पड़ोसी का घर जलाकर लौटे हो....

मन्दिरो-मस्जिद की बात पर रमें हो 
सियासत का नया मुद्दा मालूम होते हो।

साज़िश है तुम्हारे लहू का रंग बदलने की 
और तुम बहुत बीमार मालूम होते हो।

परिन्दो परवाज़ नफ़े नुक़सान में तोली 
कोई ज़िन्दा बारूद से मालूम होते हो।

दिलों में नफ़रत की दींवार खींच गया
वो वज़ीर, तुम पैदल मालूम होते हो।

तुम्हीं को बाँटकर, दिल्ली के सफ़र में है 
उन्ही के बस मददगार मालूम होते हो।

पड़ोसी का घर जलाकर के लौटे हो
हुक्मारानो की नयी अदा मालूम होते हो।

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित





फटी जींस में घूम रहा है ......

फटी जींस में घूम रहा है 
हनी सिंह पे झूम रहा है 
भारत का नव युवा है 
फ़ैशन की हद चूम रहा है

सर पे छत्ता मधुमक्खी सा
मुँह में है बालों की खेती 
सुबह-शाम है सजता-धजता
संग सहेली घूम रहा है।

पिज़्ज़ा बर्गर भोजन करता
बात किसी की कभी ना सुनता
भरी ट्रेन गलबहियाँ करता
बन वेलेंनटाइन घूम रहा है।

अम्माँ-बाप का दिवस मनाता
आज़ादी का दिन भूल ही जाता 
अगड़ेपन की किश्त करारी 
भरसक इंग्लिश झाड़ रहा है।








कोई ज़िन्दा शख़्स नहीं मिलता ..

आदमी पर आदमी भीड़ पर भीड़
कोई ज़िन्दा शख़्स नहीं मिलता

वादे पर वादे भाषण पर भाषण
तलाशिये पर ईमान नहीं मिलता 

फ़ाइलो पर फ़ाइल दौड़ पर दौड़
जो गया मुआवज़ा नहीं मिलता 

व्यस्तता जद्दोजहद और कारोबार 
चाहा बहुत पर शुकून नहीं मिलता 

सोच पर सोच योजना पर योजना 
कोशिशे तमाम हासिल नहीं मिलता

हलक तक आकर रुक जाता रहा 

बातें बहुत सी पर सच नहीं मिलता 

झुग्गियो मे सर्द रातें रो रहा है हिन्दुस्तान ....

हाशिये पर चल रही है देश की क़ौमें तमाम
पत्थरों को पूजते फिरते है अपने हुक्मरान

दीप जलते है बहुत से नदियों के घाटों पर
झुग्गियो मे सर्द रातें रो रहा है हिन्दुस्तान

क़र्ज़ किसपे कितना है बस पैमाना यही 
रफ़ूचक्कर होते बड़े जेल जाता है किसान

कौन सी सीख देते अपनी पीढ़ियों को हम
विज्ञान मद्दिम है,मान्यताओ का है निज़ाम

@विक्रम 





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जिया हो “बिहार” के लाला.... “UP” है हज़ार साला ..

जिया होबिहारके लाला.... “UP” है हज़ार साला ....

देश के जनमानस में अमूमन ये धारणा हैं कि बदनाम बिहारी, बदमाश UP वाला .... काहे भैया.... काहे?? ज़माना गुज़रा फ़्रंटलाइन magzine थी शायद, एक आर्टिकल पढ़ाnd वेव ऑफ़ migration” माने रोज़गार की तलाश में ...इधर का आदमी उधर... उधर का आदमी और उधर .....

छत्तीसगढ़ का आदमी कानपुर में .... बिहार का आदमी दिल्ली मुम्बई में .... यूपी का आदमी बंगलोर, दिल्ली .... पंजाब का आदमी कनाडा में और केरल का आदमी .... क़तर और दुबई में ..... सब रोज़गार की तलाश में इधर से उधर हुये..... कुछ स्किल्ड लोग कुछ वाइट कालर
वाले  ... कुछ मज़दूर या अपना काम धन्धा करने वाले ...... 

मैंने कुछ समय कनाडा में गुज़ारा .... छोटी से बड़ी दुकान हो ..... तमाम ट्रक या बस चलाने का काम हो ....कोई अन्स्किल्ड जॉब हो .... पंजाबी भाई मेहनत से काम करते नज़र आए .... हाँ ड्रग की तस्करी में थे ... गैंगवार की ख़बरें भी सुनने में आती थी ..... कनाडा को लोग मिजी पंजाब भी कहते है ......कुछ यही हाल दुबई और क़तर में केरल के भाइयों का है....

