कविता: नये वर्ष में नये इरादे, आओ नव लक्ष्यों को साधे

नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ मैं आपके नए वर्ष की शुरुआत इस इस कविता के साथ करने की इज़ाज़त चाहूँगा।

नये वर्ष में नये इरादे
आओ नव लक्ष्यों को साधे
भूली बिसरी इच्छाओं को
भूले बिसरे हर सपने को
एक डोर में बाँधे।

आओ नव लक्ष्यों को साधे ।।
साथ गर्व के बढे चले हम
हर कठिनाई चढ़े चले हम
कष्ट करे सब आधे-आधे।
आओ नव लक्ष्यों को साधे।।

अन्तरतम को दूर भगाये
नयी भोर जीवन में लाये
जीवन की सब वाधायें लाँघे।
आओ नव लक्ष्यों को साधे।।

हर गरीब को गले लगाये
सदभाव की अलख जगाये
मानवता के रोपे पौधे ।
आओ नव लक्ष्यों को साधे।।

देश के हित में एक शपथ ले
देश के हित में आओ सुपथ ले
सारी धरती और अम्बर  में
गूँज उठे अपने ये वादे।
आओ नव लक्ष्यों को साधे।
आओ नव लक्ष्यों को साधे।।

कहानी: और बापू बहुत देर तक हँसते रहे!!!

चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन पर उतरकर राजघाट की ओर रुख किया। मन आज गाँधी जी से मिल लेने की धुन में रमा हुआ था। राजघाट आने का ये दूसरा प्रयास था। पहली बार जब आया था उस दिन राजघाट बन्द था। आम आदमियो के लिए बन्द था!! क्यों कि अगले दिन कोई खास आनेवाला था। किसी देश का राष्ट्रपति था शायद। बैरंग वापस लौटना पड़ा था। गहरा निराशा भाव मन में था। एक तो दिल्ली की आपाधापी वाली जिन्दगी में ट्रैफिक और भीड़ का मुकाबला करते हुये यहाँ तक आ पाना आसान ना था। और जब आ गये तो निहित उद्देश्य हासिल किये बिना जाना मन को थका देने के लिये काफी था। किसी देश का कोई राष्ट्रपति आ रहा है तो गाँधी जी के दर्शन बन्द क्यों हो भाई? जन्म से भारतीय होना क्या पर्याप्त नहीं है दर्शन हेतु????

जैसे तैसे आगे बढ़ा और बस पकड़ कर राजघाट की ओर बढ़ लिया। बस के धक्के खासकर गर्मियों के महीने में लू के थपेड़ो से भी खतरनाक होते है और साथ ही बस कन्डक्टर की कर्कश खड़ी बोली हृदय को लहूलुहान कर देती है। ऐसा लगता है की मानों दिल्ली की बस में नहीं किसी असभ्य समाज में घुस आये हो आप!! चन्द गुण्डे थोड़ी सभ्यता के साथ गलियाँ रहे हों। वो लखनऊ, कानपुर की नजाकत और नफासत भरी भाषा यहाँ थोड़ी ही मिलेगी !!! दिल्ली की बसों में सम्मान बचाये रखना भी उपलब्धि जैसा होता है। "राजघाट राजघाट, राजघाट वाले उतर लो भाई" कन्डक्टर की कर्कश आवाज गूँजी, राजघाट आ चुका था। लगभग रेंगती हुयी बस से उतरना पड़ा। ले दे कर सड़क पार करी और एक पानी की स्टाल पर रुक कर नीबू पानी का गले के नीचे उतार लिया।  तरावट महसूस हुयी। जान में जान आई और आगे बढ़ने के लिये पर्याप्त ऊर्जा भी भी सँजो ली। राजघाट के दरवाजे फिर बन्द थे। कल कोई आ रहा था। कोई बड़ा आदमी नाम याद नहीं पड़ता पर कुल मिला कर आम जनता  लिये राजघाट आज भी बन्द था।

निराशा का भाव चरम पर था। चौकीदार से बहस होने लगी। "क्या मजाक लगा रखा है? रोज-रोज बन्द ही रहता है ये" हम कब देख पायेगे गाँधी जी को एक तो ले दे के दिल्ली आना होता है!! पूरा दिन ख़राब कर के आओ और राजघाट बन्द ??? हाथ लगी निराशा और मौसम के मारक मिजाज से तेवर तल्ख़ हो चले थे। पर सामने से आये जवाब ने मानो घड़ो पानी उड़ेल दिया हो !!! "अरे बाबू हमसे कहे लड़ रहे हो? हम तो वही कर रहे है ना, जो हमसे कहाँ गया है। हमे क्या मिलना है आपको रोक कर? हम तो साहब लोगो की आज्ञा बजा रहे है बस" उम्र दराज से दिखने वाले उस चौकीदार की बात से गुस्सा हवा हो गया। "सही बात" मैंने जवाब दिया।
साभार :http://www.biography.com/

गाँधी जी से ना मिल पाने का ग़म लिये यमुना की तरफ कूच किया। कदम बढ़ रहे थे और साथ ही मन में रस्साकशी भी। क्या यही गाँधी जी के सपने का भारत है? क्या राष्ट्रपिता से मिलने के लिये किसी की आज्ञा की जरूरत है? अफसोसजनक है की केवल गाँधी जी केवल बड़े लोगो के हो गये !! वैसे गाँधी जी तो जन-जन तक पहुँचने की बात करते थे। तो क्या सरकारी तन्त्र ने बापू को बन्धक बना लिया ??? सामने पुल देख कर कदम रुक गये। शायद यमुना किनारे आ चुका था। पर जैसे ही नज़र पुल के नीचे के जल पर गयी … मन का भरम दूर हुआ ये यमुना नहीं कोई गन्दा नाला था। एक सज्जन से पूछने की सोच ली। " भाईसाहब यमुना कितनी दूर है अभी?" अजी यही तो है यमुना!!! जहाँ आप खड़े है। दुबारा पुछा यही है यमुना?? हाँ भाईसाहब यही है यमुना मैं यही पास में ही रहता हूँ, यही है यमुना " सज्जन जवाब दे कर आगे बढ़ गये और मैं ठगा सा यमुना को निहारता रहा। "यमुना तीरे.......पर कृष्ण जी बाल्यकाल कहानियों का चित्र मन में जीवंत हो उठा" इसमें अगर शेषनाग होता तो अब तक शहीद हो चुका होता। खैर यमुना रुपी गन्दे नाले के पास साफ़ सुथरी से जगह खोज बैठ गया।

यनुमा की हालत पर तरस खा की रहा था कि एकाएक नज़र अपनी शर्ट की जेब में पड़ी। ऊपर की जेब में जो पचास का नोट पड़ा था उसमे से हँसते बापू नज़र आये। बापू बहुत देर तक हँसते रहे!!! और फिर सहसा मुझे सम्बोधित करते हुये बोले बेटा। तुम सही सोच रहे थे!! मुझे सरकारी तन्त्र ने कैद कर लिया है !!! ये वो कैद है जो आपको सम्मानित करने के नाम पर दी जाती है। ये कैद ताजीरातेहिन्द के तहत नहीं है पर है। अपार कष्ट वाली। एक पीड़ा जो हमेशा होती है। मुझे नोट पर छाप दिया, लड़ाई का जरिया बना दिया। भाई-भाई ना रहा, मुझे सफ़ेद और काला बना दिया। सफ़ेद  बैंक में कैद हो गया। काला कोठरियों में कैद हो गया। विदेश के क़ैदख़ानो में भी डाला। जिन विदेशियों से मैं उम्र भर लड़ा , वो विदेशी जो मेरे सामने टिक ना सके मैं उन्ही के क़ैदख़ानो में हूँ। हर थाने, चौराहे, हर सरकारी दफ्तर में मेज के नीचे से इधर-उधर किया जाता हूँ।  हालाँकि ऊपर चिपका मैं ये सब देख रहा होता हूँ। रोता हूँ पर मेरे आँसू काफी नहीं। मैं औरों से क्या उम्मीद करुँ  देश की संसद में मेरी आँखों के सामने जूतम -पैजार हुआ करती है। मैं कैद हूँ बेटा इसीलिये इतने प्रयासों के बाद भी मिल ना सका। अभी मैं हँस जरूर रहा हूँ, तुम्हारी मनोदशा देख कर किन्तु मैं रोज रात को राजघाट में रोता हूँ आगे भी रोता रहूँगा ……

नारकण्डा, एक सुन्दर,शान्त,रमणीक हिल स्टेशन( Narkanda, a very beautiful Hill station, especially for skiing)

