सड़क पर हादसे आपका इंतज़ार करते है .....

घर से निकला करो बहुत दुआयेँ लेकर
सड़क पर हादसे आपका इंतज़ार करते है ।

जागा हुआ जमीर या अखबार सुबह का
सबके सब बेचैनियों का कारोबार करते है।

दरअसल एक भीड़ है सब हिस्सा उसी का
जो समझते सब है पर दरकिनार करते है।

कहाँ तक भाग पयोगे अपने आप से विक्रम
दुनियादारी के कीड़े है जीते है ना मरते है।

प्रद्युम्म्न मामला और पुलिस प्रशासन की विश्वसनीयता

पुलिस पर किसे भरोसा है?? ये हमेशा से जगजाहिर है की पुलसिया महकमा बिना मुद्रा, बिना सिफारिशों के हिलता नही है। ताकतवर पदों के घुमावदार रास्तों में ईमान और जिम्मेदारियाँ रास्ता भटक जाती है। प्रद्युम्म्न हत्याकाण्ड में पुलिस जाँच पर गम्भीर सवाल उठ रहे है। पहले दिन से ही बच्चे के घर वाले CBI जाँच की माँग करते आये है।

एक हफ्ते से ऊपर हो गया, पुलिस ने जाँच पूरी करने का दावा भी कर दिया। अब जाँच CBI के हवाले है, यहां से करीब महीने भर बाद CBI हैंडओवर ले पायेगी। क्या सबूत मिलेंगे CBI, क्या सबूतों से छेड़छाड़ नही हो चुकी होगी अब तक??

अब क्या और कितनी उम्मीद करेंगे CBI से। IAS अनुराग तिवारी जी मामले में तमाम धरना प्रदर्शनों के बाद, CBI को मामला सौंपा गया। औपचारिकताएं पूरी करते करते घटना के दो महीने गुजर चुके थे, 2 महीने बाद CBI किस जादू से सबूत इकट्ठे कर लेगी, क्या खाक जाँच आगे बढ़ा लेगी। 6 महीने का समय हो गया। स्वर्गीय अनुराग तिवारी मामले में सब हवा है अभी।

सत्येन्द्र दुबे ध्यान होंगे शायद आपको, मंजूनाथ भी, उनके मामलात में भी CBI को लाने में बहुत देरी की गयी, मामले गम्भीर थे। देर सवेर CBI को आना था पर आई बाढ़ में ही नियोजित तरीके से। देर से आने पर खाक के शिवॉय क्या मिलेगा। ये देरी न्याय पर भारी साबित हुई। ये कहना ही सही होगा की न्याय मिला ही नही।

प्रद्युम्म्न मामले में भी न्याय दूर भागता दिखता है। स्कूल प्रशासन के नित नये खुलते कारनामे इशारा करते है। कहीं तो दबाव है किसी को बचाने का और किसी को फ़साने का। बेहतर होता की आला पुलिस अफसरान और स्वयं प्रदेश के मुखिया ये बताते की पुलिस से जाँच CBI को क्यों देनी पड़ी। जब देनी ही थी तो देर क्यों की?

हम क्यों नही सीखते पुरानी भूलो से, या सीखना चाहते नही। या ये सब नियोजित है??? सरकार, शासन और प्रशासन सभी की विश्वनीयता बेहद खतरे में है। कुछ तो करिये हुक्मरानों।

सरदार सरोवर बाँध और विस्थापन

"सरदार सरोवर बाँध" एक ऐसे विकास का प्रतीक है, जो कुर्बानियाँ देकर ही आता है। इस बाँध के लिये जहाँ एक ओर मध्य प्रदेश के हज़ारों गाँवों को पानी मे समाना पड़ा, वहाँ के रहने वालों को विस्थापित होना पड़ा। वहीं दूसरी ओर गुजरात में अब बिजली बन सकेगी, बहुत सारे उधोगो को पानी मुहैय्या होगा, कुल मिलाकर उधोग-धन्धो को बढ़ावा मिलेगा।

जाहिर है,विस्थापन आसान नही, पीढ़ी दर पीढ़ी चले आये अपने घरों को पानी मे समाते देखना और भी मुश्किल। विरोध स्वाभाविक था,लेकिन परिवर्तन अवश्यसंभावी। मेधा पाटकर जी का लम्बा संघर्ष भी इन्ही विस्थापितों के लिये था। अब जब सरदार सरोवर देश को समर्पित हो चुका है, ये जरूरी है की सरकार देश को ये भी बताये, की कितने लोग सुरक्षित जगहों पर विस्थापित हुये, उनको कितना मुआवजा और क्या सुविधाएं मुहैय्या करवाई?

मेहनतकश था वो हमेशा कफन में रहा....

