नरमुण्डों और कंकरीट की सभ्यता है NCR

एक परिंदे की परवाज़ एक बिल्डिंग की खिड़की से धूल भरी फ़िज़ा मे शुरू होती है और दूसरी बिल्डिंग की ऊँचाई नापते-नापते टकराकर दम तोड़ देती है। परिंदे के घोंसले बन्द आपार्टमेंट के वाशरूम की खिड़कियों के मोहताज होते है। जिस रोज़ exhaust लगा। घोसला उजड़ जाता है।

आदमी की सुबह धुआँ छोड़ते बेतरतीब traffic से शुरू हो रेडलाइट लाँघते हुए बस स्टाप या मेट्रो पर आकर नरमुण्डों के झुण्ड मे तब्दील हो जाती है।हर तरफ़ हर जगह छोटा बड़ा, काला गोरा, सादा फैशनेबल हर तरह का मगर भगता हुआ आदमी दिखाई देता है। नज़र और दिमाग़ समय के काँटे पर अटका होता है। रेस ऐसी की जिसका कोई अन्त नहीं। जीत और हार का हिसाब हाई ही नहीं कोई मानक भी नहीं।

एक रेस वो भी हाई जिसमें नौनिहाल दौड़ते है।आपार्टमेंट की लिफ़्ट माँ डाँट खाते हुए, नाश्ता ज़बरन चबाते हुए, भारी भरकम बैग का बोझ उठाते हुए, तेज़ चलकर बस मेन चढ़ जाने की जुगत भिड़ाते हुए। वो भी ऐसी रेस में है तमाम अवसादों और तमाम विवादों पर जाकर ख़त्म होती है।


आज़ादी के 7 दशक तड़ीपार हुये।रोज़ी और रोटी का संकट बरक़रार है। नौकरियाँ और आर्थिक विकास गिनी चुनी जगहों पर केन्द्रित है। वैकल्पिक आर्थिक केन्द्र का सपना है। ऐसे में दिल्ली, नोयड़ा जैसे शहरों का नरमुण्ड संस्कृति बन जाना अवशसंभावी है।लुटीयन दिल्ली के हुक्काम, तमाम राजनीतिक समीकरण साधने मे व्यस्त है।कभी मंदिरो, मस्जिद के नाम पर, कभी जाति और सांस्कृतिक गौरव के नाम पर। नैतिकता और मूल्य शपथगृहण साथ शुरू और ख़त्म हो जाते है।

The country is power hugry

हम IOT युग को जी रहे है। Connected होने की मुहर हमारे हाथ, जेब और कलाइयों में अंकित है जेब में मोबाइल, घर में Alexa, मोबाइल में Siri, google Assitant, कम्प्यूटर में Cortana, हमारी आवाज़ मात्र सुनकर काम करने को आतुर फिरते है। 

आकाशगंगा में पृथ्वी का चक्कर काटते तमाम उपग्रह अनवरत डाटा फेंक रहे है, धरती की छाती पर गढ़े तमाम cellular टावर आपके मोबाइल को अनवरत स्कैन कर रहे है, घर में wi-fi, zigbee, BLE का बड़ा network बिछा है। हाथ में बँधा बैंड आपकी क़दमताल और धड़कनो की चाल को नापता है। क़ानून के हाथों से लम्बा google आपके हर आवागमन का ख़ाका खींच देता है।
उपग्रहों की मदद से इतना सटीक दिशा-निर्देशन करता है कि घाघ से घाघ दिशा का ज्ञान रखने वाला चकरा जाये।

मोबाइल में झाँक कर अमेरिका,यूरोप घूम रहे सोशलमीडियावीर, रिश्तों के पैमानो पर भलेअलग थलग हो डावाँडोल हो, किन्तु आभासी समाजिकता में परमवीरचक्र है। कुल मिलाकर Connectivity ज़रूरत है और connectivity का ईंधन है पावर, लुटीयन दिल्ली वाली नहीं...... तारों में संचरित होती Ohm’s law वाली पॉवर।

इसी connectivity के चक्कर में पूरा देश का देश पावर का भूखा हुआ जाता है। रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डों, छोटे बड़े hotels में पावर स्टोर कर लेने की होड़ है।बच्चा या बड़ा सब के सब हम पावर plug के आसपास मँडराते पाये जाते है। मौक़ा मिलते ही पावर चूस लेने kee जुगत भिड़ाते है, पावर को क़ैद कर जेब में भर लेते है। लिथीयम के तमाम पोलिमर विघटित होकर हमारी जेब क़ैद है। कभी मोबाइल की बैटरी के तौर पर कभी पावर की जमा पूँजी पावर बैंक के रूप में। लिथीयम polymer के कान यदि थोड़ा गर्म हो जाये तो समझ लीजिए जीता जागता बम है। हथगोला, जेबगोला, जो गर हवा हुआ तो वाट आपकी ही लगायेगा। पर तमाम जाने अनजाने ख़तरे उठाते हुये भी हमारी पावर की भूख चरम की ओर है