शिमला शहर जाईये घूमने की कोशिश शुरू कीजिये, कोशिश मतलब होटल, पार्किंग इत्यादि। कोशिश में सफल हो गये तो पार्किंग खोजने की जद्दोजहद दिमाग में लेकर मॉल रोड पर घूमिये। रोड के किनारे बिकने वाले चना मसाला सॉफ़्टी आइसक्रीम इत्यादि का लुत्फ़ उठाईये। थोड़ा सा मजा आना तय है। लेकिन मजा अगर अधिक चाहिये शान्ति और अतीव सुन्दरता के साथ तो थोड़ी और जहमत उठाईये। शिमला शहर की ऑकलैंड टनल को पार करते हुये रुख करिये नारकण्डा की ओर। राष्ट्रीय राजमार्ग -22 पर शिमला शहर से लगभग 68 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है नगर पंचायत नारकण्डा। 68 किलोमीटर लम्बे इस मार्ग के दोनों तरफ सर्दी के समय बर्फ की एक सफ़ेद धवल चाँदनी सरीखी चादर बिछी रहती है। पाइन के लम्बे हरे पेड़ और उस पर बर्फ की सफ़ेद चादर, सूरज की चढ़ती त्योंरियो के साथ मनमोहक हो उठती है। सम्मोहित करती है, मानो आपको अपने पास बुला रही हो। आप भी विवश हो जायेगे और बार- बार रुकेंगे, इस अतीव सुन्दरता को अपनी आँखों और कैमरे में कैद कर लेने के लिये। जैसे जैसे आगे बढ़ते जायेगे लगेगा मानों प्रकृति के और करीब जा रहे है। बीच -बीच में जगह मिलने पर गाडी पार्क करे और मनमोहक मैगी का आनन्द जरूर उठाये। सुन्दरता के साथ खतरे भी निहित होते है सो गाड़ी जो भी चला रहा हो उससे धीरे चलाने का अनुरोध करे। बर्फ सड़क पर भी कई जगह मोटी परत बना लेती है। जो देखने में मिट्टी जैसी लगती है किन्तु कभी ब्रेक लगाने की जरूरत आन पड़ी तो स्लिप करने का खतरा अत्यधिक होता है। सो धीरे चले सुरक्षित चले।

मनोरम दृश्यों को बटोरते हुये जब आप थियोग तक आ जायेगे तो यहाँ से नारकण्डा करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर रहा जाता है। थियोग से शुरू होने वाली पर्वत श्रंखलायें बर्फ से पूरी तरह आच्छादित मिलेगी। पर्वत श्रंखलाओं के मिलने से बनने वाली घाटियाँ और उनमे स्टेप बाई स्टेप बिछी हुयी बर्फ दूर तलक सुन्दरता के नये पावदान स्थापित करती नज़र आयेगी। मानो पहाड़ों की रानी श्रृंगार आपके स्वागत में खड़ी हो।

नगर पंचायत नारकण्डा में पहुँचने पर आपको गिने चुने होटल ही मिलेंगे। जैसे होटल हातु, होटल महामाया , होटल हिमालय, और भी एक्का, दुक्का ठीक ठाक होटल मिल जायेगे। व्यावसायिकता यहाँ काम है सो शिमला की तरह जगह पर खड़े होटल गाइड नज़र नहीं आयेगे। सो होटल की व्यवस्था ऑनलाइन कर सके तो बेहतर। विश्राम के उपरान्त नारकण्डा में आपका निम्न चीजो का लुत्फ़ उठा सकते है

स्कीइंग पार्क
होटल महामाया के विपरीत दिशा में एक रास्ता स्कीइंग पार्क को जाता है। यहाँ पर अपने जूते पहन कर बिल्कुल न जाये। बर्फ में चलने के लिये विशेष जूते किराये पर मिल जायेगे। साथ ही साथ कुछ गाइड आपके साथ चलने के लिये तैयार खड़े होगे, पार्क तक जाने के लिये करीब 400 मीटर लम्बा बर्फीला रास्ता तय करना होगा। यहाँ गाइड की मदद ले चलने का तरीका समझे। छोटे -छोटे दृढ़ कदमों  साथ तय करे। आप प्रकृति की गोद में अठखेलियाँ करते नज़र आयेगे। रास्ता तय करते समय दाहिने हाथ पर, सुनहरी पर्वत श्रंखलायें नज़र आयेगी। ये हिमालय पर्वत है , कैलाश पर्वत है।  मनोहारी दृश्यों के साथ स्कीइंग का लुत्फ़ है . स्कीइंग में गाइड को साथ ले किनारों पर ना जाये तो स्कीइंग खतरा रहित है।

हातु पीक:
नारकण्डा की सबसे उँची जगह। ट्रैकिंग के शौक़ीन लोग इसका लुत्फ़ उठा सकते है। अमूमन बर्फ़बारी के बाद सड़क मार्ग बन्द हो जाता है। ट्रैकिंग करने के लिये गाइड की सलाह ले तो बेहतर, पूरा रास्ता करीब 8km लम्बा है। हातु पीक पर एक प्राचीन मन्दिर स्थित है।

तानी जुब्बेर लेक:
नारकण्डा क़स्बे से करीब 12 KM की दूरी पर स्थित है ये झील। ये एक छोटे तालाब जैसी है किन्तु अति सुन्दर है। बर्फ़बारी के बाद यहाँ का पानी जाता है। और झील की परिधि में सफ़ेद बर्फ की चादर नज़र आती है। खिली हुयी धूप इसकी सुन्दरता पर चार चाँद लगाती है। पास एक मन्दिर स्थित है जो की केवल लोकल लोगो के लिए खुलता है। मन्दिर की बनावट बेहद ही खूबसूरत है।

दो दिन का समय नारकण्डा में लुत्फ़ के साथ गुजरा का सकता है। ज्यादा भीड़-भाड़ नहीं है. इस लिये शान्त माहौल मिलता है।  नारकण्डा लगभग 8 PM पर बन्द हो जाता है। इस समय के बाद अँधेरा ही मिलता कोई दूकान खुली नहीं मिलती। आगे नारकण्डा के स्कीइंग पार्क और तानी जुब्बेर लेक की तस्वीरें है। नोश फरमाये..........
Panorama View of Skiing Park Narkanda
Himalayan Mountain Side view of Skiing Park


Scenic view of Skiing park Narkanda
Locals houses wrapped with snow, Narkanda
Hotel The Hatu, A HPTDC Hotel, on NH-22, Narkanda
View of Himalayan Mountain Range from Narkanda
Himalayan Mountain Range From Narkanda
Guides- Sudhanshu and Kunal at skiing park Narkanda





A tools to slip over snow

Skiing at Skiing park
Locals Car wrapped by snow. This pic is taken post 13 day of snow fall


Tani Jubber Lake at Thanedar 12 Km from Narkanda Town

 
A temple near by Tani Jubber lake at Thanedar 12Km from Narkanda Town
Tani Jubber lake: Frozen Water of lake
Scene on the way to Tani Jubber lake
Dusk: View From Satya Hotel, Narkanda

दीवानो को यूँ ना सताया करिये...

दीवानो को यूँ ना सताया करिये
देख यूँ नज़रे ना फिराया करिये

वो एक झलक को करते है सजदे
कभी बाल सुखाती नज़र आया करिये

छोड़ इतराना अपने हुस्न पर
कभी बेमक़सद भी मुस्कराया करिये

दिल में थोड़ी सी जगह बनायीं है उसने
ना इस बात को बेससब झुठलाया करिये

देख एक झलक अजनबी ना बन जाया करिये
रोज सखियों को ना शिकायत लगाया करिये

प्यार की राहे नहीं है सरल मगर
जज्बा कभी तो दिखाया करिये

एक बार तो करना ही है ज़िन्दगी में
अब वक़्त और ना जाया करिये

कविता : पहाड़ों की रानी आज गा रही है


हिमाँचल में पहाड़ियाँ
बर्फ से आच्छादित है
सूरज की किरणों में
धवल चाँदनी सी सम्पादित है
रात  चाँद की रोशनी में
ऐसा लगता है कि मानो पहाड़ो की रानी ने
एक सफ़ेद साड़ी पहन ली हो
माथे पर  बिंदियाँ लगायी  हो
सज धज के पर्यटको स्वागत में आयी हो
जैसे सुन्दरता रग-रग में समायी हो
जैसे दादी ने कोई कहानी सुनायी हो
जैसे फ़ौज सितारों की आयी हो
प्रकृति अपना जादू दिखा रही है
पहाड़ो की रानी आज गा रही
मधुर साज बजा रही है।
मधुर साज बजा रही है।

नये वर्ष की अगवानी में, टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें,

पूज्यनीय अटल बिहारी बाजपेयी जी  की ये कविता मुझे बेहद पसंद है  ..........















