धन्ना सेठों के अधीन लोककलायें 

यूँ तो लोककलायें हमारी संस्कृति की ध्वजवाहक है। किन्तु आधुनिकता से निरन्तर संघर्ष कर क्षरित होने को मजबूर है।  सदियों पहले "नगर सेठों" का प्रभाव हुआ करता था। नगर वधुएँ भी हुआ करती थी। तब  लोककलायें अमूमन नगर सेठो के अधीन हुआ करती थी। उनकी महफ़िलो की साज सज्जा और मनोरंजन का हिस्सा हुआ करती थी। एक-एक नगर में कई सेठ थे। उस नाते कलाकारों को अधिक मौका रहता था। आजीविका चलाने हेतु बहुत सारे लोक इस कला को सीखते थे। उस दौर  में कद्रदान भी हुआ करते थे। कलायें जिन्दा थी, साँस लेती और फलती फूलती थी। कभी आदिवासियो के त्योहारों को नया रूप और आयाम देती थी। कभी नगर सेठों की महफिलों को सजाती और सँवारती थी।

आज का दौर "धन्ना सेठों" का था। धन्ना सेठ मतलब सेठों के सेठ , लोककलायें या और तमाम मनोरंजन विधायें धन्ना सेठ बेच रहे है। कलाकार आजीविका की चाह में ग्लोबल धन्ना सेठों के व्यापर का हिस्सा है। आज का शासन प्रसाशन कमोवेश उदासीन है। लोककलाओं को जिन्दा रखने की लचर सरकारी नीतियाँ। लोगों कोई कला से विमुख होने का कारण देती है। राजस्थान का  "कालबेलिया नृत्य", "घूमर नृत्य" उत्तर प्रदेश के कोने कोने में गया जाने वाला "आल्हाखण्ड", नौटन्की इत्यादि के कलाकार प्रोत्साहन के अभाव में सब छोड़ने को विवश है।  

तब सब कुछ तन्दूरी था

जब भी "Barbeque Nation" या उसके जैसे किसी "restaurant" में जाना होता है। गाँव की यादें ताज़ा हो उठती है। जब घर की बखरी में चूल्हा जल रहा होता था। चूल्हे में चढ़ी बटोईया में दाल उबाल मार रही होती थी। चूल्हे के एक ओर जलते कण्डों में आलू या शकरकन्द भुन रहे होते थे। बाहर की तरफ कण्डों के ढेर में ढूध की पतैली  उफान मारती।  दूसरी ओर कभी उल्टे कभी सीधे तवे पर रोटी बन रही होती थी। मम्मी,चाची या बडीअम्मा फुकनी का इस्तेमाल कर चूल्हे की आग जलाये रखती और रोटियाँ सेकती जाती। जब पूरा खाना बन चुकता तब दादी(दाई) सबको हटा देती और चूल्हे पर अपनी दो रोटियाँ सेकती, मोटी पनेथी रोटी हम सब उसकी माँग पर अड़ जाते दाई ४-५ रोटी सेंक कर हम सब को शान्त करती। दरअसल दाई के हाथ पैर जब तक चले, तब तक वो अपने हाथ की ही रोटियाँ खायी। बाकि सब बेकार था उनके लिये।  चूल्हे के अगल-बगल हम सब अपनी अपनी थाली और कटोरी लिए पीढ़े पर बैठ खाना लपेटते। तब सब कुछ तन्दूरी था। Barbeque Nation की जरूरत ही न थी। 

५० हज़ार का निजी मुचलका, प्रद्युम्न, अशोक से सुनील कुमार भट्ट तक

पिछले दिनों मासूम प्रद्युम्न की निर्मम हत्या हुयी, पुलिस और CBI दोनों ने जाँच की, पुलिस ने जिसको दोषी कहाँ CBI ने उसे बरी किया। बरी हुये पीड़ित से अदालत ने उसे 50 हज़ार मुचलका भरवाया, फिर रिहा किया !!! दीगर है की बस कन्डक्टर के लिये ५० हज़ार का निजी मुचलका साधारण नहीं है। खासकर जब उसका परिवार पहले ही कानूनी और सामजिक लड़ाई में लगभग सब कुछ गवां चुका हो। असाधारण घटनाओं और साजिशों वाला प्रद्युम्न हत्या काण्ड ना केवल पुलिसिया काम करने के तरीके पर बड़ा सवाल उठाता है। वरन  बात के इंतज़ार में भी दिखता है की गलतियों के जिम्मेदार अधिकारियो पर सरकार कार्यवाही क्यों नहीं करती। क्यों नहीं उन्हें नौकरी से बर्खास्त करती?  क्यों नहीं सरकार स्वयं अशोक के ऊपर से मकदमे वापस लेती? वो सरकार जो बड़े अपराधियों तक के संगीन अपराध माफ़ कर देती है, क्यों नहीं जरूरतमंद अशोक की मदद करती???? बेहद गंभीर सवाल सफ़ेद कॉलर्स पर दाग लगाते है पर सरकारी महकमा अपना जड़त्व कायम रखे है।