हम कभी नदियों की धार से, कभी हवायो के बहाव से, कभी सूरज की रोशनी चूसकर पावर का जुगाड़ करते है। फिर उसे लिथीयम ion के तमाम पोलिमर के फ़ॉर्म में जमा करते है। जैसे किसी बैंक में पैसा जमा होता है।पावर जमा करने के और नये जुगाड़ की खोजबींन भी जारी है। कुल मिलाकर connected रहने की जुगत और ज़रूरत में हम पावर के भूखे है। भूख अनवरत बढ़ रही है। power requiremnt per capita इसका सबूत है। 

ताज़गी पैक होकर बासी हुई!!

ज़रा सोचिये, दिमाग़ पर थोड़ा ज़ोर डालिये कि पहली या आख़िरी बार कब आपकी माँ ने सुबह के नाश्ते, दोपहर के भोजन, रात के खाने में बासी खाना खिलाया हो!!! याद आये तो टिप्पणी करिये। पहले पैक्ड पानी का कारोबार भारत में ख़ूब फला फूला।अब सुराही,प्याऊ, नल ग़ायब से हो गये है, बचा है तो बस दुकान की फ़्रीज़ me सज़ा हुआ एक 2 litre का पैक्ड पानी। सैकरीन में से लबरेज़ शीतलपेय। जो रफ्ता-रफ्ता हमारे जीवन के अंग होते चले गये। 

हर बड़ा औधीगिक घराना इस कारोबार में आया और जम गया। इसी तर्ज़ोअन्दाज़ में पैक्ड फ़ूड का कारोबार फलफूल रहा है। आरामतलब ज़िन्दगी की तलाश हमें कहाँ तक ले जायेगी नहीं मालूम।किन्तु वक़्त के साथ ताज़ा, .... बासा होता चला गया और हम बासे में भी ख़ुशियाँ खोजते चले गये। ज़िन्दगी की बढ़ती तमाम व्यस्ततायें भी पैक्ड फ़ूड की जनक रही है। किन्तु अब रफ्ता हम इसे स्वेच्छा से आत्मसात किये जाते है। ये भारतीय संस्कृति का हिस्सा हाल-फ़िलहाल ही बनी है। पहले नहीं थी। हतप्रभ तो तब होना पड़ता है जब भारतीयता और संस्कृति का दोहन कर अपने उत्पाद बेचने वाली कम्पनी भी पैक्ड फ़ूड को प्रमोट करते नहीं थकती।

जो माँ अपने बच्चे को तेज़ बुद्धि और चपल देखना चाहती है वो माँ आज बढ़ी ख़ुशी के साथ बच्चों की सुबह सेरेलक से शुरू करती है। गर्व की अनुभूति के साथ। ताज़े का विकल्प बासा हो सकता है क्या? ताज़ा खाना बनाने के लिये जल्दी सुबह उठकर सभी उपक्रम करने में गुरेज़ ना करने वाली माँ भी आज सेरेलक से नौनिहालो की सुबह शुरू करती है??? मैगी, एप्पी टाइप के तमाम नूडल सुबह, शब हमारी ज़िन्दगी का  हिस्सा और क़िस्सा हुये।

जाने अनजाने में हम बासी खाना, ताज़ा मानकर चबायें जाते है। रूहअफ़जा वाले शर्बत की जगह, सैकरीन से लबरेज़ शीतलपेय ने ले ली। ताज़ा पेठे की जगह बिसकिट और कूक्कीस ने ले ली। 
हालाँकि एक कारोबार बढ़ता है तो साथ ही साथ दूसरे कारोबारो को भी बल मिलता है। खाने पानी की तमाम आधुनिकताओ के चलन में वक़्त के ख़ासकर डॉक्टरी का पेशा एक नया उधोग बन गया हॉस्पिटल भारत के share मार्केट की शोभा है।पाँच सितारा होटल से ज़्यादा महँगे कमरें अब अस्पतालों में मिलते है। लाशों का इलाज दिनो-दिनो चलता रहता है। डॉक्टर का पेशा कुछ यूँ ही की बिना कोई मलामत किये डॉक्टर की बात मानने की विवशता है।

मैं ये सब इस लिये लिख रहा हूँ चूँकि भारत किसानो का देश है। जो आज भी ताज़ादम तरकारी,भाजी और फल उगाता है। ऐसे में पैक्ड फ़ूड पर डिपेंड होते जाना दुरुस्त नज़र नहीं आता।

ये आर्थिक विकास की ज़रूरत सकती, हमारी आराम तलबी की ज़रूरत सकती है, पर सामाजिक  ज़रूरत नहीं है। हम विदेशी संस्कृति को पूरी तरीक़े से कभी अपना नहीं पाये। आधा अपनाना और आधा छोड़ दें आत्मघाती प्रवृत्ति है।