यमुना तट, टीले रेतीले, घास फूस का घर डंडे पर,
गोबर से लीपे आँगन में, तुलसी का बिरवा, घंटी स्वर.
माँ के मुँह से रामायण के दोहे चौपाई रस घोलें,
आओ मन की गाँठें खोलें,
बाबा की बैठक में बिछी चटाई बाहर रखे खड़ाऊँ,
मिलने वालों के मन में असमंजस, जाऊं या ना जाऊं,
माथे तिलक, आंख पर ऐनक, पोथी खुली स्वंय से बोलें,
आओ मन की गाँठें खोलें.
सरस्वती की देख साधना, लक्ष्मी ने संबंध ना जोड़ा,
मिट्टी ने माथे के चंदन बनने का संकल्प ना तोड़ा,
नये वर्ष की अगवानी में, टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें,
आओ मन की गाँठें खोलें।

आदरणीय अटल जी की ये कविता उस ग्रामीण परिवेश की झलक देती है जहाँ उन्होंने बचपन गुजारा। देश के लिये योगदान को सभी जानते है। अटल जी को भारतरत्न देना देश और सभ्यता के लिये एक मील का पत्थर है। आने वाली पीढ़िया ऐसे महानुभावो से प्रेरित होगी। तो देश सही मार्ग पर चल सकेगा।

चण्डीगढ़: सुखना में ऑपरेशन क़त्ल

चण्डीगढ़ की सुन्दरता पर चार चाँद लगाने वाली सुखना लेक के लिये बीता पखवारा ठीक नहीं रहा। सुखना चण्डीगढ़ की सुन्दरता का प्रतीक थी और सुखना लेक में रहने वाली बतखें सुखना का आभूषण। बच्चों के लिए सुखना का मुख्य आकर्षण बतखें ही थी। किन्तु नियति को कुछ और ही मन्जूर था। माइग्रेटरी बर्ड की एक कतार इस मौसम में सुखना लेक आती है। इन्ही में से कोई बर्ड अपने साथ फ्लू ले आई। और बीते दिनों एक बतख की मृत्यु हो गयी, पोस्टमार्टम से बर्ड फ्लू की बात पता चली। चण्डीगढ़ नगर निगम के अधिकारियों को क्रूर फैसला लेना पड़ा। सभी बतखों को सुखना के आईलैंड पर क़त्ल कर दिया गया, जलाया गया और फिर 12 फुट के गहरे गड्ढे में दफ़न कर दिया गया।
30 लोग इस ऑपरेशन क़त्ल में लगाये गये। विशेष तरीके की वेशभूषा पहन कर। ऑपरेशन क़त्ल के पहले और बाद में उनका मेडिकल किया गया। पर अफसोश आज अख़बारों की खबर है की उनमे से एक व्यक्ति को बर्डफ्लू हुआ है।

      सुखना लेक की बतखों का एक चित्र साभार :                                                 https://aamirshabir.wordpress.com/2008/09/09/sukhna-lake-chandigrah/
अख़बार पढ़ कर बेहद दुःख हुआ की अब सुखना लेक में कभी बतखों की वो मण्डली वो सफ़ेद कतारे बनाती हुयी नज़र नहीं आयेगी। वो पक पक … की आवाज़े जो सीढ़ियों उतरते हुये व्यक्ति को देख कर सुखना की बतखें करती हुयी नज़दीक आ जाती थी। वो अब कभी नहीं होगी। सुखना के आभूषण उतार दिये गये, मजबूरी थी इंसान को बचाने की !!! हाल फिलहाल अगले एक महीने तक सुखना लेक के आस-पास का इलाका सील कर दिया गया है। सुखना से लगे हरियाणा राजभवन में सैनिटेशन किया जा रहा है। चण्डीगढ़ प्रसाशन की भूमिका बहुत ही जबरदस्त रही वो बधाई के पात्र है। किन्तु इन सब के बीच मुझे डार्विन के सिद्धांत की याद आ गयी। "सर्वोत्तम की उत्तर जीविता(सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट) हम बेहतर जीव है, बुद्धि वाले है सो हमने बतखों को क़त्ल कर दिया। इंसानो को भी बर्ड फ्लू हुआ है किन्तु उन्हें सबसे अलग रख बचाने के प्रयास किये जा रहे है ,क़त्ल नहीं किया गया। अगर हम पहले से इस स्थिति के लिये तैयार होते किसी वैक्सीन का इस्तेमाल करते तो शायद बतखें भी बच जाती। पर अफसोश ये हो न सका। दोष नहीं दे रहा हूँ बस ये सोच रहा हूँ की कभी-कभी काल इतना क्रूर क्यों हो जाता है?


हे जेहादियों हमें जीने दो

पेशावर में बच्चों के कत्लेआम और "बोको हराम" द्वारा महिलाओं के अपहरण और दुनिया के अन्य देशो में फैले आतंकवाद के परिपेक्ष में।
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इस्लाम की अलग-अलग परिभाषा
ना जाने कितने संगठन गढ़ रहे है
ना जाने क्यों?
ना जाने किससे लड़ रहे है?
कभी कुछ निर्दोष
कभी कुछ बच्चों की माँए
कभी खुद बच्चे बलि चढ़ रहे है।
kaaji साहब रोज फतेहा पढ़ रहे है।

जन्नत की चाह में
जेहाद की राह में
हर सीमा लाँघ ली गयी है
कट्टरता के फेर
लाशों के ढेर में
हर मुफलिश
हर मजबूर की
आरजू बाँध दी गयी है

जेहाद और कायरता को अलग अलग रहने दो
इस्लाम को कुरान saath ही bahane दो
हे जेहादियों हमें जीने दो
हे जेहादियों हमे जीने दो 

संस्मरण: जियासराय का देशी कुत्ता

जियासराय की गलियों में कुछ मित्रो के साथ चाय पर चर्चा चल रही थी। चाय की दुकान से पोर्टेबल गिलास में चाय लेकर हम सब थोड़ी दूरी पर खड़े थे। चाय की हर चुस्की के साथ नयी खुशियो का एक सवेरा सा आ जाता। जिया सराय की तंगहाल गलियों में सुकून के कुछ पल या तो चौराहे पर खड़े होकर मिलते थे या फिर किसी चाय की दुकान पर। वर्ना बाकी जगहों पर हाल ये था की आसमान से गिरा पानी भी अपना रास्ता नहीं खोज पाता। धूप इधर-उधर दीवारों से टकराकर गुम हो जाया करती है, परावर्तन की कोई प्रक्रिया धूप को सड़क तक ला पाने के लिये नाकाफी थी। चाय की चुस्कियाँ खात्मे की ओर अग्रसर थी .......... तभी एकाएक कुछ कुत्तों के भौंकने और किसी के भागने की कदमताल ने हमारा ध्यान भंग किया। चाय की कुछ चुस्कियाँ मामला समझने में लग गयी। अब नज़रे कुत्ते और आदमी के ऊपर गड़ी हुयी थी।

एक तरफ एक मरियल देशी कुत्ता दूसरे ओर आयातित विदेशी टाइप नश्ल का भारी भरकम कुत्ता दोनों के घमासान छिड़ी हुयी थी। मरियल देशी कुत्ता झबरा टाइप कुत्ते को कूटे पड़ा था और झबरा गुर्रा कर विरोध जरूर दर्शा रहा था पर निरीह था। झबरा कुत्ता मुकाबले में शुरू से ही पिछड़ गया था। झबरा कुत्ता किसी तरह बच कर भागा और एक कार के नीचे घुसने प्रयत्न करने लग गया पर घुस नहीं पाया, फँस जरूर गया। देशी कुत्ता फिर टूट पड़ा दो-तीन पटखनी लगा दी। विदेशी कुत्ते का मालिक हाथ में पत्थर लिये भागा और देशी कुत्ते पर प्रहार किया। देशी कुत्ता बाल बाल बचा और चिरपरिचित अंदाज़ में आवाज़ निकालते हुये भागा। मम मम मम ………… उसके भागने देर थी की विदेशी कुत्ते में अचानक ऊर्जा जाने कहाँ से आ गयी . मानों उसके मालिक ने ग्लूकॉन D का घोल पिला दिया हो। वो गुर्राया और भौका …… देशी कुत्ता भी पलटा  ....... दोनों में गुर्राना और भौंकना जारी रहा। झबरा कुत्ता थोड़ा जोर दिखाते हुये मालिक से छुड़ा कर देशी कुत्ते के तरफ हमलावर हुआ किन्तु सर मुड़ाते ही ओले पड़ गये देशी कुत्ते ने आव देखा ना ताव और यलगार कर दिया विदेशी कुत्ता नीचे और देशी फिर ऊपर ……  इस बार झबरा के चारो खाने चित्त थे देशी कुत्ता विजय का बिगुल बजा चुका था। झबरा का मालिक जिया सराय की बड़ी भीड़ के सामने शर्मिन्दा महसूस कर रहा था। इसी के चलते उसने भी मोर्चा सम्हाल लिया डण्डा लेकर देशी कुत्ते पर प्रहार किया। देशी कुत्ता चिल्लाते हुये भगा ....... और मौका पाकर झबरा भी भाग निकला देशी कुत्ते ने फिर झबरा को दौड़ाया। दृश्य कुछ था झबरा आगे देशी कुत्ता पीछे और उनके पीछे झबरा का शर्मिन्दा मालिक।