इन सबके बीच ये सोचना और समझना जरूरी है। प्रद्युम्न का मामला किन पहलुओं पर सवाल उठाता है। "सौ दोषी आरोपमुक्त हो तो ठीक, किन्तु किसी निर्दोष को सजा मना होंमे पावे" ये भारत के सम्विधान की दण्ड सहिंता की आत्मा है। ऐसे में गुडगाँव के रेयान स्कूल के प्रद्युम्न मामले पर सोचना जरूरी हो चलता है। जहाँ एक तरफ गुडगाँव की पुलिस स्कूल बस के कन्डक्टर को आधे अधूरे साक्ष्यों के आधार पर उठा लेती है। थर्ड और फोर्थ जो सम्भव थी सभी तरह की इस्तेमाल कर जुर्म कबूल करवाती है। लगभग आरोप पत्र दाखिल करने के मुहाने तक पहुँच जाती है। पुलिसिया विभाग स्वयं की पीठ थपथपा लेता है। उस समय जब हर घर की चाहरदीवारी में ये सवाल धुएँ  की मानिन्द सुलगता था की हत्यारा अशोक नहीं।  मामला कुछ और है।  ऐसे ही सुलगते सवालो और भारतव्यापी रोष के चलते मुद्दा CBI तक पहुँचा। CBI कुछ एक महीनो के अन्तराल में बिलकुल अलग जाँच के साथ सामने आती है। जैसा लगभग हर दूसरा अभिवावक सोचा रहा था कुछ वैसे ही थ्योरी सामने निकल कर आती है।

यहाँ सवाल पुलिस जाँच की गुणवत्ता पर है। उस सवालिया जाँच के आधार पर थर्ड डिग्री के इस्तेमाल पर है। सवाल गुरुग्राम की कचहरी के उन सब वकीलों पर है जिन्होंने अशोक का केस लड़ने से मना किया। इस सवाल का कद और बड़ा तब हो जाता है जब उस हत्यारे बच्चे का केस लड़ने से कोई भी वकील मना नहीं करता!!! इन कई सवालो के जवाब हमारी प्रतिक्रियावादी सभ्यता की रगों में दौड़ते है। हालॉकि की ये भी जाहिर है की हम "प्रतिक्रियावादी" से "अतिप्रतिक्रियावादी" सभ्यता बन चुके है।  जहाँ गलती से सीख कर सुधारने की बजाय उसे छुपाने का प्रयास निरंन्तर नज़र आता है। अतैव हम एक सशंकित सभ्यता एक आशंकित सभ्यता बनते जा रहे है।  जहाँ बच्चे को स्कूल भेजते डर लगता है।  जहाँ घर से सड़क पर चलते हुये डर का श्राप है। जहाँ सूरज ढलते ही घर की चाहरदीवारियों में कैद हो जाने को अभिशप्त होते जाते है। 

कल गुडगाँव महिपालपुर सुनील कुमार भट्ट मार दिये गये, ATM का पिन पूछकर हत्या की कई एटीएम से पैसा निकाला गया। अपराधियों की हवा नहीं है अभी तक।  जून  आईएएस अनुराग तिवारी की हत्या हुयी। जाँच आत्महत्या साबित करने पर जुटी पुलिस से हत्या साबित कर हवा जाने वाली सीबीआई  अटकी है।  देखिये आगे ये सत्येंद्र दुबे वाली परिणति को प्राप्त होता है।  या जाँच ही कानूनी बेड़ियों में उम्रकैद हो जाती है।

सड़क पर हादसे आपका इंतज़ार करते है .....

घर से निकला करो बहुत दुआयेँ लेकर
सड़क पर हादसे आपका इंतज़ार करते है ।

जागा हुआ जमीर या अखबार सुबह का
सबके सब बेचैनियों का कारोबार करते है।

दरअसल एक भीड़ है सब हिस्सा उसी का
जो समझते सब है पर दरकिनार करते है।

कहाँ तक भाग पयोगे अपने आप से विक्रम
दुनियादारी के कीड़े है जीते है ना मरते है।

प्रद्युम्म्न मामला और पुलिस प्रशासन की विश्वसनीयता

पुलिस पर किसे भरोसा है?? ये हमेशा से जगजाहिर है की पुलसिया महकमा बिना मुद्रा, बिना सिफारिशों के हिलता नही है। ताकतवर पदों के घुमावदार रास्तों में ईमान और जिम्मेदारियाँ रास्ता भटक जाती है। प्रद्युम्म्न हत्याकाण्ड में पुलिस जाँच पर गम्भीर सवाल उठ रहे है। पहले दिन से ही बच्चे के घर वाले CBI जाँच की माँग करते आये है।

एक हफ्ते से ऊपर हो गया, पुलिस ने जाँच पूरी करने का दावा भी कर दिया। अब जाँच CBI के हवाले है, यहां से करीब महीने भर बाद CBI हैंडओवर ले पायेगी। क्या सबूत मिलेंगे CBI, क्या सबूतों से छेड़छाड़ नही हो चुकी होगी अब तक??

अब क्या और कितनी उम्मीद करेंगे CBI से। IAS अनुराग तिवारी जी मामले में तमाम धरना प्रदर्शनों के बाद, CBI को मामला सौंपा गया। औपचारिकताएं पूरी करते करते घटना के दो महीने गुजर चुके थे, 2 महीने बाद CBI किस जादू से सबूत इकट्ठे कर लेगी, क्या खाक जाँच आगे बढ़ा लेगी। 6 महीने का समय हो गया। स्वर्गीय अनुराग तिवारी मामले में सब हवा है अभी।

सत्येन्द्र दुबे ध्यान होंगे शायद आपको, मंजूनाथ भी, उनके मामलात में भी CBI को लाने में बहुत देरी की गयी, मामले गम्भीर थे। देर सवेर CBI को आना था पर आई बाढ़ में ही नियोजित तरीके से। देर से आने पर खाक के शिवॉय क्या मिलेगा। ये देरी न्याय पर भारी साबित हुई। ये कहना ही सही होगा की न्याय मिला ही नही।

प्रद्युम्म्न मामले में भी न्याय दूर भागता दिखता है। स्कूल प्रशासन के नित नये खुलते कारनामे इशारा करते है। कहीं तो दबाव है किसी को बचाने का और किसी को फ़साने का। बेहतर होता की आला पुलिस अफसरान और स्वयं प्रदेश के मुखिया ये बताते की पुलिस से जाँच CBI को क्यों देनी पड़ी। जब देनी ही थी तो देर क्यों की?

हम क्यों नही सीखते पुरानी भूलो से, या सीखना चाहते नही। या ये सब नियोजित है??? सरकार, शासन और प्रशासन सभी की विश्वनीयता बेहद खतरे में है। कुछ तो करिये हुक्मरानों।

सरदार सरोवर बाँध और विस्थापन

"सरदार सरोवर बाँध" एक ऐसे विकास का प्रतीक है, जो कुर्बानियाँ देकर ही आता है। इस बाँध के लिये जहाँ एक ओर मध्य प्रदेश के हज़ारों गाँवों को पानी मे समाना पड़ा, वहाँ के रहने वालों को विस्थापित होना पड़ा। वहीं दूसरी ओर गुजरात में अब बिजली बन सकेगी, बहुत सारे उधोगो को पानी मुहैय्या होगा, कुल मिलाकर उधोग-धन्धो को बढ़ावा मिलेगा।

जाहिर है,विस्थापन आसान नही, पीढ़ी दर पीढ़ी चले आये अपने घरों को पानी मे समाते देखना और भी मुश्किल। विरोध स्वाभाविक था,लेकिन परिवर्तन अवश्यसंभावी। मेधा पाटकर जी का लम्बा संघर्ष भी इन्ही विस्थापितों के लिये था। अब जब सरदार सरोवर देश को समर्पित हो चुका है, ये जरूरी है की सरकार देश को ये भी बताये, की कितने लोग सुरक्षित जगहों पर विस्थापित हुये, उनको कितना मुआवजा और क्या सुविधाएं मुहैय्या करवाई?

मेहनतकश था वो हमेशा कफन में रहा....

कभी दबा कभी कुचल गया, बहुत खतरे में रहा
मेहनतकश था वो  हमेशा कफन में रहा

कोई बात थी मुहल्ले में पुलिस उठा ले गयी
कमजोर बेबस सा समाज का जख्म सा रहा

योजनाएं बहुत सी तामील हुई उसके हक की
पर जब भी दिखा उजाले में बस नग्न सा रहा

हकों हुकूक की लड़ाई का वक्त कब था यहाँ
वो जिन्दा दिखता तो था पर दफन सा रहा।

@विक्रम