सूरज पर कविता: शाम गोधुलि बेला में ....सब का मन मदमाता है...

सुबह सवेरे उगता सूरज
जग में उजियारा लाता है 
पौधों को भी भोजन देता 
जीवन-चक्र चलाता है।

रंग-बिरंगे फूल हो हर्षित
भौरा भी गाना गाता है 
रफ्ता-रफ्ता छटा बिखेरे 
बाग़ों में जीवन लाता है।

हाड़ कँपाती सर्दी में 
उगकर धीर बँधाता है
ज्यों-ज्यों है चढ़ती त्योंरियाँ
अलाव सा ताप जागता है।

मानव जीवन स्वस्थ्य करें
औषधि सा काम दिखाता है
घोर तिमिर से लड़कर सूरज
नित आशा नयी जागता है।

नदी किनारे कलरव करते
पंछी का झुण्ड बनाता है 
धर्म-कर्म, बहुत सी पूजा 
सूरज भी जीवनदाता है।

शाम गोधुलि बेला में 
सब का मन मदमाता है 
नज़र बचा रोज़ शाम को 
जा नभ में छिप जाता है।
@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित




बेगमजान के साथ 10 बरसातें गुज़री .... स्वयं को और बेगम को मुबारक ...

बीते 13 NOV को 00.00 बजे के बाद मैंने, मेरी सदाबहार “बेगमजान” ने सुपुत्री की निगरानी और Alexa में बजते संगीत के बीच एक केक को हलाल किया। शादी हुये दस बरसातें गुज़री। आज से दस बरसातों पहले (एक दशक) पहले जब “बेगमजान” का ज़िन्दगी के रंगमहल में प्रवेश हुआ था तब मेरा रौलाँ था ..... वक़्त बीता ..... अग्रिमा के समझदार होने के साथ ....मैं अपने ही घर में अल्पसंख्यक हुआ.... मेरा हर दूसरा प्रस्ताव .... 2/3 बहुमत के साथ धड़ाम हुआ। ख़ैर ये व्यंग हुआ......

बाक़ी कहानी पुरानी है ...... सुनहरी है ज़िक्र लाज़िमी है ....हैदराबाद में हुसैन सागर, ओसमान सागर का रास्ता नापता अपनी दुपहिया को हाँकता मैं.... पीछे काला चश्मा चमक़ाये “बेगमजान” वो भी दिन थे। तब मोबाइल झुनझुना हुआ करता था। तस्वीरें खीचने में असमर्थ।


चण्डीगढ़ आये तो अग्रिमा साथ थी .... ख़ैर मैं कार का ड्राइवर बन गया ...... ड्राइवर माने पढ़ा लिखा फ़ुलटाइम ड्राइवर। चण्डीगढ़ में सुखना लेक.... रॉकगार्डन .... और दूसरे तीसरे महीने सवारी .... हिमाचल की ओर निकली कभी कसौली के पहाड़ ... कभी सोलन को चीरते हुये “चैल” कभी शिमला ... कभी नारकण्डा ..... कभी लॉंग ड्राइव पे पिंजौर की ओर ..... एक तरफ़ ड्राइवर विक्रम दूसरी तरफ़ बेगमजान और सुपुत्री पुनः दोनो काला चश्मा चमक़ाये ..... चण्डीगढ़ का सफ़र ख़त्म हुआ।


नॉएडा से उत्तराखण्ड के रास्ते नापे नैनीताल..... रानीखेत....कौसानी .... चकराता इत्यादि पर ज़्यादा नहीं नाप पाये ....भाग दौड़ ज़्यादा रही ...... अब भी है .....


अब दो मूलभूत परिवर्तन आये ...मैं अब ड्राइवर नहीं रहा ..... होता कुछ यूँ है .... अब गाड़ी हाँकती है “बेगमजान” और .... अपना ट्रेडिशनल मोटे लेंस वाला चश्मा लगाये मैं और अग्रिमा .... सैर करते है .... दूसरी तरफ़ अपनी दुकान यानि “अम्माँजान” का आगमन हुआ। अम्माँजान और बेगमजान की ख़ूब जमती है।


बीत दौर शानदार रहा ख़ुशियाँ लम्हों में जी ज़्यादा इंतेज़ार नहीं किया ..... हम यानि बेगमजान, अग्रिमा और विक्रम सचान शानदार सुनहरे सफ़र में रहे ..... आगे का बही खाता बाद में .....ख़ैर बेगमजान को 10 बरस मुबारक कहे तो बात बने ...... मुबारक बेगमजान ....



कविता: मैं भीड़ बनकर जी रहा हूँ ज़िन्दगी की तलाश में...