भागा दौड़ी में झबरा ने कोण बदल कर ऐसी दौड़ लगायी की सीधे मालिक की शरण में आ गया देशी कुत्ता दूर खड़ा गुर्रा रहा था। मानो कह रहा हो की जी भर पेट भोजन नहीं मिला तो क्या बात सम्मान की थी इसलिये मुकाबला किया। देखो झबरे को कितने बिस्कुट और दूध का स्वाद मिला हो पर जमीन पर हम ही है भारी। जैसे कह रहा हो की जी सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं!!!! झबरा का मालिक झबरा पर बरस पड़ा और झबरा शर्म के कारण नीचे की तरफ देख रहा था। झबरा और उसके मालिक ने अपना रास्ता पकड़ा देशी कुत्ता विजयी भाव में खड़ा उन्हें जाते देखता रहा। जिया सराय की आधी जनसँख्या ये दृश्य देख रही थी। हर तरफ ठहाके थे और एक तरफ शर्मिन्दा मालिक। इस पूरे वाकये के बीच हमारी चाय की चुस्कियाँ लाख टके की हो चुकी थी और चाय खात्मे की ओर थी। चाय का गिलास डस्टबिन में फेक कर हम सभी ये कहते हुये आगे बड़े की भाई "काम का ना काज का दुश्मन अनाज का" .

कहानी: भोर के लुटेरे ......

 "चाय चाय चाय" ....... न्यूज़ पेपर दैनिक जागरण,आज, अमर उजाला ...........आवाजों की बढ़ती तीव्रता ने मेरे कान के पर्दो में कम्पन पैदा कर दिया, जो गहरी तन्द्रा को भंग करने के लिये काफी था। मन जाग चुका था पर आँख खोलना मुश्किल हो चला था मानो किसी ने धड़ी भर बोझ आँखों पर लाद दिया हो। अमानत में खयानत वाली बात हो गयी। आँखे खुलने का यत्न कर ही रही थी कि अचानक जूतों का ख्याल मन में कौंदा और बस अगले ही पल अपर बर्थ से सीधे लोअर बर्थ के नीचे कूद पड़ा नज़रे गड़ाये जूते ताकने लगा, जूते अपनी जगह से दूर पर सीट के नीचे पड़े थे, दिल को गहरा सुकून मिला। जूता चोरी के कई मामलात मित्रो साथ हो चुके थे। खैर आँखें खुल चुकी थी और नज़र घड़ी पर गयी 3 बज कर १७ मिनट का समय हो चला था। एक अखबार वाले से पूछा कौन सा स्टेशन है? कानपुर कितनी देर में आयेगा? बस भाई साहब अगले २५ मिनट में कानपुर होगे आप। अखबार भी ख़रीद लिया और खबरे खंगालने लगा। ट्रेन लगभग ५ घण्टे लेट हो चुकी थी। बाहर वातावरण में घना कोहरा आच्छादित था। इतना घना की बाया हाथ दाये हाथ को खोजता रह जाये।

अखबार पलट रहा था, नज़र महानगर पन्ने पर टिक गयी। "भोर के लुटेरो ने कनपटी पर तमंचा लगा, कपडा व्यापारी को लूटा" खबर पढ़ कर खून सर्द हो गया। जिस्म जुम्बिश कर उठा जैसे ही ये समझ आया कि कानपुर पहुँचते-पहुँचते ४ बजा होगा। भोर के लुटेरो की सक्रियता का आदर्श समय यही है। भयभीत मन एक पल को मान बैठा कि कल की अखबार में खबर मेरी ही होगी। मैं भी छप जाऊँगा अख़बार में पीड़ित की तरह, लुटेरे तो कन्टापीकरन भी करेंगे ही साथ ही साथ पुलिस वालो से भी हील-हुज्जत का चक्कर भी होगा। सोच-सोच कर दिल बैठा जा रहा था। "डरा हुआ मन शंकाओं का घर" बस फिर क्या छूटते ही भोर के लुटेरों की कुछ पुरानी खबरे भी जहन में ताजा हो उठी। पल-पल भारी होता जा रहा था। लगता था अभिमन्यु की मानिन्द चक्रव्यूह में फस गया हूँ। बच निकलने का रास्ता नहीं पता। सुना था जिसका जब समय आ जाता है उसे जाना ही होता है कोई रोक नहीं सका, ख्याल भयातुर करने के लिये काफी था। ऐसा लग रहा था की मानो काल एक व्यूह रच चुका हो और सिलसिलेवार ढंग से सब कुछ होता जा रहा था जैसे पहले ही रच दिया गया हो ट्रेन ५ घण्टे लेट, कल तक कोहरे का नामो निशान नहीं था आज घुप्प अँधेरा। नियति मेरे खिलाफ साजिशरत थी। भय बढ़ता जा रहा था, इस समय एक कुत्ते की भौक ही ह्रदय गति को थाम देने लिये काफी थी।
साभार गूगल

शरीर जड़वत था किन्तु फिर मरी गिरी सी हालत में कुछ बची खुची हिम्मत बटोरी और हनुमान चालीसा के एक दो दोहो कण्ठस्थ किये और आगे की खबर पर नज़र बढ़ायी। जैसे-जैसे निगाहें आगे बढ़ी दिमाग में शंकायें नाच उठी ये कहे की ताण्डव करने लगी। ख्याल आया की मान लो लुटेरों ने धर लिया तो क्या करुँगा? हाथ पैर ही जोड़ने पड़ेंगे और क्या? तो हाथ पैर जोड़ लूँगा, जान की भीख माँग लूँगा इतना रायता फैलाऊगा की लुटेरों को भी दया आ जाये, पर अगर नहीं माने तो क्या? कन्टाप रसीद कर दिया तो क्या? पर्स में १०० -२०० पत्ता देख कर नाराज़ हो गये तो क्या? लुटेरों के लिये तो वही वाली बात हो जाएगी की "ना खुदा मिला न विशालेसनम" इतनी सर्दी में निकले है लूट के लिये उनको भी लगेगा की इतनी मेहनत की और मिला क्या? भाई कंटाप तो तय है, बचना छुरे से है।आक्रोश में छुरा भी तो भोक सकते है, खिसियानी बिल्ली अक्सर खम्भा नोचती है!! मैं पक्का नुचा भाई इतने घुप्प कोहरे में अस्पताल का रास्ता भी न नज़र आयेगा। इतनी सर्दी में आदमी आलरेडी छुईमुई टाइप होता है। छुरे ख्याल ही नेस्तोनाबूत करने को काफी था। मन डर-डर सिकुड़ा जा रहा था यकायक एक ख्याल कौंदा की स्टूडेंट डिस्काउंट की बात आगे करुँगा, ....... पर ये शिमला समझौता थोड़ी ही है की वो मेरी सुनेगे। ऊपर से एक कन्टाप बोनस में भी दे सकते है। 

मन विचलित था बाहर पंक्षियों  के कलरव की आवाज़ गूँजने लगी थी और कानपुर सेंट्रल भी नज़दीक था। मन में भय बढ़ता रहा था। पाँव में जूते डालते हुए ऐसा था मानों भारत के सीमावर्ती इलाके में युद्ध करने हूँ ….... कर चले हम फ़िदा साथियों जैसे गाने मन ही मन बजे जा रहे थे ……  स्टेशन पर यूँ उतरा मानों दोजख का द्वार हो और मैं अपने किये की सजा पाने के लिये आगे बढे जा रहा हूँ। खैर गिरते पड़ते ऑटो स्टैण्ड पर आ ही गया। हर ऑटो वाला भोर का लुटेरा दिखायी दे रहा था। कौन सा ऑटो यमराज का भैसा बन जाये किसको पता। पूरे शहर में यमराज ने लंगर फेक रखे है किसमें फसा का ऊपर घसीट ले पता नहीं। हर मूँछ वाला ऑटोचालक यमराज प्रतीत हो रहा था, मरता क्या ना करता घर तो जाना ही था। एक बिना मूँछ वाला ऑटोचालक फाइनल किया। ऑटो में बैठा एक यमदूत सा लगने वाला सहयात्री बैठा था। पर भी मनोबल थोड़ा बढ़ा। कुछ देर के बाद एक जोड़ा आ गया महिला बुर्केवाली थी, उसे देख सीट पर जड़वत हो गया और सिमट गया ….... भोर के लुटेरे अक्सर ऐसे ही आते है कभी पुलिस की वर्दी में कभी बुर्के में!!! 

ऑटो वाला चल पड़ा टाटमिल चौराहा आते-आते जान हलक तक आ गयी थी। हर पल ऐसा ही लग रहा था की अब बुरका उठा और कब हमला हुआ ……  टाटमिल चौरहे पर सवारी और चढ़ी। टाटमिल के आगे का रास्ता थोड़ा सेफ सा था निगाहे पुलिस पिकेट की तरफ टिकी रही। पुलिस पिकेट तो दिखी पर पुलिस वाले नहीं। आ कुछ जगह लोग अलाव लगाये बैठे थे। उसी अलाव की गर्मी से ऊर्जा मिल रही थी मुझे। टाटमिल से किदवई नगर का रास्ता भारी था। रास्ते जितने भी भगवान पड़े उन्हें कोहरे में देख तो नहीं सका पर अन्दाज़े लगा कर हाथ जोड़ लिये प्रार्थना कर डाली। …… हे भोलेशंकर ये गणेश जी …… बस आज यम के प्रहार को विफल कर दो प्रभु जीवन आपकी भक्ति में काटूँगा … इतनी भक्ति भावना पहले कभी नहीं उमड़ी थी जितनी की आज थी .... भगवान भी मुसीबत में  ही याद आते है …… दुःख के सुमिरन सब करे …… प्रार्थनाओं का दौर चल ही रहा था की किदवई नगर चौराहे पर ऑटो ने विराम लिया। हनुमान जी का बड़ा मंदिर देख मन दण्डवत था। हनुमान जी की कृपा बरसी और बुर्केवाली उतर गयी। दो भले से दिखने वाले लोग चढ़ गये जान में जान आ गयी। अँधेरा छट रहा था मनोबल बढ़ता जा रहा था। दीप टाकीज के पास डर का एक दौर आया पर करो या घर की नज़दीकी ज्यो ज्यों बढ़ रही थी मनोबल बढ़ता जा रहा था रहा। बर्रा चौराहे पर जब उतरा तो लगा की मानों के नयी जिन्दगी मिल गयी हो मानो कारगिल से जीत वापस आया हूँ भोर के लुटेरों से सामना नहीं हुआ किन्तु  अंतरात्मा उनके दर्शन भली प्रकार से कर चुकी थी .... मैं पैदल बैग उठाये घर की तरफ बढ़ रहा था डर बाहर बिखरता जा रहा था। 

IS के ट्विटर वाले मेहँदी के लिये चन्द अल्फाज ....

ऐ मेहँदी,
मेहँदी लगे हाथों से
तुमने क्या गुल खिलाया है ?
IS के प्यार में
खूब ट्विटर चलाया है
देश तो देश रहा
मानवता को जलाया है
तुम मेरे देश के हो
इसका मुझे गम है
अब छोड़ भी दो देश
अगर थोड़ी सी भी शर्म है !!!!!

संकिसा: उपेक्षित किन्तु बुद्ध धर्म का एक बेहद महत्वपूर्ण तीर्थस्थान( A ignored religious tourism place for baudhisth )

यूँ तो उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन के कई बेहद ही महत्त्वपूर्ण स्थल स्थित है। सभी संरक्षित है किन्तु उपेक्षित है!!! जब जब आकाशवाणी पर गुजरात और मध्यप्रदेश विज्ञापन देखता हूँ तो ये सोच कर दिल भर आता है की काश मेरे प्रदेश में भी कुछ अच्छे लोग शासन में आ पाते। जो अपनी धरती की मिट्टी की खुशबू और उसके महत्व को जान पाते। नाम भी होता और व्यवसाय भी। किन्तु अभी केवल ये एक कोरी कल्पना है जो अगले दशक तक शापित दीख पड़ती है। 

मथुरा में देवकीनन्दन कृष्ण, अयोध्या में राम, काशी में मोक्ष, इलाहबाद का संगम, कुम्भ और समूची गंगा का किनारा धार्मिकता से ही तो भरा हुआ है। कुशीनगर में भगवान बुद्ध और संकिसा में भगवान बुद्ध का मंदिर सब धार्मिक तीर्थ स्थान तो है। किन्तु अफ़सोस पर्यटन तो बहुत दूर की बात है इन्हे संजो का रखना भी मुश्किल काम लगता है। कोई पुरसाहाल लेने वाला ही नहीं है।

आप किसी भी तीर्थ स्थान जाये पुलिस और प्रशासन की सुरक्षा मिले ना मिले CRPF और PAC की टुकड़ियाँ जरूर मिल जायेगी। ऐसी ही एक जगह है संकिसा। बौद्ध धर्म का पावन स्थल। ऐसा माना जाता है कि भगवान बुद्ध यहाँ पर आये थे और प्रवास किया। यहाँ पर उनका एक आसन भी बना हुआ है। सम्राट अशोक के काल का एक स्तूप भी है। देश-विदेश से बहुत सारे पर्यटक आते है यहाँ पर किन्तु जितने आ सकते है उससे बहुत कम। इस स्थान पर पहुँचने के लिये फर्रुखाबाद से करीब ४० किलोमीटर की दूरी मोहम्दाबाद से होते हुये तय करनी पड़ती है। मार्ग ठीक है किन्तु मन्दिर प्राँगण का रखरखाव भगवान भरोसे है। आधिकारिक तौर पर ये फर्रूखाबाद जिले में आता है किन्तु मन्दिर के प्राँगण के प्रवेश द्वार से जस्ट पहले मैनपुरी जिला शुरू हो जाने का बोर्ड देखा जा सकता है।
कुल मिला कर तीन मन्दिर , मायादेवी ( भगवान बुद्ध की माँ )का मन्दिर जो गेट से अन्दर जाते ही दीख पड़ता है। फिर के बड़ा बरगद का पेड़ और उसके पीछे CRPF की एक टुकड़ी और तत्पश्चात थोड़ी ऊचाई पर एक भगवान बुद्ध जी का मन्दिर और साथ में लगा हुआ बजरंगबली जी का मन्दिर। संरक्षण के नाम पर पुरातत्व विभाग का एक बोर्ड बस। यदा कदा अगल-बगल नाचते कुछ मोरे भी दिख जाते है, ५-६ एकड़ का प्राँगण पर चहारदीवारी भी की हुयी है।

जहाँ धर्म की बात चलती है साथ में विवादों का एक सिलसिला भी साथ ही चलता है। यहाँ भगवान बुद्ध जी के मन्दिर से चन्द कदमों दूरी पर बजरंगबली जी का भी एक मन्दिर है। दावे है की ये भी बहुत पुराना मंदिर है और इसी दावे के साथ विवाद। CRPF का की टुकड़ी स्थायी रूप से यहाँ तैनात है और कोर्ट में इसके बावत मुकदमा भी चल रहा है। यहाँ पर बौद्ध भिक्षुओं की माने तो मन्दिरों का विवाद क्षेत्र में बौद्ध धर्म की बढ़ती लोकप्रियता का परिणाम है। जैसे -जैसे क्षेत्र में बुद्ध धर्म की लोकप्रियता बढ़ी धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले लोगो पर डार्विन का सिद्धान्त लग गया और विवाद पनपते कितनी देर लगती है !!!! खासपर उत्तर प्रदेश में !!!
संकिसा के के बुद्ध तीर्थ स्थल का एक दृश्य


शेचेन स्तूप


संकिसा में: देश के गणमान्य पत्रकार,सामाजिक कार्यकर्ता मेरे बड़े भाई श्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह जी और मेरी धर्मपत्नी स्वेता कटियार जी 


मायादेवी ( मदर ऑफ़ लार्ड बुद्धा )टेम्पल



सम्राट अशोक के कार्यकाल में बना हाथी का पिलर जो खुदाई में मिला


मायादेवी जी के मन्दिर के नजदीक से एक दृश्य








प्रार्थनारत पर्यटक जो बहुतायत में विदेश से आते है 


भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण विभाग का बोर्ड जो इस स्थान को संरक्षित बताता है।


लार्ड बुद्ध टेम्पल : प्रार्थनारत पर्यटक
फ्रंट व्यू ऑफ़ लार्ड बुद्ध टेम्पल



भिक्षा की आस में बैठे कुछ बौद्ध भिक्षु


बौद्ध भिक्षु और पीछे CRPF की टुकड़ी का कैंप


तीर्थस्थान पर लगा बरगद का पेड़
मन्दिर प्राँगण के बाहर खेत में राष्ट्रीय पक्षी मोर

तीर्थ स्थान के पास बना एक मन्दिर और मन्दिर के  होटल भी है

बेवाक: धर्म-परिवर्तन की बात पर देश परेशान है??

हो हल्ला शुरू हो गया, आगरा के कुछ परिवारों ने धर्म परिवर्तन किया और दिल्ली में सियासी गलियारा तू-तू मैं मैं में तब्दील हो गया। कुछ कह रहे है कि लालच दिया गया कुछ कह रहे है जबरन किया गया। हर किसी का अपना कयास है। कुछ राजनीति की रोटियाँ सेक रहे है। कुछ मामा शकुनि के मानिन्द अपने पास फेक रहे है। मतलब हर किसी का है। इस पूरे मुद्दे में नज़र डाले तो पायेगे की तथ्य बिलकुल साफ़ है। वो ना मीडिया देख पा रही है ना राज नेता। शायद मीडिया अपनी TRP बढ़ाने की गरज में और नेता बैलेट के खेल में!!! कल्पना कीजिये कि एक निर्धन परिवार जिसे पढ़ना भी शायद ही आता है। जिसे सुबह से शाम तक अपनी हड्डिया गलाने के बाद रोटी नसीब होती है। वो व्यक्ति, परिवार वेद,उपनिषद् , गीता या कुरान पढ़ सके ऐसी उम्मीद क्या उनसे की सकती है? जब पढ़ नहीं सकते तो इतने ज्ञानी तो नहीं सकते की ये व्याख्या कर सकते कि कौन सा धर्म बेहतर कौन सा बुरा !!!! वो धर्म की परिभाषा समझ सके ये उम्मीद भी बेजा ही लगती है। ऐसे में जो रोटी दे वही भगवान वही अल्लाह!! उनके लिये धर्म के क्या मायने?

न्यूज़ चैनल में खबर थी के लोगो को आधार कार्ड और BPL कार्ड बनाने का आश्वासन दिया गया और घर देने का भी। यहाँ मुद्दा क्या है? धर्म परिवर्तन या निर्धन परिवारों को ना मिल पाने वाली मूलभूत सुविधाये? जो धर्म समझता ही नहीं उसका धर्म-परिवर्तन एक राष्ट्रीय मुद्दा बना जा रहा है। जो मूल मुद्दा है वो बहुत पीछे छूट कर नज़रो से ओझल हो चला है। देखिये गाँधी जी के देश में मूलभूत सुविधाये न मुहैया करा पाने का दर्द, जिम्मेदारी का भाव किसी को नहीं? जो इन्सान होने के नाते आपके पास होना ही चाहिये उसका लालच दिया जा रहा है। और उससे लालच कहा भी जा रहा है। ये नजीर है आने वाले वक़्त में इसे याद रखे, और शायद राजनीति भी यही है और वही हो रही है। आगे भी होती रहेगी। ये मान लेना गलत नहीं होगा की इन चीजो का लोभ धर्म-परिवर्तन के लिये दिया गया हो। पर क्या ये लोभ की बड़ी परिभाषा का हिस्सा हो भी सकता है ? हाँ  एक लोकतान्त्रिक देश में जहाँ चौथा स्तम्भ 24 घण्टे खबरों की तलाश में रहता है वहाँ इतनी बड़ी सँख्या में जबरन कुछ भी nahi हो सकता खास कर दो धर्मो के बीच। वो भी समाजवादी राज में ये तो कतई नहीं।

यहाँ लोभ की चर्चा जरूरी हो चलती है। एक नौकर मालिक से 20 रूपये ज्यादा पाने के लिये ज्यादा काम करने को तैयार हो जाता है। तो क्या ये लोभ नहीं है? एक TC टट्रेन में कमीशन पाने के लिये पेनाल्टी काटता घूमता है तो क्या ये भी लोभ नहीं है। देश की सरकारे देश में सर्वशिक्षा अभियान चला रही है। अमूमन बहुतायत बच्चे स्कूल नहीं जाते। पढ़ाई लिखायी उनके लिये महत्व का विषय है ही नहीं। स्कूलों में काम सँख्या होने पर स्कूल में सँख्या बढ़ाने के लिये सरकार भी तो लालच देती है। मिड डे मील का, साल भर में २ जोड़ी कपड़ों का, वजीफे का, कॉपी और किताबों का ? क्या ये गलत प्रवत्ति नहीं है? ये लालच बच्चों को नहीं उनके घर वालों को दिया जाता है। ताकि वो बच्चों को स्कूल भेजे और बहुतायत मात्रा में बच्चे केवल मिड डे मील के लिये अपना नाम स्कूल में दर्ज करा देते होगी है। लालच बहुत विस्तृत विषय है भाषाओं और परिभाषाओं से परे है। जो हुआ उससे जायज़ नहीं ठहराया जा सकता वो किसी भी धर्म से किसी अन्य धर्म में हो। लेकिन मूल मुद्दा क्या है उसे भूल कर फालतू की बातों को तूल देने वाली मीडिया और कुछ नेता बातों का मतलब अपनी तरीके से अपने लिये निकालते है। अब जो लोग कल बिना किसी दबाव के धर्म परिवर्तन करने का बयान दे रहे थे वो अचानक विद्वान हो उठे क्यों की हर धर्म के बड़े ठेकेदार अब उन्हें ज्ञान बात रहे है। उनकी शान और आन में गुस्ताखी हुयी और अब ये मुद्दा उनका है। हालाँकि अभी भी करोड़ों ऐसे लोग जो इस तरह के लालच में परिवर्तन करने को तैयार बैठे होगे उनकी खबर किसी को नहीं, और आगे जाते हुये होगी।

प्रसंगवश जिक्र लाजिमी है। अपने इंजीनियरिंग के दिनों में जब मैं गोरखपुर के विख्यात मदन मोहन मालवीया इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ता था। उन दिनों इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के हेड Dr A M Khan साहब के धर्म परिवर्तन की खबरें अखबारों में पढ़ी। Khan को सभी जानते थे वो इस लिये कि उनके दफ्तर में इतनी किताबे हुआ करती थी की उनके खुद के बैठने की जगह काम पड़ जाया करती थी। उन्होंने कुछ किताबों के ढेर प्रयोगशाला में भी रखवा रखे थे। उस रोज जब KHAN साहब के डॉ A M Khan से डॉ शिवानन्द तिवारी बन जाने के खबर पढ़ी। तो बस यही सोचते रहे की कुछ तो सोच कर ही किया होगा। ना हिन्दू ना मुस्लिम होने से हमे को फर्क पड़ता था ये सब बाते उस दौर में अर्थहीन हुआ करती थी। हाँ हिन्दू और मुस्लिम संगठनों के अपने दावे थे। एक प्रोफेसर का धर्म परिवर्तन के उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस खबर के कुछ रोज बाद एक खबर कॉलेज की सीमाओं में आम थी की Dr Khan साहब के परिवारवालों ने उनका बहिष्कार कर दिया है। दानापानी उठना बैठना सब बन्द। करीब महीने भर बाद छात्रगण Dr Khan साहब की मानसिक हालत पर सवाल उठाने लगे थे। Dr Khan साहब अपनी 800 मारुति कार में ना जाने क्यों ३-४ बड़ी-बड़ी बोतल में अलग-अलग रंग का द्रव्य भर कर टाँगे रहते थे। एक महीने में ना जाने क्या हुआ की Dr Khan साहब पहले जैसे नहीं रहे। ये परिवार और समाज द्वारा किये बहिष्कार का नतीजा था या कुछ और ये हमेशा सवाल रहा। लेकिन यहाँ भी बड़ा मुद्दा ये था की जो खान साहब ने किया वो उनका व्यक्तिगत निर्णय रहा होगा। किन्तु वो शायद ये भाप नहीं पाये थे की बाद में क्या? अपने भी तो रूठ सकते है। धर्म के बड़े बुजुर्ग भी तो सवाल उठा सकते है। निर्णय से पीछे हटने का दवाव भी शायद पड़ा ही होगा अन्यथा मानसिक हालत सवालिया होती। जो जैसे जी रहा लोग जीने नहीं देते। यही लोकतन्त्र की विडम्बना है।

जहाँ कभी दौरेरंजिश चला होगा ........

वो दौर जब वर्चस्व की लड़ाई,अहम और स्वाभिमान की लड़ाई में आदमी अपनी जान देने और दूसरे की जान लेने पर आमादा हो गया करता था। जिस लड़ाई में केवल जान जाती थी इसकी या उसकी। एक जान के साथ एक पीढ़ी तबाहोबर्बाद हो गया करती थी। उस दौर की कल्पना करने का एक अदना सा प्रयास है। वजह फरमाये।

जहाँ कभी दौरेरंजिश चला होगा
वहाँ किसका भला हुआ होगा।

बिखरे होगे खून के गहरे धब्बे
हर तरफ मातम ही पसरा होगा।

वो घर जाने कब से वीरान है जहाँ
साजिशो का सिलसिला चला होगा।

ये बारूद किसकी सगी हो सकी है
बिन आहुति लिये कैसे जला होगा।

उड़ते हुये चील कौवों से पूछो
उसकी खबर जो मिटा होगा। 

वर्तमान का क़त्ल हो चुका था
भविष्य भी तो यूँ ही लुटा होगा।

रंजिशे पलती रही है होगी
जीवन जलता रहा होगा।

गुलो गुलज़ार कहिये ......

गुलो गुलज़ार कहिये
लैला के रुखसार कहिये
कद्रदानों का प्यार कहिये
खुशबू का बुखार कहिये
रंगो की बहार कहिये
इंद्रधनुषी हार  कहिये
इन सुन्दर फूलो को
कुछ तो मेरे यार कहिये।

@गुलदाउदी- टेरेस गार्डन चण्डीगढ़
















वो जेहादी बने रहे .....

पाकिस्तान के छदम युद्ध और आतंक से पीड़ित भारत के सन्दर्भ में:

हम फरियादी बने
रहे वो उन्मादी बने रहे

हम आबादी बने रहे
वो जेहादी बने रहे 

हम बर्बादी बने रहे
वो फसादी बने रहे

वो बम बन कर फटते रहे
हम हर बार निपटते रहे

मेरे देश के नेता अब तो जागो
शहीदों का कुछ तो हिसाब माँगो 
देश के लिये एक मैराथन भागो।

6 दिसम्बर को एक दीवानापन देखा था ....

6 दिसम्बर को एक दीवानापन देखा था
दीवानो को पत्थर चलाते हुये देखा
बाबर को घायल हो जाते हुये देखा था
राम को लहूलुहान हो जाते हुये देखा था 
सरयू के किनारे रोते हुये देखा है
जब उस रोज मैंने अपना शहर देखा था।
6 दिसम्बर को एक दीवानापन देखा था

प्यार को दफ़न हो जाते हुये देखा था
चादर को कफ़न हो जाते हुये देखा था
शमसान को मुस्काते हुये देखा था
अल्लाह, राम जो दर बदर हो जाते देखा था 
चैन-अमन को धुँधलाते हुये देखा था
जब उस रोज मैंने अपना शहर देखा था।
6 दिसम्बर को एक दीवानापन देखा था

सरयू के तट पर कहर देखा था
वीरान अपना शहर देखा था
कराहता हर पल हर पहर देखा था
फिजाओं में घुलता जहर देखा था
जब उस रोज मैंने अपना शहर देखा था।
6 दिसम्बर को एक दीवानापन देखा था। 

नित नये पायदान चढ़ती है जिन्दगी .......

एक नियत रफ़्तार से चलती है जिन्दगी 
नित नये पायदान चढ़ती है जिन्दगी
छोटे बड़े जज्बात में पलती है जिन्दगी 
बनती बिगड़ती बात में मिलती है जिन्दगी 
खुशियों कभी गमो में ढलती है जिन्दगी
खाती है ठोकरें सम्भलती है जिन्दगी
अल्लाह,जीसस, भगवान की बन्दगी
फूलो-कलियों सी खिलती है जिन्दगी
दुधमुँहों की किलकारियाँ मुस्कान जिन्दगी 
नित नये पायदान चढ़ती है जिन्दगी।  


पण्डित पोंगा भी हो सकता है ....

जिस तरह
मन्दिरों-मस्जिदों में वसूली
को नाकारा नहीं जा सकता
धर्म के नाम का माल
डकारा नहीं जा सकता
कमान से निकला तीर
दुबारा नहीं जा सकता
युद्ध के बीच शान्ति का
हरकारा नहीं जा सकता
बिन मेहनत जीवन
सँवारा नहीं सकता

अतैव एक इंसान को भगवान
कहकर पुकारा नहीं जा सकता

क्यों कि
पण्डित पोंगा भी हो सकता है
मौलवी चोंगा भी हो सकता है


ये भारत है मेरे दोस्त!!!

रामपाल की बगावत देखिये
आशाराम की शरारत देखिये
फिर भी भक्तों की इबादत देखिये
शाहदत देखिये
ये भारत है मेरे दोस्त!!!
कहीं रामायण कहीं महाभारत देखिये।

समाजवाद लोगो को छल रहा है ........

उत्तर प्रदेश परिवहन की डग्गामार
बस स्टैण्ड बेहद सड़े, बीमार
सड़को पर अतिक्रमण
आलिंगनबद्ध वाहनों की कतार
दूसरी ओर समाजवादी बग्घी गुलज़ार
जगह-जगह समाजवादी गुण्डो की मार
आम आदमी कुपित
और खास असरदार
मानवता के सूरज ढल रहा है
समाजवाद लोगो को छल रहा है
समाजवाद लोगो को छल रहा है। 



देश का प्रधानमन्त्री झाड़ू लगा रहा है और ट्रेन में ……

तारीख 21 Nov -2014, ट्रेन 12231 चण्डीगढ़ स्टेशन पर निर्धारित समय से ६ बजे से ३ घण्टे की देरी से पहुँची और 12232 बन कर अपने निर्धारित समय 9 बजकर 10 मिनट से  लगभग २ घण्टे  से लखनऊ की ओर रवाना होती है। ट्रेन के आगमन और प्रस्थान के बीच २ घण्टे था ट्रेन सफाई के लिये।  पर सफाई नहीं हुयी और शायद मैनटेनस चेक-अप भी। ट्रेन अम्बाले की ओर कूच कर चुकी थी और लगभग एक तिहाई रास्ता पायी थी। एक ऊँघता हुआ, बिना और जनरल टिकट वालों को सूँघता हुआ टी सी प्रकट हुआ। टिकट चेकिंग के अभियान में मशगूल था मुझसे टिकट माँगा, मैंने अपना फ़ोन आगे बढ़ा दिया और साथ ही साथ कुछ प्रश्न भी दाग दिये। जनाब क्या ट्रेन को रवाना करने से पहले यार्ड में ले जाया गया? ट्रेन की सफाई हुयी? जवाब था … नहीं। मैंने प्रतिउत्तर दिया जनाब देश का प्रधानमन्त्री झाड़ू लगाता और लगवाता फिर रहा है फिर भी ऐसा क्या हुआ कि रेलमंत्री और आपके डी र म ट्रेन भी नहीं साफ़ करवा पाये ? साहब ट्रेन यार्ड में ले जाकर साफ़ क्यों नहीं की गयी? समय तो था। अन्यथा २ घण्टे तब स्टेशन पर ट्रेन खड़े रखने का क्या औचित्य? मारक जवाब आया सर जी मैंने प्राइवेट सफाई कर्मियों को बुला कर 1st AC की सफाई करवा दी थी। बाकी का उन लोगों ने नहीं किया !! मैं क्या करूँ?? मैं भी तो सरकार का नौकर हूँ।

जवाब के उपरान्त न कुछ कहने को बचा ना ही सुनने को। यथा स्थिति कायम रहनी थी। कुछ नहीं हो सकता था , भारतीय रेल की अलसायी हुयी सेवा का। आप इसके मुँह पर घड़ों पानी उड़ेल दीजिये पर तन्द्रा से उठ कर खड़ी भी हो जाये तो भी आलस्य कभी न जाने वाला रोग है। प्लेटफॉर्म से लेकर ट्रेन के कूपे तक हर जगह नाक पर रुमाल रखनी पड़ती है। बढ़ा हुआ किराया देने का मलाल भी यही से शुरू हो जाता है। खैर आदतन कहे या इरादतन मैंने विरोध दर्ज कराने की ठान ली थी। पहले सोचा कन्डक्टर के पास से कम्प्लेन बुक ले आता हूँ पर पिछले अनुभवों का मान रखते हुये मैंने ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने का मन बनाया। मैंने धर्मपत्नी से फ़ोन लीज पर लिया और भारतीय रेल के कस्टमर केयर पोर्टल पे शिकायत दर्ज कर दी। लगा की एयरटेल के 2G(GPRS) का दोहन रहा हूँ पर रफ्ता-रफ्ता शिकायत दर्ज ही हो गयी। यूँ तो मेरे पास भी 3G फ़ोन था और उसे सपोर्ट करने वाला रिलायंस का सिम भी पर अफसोस रिलायंस हाइली अन रेलाइबल है। अपने उत्तम क्षेत्र में भी सेवाएँ नहीं दे पता। जिस 3G के लिये मैं उस सिम को ढ़ो रहा हूँ वही नहीं आता और वॉइस तो मासाअल्लाह!!!!!

रेलवे स्टेशन्स पर रेलवे यूनियन की नारेबाजी के नारे बड़े बड़े अक्षरों में अंकित देखे जा सकते है। पगार भी बिना किसी उत्पादकता के मानक के  बढ़ती चली जाती है। खैर शिकायत दर्ज करने के उपरांत मुझे ध्यान आया की ये भी तो महज औपचारिकता ही है। रेलवे वाले तो सफाई कर्मियों को गन्दगी पर क्लीन चिट दे देंगे। अमूमन ऐसा ही होता आजकल विभिन्न मुद्दो पर समय-समय पर की गयी शिकायतों का नतीजा ढाक के तीन पात ही होता है । बस कभी रेलवे से चिट्ठिया आ जाती है " आप  शिकायत सही नहीं पायी गयी, आपको हुयी असुविधा के लिये हमे खेद है", सोचता हूँ की रेलवे तो केन्द्र सरकार के सीधे नियन्त्रण में है। फिर 6 माह के उपरान्त भी सफाई के क्षेत्र में कोई परिवर्तन क्यों नहीं दिखा? प्रधानमन्त्री जी तो पूरे देश की सफाई की कोशिश में लगे है जी। खयाली पुलाव और पके लगा की शायद सदानन्द गौड़ा साहब सोते रहे इसीलिये रेलवे जाग नहीं सका अब उनको सोने की सजा मिली है तो शायद नये मन्त्री जी कुछ कर दिखाये!!! सोच रहा हूँ कि कभी तो रेलवे की शिकायत प्रणाली दुरुस्त होगी!! कभी तो शिकायतों पर कार्यवाही होगी। देखो कब आते है अच्छे दिन। …………………

जब से दादी गुजर गयी .....

ना गाँव के उस घर,
ना उस पुस्तैनी जमीन,
में बात कुछ रही
जब से दादी गुजर गयी

यूँ करवट बदली समय ने
एक ही आँगन में पले रिश्ते
आँच में मक्के की तरह
दूर-दूर छिटकते रहे

हको-हुकूक की लड़ाई
घर से निकली
पेड़ो,खेतों,खलिहानों
तक चली आयी

वो घर की दीवारे
जो सदियों से चली आयी है
हम सब का साथ निभाती
वो दीवारे जो कभी कभी
पूछ लेती थी मेरा हाल
अब खमोश रहती है
बोल नहीं पाती!!
शायद टूटते बिखरते
रिश्तो को ना समेट पाने की
गरज में ग्लानि से भर चुकी है
और खामोश रह कर ही
अपना आक्रोश अपना रोष
जाहिर कर रही कर रही है।

वो दादी ही थी जिन्होंने
कई बातों का हवाला देकर
बाँध रखा था सभी को
पर ना पकड़ कोई रही
जब से दादी गुजर गयी।

अपनों के हाथ में खंजर देखा है ....

कभी कभी ऐसा भी मंजर देखा है
अपनों के हाथ में खंजर देखा है

लहलहाती थी प्यार की फ़स्ल जहाँ
उसी जमीन को आज बन्जर देखा है

लुट गये अहसास और जज्बात रिश्तों से
हर दिल में हमलावर सिकन्दर देखा है

ये इंसान की ही कारस्तानी है वो जो
आसमाँ में उठा हुआ बवन्डर देखा है

वक्त ही कभी कभी करता होगा मजबूर
मैंने दरिया में सिमटता समन्दर देखा है


Kabhi kabhi aisa manzar dekha hai
Apno ke haath me khanjar dekha hai

Lahlahati thi khushiyon kee fasl jahan
Us jameen ko banjar dekha hai

Lut Gaye ehsaas aur jajbaat rishto se
Har dil me hamlawar sikandar dekha hai

Ye insaan ki hi karastaani hai wo jo
Asmaa me utha huya bavander dekha hai

waqt hi kabhi kabhi kar deta haga majboor
Dariya me simatta samandar dekha hai 

रामपाल का राजद्रोह: भास्कर की सम्पादकीय के जवाब में .....

आज दैनिक भास्कर की सम्पादकीय पढ़ रहा था। कल्पेश यागनिक जी द्वारा प्रस्तुत, कथित संत रामपाल के मुद्दे पर विचार व्यक्त कर रहे थे कल्पेश जी। उनका दृष्टिकोण क्या था? निन्दा का,आलोचना का,समीक्षा का ये सम्पादकीय पढ़ कर पता नहीं लगा! पर एक बात साफ़ थी कि उन्होंने हरियाणा पुलिस और मुख्यमंत्री की मनोहर लाल खट्टर पर जमकर हमला किया। ना जाने क्यों ऐसा लगा की जिसकी प्रसंशा होनी चाहिये उनकी निन्दा टाइप हो रही है। बरवाला में लगातार बढ़ता पुलिस बल क्या आगे कदम बढ़ाते जाने का संकेत नहीं था? जब एक तरफ 40 हज़ार का पुलिस बल और दूसरी ओर संत और उनके समर्थक बच्चे और महिलाये और उनकी सेना हो तो पुलिस के पास क्या विकल्प हो सकते थे? गाँधी जी के देश में क्या आप हज़ारों लोगो पर गोली चलाने का आदेश दे सकते थे? बातचीत के रास्ते समाधान निकालने की कोशिश गलत तो नहीं कही जा सकती!! देर आये दुरुस्त आये!! पुलिस हमलावर होती तो कई जाने जाती दोनों तरफ से। क्या वो अच्छा होता? कुछ गुमराह भक्त पुलिस की गोली से मारे जाते तो क्या वो लोकतन्त्र को शर्मशार नहीं करता?

देश के संविधान का मानना है कि यदि न्याय व्यवस्था 100 दोषी छूट जाये तो कोई बात नहीं किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिये। तो हरियाणा सरकार संविधान के अनुरूप ही तो चल रही थी। फिर दोष मढ़ने का अवसर कैसे  मिल गया ? पुलिस संत से डर रही थी ऐसा कभी नहीं लगा, चण्डीगढ़ के अखबारों का तो कम से कम यही मानना था। पुलिस महिलाओं और बच्चों के लिये चिन्तित जरूर थी, और होना भी चाहिये था। संत और उसके समर्थको को अनन्तः तोड़ दिया गया ना। ये काम लाशों के ढेर गुजर कर होता तो क्या हम और मीडिया वाले जलियाँ वाले बाग़ काण्ड का उदहारण ना देते! हरियाणा पुलिस पर जनरल डायर होने का लेवल चस्पा नहीं होता। क्या हम इसे लोकतन्त्र पर कालिख ना बताते? एक हठधर्मी अपराधी को पकड़ने के लियें क्या पुलिस दुधमुँहो की लाशों से गुजर जाते? कुछ अन्य अखबारों ने पुलिस का ऑपरेशन शुरू होने पर ये भी लिखा था की पुलिस महिलाओं पर बर्बरता की। ये तो जी वो वाली बात हो गयी की चिट भी मेरी और पट भी मेरी। कुछ भी गाली तो पुलिस और मनोहर लाल खट्टर साहब को निकालनी ही है। कभी भयातुर बता कर कभी अपराधियों का संरक्षक बता कर। अजी बर्बरता देखनी है तो जी इराक को देखिये, सीरिया को देखिये महिलाओं के साथ जबरदस्ती देखिये और अमरीकियों के काटते हुये सर देखिये।
साभार : दैनिक भास्कर

रामपाल ने सेना बनायीं सेना पुलिस से टकरायी अगर बात केवल इतने तक सीमित होती तो सेना भी लगायी जा सकती थी। बराबर का मुकाबला भी हो सकता था। पर बात महिलाओं और बच्चों पर आकर टिक जाना स्वाभाविक था। कहने जो बड़ी बड़ी बातों से मैं अपने कथन का समर्थन सकता हूँ कह सकता कि हम उस देश के है जहाँ पितामह भीष्म पैदा हुये जान दे दी पर स्त्री पर अस्त्र नहीं उठाये . पर बेहतर वही होता है जो समय की नज़ाकत को देखते हुये किया जाय, ना की जोश में कोई गलती की जाय!! और शायद इसी को बुद्दिमत्ता कहते है। पुलिस ने सार्थक प्रयास किये, प्रसंशा बनती है हर समय गाली निकलना ठीक नहीं होता। क्यों की किताबी बातें अलग है और धरातल का सच अलग। ४० हज़ार पुलिस के जवान जब एक जगह रुकते तो उनको पाँच सितारा होटल नहीं मिलता। खुला आसमान ही साथी है। विकट परिस्थितियों में किये गये ऑपरेशन संत को मुबारकबाद देनी बनती नहीं। वेलडन हरियाणा पुलिस वेलडन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी !! उँगलियाँ देश के हर नेता पर उठती है क्यों कि लोकतन्त्र हक़ देता है विचार व्यक्त करने का। आपने निर्णय लिया और कथित संत को धार दबोचा ये अच्छा था। वो कहते है ना की "अन्त भला तो सब भला!!!"