कभी दबा कभी कुचल गया, बहुत खतरे में रहा
मेहनतकश था वो  हमेशा कफन में रहा

कोई बात थी मुहल्ले में पुलिस उठा ले गयी
कमजोर बेबस सा समाज का जख्म सा रहा

योजनाएं बहुत सी तामील हुई उसके हक की
पर जब भी दिखा उजाले में बस नग्न सा रहा

हकों हुकूक की लड़ाई का वक्त कब था यहाँ
वो जिन्दा दिखता तो था पर दफन सा रहा।

@विक्रम

कुछ तो पानी बचायें रखते अपनी आँख में

दुधमुँहो की मौत  मुद्दा गरम है  ......  देश के प्रदेश के सरकारी अस्पतालों उनके निज़ामों, शासकों पर कुछ शेर अर्ज है.........


अपनी ही पीठ थपथपा ली और इतरा लिये 
दुधमुँहों की मौत थी, पर बहाने बना दिये। 

किसी चीज की कमी, या लापरवाही किसी की  
जाँच के नाम पर फिर आयोग बिठा दिये। 

मुआवजा घोषित हुआ, जाने किसको मिला 
बुनियादी जरूरतों के सवाल सभी निपटा दिये। 

कुछ तो पानी बचायें रखते अपनी आँख में 
मौत पर जो रोने गये उनपे भी पहरे  बिठा दिये। 

@विक्रम 







​Post independence in process of nation building, Textile industry of Kanpur achieved new extremum. profit made from this industry has been parked to run other profitable business. Over the process of time machinery has been not upgraded and technical advanced has not been opted by mills owners and slowly by 1960 these textile mills became non-profitable. 1968 government formed " Nation textile corporation and with 16 mills it started process of overhauling but no avail, by 1974 116 companies came under banner of NTC. in 1981 British India corporation has been taken over by India government, and Lalimli and Dhariwal mills where profitable till 1989. post nationalization bureaucracy taken a toll on mill. Government made several policies but they fallen flat due to lack of practical approach. Mills are not closed formally till now. Lal-imli is still running with almost 1800 employees in place.

​Post independence in process of nation building, Textile industry of Kanpur achieved new extremum. profit made from this industry has been parked to run other profitable business. Over the process of time machinery has been not upgraded and technical advanced has not been opted by mills owners and slowly by 1960 these textile mills became non-profitable. 1968 government formed " Nation textile corporation and with 16 mills it started process of overhauling but no avail, by 1974 116 companies came under banner of NTC. in 1981 British India corporation has been taken over by India government, and Lalimli and Dhariwal mills where profitable till 1989. post nationalization bureaucracy taken a toll on mill. Government made several policies but they fallen flat due to lack of practical approach. Mills are not closed formally till now. Lal-imli is still running with almost 1800 employees in place.

सांस्कृतिक चोटी बनाम अपभ्रंश चोटी और चोटीकटवा

अजीब संकट है मार्केट में, सभ्रान्त घरों की महिलायों की चोटी नयी होती संस्कृति ने काट दी। बाकी की चोटी कटवा काट रहा है। चोटी का कटना आधुनिकता का प्रतीक सा है किन्तु यहाँ बात अलग है, गहरा मातम पसरा है, जबकि यहाँ जश्न का माहौल होना चाहिये था :)

नज़र थोड़ी बड़ी करके देखे तो लगता है चोटीकटवा का उद्देश्य चोटी काटकर के India और भारत के बीच के सांस्कृतिक फर्क को ख़तम करना है। वो अपराधी नहीं साँस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तक है। 

आज के करीब 17-18 साल पहले मैंने एक कविता लिखी थी, चोटी के कटते जाने पर मुखड़ा प्रस्तुत है, पूरी याद भी नही, लिखूँगा भी नही, नही तो नारी विरोधी घोषित किये जाने का खतरा होगा :)
" कट गई लम्बी छोटी पिछड़ गया कुर्ता सलवार
देखो यारो कैसी आयी टीशर्ट जीन्स की बयार
एक हाथ मे छाता है एक हाथ मे पर्स टँगा
इनकी फ़ोटो ले ले कर आज हर अखबार छपा
.............."
इस कविता को मैं 2001 में मालवीय की फ्रेशर पार्टी में सुना रहा था की सदन में हंगामा बरप गया, यकीन मानिये उस दिन भरी सभा मे मुर्गा बनते-बनते बचा, सभा में उपस्थित लगभग सभी लड़कियों(सीनियर्स) ने वाक-आउट कर दिया। नारी विरोधी होने का तमगा तो माथे पर चिपक ही गया .....
आज देखिये चोटियां काट रही है कोई विरोध नही है :)
"चोटीकटवा आया था, चोटी उसकी काट गया,
बची खुची संस्कृति को दो हिस्सों में बात गया"