अब देखिये अधिकतर बिहार से और कुछ UP से आने वाले लोग दिल्ली में आला अफ़सरान है। माने दिल्ली ही नहीं देश चलाते है ...... बाक़ी कुछ दिल्ली और देश के अन्य शहरों में वाइट कालर.... कुछ अन्स्किल्ड जॉब भी करते है ..... यहाँ अच्छी ख़ासी संख्या में है .....

कुल मिलाकर पाक साफ़ नज़रों से दर्शन शास्त्र समझे तो हर आदमी रोज़ी-रोटी की लिये काम धन्धे में जुटा ..... भले अपना घर छोड़कर विदेशी हुआ ..... या देश में ही कहीं और रहा ....... अब देश के हुक्मरान कुल मिलाकर दो चार ही आर्थिक सेंटर बना पायें।कृषि को बधिया कर दिया। अब भला रोज़गार के लिये आदम जात कहाँ जायेगी??

1857 से गिनना शुरू करिये ....आज़ादी की लड़ाई में उत्तरप्रदेश का अपना मक़ाम है .... उद्योग-धन्धे, पढ़ाई लिखाई और आज़ादी के बाद देश की राजनीति को चलाने और ज़िन्दा कैमो की सरज़मीं रही। कुशीनगर, मथुरा, अयोध्या, प्रयाग बनारस का कहीं कोई मोल है क्या ..... 

बिहार को देखिये .... दिनकर से लेकर देश के तमाम मूर्धन्य साहित्यकार, चमपारण में गाँधी से जेपी के आन्दोलन तक देश को लोकतन्त्र को बल दिया .... गया कैसे धार्मिक स्थान कोई समतुल्य है क्या .... झारखण्ड की खाने ... या टाटा का जमशेदपुर आपके घरों और इमारतोंन में स्टील बनकर समाया हुआ है। तमाम सामाजिक आंदोलनो से तपकर निकला है बिहार। योगदान अन्य प्रदेशों का भी बहुत है। यहाँ मैं किसी की बुराई नहीं कर रहा किन्तु कोशिश कर रहा हूँ कि जिनको भारत का जनमानस दोयम दर्जे का समझने लगा है। उन्हें ये बताया जाय कि सफ़र सब का एक ही रहा मक़ाम अलग अलग रहे। 

कोई देश में काम करके रोज़ी रोटी चलाता है। अपनी संस्कृति और सभ्यता कि अस्मिता की लड़ाई लड़ता है। वो ज़्यादा देश भक्त हुआ आज के दौर में ज़्यादा राष्ट्रवादी हुआ। जिस कांग्रेस मुक्त भारत कि बात आप आज करते है.....1990 के दशक से UP और लगभग इसी समय से बिहार कांग्रेस मुक्त है .... क्षेत्रीय दलों को बढ़ावा दिया ताकि क्षेत्रीय समस्याए दिल्ली दरबार में मज़बूती के साथ पहुँचे। देखिये ना लोगों की जागरूकता, ज़िन्दा और जागरूक लोगों को समझिये ना। 

सिर्फ़ इसलिये कि कोई बिहार से किसी को मुम्बई और गुजरात से मारकर मत भगायिए.... दिल्ली में बाहर का मत कहिये.... दिल्ली आपसे ज़्यादा उनकी है..... आपके घर में लगी ईंट UP और बिहार है .... परस्पर सम्मान की भावना ज़रूरी दुर्भावना को दूर भगाना भी। मैं भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिये पूर्वांचल और बिहार के लोगों में आग देखता हूँ .... जन्तर मन्तर में उनका प्रदर्शन देखता हूँ तो अच्छा लगता है ...... आप भाषा की करना दायित्व है .... माँ की रक्षा करने जैसा है ...... आइये कभी बुंदेलखंड और सुनिये आल्हा खण्ड रगों ख़ून उबल उठेगा ....
पर देखिये १० दशकों से चली आयी आल्हा और फाग की विधा के किस गायक को सरकार ने .... पद्मश्री दे दिया???? नहीं दिया तो कैसे ज़िन्दा रहेगी लोककलायें?

किसी ना बदनाम कहिये ना समझिये..... ये कहियेजिया हो बिहार के लाला..... UP है हज़ार साला ......”