मैं भीड़ बनकर जी रहा हूँ 
ज़िन्दगी की तलाश में
जीवन की है श्रोत नादियाँ 
ख़ुद ही बेसुध प्यास में।

ज़िन्दगी से इश्क़ में 
हासिल नहीं कुछ भी रहा
वक़्त ने है नब्ज़ थामी
बालिश्तों की माप में 

सूर्य का है तेज़ मद्धिम 
धुन्ध की बढ़ती प्रबलता 
चाँद लगभग छिप गया है
तिमिर के अहसास में।

मैं भीड़ बनकर जी रहा हूँ
ज़िन्दगी की तलाश में।

है गगनचुंबी जो इमारत 
देखिये हासिल है क्या
है अकेलापन बहुत सा 
तनहाईयाँ है साथ में 

मैं भीड़ बनकर जी रहा हूँ
ज़िन्दगी की तलाश में।

चाह की सीमा नहीं है
धरती से आकाश तक
बस समझ का फेर है
बाक़ी सब है पास में 

मैं भीड़ बनकर जी रहा हूँ
ज़िन्दगी की तलाश में।

कर लो चाहे लाख पूजा
पत्थरों के साथ में
है सफलता की डगर 
ख़ुद पे ही विश्वास में।

मैं भीड़ बनकर जी रहा हूँ
ज़िन्दगी की तलाश में।

जो तिमिर में हो प्रबलता
दीप बन जीते चलो
भोर का स्वागत करों
बदलाव की आस में 

मैं भीड़ बनकर जी रहा हूँ
ज़िन्दगी की तलाश में।

@विक्रम
सर्वाधिकार सुरक्षित

ये “दिल्ली यूनिवर्सिटी” नॉर्थ कैम्पस दीवारें है ...

ये “दिल्ली यूनिवर्सिटी” नॉर्थ कैम्पस की दीवारें है ............अमूमन ABVP, NSUI टाइप के संगठनो के पोस्टर से अच्छादित रहती है। .....कुछ रोज़ पहले .....मेरी नज़र दीवार पर बनी इन तस्वीरों पर पड़ी .....  बस मैं .........सोचता रहा कि .... किसी दिन पैदल यात्रा कर तस्वीरों को कैमरे में क़ैद करता हूँ ......आज मौक़ा मिला .......देखिये कि प्रतिभा और रचनात्मकता ज़िन्दा है अभी.....लुटियन दिल्ली जहाँ राजनीति बेहिसाब है .... तमाम सन्देश देती तस्वीरें ..... दीवारों को बेहद सुन्दर और सहज दोनो है बनाती है..... भाईचारे, ज़िम्मेदारियों का सन्देश देती है ....... काश कि दिल्ली में कुछ मेरे अधिकार क्षेत्र में आता ...... तस्वीरें बनाने वाले छात्र -छात्राओं को सम्मानित करता ..... ख़ैर कलाकारों के दर्द को कहते शेर के साथ 
“टके में बिक गयी कारीगरी मेरी  

रोज़ी रोटी मेरी कल-कारख़ाने खा गये”






















जन्मदिन मुबारक बड़े भाई “बृजेंद्र प्रताप सिंह “

कानपुर और प्रयाग वैचारिक और सामाजिक क्रान्तिकारियों की सर ज़मीन रही है अनवरत.....

एक पत्रकार का आलेख, और तमाम ख़बरें जब शब्द दर शब्द .... जब आपकी सोती सम्वेदनाओ को झिझोड दे ... आपको जीवित होने का अहसास दिलाती चले ..... तब समझिये एक और क्रान्तिकारी है जोज़िन्दा कौमो को ज़िन्दाहोने अहसास दिलाता चल रहा है .... 

मैं बात कर रहा हूँ .... 1 नवम्बर को कानपुर में जन्मे, पितातुल्य बड़े भाई ..... मानवीय मूल्यों.. सम्वेदनाओ और सामाजिक सरोकारों के पत्रकार, सम्पादक, “जल ,जंगल और पर्यावरण के योद्दापैरोकारो बृजेंद्र जी की

मेरे जैसे तमाम पाठकों को ....उनकी क़लम हमेशा ज़िन्दा होने का अहसास दिलाती रही...

ईंट के भट्टों में बंधुआ की मानिन्द काम करते मज़दूरों का दर्द हो या ईंट कीमानिन्द ढलते उनके बच्चों का बचपन हो” 

कानपुर के नगर निगम में माननीयो द्वारा लहराई जाती पावर प्लाण्ट की राख से हलकान पाण्डु नदी और मानव और औधोगिक मलवे से हलकानगंगा नदीकी ख़बरें हो 

कानपुर के DBS कॉलेज में प्राचार्य, प्रोफ़ेस्सरो के साथ हाथ उठाकर नदियों को बचाने का संकल्प साधते तमाम छात्र शिक्षक हो ....

गाँव में क़ब्ज़े से मरते तालाबों का दर्द का मुद्दा हो ..... या मौरंग के overload ट्रको se कुचली जाती हमीरपुर रोड और कुचले जाते परिवारों का दर्द हो ...

प्रयाग के संतों द्वारा गंगा पर दाख़िल जनहित याचिकायो ....की आधार ख़बरें या साक्ष्य के तौर पर स्वीकारी जाती ख़बरों का दौर हो 

जलपुरुषराजेंद्र सिंहके साथ क़दमताल करते .... क़दम कभी पाण्डु नदी किनारे, कभी गंगा किनारे ....कभी प्रयाग के संगम किनारे .... आन्दोलन का रूप लेते और जनजागरण कर तमाम आन्दोलन को मुक्कमल करते ..... 

ये बड़े भाई के तमाम सामाजिक सरोकारों का ख़ाका है ....क़लम के निकलती सम्मवेदना है ...


जीवन में तमाम और मुक़ाम हासिल करने की शुभकामनाओं के साथ .... जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाए...