पड़े बोले अमा मियाँ  देश में भीषण महिला सशक्तिकरण हो रहा है। दुनिया पीतल की हो चुकी है और गुड़िया सोने की। पता है ना आपको सोने वाली गुड़िया कनाड़ा के सीमावर्ती इलाकों से है। अक्सर सीमावर्ती इलाकों के समुद्री किनारों पर या फिर बंद कमरे में पायी जाती थी। कभी-कभी हरी भरी घास से आच्छादित एकान्त वालें एल्कलॉन में भी पायी जाती है। मनोरंजन भी करती है शौक़ीन लोगो का!! सम्पूर्ण सीमावर्ती इलाके में इनके जलवे रहे है। हाहाकारी क्रियाकलाप है और इंटरनेट की दुनिया में भी जलवे भी बिखेरे हुये। मालूम होता है कि भारत के लोगो ने नारी सशक्तिकरण की गरज से इस सोने की गुड़िया को आयात कर लिया। शायद ध्यान हो आपको मियाँ आज से कई वर्षो पहले एक चाँदी की गुड़िया थी उसका एक "यम यम स वायरल" हो गया था। परिवार शर्म से बच सके शायद इस नाते, या शायद इस लिये खुद
साभार विकिपीडिया: बेबी डॉल है सोने दी ?????
एक बेहतर जिन्दगी जी सके उस गुड़िया को देश छोड़ कर जाना पड़ा था। आज हमने सोने की गुड़िया आयात कर ली है इसीलिये कहा रहा हूँ महिला सशक्तिकरण तो हुआ है। भीषण भयंकर हाहाकारी। अब सोने वाली गुड़िया चाँदी वाली गुड़िया का अभिनय करेगी और नोट छापेगी . कितने बरस हो गये मियाँ उस चाँदी वाली गुड़ियाँ को परदेश गये। पर लोग है की बार-बार उस बेचारी के दुखती रग पर हाथ रख देते है। अब बताईये ऐसे में क्या वो चाह कर भी भूल पायेगी? क्या कभी सामान्य जीवन जी सकेगी वो? पता नहीं क्या हो हल्ला मचा रखा है। जिससे केवल गलती हुयी वो अब तक सजा भुगत रही है। जो आदतन ही शौकीन है वो आयात होकर आ गयी और रुपहले पर्दे पर छायी हुयी है अदाकारा कहलाती है। अमा कोई मर्यादा कोई सीमा बची ही नहीं। यूँ तो लखनऊ की रक्खसाये भी जलवे बिखेरती थी किन्तु सामाजिक मान्यता थोड़े ही प्राप्त थी उनको। आज कल ईमान धर्म सब पैसे पे कुर्बान हो गया है। पता नहीं मिया क्या होगा आने वाली पीढ़ियों का। कैसे लोगो को अपना हीरो मानेगा समाज? लाहौलबिलाकूबत अब ऐसे समाज में जीना भी एक जिल्लत ही है पर करे तो क्या मियाँ देश में कानून तभी बनते है जब आन्दोलन हो और अब इस उमर क्या आन्दोलन करे ........ अब कानून का जिक्र छिड़ ही गया तो बात कर ही लेते है।  .... एक दिव्या दृस्टा की मानिंद मियाँ मकबूल बोले …मियाँ अब की बार का चुनाव तो निकल जायेगा अगली बार कोई ना कोई राजनीतिक दल सोने की गुड़ियाँ की चुनाव जीतने के क्षमता को भी पहचान ही लेगा। महिला सशक्तिकरण की नाम पर  दबी कुचली महिला का दर्ज और साथ ही साथ टिकट भी दे ही देगा। "संसद में सोने की गुड़िया" इसी शीर्षक के साथ अखबार का पहला पन्ना होगा और सम्पादकीय में "क्या सोने की गुड़िया पास करा पायेगी अधिनियम ३७७??" मियाँ आप तो वाकिफ ही है, कई बार देश के सांसद, संसद भवन में मोबाइल और लैपटॉप पे इधर उधर की चीजे देखते धरे गये। अब जब खुद सोने की गुड़िया वहाँ होंगी तो क्या संसद मन्दिर रहा जायेगा? सब के सब ऑटोग्राफ की होड़ में लगे होगे ....... यहीं होना है मियाँ खैर ..........

RTI Matters: Robert Vadra's pre-embarkation security checks; Details exempted under RTI Section 24(1)

To learn earlier communication from in this RTI with ministry of civil aviation Click here

Some days back, Ministry of Home affairs replied to RTI on Mr. Robert Vadra's per-embarkation security checks. Home ministry denied to reveal further details based on section 24(1) of RTI ACT-2005.In earlier reply received from "Ministry of Civil Aviation" stated that they received recommendations from "Ministry of home affairs(MHA)" to exempt Robert Vadra from per-embarkation security checks when accompanied with SPG. They also written that MHA recommendations were based in inputs from security agencies. While on other hand MHA states that Ministry of Civil Aviation exempted him with the consultation of central security agencies.

Analysis of reply received:
MHA and MCA replies contradicts each other but same point of time it sure that they received inputs from central security agencies to exempted Robert Vadra from per-embarkation security checks at Indian airport. And any recommendation from Central security agencies which is not related to corruption is exempted under RTI secftion-24(1).

Now we should know one more fact; Once somebody I believe he was RTI Icon Subash Chandra Agrawal" request Office of Prime Minister to order and inquiry in land dealing of Mr Vadra.
At that time PMO replied back that they can not intervene or order a inquiry pertaining to land deal of private parties. This implies that Mr Vadra is private party, holding no constitutional post,no government post even his wife Priyanka Gandhi follow same footprints. So why PMO/Government of India/Central security agencies should be worried about a private party security until and unless requested by Private party himself?? Also there are many big private parties who are entrepreneurs , politicians of bigger stature but no concern fro them???  This is kind exploitation of   RTI-ACT and also of Government facilities. This reveal dual standards of Government.

To learn earlier communication from in this RTI with ministry of civil aviation Click here
 
What Section 24(1) of RTI Act -2005:
-----------Contents taken fromhttp://cic.gov.in/rti-act.htm ------------------------
24     (1)  Nothing contained in this Act shall apply to the intelligence and security organisations specified in the Second Schedule, being organisations established by the Central Government or any information furnished by such organisations to that Government:

Provided that the information pertaining to the allegations of corruption and human rights violations shall not be excluded under this sub-section:

Provided further that in the case of information sought for is in respect of allegations of violation of human rights, the information shall only be provided after the approval of the Central Information Commission, and notwithstanding anything contained in section 7, such information shall be provided within forty-five days from the date of the receipt of request.
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स्ट्रीट वेन्डर - प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीवुड एंड रेगुलेशन के लागू होने के बाद भी …

गली मोहल्लों के विक्रेता और उनकी आजीविका संरक्षण अधिनियम। ४ मार्च २०१४  को माननीय राष्ट्रपति महोदय की सहमति के बाद लागू हो गया। तत्पश्चात ५ मार्च २०१४ को इस वावत भारत सरकार द्वारा राज्यपत्र भी जारी कर दिया गया। मतलब कानून प्रभावी हो गया। ५ मार्च के दिन ही चण्डीगढ़ स्थित दफ्तर के बाहर चाय की दुकान लगाने का सामान नगर निगम वाले उठा ले गये। २ स्टोव कई बर्तनो का चालान और साथ में दुकान ना लगाने की हिदायत भी दे गये। पुलिस वाला भी वसूली करता है। लगभग हर हफ्ते और नगर निगम वाले भी जिस सामान का चालान करते है वह महज सरकारी औपचारिकता निभाने के लिये।
चण्डीगढ़ नगर निगम का वाहन
वसूली इसके अलावा भी होती है और बहुत होती है। ये वसूली कमोवेश हर जगह होती है और लम्बे अर्से से होती चली आ रही है। जब हम और आप परिवार समेत किसी रोज पिकनिक के बहाने बाहर जाते है तो ठेली पर गोलगप्पे बेचने वाले से लेकर बच्चो के खिलौने बेचने वाले सभी जो आपको नजर आते है सब स्ट्रीट वेन्डर की श्रेणी में आते है। गोलगप्पे या आलू की टिक्की बेचकर जितना भी ये कमाते है उसका एक बड़ा हिस्सा प्रशासन की जेब भरने में चला जाता है. जब सरकार रोजगार नहीं दे पाती तब एक वर्ग विशेष किसी एक कला को सहारा बना कर रोजगार करने निकलता है। नीयत काम करने की है तो काम का मौका जरूर मिलना चाहिये पर ऐसा होता नहीं है। शोषण किया जाता है, जब भी मौका मिलता तब-तब, कई इसे नसीब मान लेते है कुछ ये भी मानते है की सरकारी महकमा कानून का पालन कर रहा वो कानून तोड़ रहे है इस लिए पैसा देना पढ़ रहा है। ये विडम्बना ही है की लोकतान्त्रिक देश में अपनी मेहनत से आजीविका कमाने वाले को कानून का डर दिखाया जाता है। जब कानून होता भी है तो उसे तोड़ और मरोड़ दिया जाता है। पूरे मुद्दे में सबसे ज्यादा अफसोस की बात ये है की दशकों से चले आ रहे स्ट्रीट वेन्डर्स के इस संघर्ष को कानून बनाने में संसद ने अत्यधिक लापरवाही दिखायी। आजिज आकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने आदेश जरी किये और फिर जाकर कानून बना। ये सनद रखना उचित रहेगा की हम एक प्रतिक्रियावादी सभ्यता मे रहते है। यहाँ कोई भी बात एक संघर्ष के बाद ही सुनी जाती है।
स्टोव उठने के बाद का चित्र
उल्लिखित घटना और तर्कों का जिक्र इसलिये जरूरी है क्यों की अब सड़क पर इन दुकान लगाने वालों को दुकान लगाने का कानूनी अधिकार है और उस अधिकार का हनन हो रहा है। नया कानून कहता है कि अब तब तक किसी भी दुकानदार को नहीं हटाया जायेगा जब की नए कायदे और कानून के तहत "स्ट्रीट वेंडिंग समिति" पहले से कार्यरत लोगो का सर्वेक्षण नहीं कर लेती। कुछ लोग ये तर्क भी दे सकते है। ५ मार्च हो कानून आया और ५ मार्च को चालान भी हुआ अतैव ये जानकरी का अभाव भी हो सकता है किन्तु कोई भी तर्क देने से पहले यह जान लेना श्रेयस्कर रहेगा कि माननीय उच्तम न्यायलय ने २ सितम्बर २०१३ को कमोवेश वैसे ही आदेश जारी किये थे जैसे की कानून में है। माननीय उच्तम न्यायलय ने आदेश दिया था और कहा था की आदेश के १ महीने के अन्दर स्ट्रीट वेन्डर समिति का गठन किया जाय। अतैव ये वसूली/चालान  माननीय उच्तम न्यायलय की अवमानना भी है। आईये नजर डालते है स्ट्रीट वेन्डर अधिनियम के मूल बिन्दुयों पर जो हमे आपको हमेशा याद रखनी चाहिये।
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स्ट्रीट वेन्डिंग एक्ट के मुख्य बिन्दु :
-  जिले/कस्बे/तहसील/पंचायत हर जगह एक स्ट्रीट वेन्डिंग समिति का गठन किया जाये। जिसका प्रतिनिधित्व सरकारी महकमे के लोग करेगे।  ये समिति अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली जगहों पर उन सम्भावित जगहों की पहचान करेगी जो व्यापार के योग्य हो। इन्हे "वेन्डिंग जोन" की संज्ञा दी जायेगी।
- पहले से व्यापार कर रहे लोगो को तब तक नहीं हटाया जायेगा जब तक की "स्ट्रीट वेन्डिंग समिति" का गठन, पहला सर्वेक्षण तथा पहले से काम कर रहे लोगो की पहचान नहीं होती और साथ ही साथ जबतक उनको व्यापार करने का प्रमाणपत्र नहीं मिल जाता।
-  स्ट्रीट वेन्डिंग समिति एक सर्वे करे और पहले से कारोबार कर रहे लोगो की पहचान करे और उनको व्यापार करने के लिए प्रमाणपत्र दे।  ये सुनिश्चित करे की जिसे प्रमाण पत्र दिया गया है उसकी किसी अन्य श्रोत से कमायी ना हो। - प्रमाणपत्र "वेन्डिंग जोन" के लिये दिया जायेगा और यदि एक वेन्डिंग जोन में काम करने वाले लोगो की सँख्या अधिक है तो उन्हें लाटरी के आधार पर चुना जायेगा अन्यथा पास के दूसरे ववेन्डिंग जोन में समाहित किया जायेगा। एक जोन के काम करने वालो की सँख्या वहाँ की जनसँख्या की २.५ प्रतिशत होगी।  उससे ज्यादा नहीं।
- प्रमाणपत्र लेने के लिए न्यूनतम आयु १४ वर्ष होनी चाहिये। सर्वेक्षण हर पाँच सालों में जरूरी है। - स्ट्रीट वेन्डिंग प्रमाणपत्र जिस व्यक्ति के नाम पर है उसके द्वारा या परिवार के किसी व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल किया जा सकेगा। किसी अनहोनी की दशा में परिवार के नाम ट्रान्सफर किया जा सकेगा।
- स्ट्रीट वेन्डिंग से जुड़े विवादों के निपटारे के लिये भी न्यायिक व्यवस्था का गठन किया जाये। जिसका मुखिया कोई सिविल जज और सर्कार द्वारा निर्धारित दो अन्य लोग करेगे।
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यूँ तो कई संवेदनशील लोग चौराहे पर भीख माँगते हुये लोगों के प्रति सहानुभूति रखते है उनको अपना सर्वस्व दे देना चाहते है। संवेदशील होना एक बात है और जागरूक होना दूसरी आप कई बार भीख में चंद से ज्यादा बहुत कुछ कर सकते है उनके लिये जो उन्हें आत्मसम्मान भी देगा और साथ ही साथ काम करने का हौसला भी।
मेरा तातपर्य यही है की अगर अन्याय होते हुए देखे तो विरोध जरूर करे। विरोध मौखिक ,पत्रव्यवहार , सूचना के अधिकार इ-मेल, हेल्पलाइन जैसे कई अन्य तरीको से की जा सकती है। बूँद -बूँद से सागर भरता है खासकर जब आप ये जानते है की कानून है पर उसे तोडा जा रहा है तो आपका छोटा सा प्रयास कई बार मुद्दे को नयी जान दे सकता है। 

RTI Matters: Provident Fund worth "INR 26496 Crore", is lying inoperative/dormant in EPFO

Provident Fund worth "INR 26496 Crore", is lying inoperative/dormant in EPFO accounts . This attracts no interest from EPFO since April 1, 2011. This information has been received in response of RTI query raised by me with Ministry of Labour and Employment and in turns EPFO. This is public money, money of salaried class employees across country. This is lack of awareness most of the cases and ignorance some of them among the salaried class employees, which causes provident fund account to go in dormant state, a state where no interest will be paid. Let discuss bit more about dormant accounts and associated losses.


 
What is inoperative/dormant account?
EPF( Employee Provident Fund) account which has no show of transaction in last 36 month or more are that considered as dormant account. As per ruling from labor ministry from April 1, 2011 no interest given in such accounts, on other hand there are normal account gets interest rate of 8.5% per as now,that too is tax free.

Why it is necessary to get your EPF account transferred?
-Today or at later stage it is your responsibility to transfer EPF amount, if not transferred you are bounded to loose interest which can be accrued on that amount.I
- Number of year of PF membership matters, if  you have not submitted any transfer request you PF membership is not up-to-date. If some time later you wish to withdraw some amount it may cause a problem if you are working with particular company for less than 5 years. Though might be having 14 years total membership in PF. 
- Down the line as time passes you may loose credentials of existing PF membership account.
- If your work location changed  as part of your job, you are bounded to have hard time if decide to transfer PF amount.
- if account is dormant you are losing interest as well. 

How to transfer EPF amount once you decided to change?
On changing a job, the employee should file Form 13 with the new employer. On receipt of a complete and correct form by the EPF authorities, the funds ought to be transferred from the PF account maintained by the old employer to that of the new employer within thirty days. However, many employees fail to follow this process and over a period of time the EPF accounts set up while in their previous employment become inoperative/dormant.

What is EPF and EPS ? how it is calculated?  Click here


Process to withdraw Provident fund click here

Note:  Going ahead, appeal will be filed to access EPS amount details separately as well, as of  now  PIO responded saying that its is not applicable. But ideally it should be applicable for employees whose PF is managed by trust of their organization. To understand this better click  here.

Appealate authority to file appeal is :
Shri  Sanjay Kumar,
Financial Advisor & Chief Accounts Officer,
Employees Provident Fund Organization,
Bhavishya Nidhi Bhawan, 14, Bhikaiji Cama Place,
New Delhi - 110066
Phone: 011 -26172660  

Above address can also used for filing RTI can be addressed to APIO/PIO/CPIO.

मियाँ मकबूल और उनका दर्द .....

मियाँ मकबूल अक्सर दावा करते है कि उनके वालिदान ... नवाब वाजिद अली शाह के खानदान से है। मियाँ मकबूल का अपना अन्दाजेबयाँ शुरू करते लाहौलबिलाकूबत से और खतम होते है आकर, नामाकूल पर। वो कभी कभी बल्लीमारान की पान की पीकों और हुक्के की गुड-गुड में से निकलते ग़ालिब के अन्दाजेबयाँ में डूबे नज़र आते है तो कभी बस और बस ठेठ लखनवी हो नवाब। बात भूत की हो तो अन्दाज़ शायराना, अगर बात वर्तमान का जिक्र हो जाये तो कयामत सा टूट पड़ते।  जिक्र लाजिमी हो चला है कि मुहल्ले में सुगबुगाहट है हर आम और खास को खबर है कि मियाँ मकबूल मयबेगम बच्चो के सनीमा (सिनेमा ) देख कर आये है। सनीमा देखने की बाद से ही मियाँ के मिजाज बिगड़े हुये है। उनसे रूबरू होने का प्रयास भी करना जलती आग में हाथ डालने से कम नहीं। कई रोज बाद शाम ढले एक दिन मियाँ मकबूल से आमना सामना हो ही गया।  दुआ सलाम के बाद मकबूल साहब से सनीमा का जिक्र छेड़ दिया। ……  तो कौन सी फिल्म देखी जनाब आपने उस रोज । मियाँ पहले तो थोडा टालमटोल करते रहे फिर रफ्ता -रफ्ता दिल की बात जुबाँ ले ही आये। बरखुरदार अब क्या बताये हम!! लगता है जमाना बहुतय बदल गया है। उस रोज जब हम सनीमा देखने गये … तो पूछिये मत सब जगह घूमे सबसे पूछा पर बालकनी का टिकट ही नही मिला। फर्स्ट क्लास में देखनी पड़ी सनीमा हमको हम बहुत कहे टिकट खिड़की वालों से की हमको बालकनी का टिकेट दीजिये कहीं से भी उपलब्ध कराईये पर ऊ लोग बोले की की अब बालकनी वाला जमाना नहीं रहा जनाब। एक तो ससुर सब अँग्रेजी में पिटिर-पिटिर कर रहे थे। बस एक हम थे और एक बच्चों की जिद बस मियाँ मिया बच्चों जिद के आगे घुटने टेकने पड़े वर्ना लाहौलबिलाकूबत हम और फर्स्ट क्लास में सनीमा देखे! हम नवाबों के खानदान से है। हमारे वालिदान महल में ही अदाकाराएं बुला लिया करते थे . पर अब जमाना बहुत बदल गया है। का बताये मियाँ टाकीज का तो पूरा हुलिया ही बिगाड़ डाला है मेला लगा दिया टाकीज के बाहर, मानो किसी खूबसूरत लड़की के चेहरे पर पैंट कर दिया हो और जुल्फों को घड़ी साबुन लगा कर जबरदस्ती बिखरा दिया हो। गाड़ी पे खड़े होकर लड़का -लड़की गाये पड़े है ! छोटे-२ बच्चे कार टकराए पड़े है । पैंट शर्ट सब वहीं बिक रहा है । अरे मियाँ और तो और तोता-मैना स्टाइल में चोच लड़ाते बालक-बालिकायें  कोनो पर बैठे। नामाकूल कहीं के अरे एक हमारा जमाना था एक ये है अदब तो ही नहीं लोगो में अब। क्या खिचडी पकाई है लोगो ने !! जनानी सिगरेट के छल्ले बना रही है लडके नाच रहे है। एक जमाना था वो भी जब हम अपनी बेगम को पहली बार फ़िल्म दिखने ले गए थे मियाँ नजाकत थी नफासत थी बालकनी में बैठ कर पिक्चर देखी हमने। मिया बसंती नाची भी और पूरी मर्यादा के साथ। क्या दोस्ती थी जय और वीरू की आज तक नजीर है । पर देखो मियाँ आजकल की सनीमा में मोहतरमाएँ शर्मोहया को जाने कहाँ छोड़ आयी  है चुडैल टाइप हो गई है । पान की पीक थूक कर मियाँ मकबूल फिर से शुरू हो गये। अरे  कोई तुलना कर सकता है भला, कहाँ  मधुबाला और हेमा और कहाँ ई आज कल की की अदाकाराएं अदा को तो मार कर ही आयी ये सब। पहिले सनीमा में प्यार का तरीका कितनी पाकीजगी भरा हुआ करता था। पर मियाँ हमे यकीन हो चला है अब कलयुग आ गया है। खलनायक की जरूरत ही नही पड़ती बस नायक ही दोनों रोल कर लेता है । मियाँ पाकीजगी और सादगी का जमाना चला गया मालूम होता है । अब तो बस शॉर्ट कट या तो शॉर्ट स्कर्ट है फर्स्ट क्लास में सनीमा देखनी पड़ गई हमारे खानदान में कभी नही हुआ ये । चलते-चलते एक फ्री की सलाह देने लगे वो बोला अगली बार आए तो ऑनलाइन टिकेट बुक कराये दिक्कत से बच जायेगे। अब हम का जाने ई पी टिकट। क्या बला है मियाँ टिकट तो खिड़की से ही लिया जाता है न मियाँ रेल का टिकट हो या सनीमा का। अजीब दौर आ गया है सब बहके बहके से लगते है !! आज गालिब जिन्दा होते तो ऐसे माहौल में एक शायरी भी ना लिख पाते …… इतने में आवाज आयी अब्बाजान अम्मी बुला रही है …… मियाँ मकबूल बोले अभी रुखसत होना पड़ेगा मियाँ फिर मिलते है।  …… मकबूल साहब चले गये मैं बैठा तारों को ताकता रहा … देर तक ……

नोट: मियाँ मकबूल के काल्पनिक चरित्र है।

पकिस्तान जिन्दाबाद बोलने वालों तुम किस देश के हो? …

पकिस्तान जिन्दाबाद का नारे लगाने वालों,
एक शिद्दत से सोच रहा हूँ आपके मानस पटल पर क्या चल रहा होता होगा जब आप पकिस्तान का जय घोष करते होगे। क्या आप विचारशून्य होते होगे या फिर कोई मादक पदार्थ आपके सर चढ़ बोल रहा होता होगा। क्यों करते है आप ऐसा ? कहाँ से सीख ली आपने ये आदतें जो आपका आपकी जुबान पर नियन्त्रण नहीं रहता। क्या दिन भर सेंटर फ्रेश चिंगम चबाते रहते है, जबान बस चल जाती है।  किस स्कूल में पढ़ते रहे आप ? पढ़े या फिर स्कूल गोल कर पीछे ही बैठे रहे। फिल्मे देखते है कि नहीं आप? अखबार पढ़ते है कि नहीं आप? जेहादी और उन्मादी होने का जूनून जगा कहाँ से आप में? कहीं से कुछ तो सीख लेते सीखना जरूरी है। सीखा नहीं इसीलिए तो अपने से बेहतर आपको पराये लगते है। पराये वो जिनके बारे में बस आपने सुना है भोगा नहीं? पकिस्तान जायेगे तो किसी रोज किसी बम  के साथ फट जायेगे। वहाँ रोज ऐसा होता है रोज बम फटते है और बमों के साथ लोग भी …… काश की आप अखबार पढ़ पाते।

वहाँ जहाँ के आप नारे लगाते है, वहाँ लोकतन्त्र ICU में भर्ती रहता है, अब गया तब गया वाला हाल है। जब तक सत्ता हाथ में है तब तक बम के साथ फटने का डर और सत्ता गयी तो कैद खाने जाने का डर और इस सब से बच भी गये तो संयुक्तराष्ट्र के यमराज (ड्रोन) का डर ....... घर से पाखाने के लिए निकले और आ के सर पे फूट जायेगा। डर के जियोगे की डर ही जियोगे पता ही नहीं चलेगा कभी। बस दूर के ढोल है कोई एक हसीन ख्वाब दिखा कर चला गया है तुमको, ठगने की कोशिश कर रहा है तुमको और अगर कुछ है भी .... ख्वाबों ख्यालों में ही रहने दो जबान पे  क्यों लाते हो। फिल्मे देखते तो समझ पाते कि मरने मारने की बात करने वालों से न दोस्ती अच्छी और न दुश्मनी। जो अपने देश का न हुआ हुआ वो उनका कैसे होगा ये बात उनके दिमाग में भी तो आती ही होगी। इस्तेमाल हो रहे हो बस तुम जब काम के नहीं रहोगे तो दूध से मक्खी की तरह निकल फेकेगे। अपने पराये के फर्क को समझो।

सुना है की आप ६० थे जो पकिस्तान की जीत जश्न रहे थे। पूछताछ में आपने कहा कि लोकतन्त्र में रहते है किसी को भी सपोर्ट कर सकते है। आपको ये जान लेना चाहिये और मान भी लेना चाहिये की लोकतन्त्र की गलत परिभाषा और गलत धारणा में जी रहे है आप। लोकतन्त्र को सोचने और समझने की आपकी शक्ति क्षीण हो चुकी है। आप लोकतन्त्र की विकृत तस्वीर अपने जहन में समेटे घूम रहे है। एक बेहद मूलभूत नियम होता है कि "आप वहीं तक स्वतन्त्र है जहाँ से दूसरे की नाक शुरू होती है" उसके बाद आपकी स्वतन्त्रता नियमो के अंतर्गत है जिसे हिन्दुस्तानी होने के नाते मानने के लिये आप वाध्य है। जब पकिस्तान का जय घोष हुआ पूरा भारत आहत हुआ तात्पर्य है की आपने लोकतन्त्र में दूसरे के अधिकारों को नज़रअन्दाज़ किया। देशद्रोह मातृद्रोह है और ऐसा वाले को गद्दार कहा जाता है। देश की सीमा पर सैनिक शहीद हो यहाँ जय घोष ने नारे लगे ये अस्वीकार्य है।

आप पकिस्तान को चाहते तो वहाँ जा सकते है लोकतन्त्र में इसकी इजाज़त मिल जायेगी। पर यहाँ रह कर पाकिस्तान वन्दना राजद्रोह है इसमें शायद ही किसी देशवासी की दोराय हो। कश्मीर देश का अभिन्य अंग है और से यथास्थिति  बरक़रार ही रहनी है । आप जाये चले ही जाये तो बेहतर मातृभूमि के महौल को दूषित करने का क्या मतलब।

निराशा राम और सुब्रत राय बेसहारा से शुरू सफर कब तक ......

बीते दिनों देश में कुछ ऐसा हुआ जैसा पहले कभी नहीं हुआ। अकूत धन सम्पदा के मालिक, सियासी गलियारों में बेहद वजनदार कुछ लोग आज कल कानून तोड़ने की सजा भुगत रहे है। ना पैसा चला ना पॉवर सब हवा हो गया। इस फेहरिस्त में सुब्रत राय सहारा, आसाराम राम जैसे लोग है। जिन्होंने कानून को कमजोर और बिकाऊ समझ लिया, वो दोषी है या नहीं इसका फैसला आज नहीं तो कल अदालत कर ही देगी। पर जो हुआ उससे जनसाधारण की कानून और न्यायपालिका के प्रति आस्था में गुणोत्तर सुधार आयेगा। स्वथ्य और सभ्य समाज के लिये ये बेहद जरूरी है। यहाँ जिक्र लाजिमी हो जाता है कि अपराध के वो मामले जो क्रूरता की हद में आते है उन्हें प्राथमिकता से दूर किया जाना नितांत आवश्यक है। वो मामले जो दशकों से अदालतों में लम्बित है उनका निस्तारण देश और समाज में एक नयी आशा ला सकता है। किसी भी मामले का अदालत में लम्बा खिचना न्याय की सम्भवनायों को कम करता है। पीड़ित के मनोबल और आर्थिंक स्थिति पर बेहद बुरा प्रभाव डालता है तथा अपराधी को एक मनोबल देता है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि देश की न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत एक लम्बे अरसे से है पर फिलहाल ठन्डे बस्ते में है। बेहतर होता यदि केस में चार्जशीट फाइल होने और न्याय मिलने की एक समय सीमा तय होती।

साभार : Indiaexpress.com



साभार : Firstpos
हाल फिलहाल अखबारों में मैंने पढ़ा था और तत्पश्चात "क्राइम पेट्रोल" नामक धारावाहिक में देखा भी की किस तरह १०० रुपये के आस-पास के गबन के लिये एक डाकिये को रिटायर होने तक निलम्बित रखा गया। उसे जेल भी जाना पड़ा और लगभग 25 बरसों बाद वो डाकिया निर्दोष साबित हुआ। २५ वर्षों के लम्बे अन्तराल में डाकिये ने अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण समय को खो दिया परिवार को कष्टों से गुजरना पड़ा। 25 वर्षों तक भीषण मानसिक प्रताड़ना सहने के बाद भी जब वो निर्दोष साबित हुआ तो फिर से अपने खोये हुये वित्तीय अधिकारों/मुआवजे  को पाने के लिए एक नए सिरे से लड़ाई शुरू करनी पड़ी। ये अफसोसजनक है। क्यों नहीं ऐसा होना चाहिए था कि अदालत से बाइज्जत बरी होने के बाद तत्काल प्रभाव से ब्याज की रकम समेत उस डाकिये की 25 वर्षों की सैलरी लौटा दी गयी होती, मुआवजा दिया गया होता। क्यों उसे या उस जैसे लोगो को अलग-अलग विभागों से मुकदमा लड़ना पड़े? ये स्थिति बदलनी चाहिये। दिल्ली के क्रूर दामिनी बलात्कार काण्ड, जेसिका लाल, प्रियदर्शनी मट्टू, रुचिका गेहरोत्रा, हिमाचल के विधायक रामकुमार चौधरी से जुड़ा संगीता (शायद) हत्याकाण्ड, गोपाल कांडा से जुड़ा एयरहोस्टेस हत्याकाण्ड इनमे से लगभग कई मामले अभी भी अटके हुए है। रोज के रोज न्याय की गुहार लगाने वालों का हौसला टूटता है। खैर सहारा और आसाराम के मामले से हुयी शुरुआत सही है सही दिशा में है पर हम इसको कब तक और किस दिशा में बरकरार रख पाते है ये फैसला वक़्त के गर्भ में है। पर बदलाव बहुत जरूरी है .......  

"सर" श्री अखिलेश यादव जी के नाम एक "नींबू पानी" भरा खत

"सर",
बहुत दिनों से सोच रहा था कि आपको खत लिखूँ वैसे ई -मेल तो कई बार लिखी, पर आप है की जवाब ही नहीं देते। खैर "सर" मैं आपको इस लिये कह रहा हूँ क्यों कि कल ही सुना आपके अब्बाजान मुलायम जी थोड़े कठोर होकर कह रहे थे कि आपको "सर" कहलाना बड़ा पसन्द है। इससे पहले "सर" केवल डॉन ब्रैडमैन और "सर" विवियन रिचर्ड्स को ही कहा जाता था। पर जब से पता चला चला आप भी शौकीन बस तब से ही आपको "सर" कहने का जूनून सा सवार है। आप क्रिकेट के भी शौकीन है, वैसे भी शौक बड़ी चीज है। इस लिये "सर" कहने का जूनून गुणोत्तर बढ़ता जाता है। सर रिचर्ड्स अपनी आक्रामक शैली के लिये जाने जाते थे। उनकी टीम भी आक्रामक थी। आप भी अच्छा खेल रहे है अबतक नाबाद है आप। सर रिचर्ड्स बैट और बाल से खेलते थे और आप और आपकी टीम लाठी और डण्डो और कन्टाप से खेल रही है। सर रिचर्ड्स मैंदान में खेलते हुए लपके जाते थे। आप 5 बरस तक नहीं लपके जायेगे अतैव आप अजेय है और धन्य भी। आप केवल चौकों और छक्कों में ही खेलना पसन्द करते है। आप बखिया उधेड़े पड़े है। कानपुर के जूनियर रेजिडेंट और मुजफ्फरनगर के ताऊओं को आपने एक ही तराजू में दिया। आपके यही क्रिया कलाप आपको धन्य और महान भी बनाते है।
साभार :http://www.dailymail.co.uk

"सर" पता नहीं की आप पीते है कि नहीं पर आप नशे में लगते है। नशा मदिरा का होता तो कुछ घन्टो में या कुछ दिनों उतर ही जाता। पर नशा किसी और चीज का हैं। शायद सत्ता का !!! आप इस नशे में कुछ तो मगरूर हो चुके है और कुछ होते जा रहे है। पर अफसोस अब तो कोई डॉक्टर आपकी जाँच और आपका इलाज़ भी नहीं करेगा। आप नशे की हालत में थे और आपके पुलिसिया रंगरूट कानपुर के मेडिकल कॉलेज में घुस गये, लाठी चलवा दी पता नहीं क्यों? आप को ये करने से पहले " गणेश शंकर विधार्थी" जी भी याद नहीं आये पता नहीं क्यों? शायद आप उन्हें जानते ही नहीं होगे!! अपने अब्बाजान से पूछियेगा तो शायद बता दे पुराने समाजवादी है, पता हो भी सकता है।  पर …… शायद नहीं पता होगा। आपके अब्बाजान भी तो गोलियाँ चलवाने के शौकीन रहे है।

बहन जी चली गयी और जब आप मुख्यमन्त्री बने तब लगा था कि मानो पूरा प्रदेश बदल जायेगा। चमत्कार हो जायेगा। आप आये आपने लैपटॉप बटवाये अच्छा किया लगा कि पूरा प्रदेश कंप्यूटर सैवी हो जायेगा। पर तिलिस्म बड़ी जल्दी टूट गया। आपके लैपटॉप OLX में बिक रहे है। लोग समाजवादी स्क्रीन को हटाने के नुस्खे भी पूछ रहे है आजमा रहे है। आप भी एक खरीद ही लीजिये ई -मेल चेक करने के लिये। कई बार लिखी है आपको लगा था की आप विदेश से पढ़ कर लौटे है चेक कर लेते होगे। पर अफसोस हम पलक पावड़े बिछाये इंतज़ार ही करते रह गये। मेल तो मेल लगता है की आप अखबार भी नहीं पढ़ते। रोज खबरे छपती कभी भैसों की भाग जाने की कभी सैफई में सलमान और माधुरी दीक्षित के नृत्य की। .... पता नहीं क्यों बके जा रहा हूँ मैं !! भूल ही गया की आप नशे में है। पता नहीं कब आपका नशा उतरेगा, पता नहीं कब आपके जमीर की गहरी तन्द्रा भंग होगी। पूरा प्रदेश आपकी तन्द्रा भंग होने का इंतज़ार कर रहा है।

"सर" पहले उत्तर प्रदेश की जनता आपको समझ नहीं पायी,  अब आप उसको समझ नहीं पा रहे है। जनता अपने को होशियार समझती रही। 80 के दशक में ही कांग्रेस के तिलिस्म से आजाद हो गयी पर समाजवाद के चंगुल में आ फसी। खैर देर आये दुरुस्त आये पिछले के पिछले चुनाव से बहुमत देने की आदत से डाल ली है पहले बहन जी फिर आप "सर" को बहुमत मिला।  पर आपको नशा चढ़ गया!! आप मुजफ्फरनगर में चन्दा बाटने लग गये ?? कुछ वोटो के लिये ? क्या जरूरत थी जनता आपको ही वोट कर रही थी पता नहीं आप को कौन से वोट चाहिये थे? अदालत में आपके गाल लाल हो गये पर आपका नशा नहीं उतरा। आपके अब तो आपके अब्बाजान भी नाराज हो रहे है वो तो आपके लिये अदालत से भी बड़े है। आपके सुप्रीमो है अब मान जाइये "सर"
नींबू पानी पी लीजिये। शायद शुरूर थोडा सा कम हो जाये।
                                                                                     आपका और प्रदेश का शुभचिन्तक
                                                                                     - विक्रम

मुबारक हो ! तिवारी जी बाप बन गये !!

अखबारों में समाचारों में चौक और चौराहे में ख़बरों के बाजार गर्म है। तिवारी जी बाप बन गये है !! कमजर्फ उमर ने लिहाज भी ना किया अब भी जवानी जिंदाबाद का नारा लगा रखा है। वैसे जवानी लोगो की जिन्दगी में बहार की तरह आती है और पतझड़ सी चली जाती है। पर तिवारी जी को थोक के भाव मिली है पूरा का पूरा खजाना। समेटे नहीं सिमट रही कोशिश तो बहुत की होगी उन्होंने पर जवानी जुल्मी है बेदर्द है बेगैरत है । तिवारी जी की रंगीन मिजाजी भी एक मिसाल है, उनके लिए जो जवानी में ही बूढ़े हो लेते है। सलमान खान साहब को रोज देखता हूँ दूरदर्शन पर रोज सुनता हूँ आकाशवाणी पर ये कहते हुए कि पिछले 15 वर्षों से रिवाइटल टेबलेट खा रहा हूँ। क्या जरूरत थी इन सब की जब तिवारी जी के पास सिद्धहस्त फार्मूला है। अरे एक एक फोन कर लिया होता बस। तिवारी जी का फार्मूला लगाओ जवान हो जायो। बस आते ही होगे गिनीज बुक वाले तिवारी जी और उनकी हाहाकारी जवानी के जलवे अंतराष्ट्रीय चर्चा का विषय होगे।



मैं उन दिनों हैदरबाद में रहता था जब तिवारी जी ने राजभवन में अपने जलवे बिखेर दिये थे। उनके साथ के लोग या तो गुजर गए होगे, अगर होगे भी तो २-३ बार बाईपास सर्जरी हो चुकी होगी पर साहब के दिल में तो पटाके थे बगल में फुलझड़ियाँ थी। साहब धरे गये लगभग रंगे हाथों। खबर आम हुयी और मेरे दफ्तर में उत्तर प्रदेश का होने के नाते सहकर्मियों ने घेर लिया। और फिर सवालों की बौछार लगातार, लगा कि सब मिलकर कर देगे मेरा शिकार। इतनी उमर में इतनी रंगीनियत कहा से लाये तिवारी जी ??  जवाब दो ?? मैं बस बचाव की मुद्रा में थे जान बचाने की जुगत में तिवारी जी का महिमा मण्डन कर बैठा । बोल दिया कि तिवारी जी आदर्श पुरुष है हम सब को उनसे जवान और रंगीन मिजाज रहने के नुस्खे सीखने चाहिये।वैसे तो तिवारी जी तो नादान थे पर लखनऊ वजीर बने तो थोड़ी से रंगीनियत नवाबों से साभार ले ली। और दिखा दिया निजामों को अपना जलवा ये जो हुआ नवाबों और निजामों की  प्रतिस्पर्धा है अरे हम क्यों जवाब दे। बामुश्किल जान छूटी लोगों ने हूब गलियाया। पर हम कहते रहे ….... देवानन्द साहब के जलवे सुने, दिलीप साहब के अफ़साने भी पर ये सब जो जवानी में सोच भी नहीं पाये वो तिवारी जी ने 80 बरस में कर दिखाया। जय हो तिवारी जी की !!

अब देखो तिवारी जी 2008 से अदालत को छकाये पड़े है। रोज की रोज खबर आती थी। तिवारी जी अदालत नहीं पहुँचे। वकील को भेज दिये बोले सेहत गड़बड़ है। ब्लड सैंपल देने में छका लिया। तिवारी जी फर्राटा भागते रहे। और पूरी न्याय व्यवस्था सरपट उनके पीछे। 5 साल अदालतों को छकाने के बाद अब बाप बन ही गये। मान ही लिया की अभी तो मैं जवान हूँ। वैसे तो मामला अदालत को गुमराह करने और 420सी का बनता है तिवारी जी के ऊपर, पर तिवारी जी के तेज के सामने सब निस्तेज है।

सब्जीमण्डी

दुनिया एक मण्डी ही तो है। कोई क्रेता है कोई विक्रेता है। भूमिका में बदलाव जरूरत के हिसाब से आता जाता रहता है पर बाजार के मूल सिद्धान्त हमेशा और हर जगह वही है। माँग और आपूर्ति पर आधारित !! कोई सपने बेचने का कारोबार करता तो कोई सब्जी बेचने का पर अन्ततः सब एक दूसरे के पूरक है। कहीं सड़क पर साइकिल में सामान लादे आदमी जोर-जोर से चिल्ला कर अपने सामान की खूबियाँ बयान कर रहा होता है। तो दूसरी ओर अखबार में विज्ञापन देकर लोगो सामान की उपलब्धता बता रहे होते है। दूरदर्शन में तरह तरह के ब्राण्ड बड़े बड़े चेहरों के साथ बेचे जा रहे होते है। मैं सब को देखता हूँ गौर भी करता हूँ। मुझे ऐसा लगता है की मार्केटिंग के मूल सिद्धान्तो का आविर्भाव सब्जीमण्डी और अनाजमण्डी जैसी मण्डियों से हुआ है। ये मण्डियाँ लोगों की मूलभूत जरूरतों से जन्मी है यही इनकी मौलिकता का मूल कारण भी नज़र आता है। वित्तीय रूप में ना सही पर वॉल्यूम के हिसाब से ये बहुत बड़ा मार्केट है। असंख्य लोगो को रोजगार देता है।

आप सब्जीमण्डी जायेगे तो गौर करियेगा। अलंकार युक्त भाषा का इस्तेमाल कर विक्रेता क्रेता को लुभाने का प्रयास कर रहा होता है। आप ने ध्यान ना दिया तो दाम १९-२० कर लेने का लुभावना प्रस्ताव देते है । मण्डी में होने वाला शोर भले आपको एक पल के लिये निराश करे पर कानो में रस घोल देने वाले कई मौलिक जुमले आपको सुखद एहसास कराते है। कुछ जुमले मैं आज सुन कर आया हूँ ।
Sec-34 Chandigarh Sabji Mandi

"मिर्ची नहीं मलाई है बॉम्बे से आयी है",
"अमरूद नहीं ये पैदा है …… इलाहाबादी अमरूद है खायेंगे तो पेड़ा  भूल जायेगे"
"गाजर खाकर देख लो चीनी फेल है"
" मूली नहीं बताशा है"

ऐसे ही जुमले आप खुदरा विक्रेतायों की दुकानो में भी पायेगे। आगरा का मशूर पेठा, मथुरा और मलवा के नामचीन पेड़े , मलीहाबाद के जुल्मी आम, केरल ताबड़तोड़ नारियल। गुण धर्म और उपलब्धता के आधार पर किसी चीज को बेचने का प्रयास बेहद उम्दा और मौलिक लगता है। रोज नया प्रयास होता है।  रोज नये जुमले बनते है। पर अफ़सोस ये अपने जुमले का कॉपी राईट नहीं ले पाते अन्यथा देश की बड़ी बड़ी विज्ञापन एजेंसीज और बड़े बड़े घराने इस सब्जी वालों को बड़ी रॉयल्टी पे कर रहे होते।



Sector-34 Sabji Mandi Chandigarh
मौलिकता उस मोलभाव में देखी जा सकती है जब खासकर महिला क्रेताये मोलभाव शुरू करती है। पहले एक दुकान में भाव पूछती है फिर सोच विचार कर आपस में गुप्तगू की, आगे वाले से लेते इसका महँगा है। आगे २-३ दुकानो में यही प्रक्रिया चलती है। जब एक दुकान फाइनल हो जाती है तो दुबारा से मोलभाव शुरू होता है। २ किलो लेना है लो  ........… दुकान वाले भी कई बार चिल्ला रहे होते है। १ किलो २५, २ किलो ४० जल्दी आयो ले ले जाओ। बड़े बड़े क्रेता और विक्रेता अब यही फंडे और हथकण्डे अपना कर अपनी दुकान चला रहे है और सब्जीमण्डी वाले हमेशा की तरह धुप हो या बरसात आँधी हो या तूफान हमे सब्जियाँ बेच रहे है।  अपना पेट भर रहे है हमारा भी। अच्छा है की इन्हे राजनीति नहीं आती बस अपना काम आता है। इसीलिये हरदम हर कदम ये हमारे और आपके धन्यवाद के पात्र है!!!

बस एक बरसात यहाँ कयामत ढा देती है .......

जीरकपुर; सब -अर्ब ऑफ़ चण्डीगढ़ की ये सड़क कहने को तो VIP रोड है। पर बस एक बरसात यहाँ कयामत ला देती है। गौरतलब है ये सड़क पिछले 2 सालो में तीन बार बन चुकी और बह गयी। हल्की सी बरसात से यहाँ जलाशय बन जाता है। जल निकाशी के बारे में या तो सोचा या सोचकर छोड़ दिया जाता है। बाकी तस्वीर खुद बोलती है। ……
हाई स्ट्रीट मार्किट जीरकपुर



दंगो पर सियासत!!!

हाल ही में गृहमंत्रालय ने सुरक्षा सहायकों के ५३२ पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया । गुजरात के दंगा पीड़ितों को आयु में ५ वर्ष की विशेष छूट का प्रावधान रखा गया है। जाहिर है कि सियासी गलियारों में हलचल है उम्मीद है की हो-हल्ला भी होगा। पर इस कदम के पीछे सरकार और नुमाइन्दों की मंशा साफ़ नहीं लगती है। एक राज्य विशेष के दंगा पीड़ितों को लक्ष्य बनाना समझ से परे है। जबकि गये ३ दशकों में भारत का इतिहास कई भयानक दंगो से लहूलुहान हुआ। इंसान और इंसानियत की लड़ायी का मुकाम  क्या होगा ये चर्चा का विषय है किन्तु ये निश्चित है की मानवता हर बार शर्मसार हुई है। धर्मो और सम्प्रदायो के बीच खूनी संघर्ष की  फेहरिश्त बड़ी लम्बी है। कुछ एक जो बेहद क्रूर थे निम्न है।

 - 1984 में दंगे हुये
- 1989 में आरक्षण विरोधी दंगे हुये
- 1991 में राम मन्दिर और बाबरी मस्जिद के नाम पर दंगे हुये
- 2002 में गुजरात में दंगे हुये
- असम में रक्तपात हुआ।
- हरियाणा के मिर्चपुर में दंगे हुये ( जातीय दंगे हुये )
- मुजफ्फर नगर में दंगे हुये

साभार दैनिक भास्कर 
अखबारों और समाचारों की माने तो केवल उत्तर प्रदेश में पिछले २ सालों में सैकड़ो बार दंगे हुये। पर क्या कारण रहे होगे कि सरकार ने केवल गुजरात दंगों की सुध ली? सुध भी ऐसी की दंगा पीड़ित फिर से बेसुध हो जाये !! केवल ५३२ सरकारी पदों में उम्र  की छूट? ये तो डूबते हुये तिनके के सहारे से भी कम है। ये कदम यह सोचने और मानने के लिए मजबूर करता है की सरकार का दंगा पीड़ित लोगों को चंदा देकर राजनीतिक लाभ बटोरने की कोशिश है। ऐसा लगता है की सरकार इस केवल धर्म विशेष के चन्द लोगो को फायदा पहुचा कर सहानुभूति  बटोरना चाहती है। अच्छा होता अगर सरकार की नीयत साफ होती। अगर सरकार यह प्रयास करती की देश सभी दंगा पीडितो को पहचान कर उन्हें नये सिरे जीवन शुरू करने में मदद की जाती और भविष्य में भी उन्हें हितों को सुरक्षित करने के लिये प्रावधान करते। जल्दबाजी में लघुकालीन लक्ष्यों की पूर्ति हेतु विज्ञापन स्वस्थ्य लोकतन्त्र के लिये जहर के सामान है और साथ -साथ अन्याय भी।

आपको ध्यान होगा कि हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने धर्म विशेष के लोगो को मुआवजा देने का ऐलान किया था। ये एक कुत्सित और कमजोर आधार पर किया गया प्रयास था जिसमे राजनीतिक मंशा साफ थी। उत्तर प्रदेश सरकार का ये फैसला अदालत में औधे मुँह गिरा जाहिर है कि भारत सरकार का ये प्रयास भी आज नहीं तो कल अदालत में तौला जायेगा और जाहिर है की औधे मुँह ही गिरेगा। सरकार के लोग विशेषज्ञ है फिर इस तरह का कमजोर प्रयास क्यों किया गया? वो भी चन्द दंगा पीडितो के लिये? धर्म विषेश के लिये?

ये कमोवेश वैसा ही प्रयास है जैसे काले बादलो का एक झुण्ड गरज-गरज कर पहले लोगो को ये आश करवा देता बादल बरसेगा, टूट कर बरसेगा । किन्तु ये एक दिखावा होता है। किन्तु ध्यान देने वाली बात ये है की प्रयास तो सफल रहा ना। चर्चा की दरकार थी और वो हो जायेगी।  मामला न्यायलय तक जायेगा तो जाहिर ज्यादा मीडिया कवरेज भी होगा और ज्यादा लोगो तक ये बात पहुचेगी की सरकार गुजरात दंगा पीडितो की हिमायती है। लक्ष्य हासिल और शायद कुछ वोट भी!!! पर राजनीति के शीर्ष पर रहते हुये ये प्रयास बेहद अपरिपक्व है।लोग थोड़े ही सही जागरूक है। बात विकास की होती तो अच्छा था बात रोजगार की होती तो भी अच्छा था। सनद रहे की ३ दशक गुजर जाने बाद भी देश की राजनैतिक राजधानी को मानवता के खून से रंग देने वाले दंगो के पीडितो को नौकरी तो दूर कोई न्याय भी नहीं मिला। आज तक चार्जशीट ही फ़ाइल हो रही है। ये एक स्वस्थ समाज और लोकतन्त्र की निशानी नहीं है।

पडोसी धर्म ....

वो कह गये है इस लिए मैं कर रहा हूँ। मैं मानता हूँ कि ये गलत है पर फिर भी करना पड़ता रहा है। कई बार आप कई कारणों से मजबूर होते है। कई बार आप तर्कों से भले किसी जो परास्त कर दे पर व्यवहारिकता में आप मात खाने के लिए वाध्य होते है। वो मेरे पडोसी है और मैं पडोसी धर्म निभा रहा हूँ। पडोसी को आप चुन नहीं सकते। वो आपको सांसारिक व्यवस्थायों के नुमायिंदे के रूप में मिल जाते है। हाँ पड़ोसियों में से आप किसी विशेष को ज्यादा तवज्जो जरूर दे सकते है। सामंजस्य हो ना हो पर पडोसी धर्मं तो निभाना ही पड़ेगा। कई बार इस रिश्ते को नफे और नुकसान के तराजू में भी तोलना पड़ता है। कई बार आस-पास के माहौल को शान्तिमय  रखने के लिए पडोसी धर्म निभाना जरूरी हो जाता है। वो जानते है की सामाजिक न्याय और कई मुद्दो पर मेरे विचार मुखर है। पर फिर भी वो मुझसे कह गये के की प्लीज आप देख लेना। मैंने विरोध तब भी दर्ज कराया था जब ये घटना हुयी थी। मैंने कई तर्क दिये वाद-विवाद हुआ लेकिन पडोसी आपकी मानने के के लिए वाध्य नहीं होते। आप कह सकते है पर अपनी बात रख सकते है पर अंतिम निर्णय पडोसी का ही होना है।

कहते है की पडोसी आप के पास रहता है अतैव उपलब्धता के मामले में वो आपके करीबियों से कहीं ऊपर आता है। इसी लिए पडोसी धर्मं के प्रति आपका प्रतिबद्ध होना जरूरी होता है। दिन प्रतिदिन के कार्यकलापों में पडोसी कि अनिवार्यता जगजाहिर है खासकर जब आप एकल परिवारों में रहते है । पडोसी धर्मं का मान रखने के लिए मैं खुद से जद्दोजहद में लगा हुआ हूँ। ग्लानि की अनुभूति भी कई बार हुई होती है। नीद भी उड़ गयी। गलत को सही साबित करने के लिए मन ने  प्रयास भी करता है । किन्तु और परन्तु की लड़ाई अभी भी जारी है। वो एक पिंजरा है जो मेरे पडोसी मुझे दे गये कुछ दिन के लिए ही सही। उस पिंजरे में दो पँछी है एक नर एक मादा। जिनको उड़ने के लिये असीमित आसमान चाहिये वो उस पिंजरे में कभी इधर कभी उधर फड़फड़ा लेते है और फिर एक शान्ति छा जाती है पुनः प्रयास भी किये जाते है किन्तु नतीजा पता है। वो पँछी है बेजुबान है प्रयास करना उनका  कर्तव्य है वो करते है पर पिंजरे की अपनी मजबूरियाँ है पिंजरा भावनाये नहीं समझता वो ये भी नहीं समझता की जो पिंजरे में है वो पँछी है या इंसान। पर इंसान तो समझता है, समझना भी चाहिये की प्रेम पँछी से हो ये अच्छी बात है पर प्रेम इतना अंधा भी ना हो कि उसकी आजादी छीन ले।